Sunday, March 21, 2021

पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय....!!

      

अमर उजाला समाचार पत्र में...


पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय !


मैं जब भी किसी सरकारी पद के विषय में सोचता हूँ, तो मन पद की लालसा में गदगद हो जाता हैं ! काश मेरे भी पास कोई सरकारी पद होता ! मैं भी सरकारी गाड़ी से क्षेत्र का ‛भ्रमण’ करता। मेरी भी गाड़ी में लाल बत्ती की जगह बड़े-बड़े ‛हूटर’ लगे होते। सपने तो अब भी आते हैं, कि मैं पद पा चुका हूँ और सरकारी बंगले के बगीचें में सुबह सुबह पौधों को पानी दे रहा हूँ, पर पत्नी स्वप्न में से एकदम से जगा देती हैं और कहती हैं ‛उठो प्राणनाथ, “सरकारी नल में जल आ गया है!” पानी भर लो, आज फिर मेरी कमर में दर्द है !’

जब जब पद के बारे में सोचता हूँ तो मन कहता है, काश संविधान में सबके लिए एक ‛सरकारी पद’ होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में “पद जो देखन मैं चला” पद की महिमा अपरम्पार देखी। चपड़ासी से लेकर पंतप्रधान तक पदों के असंख्य प्रकार है। और हर पद के लिए पंक्तियों में खड़े लाखों-करोड़ों बूढ़े-महिला-नौजवान है। पर मुझे तो एक ही पद चाहिए था। काश कैसे भी मिल जाता। कभी-कभी तो अपनी जाति को ही कोसता हूँ कि भला ये भी कोई जाति है ! आरक्षण तक न मिलता इसमें तो, न ही “इसमें कोई भी सरकारी लाभ !” आखिर कब तक सामान्य होने के चक्कर में असमानता का बोझ ढोता रहूंगा ?

अब पद की इस पद-लोलुपता में पागल हुए जा रहा हूँ। कहीं किसी काम में मन नहीं लगता। सरकार भले मुझे सरकारी पद पर वेतन ‛एक रूपया’ दे, पर किसी निगम-मंडल में ही सही पद का कोई छोटा-मोटा प्रभार दे दे ! क्योंकि मैंने सुना है कि सरकारी पद प्रभारी एक रुपया वेतन में भी भत्तों से ही जीवनयापन कर लेता है। और फिर पदासीन होने पर टेबल के नीचें से मिलने वाले आभारों का कोई मोलभाव हो सकता है ? पद की इस सरकारी महिमा का चमत्कार लोकतंत्र के तीनों खंभों के ईर्दगिर्द रहता है। यह भी मैंने लोकतंत्र में अनुभव किया है। बस सबसे बड़ी चुनौती पद प्राप्त करना है। इस चुनौती के चक्कर में अब तक प्रतियोगिता परीक्षाओं के सैकड़ों फार्म भर चुका हूँ ! और मुझे पूरा विश्वास है कि इन सरकारी परीक्षाओं के आवेदनों से ही मैंने व मेरी चीर युवा पीढ़ी ने अबतक सरकार का अच्छा खासा राजस्व बढ़ा दिया होगा।

मेरे कुछ साथियों ने पद पाने के लिए अपनी रीढ़ की हड्डी तक निकलवा ली और अच्छा खासे पद प्राप्त कर लिये। एक मैं ही मूर्ख हूँ जो अबतक स्वाभिमान के चक्कर में ’आत्मनिर्भर’ नहीं बन पा रहा हूँ। मैंने देखा है सरकारी पद्जीवी बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बन जाता है। किसी से पूछा यह चमत्कार कैसे होता है तो बोले, “आपकी आय के स्त्रोतों में दोतरफ़ा वृद्धि हो जाती हैं ! “डबल इंजन की सरकार की तरह”। एक सीधे खाते में, एक टेबल के नीचें से !” कुछ पद तो इतने औजस्वी होते हैं कि उनकी धाक से ही घर में राशन, सब्जी, बच्चों की फीस आसानी से आ जाती हैं।
काश, मेरे भी भाग्य में कोई सरकारी पद होता ! मेरे भी पीछे पीछे गरज करने वाले दुम हिलाते फिरते रहते। मैं भी पद के नशे में चुर रहता, जिससे मुझे अन्य कोई नशा करने पर रुपया खर्च नहीं करना पड़ता। नेता मेरे चुनावी कौशल पर मुग्ध रहते। आस-पड़ोस में धाक रहती। रिश्तों की भरमार रहती। रिटायरमेंट के बाद कोई चिंता न होती। सेवानिवृत्ति के उपरांत किसी आयोग, प्राधिकरण, समिति, जाँच दल का सदस्य तो बन ही जाता !
पर लगता है इस जन्म में पद नहीं मिलने वाला है। आज यदि कबीर साहब होते तो पद के लिए मेरी इस लालसा व दुखड़े पर इतना ही कहते.....
“पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय !
जो कद खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय !!”



