Sunday, June 19, 2022

वे कहते हैं, “बेशर्म के फूल पर लिखो”....!!

 वे कहते हैं, “बेशर्म के फूल पर लिखो”....!!




वे कहते हैं कि कवि महोदय ‛बेशर्म के फूल’ पर कविता लिखो ! हाँ वहीं ‛बेहया’ का फूल ! उन्हें हर लेखक कवि ही लगता है। मैंने अपने आप को कभी कवि नहीं माना। वे ना जाने क्यों मुझे कवि मानते हैं। मैंने उन्हें कई बार कहा कि मैं तो सिर्फ़ थोड़ा बहुत व्यंग्य व समसामयिक विषयों पर ही किबोर्ड चलाता हूँ। मुझसे कवि कर्म का निर्वाह करना मुश्किल होता है। पर वे इसी बात पर अड़े रहते हैं कि मैं तो कविता ही लिखूं और वह भी बेशर्म, अमलतास, गुलमोहर, गेंदा, चमेली, मोंगरा आदि जैसे फूलों पर लिखूं।

पिछले दिनों वे मेरे एक व्यंग्य पर ही भड़क गए। मुझे अपने ओटले पर बुलाकर कहने लगे ;-
‛यह क्या है ?’
मैंने कहा- व्यंग्य है !
यह सुनकर व मेरे व्यंग्य को बगैर पढ़े ही वे कहने लगे कि ‛हमें व्यंग्य-फंग समझ नहीं आता। आपसे कितनी बार कहा कि आप सिर्फ़ फूलों, पहाड़ों, चाँद-सूरज, चंपा-चमेली पर ही कविता लिखा करों।’ ओर अपने ओटले के आसपास वाले बेशर्म, अमलतास, गुलमोहर आदि के फूलों को बतातें हुए कहने लगे कि इन फूलों पर काव्य करों।
आगे कहने लगे ;- “राजनीति, पंथ, मजहब, ईश्वर, दीन-पीन, संविधान, पंथनिरपेक्षता आदि पर आपको कुछ भी लिखनी की कोई जरूरत नहीं है। इनके लिए हमारा सुपारी का डंडा ही ठीक है। इस डंडे की आवाज बहुत बुलंद है। इस डंडे जैसे गहरी आवाज आजकल आपकी कलम में कहाँ होती हैं।”

वे आगे अपनी बात कहते ही गए। इस प्रवाह में वे ऐसी बातें इसलिए कर पा रहे थे क्योंकि इन दिनों आचार संहिता चल रही है। जब भी हमारे देश में आचार संहिता होती है। बेशर्म जैसे फूलों के दिन भी अच्छे दिन की श्रेणी में आ जाते हैं। मेरे जैसा व्यक्ति अब जाए तो जाए कहाँ ? लिखें तो क्या लिखे ! घर में रहो तो आम के अचार के लिए अचार संहिता का पालन करों और घर के बाहर जाओ तो कभी आम व कभी किसी खास आचार संहिता का पालन करो। मुझे कविता लिखना आती नहीं। वे हर बार कविता लिखने को कहते हैं। और अपनी बात में वजन बढ़ाने के लिए सीधे निराला जी का उदाहरण देते है कि उन्होंने भी कुकुरमुत्ते पर कविता लिखी थी। उन्होंने गुलाब व अपने समय के गुलाबचंदो को कभी कोई भाव नहीं दिया। सिर्फ़ इसी ऐतिहासिक साहित्यिक घटना के कारण ही वे भी कह रहे हैं कि मैं भी बेशर्म जैसे फूलों पर कविता लिखूं। और मेरे समय के बेशर्मों को कोई भाव ना दूं।
अब आखिर उन्हें कौन समझाये कि मेरे कवि मन को मेरी पूर्व प्रेमिकाएँ कब का नई दिल्ली व विदेश उड़ा ले गई। अब उस कवि मन को नई दिल्ली व विदेश से वापस लाना मेरे जैसे मध्यवर्गीय लेखक के बस का नहीं रहा है।

खैर, जब तक यह अचार व आचार संहिता का मौसम चलेगा, तब तक बेशर्म के फूलों की कविताओं की मांग आती रहेंगी और जैसे ही फिर मौसम सामान्य होगा, साहित्य की अन्य विधाओं की बहार आना शुरू हो जाऐगी। मुझे पक्का पता है जैसे ही यह मौसम विदा हुआ कि हर बार की तरह वे मुझे अगले पांच साल तक फिर कुछ भी लिखने से कोई टोकाटाकी नहीं करेंगे। वे अगले पांच वर्षों तक अपने अपने ठीये व ओटलों पर निश्चिंत होकर गहरी नींद में लोकतंत्र के मनोहारी काव्य का आनंद लेते रहेंगे....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

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