Wednesday, June 9, 2021

वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!

 वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!


कार्टून गुगल से साभार



वैसे तो यह युग इंटरनेट के माध्यम से मोबाईल-क्रांति का हो गया है, फिर भी राजनीति में हाशिये पर आ गए एक दल के कुछ बचे कुचे वरिष्ठ वयोवृद्ध नेता अब भी पत्र लिखना जानते है ! जहां आज की युवा पीढ़ी वाट्सएप भाषा शैली में तीन शब्दों में एक पत्र का सारा कच्चा चिट्ठा बयां कर देती है ओर संदेश को पूर्ण आहुति दे देती है। फिर भी आत्मा की आवाज़ सुनकर व बची कुची राजनीति को दाव पर लगाकर इन तथाकथित वरिष्ठ वयोवृद्ध नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपने दल की रानी साहिबा को सत्ता से विहीन होने के दर्द में अब कही जाकर एक पत्र लिखकर ‛पत्रचार' किया। जो मोटे-मोटे तौर पर कुछ इस तरह से कागज़ पर उतरा:-     
                                                  इस पत्र में दल की दुर्दशा के बारे मे कम ओर अपनी दिशा-दशा पर वरिष्ठ सदस्य खुल कर बोले होगे। रानी साहिबा से दल की वस्तुस्थिति पर सिर्फ़ भूरी-भूरी तौर पर चिंता व्यक्त की होगी, क्योंकि रानी से प्रश्न तो कोई पुछ सकते नहीं। वैसे ही जैसे बिल्ली के गले में घंटी बांधे कैसे और कौन ? इस पत्र में रानी के पुत्र की अयोग्यता पर भी दबी-दबी जुबान मे बातें कहीं गई होगी, “पर रानी ने इस बात पर वरिष्ठों के कान मरोड़ दिये होगें !” वरिष्ठ नेताओं मे कुछ फुलटाइम वकालत करने वाले भी है उन्हें रानी के पारिवारिक कानून के तहत दोषी ठहराकर दंड दिया गया है, ऐसा सूत्रों से पता चला है ।

इन वयोवृद्ध वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने पत्र सिर्फ़ दल का कल्याण चाहने की मनसा से लिखा होगा न कि अपना ! इसमें मुझे भारी संशय है! लेकिन हर बार की तरह रानी ने इसे अपने परिवार के खिलाफ षड्यंत्र समझा होगा ओर फिर रानी ने पत्र पर बगैर किसी चिंतन-मनन के एकतरफा एक ही दिन में फैसला कर लिया कि वे स्वयं फिर अगले छः माह तक दल की रानी साहिबा बनी रहेगी । एक दो सदस्यों ने दल के आंतरिक लोकतंत्र व सूचिता की भी बात इस पत्र में उठाई होगी, पर उस पर रानी ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा- “हमें लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाये, हमारे परिवार ने लोकतंत्र की देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक पुजा-पाठ की है!”


वैसे पत्र लिखने की परंपरा रानी साहिबा के परिवार में बहुत पुरानी है। इनके एक पूर्वज अपनी पुत्री को जेल में से पत्र लिखते थे ओर उन पत्राचारों मे देश-दुनिया की खबर देतें थे। लेकिन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का पत्र गलती से रानी साहिबा के ही परिवार की खबर लेता होगा ! जो कि रानी के लिए नाराजग़ी का विषय बन गया होगा। ओर इसके ही कारण रानी की नाक चण गई होगी ! ‛नाक’ की बात से याद आया, “रानी की पुत्री राजकुमारी की नाक अपनी दादी की नाक से मिलती है, इसके ही दम पर कुछ दिनों से राजकुमारी दल मे दमखम रखना चाहती है !” ओर रानी साहिबा के बुजुर्ग दल का नाक के दम पर नेतृत्व करना चाहती है !

खैर रानी साहिबा ने पत्र का सरसरी तौर पर अध्ययन किया होगा ओर यह पाया होगा कि “ये सत्ता के लालची वयोवृद्ध कार्यकर्ता सत्ताधारी दल से मिले हुए हैं, इनकी आपस में मिलीभगत है!” रानी के ‛चिरकुट युवा पुत्र’ ने भी वरिष्ठ सदस्यों पर आरोप लगाया होगा कि इनकी दूसरे दल से मिलीभगत है। ओर इसी के आधार पर रानी ने पत्र को कागज़-पत्तर समझकर फाईलों में दबा दिया होगा। शायद इसलिए ही अपने कुनबे पर आंच न आये रानी ने फिर अपना चलताऊ निर्णय सुना दिया कि अभी वे पत्र का छः माह तक ओर गहन अध्ययन करेगी, ओर फिर वे स्वंय भी एक पत्र लिखेगी ! जैसे दुनिया उम्मीद पर टीकी है, वैसे ही इस दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता पगड़ी बांधकर मंच सजाये बैठ गए हैं, कि चलों शायद रानी साहिबा का अगले छः माह बाद आने वाले पत्र में इस वयोवृद्ध वरिष्ठ नेताओं के दल को कोई नया राजकुमार-राजकुमारी मिल जाए।

ओर अंत में जब लेखक इन सब बातों की कल्पना कर रहा था, तो न जाने क्यों लेखक के मन में बाबा नागार्जुन की लिखी कविता ‛आओ रानी’ की पंक्तियाँ घनघना रही थी !!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !!



भूपेन्द्र भारतीय


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर। अब आपके आलेख एक जगह पढ़ने को मिल जाया करेंगे।

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  2. आभार प्रोफेसर साहब। स्वागत है। मार्गदर्शन बना रहे। 🌻

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है आपने 🌻👌

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    1. आभार उत्साहवर्धन के लिए 🌻🙏

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