भूपेन्द्र भारतीय

Tuesday, March 2, 2021

भारतवर्ष के हृदय में बहती सुंदर सरिता:- माँ नर्मदा

 

एक ऐसी नदी जिसको जितना देखो मन नहीं भरता। इसका जल मानों अमृत। घाटों की बात करो तो शब्दों से इनके सौंदर्य का वर्णन न हो पाए। इस कवितामय सरिता का वर्णन करने में अच्छे-अच्छे कवि व लेखक निःशब्द हो जाए। नर्मदा जी को जब भी देखो यह काव्यात्मक सरिता सी लगती है जिसमे सभी छंद समय-समय पर अपने रंग बिखेरते रहते हैं।


भारत की प्रमुख नदियों में नर्मदा नदी का स्थान है। नदी न कहते हुए अधिकांश लोग माँ नर्मदा जी ही कहते है। नर्मदा जी के किनारे बसे गाँवों के लोग “नर्मदे हर” अभिवादन से ही अपनी बात शुरू करते हैं। नर्मदा नदी का हर घाट अद्भुत सौंदर्य से भरा है। नदी के बहते पानी से संगीतमय ध्वनि आती है। जब भी नदी पर जाओं हर बार स्नान करने का मन होता हैं। मैं सबसे पहले २० वर्ष पहले नर्मदा जी के धारा जी घाट पर अपने दादाजी के साथ गया था। तब से लेकर आज तक बहुत बार इस सौंदर्य की नदी के दर्शन प्राप्त करने का फल प्राप्त हुआ है। बाँधों ने इसके कई घाटों को जलमग्न कर दिया जिससे इसके सौंदर्य को बहुत क्षति पहुंची है।


नर्मदा नदी के तट पर मोहन जोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। भारतीय संस्कृति मूलत:आरण्यक संस्कृति है। नर्मदा तटवर्ती वनों में मार्कण्डेय, भृगु, कपिल, जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मँडराता रहता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा-तट पर ही करनी चाहिए।
इन्हीं ऋषियों में से एक ने नर्मदा का नाम रेवा भी रखा। रेव यानी कूदना। उन्होंने इस नदी को जब चट्टानों में कूदते-फाँदते देखा, तो इसका नाम रेवा रखा। एक अन्य ऋषि ने इस नदी का नाम नर्मदा रखा। नर्म यानी आनन्द। उनके विचार से यह सरिता सुख या आनन्द देने वाली नदी हैं, इसलिए उन्हें नर्मदा नाम ठीक जान पड़ा।
हजारों वर्षों से नर्मदा नदी पौराणिक गाथाओं में स्थान पाती रही। पुराणों में इस पर जितना लिखा गया उतना और किसी नदी पर नहीं। स्कन्दपुराण का रेवा-खंड तो पूरा का पूरा सौंदर्य की नदी नर्मदा जी पर ही है।


नर्मदा, जिसे रेवा के नाम से भी जाना जाता है, मध्य भारत की एक नदी और भारतीय उपमहाद्वीप की पांचवीं सबसे लंबी नदी है। यह गोदावरी नदी और कृष्णा नदी के बाद भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लंबी नदी है। विंध्याचल पर्वत माला व सतपुड़ा के पहाड़ों को चिरती जब यह नदी बहती है मानों कोई क्षत्राणी शत्रु की सेना को तहस-नहस करते सघन वनों में से शर्प की तरह चल रही है। मध्य प्रदेश राज्य में इसके विशाल योगदान के कारण इसे "मध्य प्रदेश की जीवन रेखा" भी कहा जाता है। यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक पारंपरिक सीमा की तरह कार्य करती है। यह अपने उद्गम अमरकंटक से पश्चिम की ओर 1,312 किमी चल(बहकर) कर खंभात की खाड़ी, अरब सागर में जा मिलती है।


