बाहरी दुनिया से दूर रहना भी जरूरी है....
जनसत्ता
ज्यादा नजदीकी कभी कभी दूरियां बढ़ा देती हैं। बहुत सी चीजें दूर से बहुत सुंदर व आकर्षक लगती हैं। लेकिन जैसे ही हम उसके पास जाते है वह व्यक्ति, पशु-पक्षी, कोई चीज, दृश्य आदि हमें उतना आकर्षक नहीं लगता जितना वह हमें दूर से लग रहा था। जैसे कोई इंसान कभी कभी मिलता है तो अच्छा लगता है, लेकिन रोज रोज मिलने से उसके साथ अच्छा नहीं लगता। वैसे ही जैसे किसी के घर कभी कभी जाओं तो ठीक रहता है लेकिन घड़ी घड़ी जाने से वह व्यक्ति आपका उतना सम्मान नहीं करेगा। क्यों ? क्योंकि यह मानव का प्राकृतिक स्वभाव है कि वह एक सी चीजों व मानव व्यवहार से बहुत जल्दी बोरियत महसूस करने लगता है। वहीं आधुनिक भौतिकवादी जीवन के कारण मानव दिनोंदिन चिड़चिड़ा व एकाकी होता जा रहा है। इसलिए व्यक्ति को बाहरी दुनिया की यात्रा के बजाय कभी कभी अपने जीवन में आंतरिक यात्रा भी करना चाहिए। जिससे कि वह अच्छे से अपना स्वयं का बेहतर मूल्यांकन कर सकें।
बाहर की या कहें कि भौतिक दुनिया को जानने के साथ-साथ ही उसे अपने आप को भी जानना समझना चाहिए। बाहरी दुनिया से एक निश्चित व सामान्य दूरी बनाये रखते हुए मानव को अपनी आत्मा व मन के अधिक नजदीक रहना चाहिए। उसे योग, स्वाध्याय, ध्यान आदि के माध्यम से अपने आप के पास भी रहना चाहिए। अधिकांश शास्त्रों में कहा गया है कि मानव के अंदर ही सारा ब्रह्मांड है, यदि वह बाह्य दुनिया के झूठे आकर्षण में नहीं फंसे तो। शायद इसे ही विद्वानों ने स्व की खोज कहा है। पुरूष से पुरूषोत्तम बनने की यात्रा में स्वयं को अच्छे से जानना बहुत जरुरी है।
इस आंतरिक यात्रा पर अधिकांश ऐतिहासिक ग्रंथों ने विस्तार से कहा है। सनातन व भारतीय संस्कृति में तो कितने ही ऋषि मुनियों व विद्वानों ने अपना संपूर्ण जीवन इस आंतरिक यात्रा के चरम बिंदुओं पर पहुंचने के लिए तपस्या व योग करते हुए व्यतीत कर दिया। जितने भी धर्म, पंथ, विचारधाराओं के सच्चे अनुयायी रहें हैं उन्होंने सबसे पहले योग, ध्यान व स्वाध्याय के माध्यम से ज्ञान व सत्य की प्राप्ति इसी आंतरिक यात्रा के माध्यम से की है।
वर्तमान में भौतिकता के मोहपाश के कारण हर कोई अपने आप को ही नहीं समझ पा रहा है। अधिकांश लोगों को उनके जीवन का ना तो उद्देश्य पता है और न ही अपना लक्ष्य । वर्तमान युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, मोबाइल व भौतिक सुख सुविधा युक्त साधनों की संपन्नता को ही जीवन का अंतिम सत्य व लक्ष्य मान रही है। उसने प्रकृति व स्वयं से अपने आप का संबंध विच्छेद कर लिया है। वर्तमान युवाओं का मन बाहरी दुनिया के झूठे आकर्षण में ऐसा फंस गया है कि छोटी छोटी बातों व संघर्षों के आगे हारकर व हताश होकर वह आत्महत्या करने लग गया है। ऐसे में यह बहुत जरुरी हो गया है कि व्यक्ति सबसे पहले वर्तमान दुनिया के बाहरी आवरण से बाहर निकले व सबसे पहले स्वयं को पहचाने। अपने स्व की खोज करें। व्यवहारिक ज्ञान व जीवन के अनुभव को जानने तथा सीखने की कोशिश करें। वह सिर्फ़ ध्यान, योग, स्वाध्याय तथा अपने हिस्से में आये कर्म को करके ही प्राप्त किया जा सकता है।
अतः व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कुछ समय स्वयं के लिए जरूर निकाले। स्वयं को जानने के लिए वह योग, स्वाध्याय, ध्यान, प्रातःकाल लंबा घुमना, सामाजिक संबंधों में मधुरता रखना, प्रकृति के समीप रहकर आदि क्रियाएं करके वह अपने मन को शांत कर सकता है। और इस शांत मन के समय में ही उसे सहजता से आत्मचिंतन के द्वारा उसे अपने जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य आसानी से पता चल सकता है। वर्तमान की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये शांत पल ही मानव के लिए बाहरी दुनिया के भौतिकवादी जाल से बाहर निकलने का सबसे आसान तरीका है।
भूपेन्द्र भारतीय
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