‛अच्छा आदमी’ बनने की यात्रा में ....!!
अमर उजाला में...
अच्छा आदमी क्या होता है मुझे अपने जीवन में कुछ दिनों पहले ही पता चला। किसी आदमी को जनता भला व अच्छा आदमी क्यों कहती हैं, यह जानना व समझना मेरे लिए किसी रहस्य के खुलासे से कम नहीं रहा ! मैं अक्सर आम आदमी से सुनता था कि वो फ़लाँ आदमी बहुत अच्छा है। लेकिन उस फ़लाँ आदमी की अच्छाई के मापदंड मुझे अब जाकर ज्ञात हुए। इन मापदंडों का पालन करके मैं भी कुछ कुछ अच्छा आदमी बन पाया। वैसे मुझे अच्छा आदमी बनने में परेशानियाँ तो बहुत आई, पर अच्छा आदमी बनना कोई छोटी बात नहीं है। उससे मुझे कई लाभ हुए। आभासी दुनिया के लोग मुझे अच्छे से पहचानने लग गए। मुझे कई तरह के आयोजनों, कार्यक्रमों, विवाह-मृत्यु भोज, उद्घाटन समारोह, भूमिपूजन आदि के आमंत्रण के लिए पत्र-पत्रिकाएं आने लगी। मैं अच्छा आदमी बनकर इनमें जाने लगा। अब मैं भला आदमी कहलाने लगा हूँ।
अच्छे आदमी बनने की इस प्रक्रिया में मुझे पहले से बने अच्छे आदमियों से बहुत कुछ सीखना पड़ा। ये वरिष्ठ अच्छे आदमी हर आयोजन की पहली पंक्ति में मुझे खड़े मिले। सफेद झक रंग के कपड़े इनकी पहली पहचान रहती है। इनसे पहचान बढ़ाने के लिए मैं भी इनसे नमस्कार चमत्कार बढ़ाकर आगे की पंक्तियों में खड़े होने लग गया। शुरुआत में थोड़ी धक्का मुक्की करनी पड़ी पर फिर जगह अपने आप मिलने लग गई। अच्छा आदमी जो बन रहा था ! इसी कड़ी में एक बड़ी विदेशी कंपनी का मोबाइल व एक छोटी स्वदेशी कंपनी का मोबाइल अपने हाथों में रखने लग गया। हर आमंत्रण-निमंत्रण में जाने पर उसके फोटो लेता और अगले ही पल दनादन अपने सोशल मीडिया मंच पर अपलोड कर देता। ओर साथ में पंक्तियाँ लिखता कि “आज अच्छे आदमियों के साथ फलां साहब के यहां पहुंचकर आयोजन में गरिमामय उपस्थिति दर्ज की !”
सिर्फ़ इतने से ही मैं अच्छा आदमी नहीं बन पाया हूँ। इसके लिए मुझे बहुत त्याग व तपस्या करनी पड़ी है। अच्छा आदमी बनने के लिए मुझे अपने कार्यालय के भ्रष्टाचार समूह का सदस्य भी बनना पड़ा। उनके हर अच्छे बुरे कर्मों का भागीदार भी बना। अपने वरिष्ठ अधिकारी को खुश रखने के लिए उनके कहे हर काम को बगैर नानुकुर के किया। भ्रष्टाचार के धन को धीरे धीरे छूने से मैं अच्छा आदमी बन पाया। बड़े अधिकारी अब मुझे उनकी रात वाली पार्टियों में बगैर किसी डर के हँसते हँसते बुलाते हैं। पहले मेरे जैसे नकारा व बेकार आदमी के लिए इन पार्टियों में कोई स्थान नहीं था। पहले वे मुझ बुरे आदमी से दूरी बनाकर रहते थे। अब अच्छा आदमी बनने के कारण मेरे साथ सेल्फी लेते हैं।
अच्छा आदमी बनने की राह में मेरा सबसे ज्यादा प्रोत्साहन हमारे कार्यालय के बड़े बाबूजी ने बढ़ाया है। उन्होंने इससे पहले कितनों को ही अच्छा आदमी बना दिया है। किसी काम को कितनी ईमानदारी व कितनी बेईमानी से करना है, यह कला मुझे बड़े बाबूजी के मार्गदर्शन में ही सीखने को मिली। अब मैं हर सरकारी काम को बड़ी कुशलता से करने लग गया हूँ और हर उस आम आदमी की नजर में अच्छा आदमी बन गया, जो सरकारी व्यवस्था से पीड़ित हैं। पहले अधिकारी मुझसे चिढ़ते थे। शिकायती कहकर मेरा काम अटका देते थे। जब से अच्छे आदमी बनने के अटल मार्ग पर अग्रसर हुआ हूँ, सरकारी कार्यालय में मेरी फाईलें फर्राटे से दौड़ती है।
अच्छा आदमी बनना मेरे लिए मेरे आम जीवन के साथ ही घरेलू मामले में भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। जब से मैं अपने घर वालों की हर बात मानने लगा हूँ। जैसे घर की सब्जी लाने से लेकर गेहूं पिसाने, गैस सिलेंडर भरवाने, कचरा गाड़ी में सुबह जल्दी उठकर कचरा फेंकना आदि छोटे छोटे काम करके मैं अपने घर का अच्छा आदमी बन पाया। आप भी ऐसे घरेलू काम करके अपने घर में अच्छा आदमी बन सकते हो। अब मेरे परिवार के भी मुझे अपने घर का सबसे अच्छा आदमी कहने लगे हैं। जब से मैंने अपने घर के बच्चे से बुजुर्ग किसी भी सदस्य की कोई भी बात का बुरा मानना बंद कर दिया है, घर के सभी सदस्य मुझसे बड़ा खुश रहते हैं। अच्छा आदमी बनने की इस यात्रा में मेरे ही घर में मेरा कद बढ़ता जा रहा है। वहीं इस “नवोदित अच्छे आदमी” का अब अपने घर के बाहर भी वारे-न्यारे हो रहें हैं....!!
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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