नर्मदा हमारे देश की नदियों के बड़े परिवार की एक सदस्या है। लम्बाई के लिहाज से ही इसका नम्बर सातवाँ है। लेकिन इसकी विशेषता इसके जल की मात्रा में नहीं, इसके चट्टानी स्वभाव में है। इसके उन्मत्त प्रपातों में है। इसके प्रपाती दर्रों में है। इसकी सँकरी घाटियों में है, इसके वनों में है, इसके तट पर निवास करती जनजातियों में है और इसके पहाड़ी परिवेश में है। साहस और शौर्य का इतिहास नदियों ने रचा है, वैसा प्रकृति के और किसी घटक ने नहीं रचा। नदियाँ मानो हमसे कहती हैं--राही ! राह कहीं नहीं होती। राह बनाने से बनती है। ऐसे ही साहस का नाम नर्मदा है।


नर्मदा, समूचे विश्व में दिव्य व रहस्यमयी नदी है, इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण के रेवाखंड़ में किया है। विश्व में नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है और पुराणों के अनुसार जहाँ गंगा में स्नान से जो फल मिलता है नर्मदा के दर्शन मात्र से ही उस फल की प्राप्ति होती है। यहां तक कि मार्कांडेय परिक्रमा तो बारह बरस तक चलती हैं। नर्मदा नदी पुरे भारत की प्रमुख नदियों में से एक ही है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।


विगत दिनों जब मैंने अमृतलाल वेगड़ की किताब “तीरे-तीरे नर्मदा” पढ़ी, तो इस पुस्तक में नर्मदा नदी का अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य चित्रण पढ़ने को मिला। यह पुस्तक पढ़ते ऐसा लगता है जैसे लेखक के साथ पाठक भी नर्मदा जी की परिक्रमा कर रहा है। नर्मदा नदी इकलौती नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती हैं। अभी पीछले सप्ताह नर्मदा जी में स्नान करने गये तो परिक्रमावाशीयों का दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्हें देखकर मन ऊर्जा व आस्था से भर गया। वेगड़ जी अपनी पुस्तक में नदी के सौंदर्य का ऐसे चित्र खीचते है मानों जीवंत हो, एक जगह वे लिखते हैं कि:- “रात को नर्मदा की मर्मर ध्वनि बराबर सुनायी देती। प्रायः हर रात कल-कल बहती नर्मदा का रव सुनाई देता। दिन में वह भले ही नर्मदा हो, रात में रेवा है। दिन में वह दृश्य है तो रात में श्रव्य।” ऐसे ही वेगड़ जी इस नदी के अद्भुत सौंदर्य का जीवंत चित्रण अपनी पुस्तक में अपनी नर्मदा परिक्रमा के माध्यम से करते हैं।


सुदूर केरल से आकर एक बालक शंकर ने नर्मदा नदी के सबसे महत्वपूर्ण घाटों में एक ओंकारेश्वर पर गुरु गोविन्दपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वह बालक ओर कोई नहीं आद्य शंकराचार्य थे, जो हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक रहे। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया, वह अनुपम है। ऐसे आद्य शंकराचार्य की पावन स्मृति ओंकारेश्वर से जुड़ी है। “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे!” ( चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा), जैसी महान रचना आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित नर्मदा स्तुति या कहें नर्मदा जी का काव्य के माध्यम से सौंदर्य का चित्रण है।


मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी या कहें कि ऐसी नदी जिसका कंकर-कंकर शंकर है। जिसके हर घाट की अपनी विशेषता है। शायद ही किसी नदी में इतने मोड़, घुमाव, लचक, अल्हड़पन, नैसर्गिक सौंदर्य, कही शांति, तो कहीं पहाड़ों को चिरती हुई सतत बहती यह चिरकुँमारी किसी कविता की सरिता से कम नहीं है। लेकिन पीछले ३० वर्षों में जितना नर्मदा-तट का भूगोल बदला है, उतना इससे पहले २,५०० वर्षों में नहीं बदला होगा। कुछ कुछ यह बात मन को दुखी करती हैं। बाँधों व जंगलों की कटाई से इस नदी के सामने भी आज बहुत से संकट आ खड़े हैं। रेत माफियाओं ने इस सौंदर्य की सरिता का हृदय छलनी कर दिया हो। जिससे कि इसका प्रवाह तो बाधित हुआ ही है। लेकिन आज इसके साथ रहने वाले हजारों जीव जंतुओं पर भी गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। लोकसंस्कृति व प्रकृति को साथ लेकर चलने वाली इस नदी का वास्तविक स्वरूप बना रहे, इसके लिए जनमानस को साथ आना होगा। जिस नदी ने हमेशा से भारतीय लोकजीवन को समृद्ध किया व जीवंत रखा। उस संस्कृति सरिता की ओर भी हमें ध्यान देना चाहिए।



भूपेन्द्र भारतीय

Sunday, February 14, 2021

अंतरात्मा की आवाज़ का जादू...!!

