(हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित)
आंदोलनजीवीयों के मन-मस्तिष्क का चक्काजाम हो जाना...
लोकतंत्र के इतिहास में चक्का जाम करना आम बात रही है! पर चक्काजाम करते-करते अपना मन-मस्तिष्क जाम कर लेना भी अब कोई आश्चर्य की बात नहीं रही ! जब हर बात पर हटधर्मिता हो तो फिर जाम की ही नौबत आनी है। लेकिन इस अलोकतांत्रिक विरोध में फिर लोकतंत्र का डंडा भी अवरोध बनता है तो हर्ज कैसा ? क्योंकि जाम को खोलना भी तो लोकतंत्र का कर्तव्य है। इस मतिभ्रम से ग्रसित आंदोलनजीवी के आंदोलन में सड़क का जाम तो खुल भी जाता है पर मन-मस्तिष्क का जाम बड़ी मुश्किल से खुलता है। ओर न ही कोई चिकित्सक इस दिमागी जाम को खोल सकता है।
आंदोलनजीवीयों का मस्तिष्क जाम हुआ तो ऐसे ही नहीं हुआ। जब मुफ्त का माल भरपेट मिले तो फिर स्वभाविक है कि मन भी “माले मुफ्त दिले बेरहम” की कहावत के मार्ग पर चल पड़ता है। जिस चक्काजाम में मुफ्त में भरपेट काजू , बदाम व पिज्जा मिले उससे तो मन मस्तिष्क का जाम होना ही था। अब जब उनके तन-बदन में मुफ्त चक्काजाम लगा तो उनकी बुद्धि ऊपर-नीचे , आगे-पीछे से आग बरसाने लगी। इस आग में सड़क पर चलती-खड़ी गाड़ियां, सरकारी संपत्ति तो जली ही, पर साथ ही आंदोलन की आग भी ओर भभक गई। इसमें उनके अपने झंडे झुलसे अलग। ओर फिर क्या था ! इस आग में राजनीति की रोटी जमकर सेकीं गई। इस राजनीतिक रसोई में कितनों के ही हाथ भी जले ओर लोकतंत्र के स्तंभ पर एकबार फिर आँच आई। गनीमत है कि “खेत पर काम कर रहे किसानों ने इस आग में पानी फेर कर आखिरकार आंदोलनजीवीयों को ठंडा कर दिया।”
अबतक दो तीन बार इस आग को ठंडा किया जा चुका है। लेकिन यदि बुद्धि पर चक्काजाम लग जाए तो फिर कैसी बुद्धिमानी की बात ! उन्हें तो अपनी ही मन की बात माननी है। वे किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं। वहीं जनता कितनी बार ही उन्हें मन से मतदान करके बता चुकी है कि अब आपके अच्छे दिन नहीं रहें। आपका सारा सामाजिक-राजनीतिक पुण्य स्वीस बैंक में सड़ रहा है। प्रभु अब आप हरिद्वार की ओर प्रस्थान करो। आपने बहुत विकास कर लिया ! अब आप लोकतांत्रिक तरीकों से खाते जिमते गठीया गये हो। आपके मस्तिष्क के सारे कलपुर्जे जाम हो गए हैं आप चक्काजाम के चक्कर में मती ही पड़ो। पर वे ठहरे ढीट। वे कहाँ मानने वाले थे। चक्काजाम करने के चक्कर में बुढापे में एक दो ओर अंगों को जाम कराकर ही मानेगें।
उनके मस्तिष्क पर सवार हुए इस चक्काजाम का जुनून यहां तक सर चढ़ा कि उन्होंने अपने ही घर के रास्ते अवरुद्ध कर लिये। चक्काजाम की खुशी में रात को उन्होंने खुब जाम छलकाए ओर अपने चेले चपाटों के साथ नगर को भी देर रात तक जमकर जाम किया। गलती उनकी नहीं है। यह फ्री की आदत का कमाल है। मुझे अब समझ आया कि सरकारें मुफ्त राशन व सरकारी छूट का कार्ड क्यों खेलती है। “उन्हें जनता के मन मस्तिष्क का आसानी से चक्काजाम करने का मार्ग मिल जाता है।” जिससे नेता हमेशा विकास का मार्ग बताते नहीं थकते ! जब “सरकार ने ही तुम्हारी बुद्धि पर मुफ्त की रेवड़ीयों से चक्काजाम लगा रखा है तो तुम क्यों थक रहे हो दिखावे के विरोध में ?
आखिर में उन्हें सिर्फ़ चक्काजाम करना था कर दिया ओर फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर पर जमकर चक्काजाम के फोटो-विडियों से सोशल मीडिया पर चक्काजाम करना था सो भी कर दिया। जिससे कि दिल्ली के उनके चचा यह सब देख सके ! वहीं अगले दिन भोर में ही अखबार बाँटने वाले के पास पहुंच गए अपनी बासी खबर देखने। लेकिन उनके जमाये जाजम का कोई नतीजा नहीं निकला। क्योंकि उनकी चक्काजाम बुद्धि को अबतक भी यह पता नहीं है कि मामला जज साहब के पास लंबित है ओर जिसके लिए चक्काजाम कर रहे हैं वह अपने खेत पर काम कर रहा है। ओर इन दोनों से ये बहुत दूर है। इनको चक्काजाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इनके विवेक का ही चक्का जाम है। अब इनसे विवेक की आशा कैसे करें ? मुफ्त का खाने से मन-मस्तिष्क पर चक्काजाम जो लग गया है..!!
#चक्काजाम #आंदोलनजीवी
भूपेंद्र भारतीय

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