Tuesday, July 6, 2021

व्यस्त लोगों की दुनिया....!!

 

नईदुनिया अधबीच में प्रकाशित....


 व्यस्त लोगों की दुनिया....!!


व्यस्त लोगों की दुनिया भी विचित्र घटनाओं से भरी चलती है। आप वर्तमान समय में व्यस्त भले न हो पर लोगों की नज़र में दिखना जरूर चाहिए। आपका कोई मित्र आपसे घर मिलने आये और आप उसको सीधे फोकटिया टाईप टीवी देखते मिल जाओ ! आपकी कोई इज्ज़त नहीं करेगा। लेकिन आप बाथरूम में हो ओर आपकी पत्नी आपके मित्र से कहें कि ‛भय्या वे तो अभी पुजा कर रहे है’ ! “यहीं बात आपके सम्मान में चार चाँद लगा देगी।" मित्र भी सोचने लगेंगा !, “ये आजकल भक्ति-भाव में कितना व्यस्त रहता है।”

मेरे एक मित्र ने व्यस्त दिखने के लिए अपने घर की छत पर एक छोटी-सी वाटिका तैयार कर ली। एक दिन उसी मित्र से मिलने गया। “भले ने मिलने के लिए एक घंटा प्रतिक्षा करवाई !” ओर ऊपर से कहता है क्षमा करना यार, आजकल व्यस्तता बढ़ गई है। इतने सारे काम हो गए हैं कि पता ही नहीं चलता दिन कैसे निकल जाता है। ऊपर से इन पौधों का भी ध्यान मुझे ही रखना पड़ता हैं ! ‛हमारे घर में सभी बहुत व्यस्त रहते हैं।’ जो कि सारे मोहल्ले को पता है, “भला पत्नी की नौकरी पर ही सारे मजे छान रहा है।” दिनभर घर के ही काम में व्यस्त रहकर आराम फरमाता है। शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि “काम कोड़ी का नी और फुर्सत घड़ी भर की नहीं।”

ऐसे ही घरघुस्सू व्यस्त श्रीमानों के रखरखाव के लिए सरकारों को आगे चलकर “बिजी बंदों का रखरखाव” जैसी योजना बनाना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं होना होगा। कुछ व्यस्त लोग गलती से कभी कहीं घर से बाहर निकल जाये, तो पुरी दुनिया इनकों आफत लगती है। हर चीज में ये नुक्स निकालेंगे। सड़क पर कचरा दिखा तो सरकार को कोसेंगे, गाय इनके रास्ते में आ गई तो गौ रक्षकों को गाली देगें, सड़क पर ट्राफिक है तो पूंजीवादियों को बुरा-बुरा कहेंगे, गतिरोधक आ गया तो पड़ोसी की माँ-बहन करेंगे, अचानक से बारिश होने लगे तो सीधे इन्द्र देव को ही दो चार गाली बक देते हैं ! न जाने क्यों इन व्यस्त जैसे दिखने वालें लोगों को हर एक बात से परेशानी होती है ? मौसम व प्रकृति तक को ये अपनी प्रतिक्रियाओं से नहीं छोड़ते हैं !

फिर भी समाज में इनकी बड़ी इज्ज़त रहती है ! इन्हें फोन करो तो फटाक से कहते है, “अभी बिजी हूँ थोड़ी देर से लगाता हूँ !” इनके जैसों के बारें में सोचकर लगता है कि कहीं ‛बिजी’ शब्द, “लेजी” का पर्यायवाची तो नहीं हो गया है ? किसी भी जगह या कार्यक्रम में देर से पहुंचना इनकी व्यस्तता का पैमाना है। इन्हें लगता है कि देर से पहुंचने पर लोग इज्ज़त करते हैं। “जैसे नेताओं के देर से आने की आदत के कारण उनका मान-सम्मान होता है ! और उन्हें बड़ा आदमी माना जाता है।”

“व्यस्त रहो और मस्त रहो”, नारें का असली आनंद यही ‛व्यस्त’ रहने वाले महामानव ले रहे हैं। ऐसे ही व्यस्त लोगों से हमारे देश के सरकारी भवन भरें पड़े। शिक्षा संस्थानों के आसपास घांस काटते ऐसे “व्यस्ततम्” नौजवान आसानी से देखें जा सकते है। इनकी व्यस्त दिनचर्या में सरकारी फाईलों को तकिया बनाकर व्यस्तता को जीवंत रखा जाता है।

आजकल तो व्यस्तता का पावर-पैक हर किसी ने अपने मोबाइल में डलवा लिया है। ऐसा लगता है जैसे दसों दिशाओं में कुकुरमुत्तों की तरह व्यस्त लोगों का खेला हो रहा है। इनकी व्यस्तता जंगल के उस सरपंच(बंदर) की तरह है जो एक डाल से दूसरी डाल पर दिनभर कूदा-फाँदी ही करता रहता है लेकिन उसकी नीयत सभी जानते है।
खैर, आजकल की इस “व्यस्त” दिनचर्या में मानव आखिर कितना व्यस्त रहे और कितना दिखें, यह शोध का विषय है ! पर शोध में भी बौद्धिक परिश्रम लगता है और ऐसे में व्यस्तता की मस्ती से फुर्सत मिले तो कुछ ओर सोचें....!!


भूपेन्द्र भारतीय 


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