 जब भी चुनाव आता है तो अंतरात्मा की आवाज़ राजनीतिक चरित्र को अंदर से झँझोड़ती है। यह आवाज़ आकाशवाणी की तरह होती हैं। यह आवाज़ जब जब भी आती है। अच्छे भले आदमी का हृदय परिवर्तन करती हैं। राजनीति में यह आवाज़ जनता की सेवा के लिए आती है, तो कभी देशभक्ति के कारण यह आवाज़ नेता जी का हृदय परिवर्तन करती हैं। “जिससे वे अपने मन का मूड बदलकर दल-बदल करते है।” 



यह आवाज़ बहुत बार सरकारी विभागों में भी सुनाई देती हैं। जबतक सरकारी बाबू को यह आवाज़ नहीं आती, वे फाईलों का स्थान नहीं बदलते ! लेकिन जैसे ही जेब गर्म होती हैं, आम आदमी की गरीबी व पीड़ा को देखकर बाबूजी का इस आवाज़ के कारण हृदय परिवर्तन होता हैं। बड़े साहब भी बहुत बार इस आवाज़ के कारण न्याय व समता-समानता की बातें करते हैं। लेकिन जब तक उनके दो-चार बंगले व बैंक बैलेंस की पुरी तरह व्यवस्था न हो, तब तक उन्हें यह आवाज़ सुनने में कठिनाई होती है।


मुझे ऐसा लगता है कि अंतरात्मा की आवाज़ के संबंध में कोई क्रेश कोर्स होना चाहिए। जिससे कि यह कोर्स हर नेता व सरकारी महकमे के लोगों को आसानी से कराया जा सके या उनके प्रशिक्षण के समय इसपर विशेष बल दिया जाए ! इस अंतरात्मा की आवाज़ को यदि कोई रिकॉर्ड कर सके तो क्या कमाल होगा ! प्रतिदिन इसे सरकारी कार्यालयों में ऊंची आवाज़ से आसानी से सुनाया जाए। जैसे कि मंदिर-मस्जिद से आवाज़े आती हैं। जिससे की कितनों के ही हृदय परिवर्तन हो सकते हैं। यह आवाज़ विकास की बहार ला सकती हैं। जिससे कि भारत फिर सोने की चिड़िया बन सकता है।


इस आवाज़ को चुनाव आयोग अनिवार्य रूप से हर दो तीन वर्ष में नेताओं को सुनाये, जिससे की नेताओं के राजनीतिक कद नपे व आयोग चुनाव में व्यस्त रहे । “भले लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी बड़े या न बड़े।” जब भी चुनाव में कोई उम्मीदवार अपना परचा भरे, चुनाव आयोग उसे पहले अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए शपथपत्र मांगें, “कि क्या उम्मीदवार ने अच्छे से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन ली है?” जब भी कोई राजनीतिक दल अपना घोषणा पत्र जारी करें, उसमें अपने पुराने व मार्गदर्शक मंडल में बैठे नेताओं की अंतरात्मा की आवाज़ का स्पष्ट विवरण हो।


इस आवाज़ के बारे में मैं बचपन से सुनते आ रहा हूँ। लेकिन यह आवाज़ मुझे आज तक न अंदर से सुनाई न बाहर से ! हो सकता है इसलिए नहीं आई हो कि मैं किसी तरह के सरकारी विभाग में नहीं हूँ या फिर राजनीति के क्षेत्र में मैंने कोई रूचि नहीं ली। फिर भी इस आवाज़ का जादू मैंने कितनी ही बार देखा है। यदि इस तरह की आवाज़ में आप विश्वास करते हैं तो इसे सुने। अंतरात्मा की आवाज़ के गुणकारी प्रभाव को मद्देनज़र रखते हुए, संसद व सरकारी विभागों में एक अंतरात्मा कक्ष का भी निर्माण होना चाहिए। जिससे कि जब भी किसी को वर्तमानी कोलाहल में अंतरात्मा की आवाज़ सुनने में परेशानी हो, वह इस कक्ष का उपयोग कर सके। जिससे कि राष्ट्र फिर प्रगति व विकास की ओर अग्रसर हो।



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भूपेंद्र भारतीय

Sunday, February 7, 2021

आंदोलनजीवीयों के मन-मस्तिष्क का चक्काजाम हो जाना....!!

