शांतिदूतों की दुनिया....!!
हरिभूमि में प्रकाशित....
बर्तनों का क्या है बजते ही रहते हैं। इनके बजने से क्या हम विश्व शांति की बात करना छोड़ दें ? जब तक अपने ही घर से शांति की बात करना शुरू नहीं करेंगे तो फिर विश्व शांतिदूत कैसे कहलाऐगे! हम शांति की तख्तियां लेकर राजमार्ग पर निकल चुके हैं। हम किसी वाद-विवाद में अपनी मनोहारी शांतिलाल वाली छवि गवाना नहीं चाहते। राष्ट्रीय ही नहीं हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांतिवार्ताओं में शिरकत करना है। भला इन छोटे मोटे ठीकरों की ठें-ठें से हम विचलित होने वाले है ? हम बंदूक की गोली से नहीं, अपनी वाचाल बोली से विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त करेंगे। हमें कोई माई और न ही उसका कोई लाल अपनी शांतिप्रिय कार्यों के लिए नहीं रोक सकता है।
हम ऐसी भाषा के जानकार है जिससे बड़े-बड़े मंच एक झटके में जम सकते है। हमें टीवी बहसों में बतौर मुख्य वक्ता ऐसे ही नहीं बुलाया जाता है ! हमें शांति-वार्ता करने का लंबा अनुभव है। इसकी शुरुआत हमने सबसे पहले अपनी प्रेयसी से ही की थी। हमारी प्रेमिका ने ही हमें शांतिवार्ताओं का गुढ़ रहस्य बताया था और फिर हम उनकी वार्ताओं में नियमित शामिल होकर शांतिदूत कहलाने के सारे तौर-तरीके सीख गए। अब तो हम इस विधा में इतने कुशल हो गए है कि दो देशों के बीच शांतिवार्ता तो छोड़ो, हम दो धुरविरोधी पड़ोसियों के बीच शांतिवार्ता करा दे ! आजकल तो हमारी इस विधा का जलवा इतना है कि हम दो कट्टर विरोधी महिलाओं के बीच शांतिवार्ता सम्पन्न करा देते है। वो हम ही तो थे ! जिन्होंने शीतयुद्ध में भी शांति की मशालें थामें रखी थी। जिससे नये-नये देशों का निर्माण हुआ ! ‛गुटनिरपेक्षता’ नीति हमारे ही द्वारा तैयार किये गए पाठ्यक्रम का भाग रही है।
“गंगा-जमुना तहजीब” का पाठ हम ही तो अपनी कक्षाओं में सरपट पढ़ाते रहें है। हमने ही सर्वप्रथम हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा अपने पठ्ठो को दिया था और फिर हमारे पठ्ठो ने इस नारे के बदोलत ही चीन की दीवार पर मेरॉथन दौड़ लगाते शांतिदूतों का वैश्विक तमगा प्राप्त किया। हमारे पढ़ाये छात्र संयुक्त राष्ट्र में शांतिदूत बन गये। किसी भी विश्व मंच पर हमारे विश्वविद्यालय से निकले बुद्धिजीवी ही शांतिवार्ताओं की सर्वप्रथम पहल करते हैं। अब इससे ज्यादा अपनी विश्व शांतिप्रियता व वैश्विक छवि की बात कैसे करें !
हमने कितनी ही बार वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ विश्व साहित्य पर चर्चा में भाग लिया है। वैश्विक शिष्ठ मंडलों का प्रतिनिधित्व हमने ऐसे ही नहीं किया है। संसदीय दलों का नेता प्रतिनिधि बनकर हम विश्व के कितने ही देशों की यात्रा कर चुकें है। शांतिवार्ताओं में हुए खर्चों के हम आजतक किसी संस्था के दो रूपये के दगेलदार नहीं है। हम हर शांतिवार्ताओं की यात्राओं पर अपने ही खर्चें पर गए है। किसी सरकारी यात्रा का हम पर अबतक कोई प्रभाव नहीं रहा है ! हम विश्व शांतिदूत का पुण्य कार्य अपनी आत्मशांति के लिए करते है न कि किसी लालच के वशीभूत होकर। नारायण-नारायण करते शांतिदूत के रूप में हम कहीं भी पहुंच जाते है।
हर गाँव के ओटले पर बैठी हम पंच-परमेश्वरों की सभा शांतिदूतों का ही प्रतिनिधित्व करती है। हमारे ही कारण गाँव का हर काम शांति से सम्पन्न होता है। हम अपने गाँव में तो शांति बनाये रखते ही है, आस-पड़ोस के गांवों में भी शांतिदूत बनकर आते-जाते रहते हैं। हम ऐसे ही “लोकल से वोकल” तक अपने शांति के उत्पाद बेचते रहते है। हमारे ही शांतिदूतों के करकमलों से दुनिया में अमन-चैन फलता-फूलता रहता है। शहरों में भी हमने कई शांति के मठ खोल रखे है। इन शांतिमठों हमारे ही मठाधीश शांति से अलग-अलग शांति यज्ञ सम्पन्न करते रहते हैं। इन शांतिमठों में हमारे शांतिदूत नियमित शांति पाठ भी करते हैं। जिससे पूरे शहर का वातावरण शांतिमय बना रहता है।
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com

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