मंच की लहर को ‛मिस’ कर रहा था....!!
| नईदुनिया के अधबीच में... |
कोरोना विषाणु की दो लहरों ने एकदम घरघुस्सू बना दिया है। इस क्वॉरेंटाइन समय में मैंने सबसे ज्यादा मंचीय लहर को “मिस” किया। कोरोना से पहले कैसे कैसे मंचीय आयोजन होते थे और इन आयोजनों में कितने अद्भुत मंच सजते थे। अंतरराष्ट्रीय मंच से लेकर गली मोहल्लों के मंचों का अपना ही रंग रहता था। इन मंचों से आती भाती-भाती की लहरों से आजतक कौन बचा है ! वैसे कोरोना काल में आनलाईन मंचों से भी बहुत सारी उलटी-सुलटी लहरें निकली, लेकिन इन लहरों का काल अल्पकाल का ही रहा। अब जब कि कोरोना से तीसरी लहर की उम्मीद कम ही है तो विभिन्न ऑफलाईन मंचों से अद्भुत लहरें आना शुरू हो गई है। मेरे जैसा मंच प्रेमी तो इन लहरों की कब से बाट देख रहा था !
मंचों में मुझे राजनीतिक मंच सबसे अधिक प्रिय लगते रहे हैं। “राजनीतिक मंचों पर गजब का रंगमंच जमता है !” सफेदझग परिधानों में विराजमान माननीय नेता जी इस मंच की शान होते है ! कैसी आक्रामक व तूफानी लहरें इस मंच से चलती हैं ! एक से बढ़कर एक वक्ता अपनी ओजस्वी वाणी से राजनीतिक मंचों की शोभा बढ़ाते हैं। देश-दुनिया तो क्या ही, अखिल ब्रह्मांड तक इन लहरों से गजगजा सकता है। हर सभा में मंच की ओर से आ रही लहर मानों ऐसी हो जैसे आकाशवाणी हो रही है। कभी विकास की लहर चलती है तो कभी उम्मीदों का तूफान चलने लगता है। आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे-ऐसे शब्द भेदी बाण चलते है, जिससे अंत में बेचारी जनता ही लहुलुहान होती हैं। भरोसे की लहर का तो कहना है क्या ! ऐसी लहर जनता की आंखों में आखिरकार अतिविश्वास की धूल ही झोकती हैं।
मंच से दूसरी सबसे तगड़ी लहर कवि सम्मेलनों में चलती हैं। इस लहर से साहित्य की आत्मा कांप जाती है। वहीं कुछ साहित्यकार कहते हैं इस मंचीय लहर से साहित्य का उत्थान होता है ! ऐसे मंचों से भाषा अपनी लुंगी उठाकर सबसे पहले दौड़ लगाती है। बड़े बड़े दरबारी कवियों का मंच से बांहें फैलाकर काव्य करना, मंचीय कविता का प्रथम श्रृंगार रस होता है। “भले ही कविता में रस हो न हो !” पर इस लहर से पीड़ित जनता का सबसे अधिक मनोरंजन होता है। रस विहीन कवि सम्मेलनों में जनता के लिए “लाफ्टर” की लहर भरपूर होती है। आजकल इस मंच पर ठेका पद्धति आने से इस लहर ने हर गली-मौहल्ले में रस बरसा रखा है।
तीसरी मेरी पसंदीदा लहर “अकादमिक लहर” है। मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में ही यह लहर चलती है। यह बड़ी ही लचीली व कोमल-कमनीय होती है ! अकादमिक मंच की लहर पहली नजर में बड़ी ही शालीन व सुहानी लगती है ! पर यह लहर कुछ देर बाद असर करती है। कभी कभी तो अकादमिक मंचों की लहरें दस-बीस वर्ष बाद अपना असली चरित्र दिखाती हैं। इस मंच की लहरों से या तो पीढ़ियां तर जाती हैं या फिर पीढ़ियां की पीढियां इस लहर में उड़ जाती हैं। इस मंच पर विराजमान होने वाले अधिकाशतः बौद्धिक प्राणी ही होते है और जो बौद्धिक एक बार इस मंच पर जम जाता है वह इससे बड़ी मुश्किल से उतरता है। इस मंच की लहरें अधिकतर समय चार दिवारी में ही चलती हैं, इसलिए आम जनता को कम ही महसूस होती हैं। लेकिन इस लहर के थपेड़े खाकर अकादमी से बाहर निकला मानव बड़ा लहरबाज़ होता है !
खैर, ऊपर बताई गई तीन प्रमुख मंचीय लहरों के अलावा भी अन्य मंचों की लहरों अपनी ही निराला रंग होता है। इनके अलावा भी जाने कितनी ही तरह की लहरें अलग अलग मंचों से चलती रहती है। सारी लहरों का यहां वर्णन करना पाठक के मन में रसायनिक लौचा कर सकता हैं। मंचीय दुनिया में कभी अपने ही घर से कोई लहर निकलती है, तो कभी मंच पर विराजमान होते समय मंचासीन के स्वयं के अंदर से भी कुछ लहरें चलती रहती हैं। जमाना भरा पड़ा है इन मंचों की लहरों के थपेड़ों से ! वैसे कुछ लहरें अच्छी भी होती हैं। कुछ खट्टी-मीठी, कुछ ठंडी-गर्म भी ! हमने तो वास्तविक रूप में इन दो साल में दो ही लहरों का ही सामना किया है और भगवान बचाएं किसी “तीसरी-चौथी लहर” से ! पर मन बहलाने के लिए मंचीय लहरें चलती रहना चाहिए।
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
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