 


                       (हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित)


आंदोलनजीवीयों के मन-मस्तिष्क का चक्काजाम हो जाना...


लोकतंत्र के इतिहास में चक्का जाम करना आम बात रही है! पर चक्काजाम करते-करते अपना मन-मस्तिष्क जाम कर लेना भी अब कोई आश्चर्य की बात नहीं रही ! जब हर बात पर हटधर्मिता हो तो फिर जाम की ही नौबत आनी है। लेकिन इस अलोकतांत्रिक विरोध में फिर लोकतंत्र का डंडा भी अवरोध बनता है तो हर्ज कैसा ? क्योंकि जाम को खोलना भी तो लोकतंत्र का कर्तव्य है। इस मतिभ्रम से ग्रसित आंदोलनजीवी के आंदोलन में सड़क का जाम तो खुल भी जाता है पर मन-मस्तिष्क का जाम बड़ी मुश्किल से खुलता है। ओर न ही कोई चिकित्सक इस दिमागी जाम को खोल सकता है।


आंदोलनजीवीयों का मस्तिष्क जाम हुआ तो ऐसे ही नहीं हुआ। जब मुफ्त का माल भरपेट मिले तो फिर स्वभाविक है कि मन भी “माले मुफ्त दिले बेरहम” की कहावत के मार्ग पर चल पड़ता है। जिस चक्काजाम में मुफ्त में भरपेट काजू , बदाम व पिज्जा मिले उससे तो मन मस्तिष्क का जाम होना ही था। अब जब उनके तन-बदन में मुफ्त चक्काजाम लगा तो उनकी बुद्धि ऊपर-नीचे , आगे-पीछे से आग बरसाने लगी। इस आग में सड़क पर चलती-खड़ी गाड़ियां, सरकारी संपत्ति तो जली ही, पर साथ ही आंदोलन की आग भी ओर भभक गई। इसमें उनके अपने झंडे झुलसे अलग। ओर फिर क्या था ! इस आग में राजनीति की रोटी जमकर सेकीं गई। इस राजनीतिक रसोई में कितनों के ही हाथ भी जले ओर लोकतंत्र के स्तंभ पर एकबार फिर आँच आई। गनीमत है कि “खेत पर काम कर रहे किसानों ने इस आग में पानी फेर कर आखिरकार आंदोलनजीवीयों को ठंडा कर दिया।”


अबतक दो तीन बार इस आग को ठंडा किया जा चुका है। लेकिन यदि बुद्धि पर चक्काजाम लग जाए तो फिर कैसी बुद्धिमानी की बात ! उन्हें तो अपनी ही मन की बात माननी है। वे किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं। वहीं जनता कितनी बार ही उन्हें मन से मतदान करके बता चुकी है कि अब आपके अच्छे दिन नहीं रहें। आपका सारा सामाजिक-राजनीतिक पुण्य स्वीस बैंक में सड़ रहा है। प्रभु अब आप हरिद्वार की ओर प्रस्थान करो। आपने बहुत विकास कर लिया ! अब आप लोकतांत्रिक तरीकों से खाते जिमते गठीया गये हो। आपके मस्तिष्क के सारे कलपुर्जे जाम हो गए हैं आप चक्काजाम के चक्कर में मती ही पड़ो। पर वे ठहरे ढीट। वे कहाँ मानने वाले थे। चक्काजाम करने के चक्कर में बुढापे में एक दो ओर अंगों को जाम कराकर ही मानेगें।


उनके मस्तिष्क पर सवार हुए इस चक्काजाम का जुनून यहां तक सर चढ़ा कि उन्होंने अपने ही घर के रास्ते अवरुद्ध कर लिये। चक्काजाम की खुशी में रात को उन्होंने खुब जाम छलकाए ओर अपने चेले चपाटों के साथ नगर को भी देर रात तक जमकर जाम किया। गलती उनकी नहीं है। यह फ्री की आदत का कमाल है। मुझे अब समझ आया कि सरकारें मुफ्त राशन व सरकारी छूट का कार्ड क्यों खेलती है। “उन्हें जनता के मन मस्तिष्क का आसानी से चक्काजाम करने का मार्ग मिल जाता है।” जिससे नेता हमेशा विकास का मार्ग बताते नहीं थकते ! जब “सरकार ने ही तुम्हारी बुद्धि पर मुफ्त की रेवड़ीयों से चक्काजाम लगा रखा है तो तुम क्यों थक रहे हो दिखावे के विरोध में ?


