आज माँ होती तो धीरे से मेरे माथे पर अपना हाथ रखकर कहती, “आज तेरा जनम हुआ था, नवरता की नवमी तिथि की रात को तू पैदा हुआ था।” वैसे हमारे घर में जन्म दिन मनाने की कोई विशेष परंपरा नहीं रही। दादी जब तक जिंदा थी वह भी ऐसे ही धीरे से मुझे पास बुलाकर अपना आशीर्वाद देती थी और बड़े प्यार से कहती थी आज नवमी को तू पैदा हुआ था व अपने पास से कुछ रूपये जन्मदिन पर जरूर देती। मेरा जन्मदिन जब तक माँ जीवित थी तब तक ऐसा ही मना। अब दादी को जाए सात साल हो गए और माँ को इस मृत्युलोक से जाए को 21 महीने व एक दिन हो गया।
अब माँ के नहीं होने पर घर पर आता हूँ लगता है घर के किसी कमरे से माँ अभी निकल आऐंगी ओर पूछने लगेगी, आ गया तू, चाय बना दू। यह सब लिखते हाथ अब भी काँप रहे है। गाँव वाले घर जाता हूँ तो वहां भी लगता है कि दादी अभी अपने कमरे से निकलकर पूछने लगेगी, “आ गया बेटा, इत्ता दन में आयो, अपनी दादी को भूल ही गया है और फिर दोनों हाथों के चुम्मे लेने लगती।"
इन दोनों के जाने के बाद अब घर व मेरा मन एक अजीब खामोशी को ओढ़े रखता है। जो कि घर में पांच बच्चे व बाकी सभी सदस्य भी हैं। लेकिन इस खामोशी को माहेश्वर तिवारी के शब्दों में कहूँ तो....
एक तुम्हारा होना
क्या से क्या कर देता है,
बेजुबान छत दीवारों को घर कर देता है ।
ख़ाली शब्दों में आता है
ऐसे अर्थ पिरोना
गीत बन गया-सा लगता है
घर का कोना-कोना
एक तुम्हारा होना सपनों को स्वर देता है ।
आरोहों-अवरोहों से समझाने लगती हैं
तुमसे जुड़ कर चीज़ें भी बतियाने लगती हैं
एक तुम्हारा होना अपनापन भर देता है ।
माँ जब इस नश्वर संसार से विदा हुई तो मेरी गोद में थी, मेरी गोद में माँ के प्राण निकले। करीब पांच मिनट तक हार्ट अटैक से झूझती रही व बीच बीच में एक ही बात कहती रही की मेरी पांचों बेटियों का ध्यान रखना। वह पल निरंतर आँखों के सामने आता है, शब्दों के माध्यम से कहा नहीं जाता। अटैक ने अस्पताल पहुंचने ही नहीं दिया। आज 21 माह बाद काँपते हाथों से लिखने की हिम्मत कर पाया। माँ पर लिखना मेरे बस का नहीं रहा है। बहुत मुश्किल होता है इस प्रेम को शब्द देना। मैंने लिखना ही प्रेम पत्रों के माध्यम से सीखा है लेकिन माँ-बेटे के प्रेम पर कुछ लिखना मेरी लिए शुरू से ही असंभव रहा है। वैसे भी बेटे के लिए माँ कभी कहाँ कहीं जाती है... माँ जीवनभर बेटे के आसपास ही तो रहती है। माँ का लाड़ ही जीवनभर बेटे के लिए माँ का साथ है। माँ व दादी माँ के लाड पर पूर्ण लिखना किसी कवि के बस का नहीं है...
आज जब यह सब लिख रहा हूँ तो इसके पीछे कल मेरे प्रिय कवियों में से एक चंद्रकांत देवताले जी की कविताओं को पढ़ रहा था तो यकायक “माँ पर नहीं लिख सकता कविता" कविता को पढ़कर ठहर गया...
माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा....!
माँ का जाना फिर भी एक खामोशी-एक शून्य कर गया है। मुझे पता है इस शून्यता को भरना असंभव है। उनकी स्नेहिल स्मृति व लाड ही अब मेरी सबसे बड़ी प्रेम पूंजी है। बाकी बचा, दुनियावी झंझावातों से निपटने का हूनर तो माँ ने मुझे बहुत कम उम्र में ही सीखा दिया था....बड़ा बेटा हूँ ना, बचपन से ही सब बड़ा समझते हैं..! बस माँ के लिए सिर्फ बेटा था। उसके बाद तो बड़ा बेटा, भय्या, मित्र, प्रेमी, पति , पिता, लेखक, अधिवक्ता, प्रोफेसर, भिया, सर...आदि अनादि..!
अपनी इसी अंतिम बात को कृष्णबिहारी ‛नूर' के शब्दों में कहूँ तो....
ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं....!!
©भूपेन्द्र

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