हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि काल का प्रश्न है, वहीं हिन्दू विवाह एक पवित्र संस्कार की मान्यता रखता है और हम वेद से लेकर रामायण, महाभारत व वर्तमान हिन्दू विवाह के स्वरूप को देखते आ रहे हैं। हिन्दुओं में विवाह अब भी बहुत विचार-विमर्श , गुणों के मिलान व समानताओं को देखकर होता है। मुख्य बात यह है कि वर्तमान हिन्दू विधि व हिंदू संपत्ति विधि अंग्रेजी मानसिकता की बनी हुई है जो कि अधिकांश स्वतंत्रता के पहले व बाद में जो भी हिन्दू विवाह व संपत्ति विभाजन से संबंधित विधि अधिनियमित हुई हिन्दू परिवार, विवाह, संस्कार , मान्यताओं व संबंधों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई। इसमें राजनीतिक लालच व पूर्वाग्रह से ग्रसित भावनाओं से इनमें संशोधन किये जाते रहे हैं। “2004 के बाद के निर्णयों और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन के संदर्भ में, एक महत्वपूर्ण निर्णय 20 दिसंबर, 2004 से पहले किए गए पैतृक संपत्ति के बंटवारे पर था। इस दिनांक से पहले यदि पैतृक संपत्ति का विभाजन कर दिया गया था, तो उसमें बेटियों को अधिकार नहीं मिलेगा, क्योंकि तब लागू पुरानी विधि के अनुसार, बेटों को ही संपत्ति का अधिकार था। 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में समान का अधिकार मिला।" वर्तमान में इस विधि व संपत्ति विभाजन व्यवस्था पर विधायिका, जनप्रतिनिधियों व हिन्दू समाज को गंभीरता से विचार व मंथन करना होगा। हिंदू समाज, परिवार, विवाह, संस्कार व संबंधों की सुरक्षा व इसके महत्व को यथावत रखने के लिए कोई उचित, न्यायसंगत व निर्विवाद विधि व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए। क्योंकि इस विधि के कारण जैसा मेरा पीछले 15 वर्षों से व्यवहारिक अनुभव है व समाज व न्यायालयों में मामले देखते आ रहा हूँ हिंदू समाज के आधार स्तंभ परिवार व विवाह संस्था दिनोंदिन कमजोर हो रहे हैं। आपस में विवाद दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। भाई-बहन, भुआ, मामा आदि के बीच संबंधों में दरारें आने लगी है। संपत्ति के लालच में संबंधों की गरिमा गिर रही है। हिन्दू समाज के लिए भविष्य में यह घातक हो सकता है या फिर कहुँ इसके परिणाम आने शुरू हो गए है। हिंदू समाज को इसके लिए आगे आना होगा। पूरी तरह से नेताओं, विधायिका व न्यायपालिका के भरोसे रहना घातक व अंधेरे में रहना जैसा है। भूमि व्यवस्था व भू राजस्व से संबंधित विभाग व अधिकारियों के भरोसे तो बिल्कुल भी नहीं रहा जा सकता है। इससे संबंधित अधिकारी, विभाग व मंत्रियों को अक्सर देखा गया है कि वे तो इस भयंकर आपदा में निरंतर माल कूटते देखें व लिप्त पाये गए हैं। इसलिए हिन्दू उत्ताराधिकारी व भूमि विभाजन विधि के संबंध में हम हिन्दू समाज को बेटे व बेटियों की पैतृक संपत्ति के अधिकार के विषय में गंभीरता से विचार , मंथन व विमर्श करना ही होगा। इस चुनौती व समस्या पर हिंदू समाज में जल्द से जल्द जागरूकता बढ़ाना बहुत जरुरी है।
आज के नईदुनिया अंक में तो ये सिर्फ़ दो बड़े राजघरानों के संपत्ति विवाद है लेकिन ऐसे कितने ही विवाद हिन्दू समाज में संपत्ति के विभाजन को लेकर निचले न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चल रहे हैं।