आखिर में उन्हें सिर्फ़ चक्काजाम करना था कर दिया ओर फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर पर जमकर चक्काजाम के फोटो-विडियों से सोशल मीडिया पर चक्काजाम करना था सो भी कर दिया। जिससे कि दिल्ली के उनके चचा यह सब देख सके ! वहीं अगले दिन भोर में ही अखबार बाँटने वाले के पास पहुंच गए अपनी बासी खबर देखने। लेकिन उनके जमाये जाजम का कोई नतीजा नहीं निकला। क्योंकि उनकी चक्काजाम बुद्धि को अबतक भी यह पता नहीं है कि मामला जज साहब के पास लंबित है ओर जिसके लिए चक्काजाम कर रहे हैं वह अपने खेत पर काम कर रहा है। ओर इन दोनों से ये बहुत दूर है। इनको चक्काजाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इनके विवेक का ही चक्का जाम है। अब इनसे विवेक की आशा कैसे करें ? मुफ्त का खाने से मन-मस्तिष्क पर चक्काजाम जो लग गया है..!!



#चक्काजाम  #आंदोलनजीवी

भूपेंद्र भारतीय







Friday, January 8, 2021

वे राजनीति में थे, हैं और बने रहेंगे....!!

 

             नईदुनिया ‛अधबीच’ स्तंभ  में ....


उन्हें ऐसा लगता है कि इस देश की राजनीति में उनका होना बहुत जरुरी है। वे सोचते हैं कि जिस दिन उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया, वैसे ही इधर देश का लोकतंत्र पंगु हुआ ! ऐसा उन्हें क्यों लगता है ? जब यह पूछा गया तो वे कहने लगे, “जब जब हम विपक्ष में आते हैं तो लोकतंत्र खतरे में आ जाता हैं !” सत्ताधारी दल लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं। ऐसा उन्हें लगता है ! वे राजनीति के माध्यम से समाज में विकास की नदियाँ बहाने के सपने बेचते रहे हैं। ओर उसी विकास की छद्म नदी में वे अपने कुकर्मो का परिवाहन करते रहे है !


वे जब भी अपने गाँव से राजधानी की ओर जाते हैं तो उन्हें लगता है कि “वे विकास की यात्रा कर रहे हैं।” उन्हें अब भी ऐसा लगता है कि विकास गाँवों से शहरों की ओर जाने से ही होगा। इस आने जाने की भागदौड़ में उन्होंने लोकतंत्र को छका दिया है! वे थकते नहीं है ! उनके कार्यकर्ता हांफते रहते हैं। जनता उनकी विकास मैराथन दौड़ देखकर दंग है ! ओर उनके दल के मूल्य दिनोंदिन इस यात्रा में सिकुड़ते जा रहे है। वहीं लोकतंत्र के मंदिर उनकी प्रतिदिन की कदमताल से हतप्रभ हो रहे हैं।
        

                  अमर उजाला में प्रकाशित....


वो तो अच्छा रहा कि उन्हें चुनाव के चक्कर में राजधानियों से नीचे उतरकर जनता के दरबार में आना-जाना होता है। नहीं तो वे कबके लोकतंत्र को राजतंत्र कर देते। वे जब भी चुनाव के चक्कर में क्षेत्र का दौरा करते हैं तो उन्हें कई दौरें पड़ते हैं। इन क्षेत्रीय दौरों के कारण उन्हें दयनीयता की “बेड फिलिंग” आती है। पर वे बेचारे करें तो क्या करें ? वोटबैंक का भी तो दमखम रहता है लोकतंत्र में। इन्हीं वोट की रेवड़ीयों को बटोरने की जद्दोजहद में वे हरदम चुनावी क्षेत्र में दम-फक्क होते रहते हैं।


वे अब भी सोचते हैं कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र का झंडा उनके ही दल ने तौक रखा है ! भले ही उनकी राजनीति अब तक दल के बड़ो को तौकते-तौकते चल रही हो। वे लोकतंत्र के मामले में “अमेरिका को अपना अभिभावक मानते हैं, भले ही उन्हें उधर से पाकेट मनी मिलना बंद हो गई हो !” वे जब भी लोकतंत्र की बात करते हैं मानो “वाईट हाऊस” के चबूतरे पर खड़े हो ! वो तो क्षेत्र की जनता इस राजनीतिक स्वप्न के बीच आ जाती है, नहीं तो वे कबके “प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका” सपनों में ही बन जाते। उनका लोक-चरित्र राष्ट्रीय मिडिया का कई बार ज्वंलत विषय बना है। फिर भी वे अपने चाल--चलन के दम पर ही अपने क्षेत्र की जनता से जनमत मांगते हैं ! उनका राजनीतिक सफर इतने सफेद-काले कारनामों से भरा पड़ा है कि उनके क्षेत्र का विकास हर बार इन रंगों में धूमिल हो जाता हैं !


खैर, उनके आत्मविश्वास का लेवल उनके दल के अच्छे दिनों जैसा ही अबतक बना हुआ है। वे अब भी जहाँ बैठे हैं, वहीं उनका सदन है ! ओर जिस दिन उस जगह से खड़े हो गए, तो खड़े होते ही अपने राजनीतिक कद को ओर अपने दल को फिर खड़ा कर लेगे ! लोकतंत्र के प्रति उनका समर्पण अब भी इतना है कि वे अब भी अपने दल के अध्यक्ष है ! “वे अपने दल के अध्यक्ष थे, हैं ओर बने रहेंगे !” क्योंकि उनका मानना है कि इससे लोकतंत्र व उनकी राजनीतिक जागीरी सुरक्षित है।



©भूपेंद्र भारतीय

Monday, December 21, 2020

श्रीमद्भगवद्गीता- जीवन का मूल दर्शन

 


श्रीमद्भगवद्गीता- जीवन का मूल दर्शन 





 

कुरुक्षेत्र की धर्म युद्ध पृष्ठभूमि में ५००० वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया जो श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। यह कौरवों व पांडवों के बीच युद्ध महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। जैसा गीता के शंकर भाष्य में कहा है– तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यासः सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैरु पनिबन्ध । गीता में १८ अध्याय और ७०० श्लोक हैं।

गीता की गणना प्रस्थानत्रयी(श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है ) में की जाती है। अतएव भारतीय परम्परा के अनुसार गीता का स्थान वही है जो उपनिषद् और धर्मसूत्रों का है। उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है।

गीता में योग की दो परिभाषाएँ पाई जाती हैं। एक निवृत्ति मार्ग की दृष्टि से जिसमें ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अर्थात् गुणों के वैषम्य में साम्यभाव रखना ही योग है। सांख्य की स्थिति यही है। योग की दूसरी परिभाषा है ‘योगकर्मसु कौशलम’ अर्थात् कर्मों में लगे रहने पर भी ऐसे उपाय से कर्म करना कि वह बंधन का कारण न हो और कर्म करनेवाला उसी असंग या निर्लेप स्थिति में अपने को रख सके जो ज्ञानमार्गियों को मिलती है। इसी युक्ति का नाम बुद्धियोग है और यही गीता के योग का सार है।

पाश्चात्य जगत में विश्व साहित्य का कोई भी ग्रंथ इतना अधिक उद्धरित नहीं हुआ है जितना भगवद्गीता हुई हैं। भगवद्गीता ज्ञान का अथाह सागर है। जीवन का प्रकाशपूंज व दर्शन है। शोक और करुणा से निवृत होने का सम्यक मार्ग है। भारत की महान धार्मिक संस्कृति और उसके मूल्यों को समझने का ऐतिहासिकसाहित्यिक साक्ष्य है। इतिहास और दर्शन भी है। समाजशास्त्र और विज्ञान भीवहीं लोकपरलोक दोनों का आध्यात्मिक मूल्य भी हैं।

श्री वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता जी का वर्णन करने के उपरांत कहा है कि ‘गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैःया स्व्यं पद्मनाभस्य मुखमद्माद्विनीःसुता.’ अर्थात गीता सुगीता करने योग्य है इसे भली प्रकार पढ़कर अंतःकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है जो कि स्वयं पद्मनाभ भगवान श्रीविष्णु के मुखारविंद से निकली हुई है। स्वयं श्री भगवान ने भी गीता के महात्मय का बखान किया है। श्रीगीता एक ऐसा अनुपमेय शास्त्र है जिसमें एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है।

गीता का प्रारम्भ धर्म शब्द से होता है तथा गीता के अठारहवें अध्याय के अन्त में इसे धर्म संवाद कहा है। धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाला जो है उसे आत्मा कहा गया है और जिसे धारण किया है वह प्रकृति है। आत्मा इस संसार का बीज अर्थात पिता है और प्रकृति गर्भधारण करने वाली योनि अर्थात माता है।

श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को लेकर भारत में ही नहीं विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही है। निष्काम कर्म का गीता का संदेश प्रबंधन गुरुओं को भी लुभा रहा है। दुनियाभर के बड़े बड़े प्रबंधन संस्थान गीता ज्ञान पर आधारित पाठ्यक्रम चला रहे हैं। वर्तमान भौतिक युग में युवाओं के लिए यह अमृत वाणी से कम नहीं है। निराशाक्रोधस्वार्थअकर्मण्यताआलसगलाकाट प्रतियोगिता के इस समय में गीताजी ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

धर्म शब्द का प्रयोग गीता में आत्म स्वभाव एवं जीव स्वभाव के लिए जगह जगह प्रयुक्त हुआ है। इसी परिपेक्ष में धर्म एवं अधर्म को समझना आवश्यक है। साथ ही धर्म रक्षा के लिए इस श्लोक के माध्यम से ज्यादा बल दिया गया है

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

श्री कृष्ण कहते हैं की जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हुं। साधुओं की रक्षा के लिए दुष्कर्मियों का विनाश करने के लिए धर्म की स्थापना के लिए मैं युग युग मैं मानव के रूप मैं अवतार लेता हूँ। 

आत्मा का स्वभाव धर्म है अथवा कहा जाय धर्म ही आत्मा है। आत्मा का स्वभाव है पूर्ण शुद्ध ज्ञानज्ञान ही आनन्द और शान्ति का अक्षय धाम है। इसके विपरीत अज्ञानअशांतिक्लेश और अधर्म का द्योतक है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से जगत को समझाया है कि निष्काम कर्म भावना में ही जगत का कल्याण है। श्रीकृष्ण का उपदेश ही गीता का अमृत वचन है। उन्होंने गीता के जरिए दुनिया को उपदेश दिया कि कौरवों की पराजय महज पांडवों की विजय भर नहीं बल्कि धर्म की अधर्म परन्याय की अन्याय पर और सत्य की असत्य पर जीत है। श्रीकृष्ण ने गीता में धर्मअधर्मपापपुण्य और न्यायअन्याय को भलीभांति परिभाषित किया है। उन्होंने धृतराष्ट्र पुत्रों को अधर्मीपापी और अन्यायी तथा पाडुं पुत्रों को पुण्यात्मा कहा है। उन्होंने संसार के लिए क्या ग्राहय और क्या त्याज्य है उसे भलीभांति समझाया।

श्रीगीता मानवता का अबतक का सबसे महत्वपूर्ण संविधान है। गीता जिस धर्म का सार हैउस धर्म को ‛वैदिक धर्म‘ कहते है। जिसमें प्राणीमात्र के लिए आनंदम्य व शांतिपूर्ण जीवन का दर्शन है। संत ज्ञानेश्वर ने गीताजी पर कहा है कि गीता विवेकरूपी वृक्षों का एक अपूर्व बगीचा है। यह सब सुखों की नींव है। सिद्धांत रत्नों का भंडार है। नवरसरूपी अमृत से भरा हुआ समुद्र है। और सब विद्याओं की मूल भूमि हैं। वहीं भारतीय आध्यात्मिक चेतना के प्रेरणापुंज स्वामी विवेकानंद ने कहा कि गीता उपनिषदों से चयन किये हुए आध्यात्मिक सत्य के सुंदर पुष्पों का गुच्छा है।

वहीं लोकमान्य तिलक कहते हैं कि गीता हमारे धर्मग्रंथों में एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है। गीता प्रवचन में विनोबा जी कहते हैं– गीता जबानी जमा खर्च का शास्त्र नहींकिन्तु आचरण शास्त्र है।

विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि भगवद्गीता को पढ़कर मुझे ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ। महापुरुष महात्मा गांधी कहते थे कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है तो मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं। महान दार्शनिक श्री अरविंदों ने कहा है कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवन शैली हैजो हर उम्र के लोगों को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है।

गीता के प्रथम अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन रुपी जीव द्वारा मोहग्रस्त होनाकरुणा से अभिभूत होकर अपनी शक्ति खो देना इत्यादि का भलीभांति उल्लेख है। दूसरा अध्याय हमें देहान्तरण की प्रक्रियापरमेश्वर की निष्काम सेवा के अलावा स्वरुपसिद्ध व्यक्ति के गुणों से अवगत कराता है। तीसरेचौथे व पांचवे अध्याय में कर्मयोग और दिव्य ज्ञान का उल्लेख है। यह अध्याय इस सत्य को उजागर करता है कि इस भौतिक जगत में हर व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार के कर्म में प्रवृत होना पड़ता है। छठासातवां और आठवें अध्याय में ध्यानयोगभगवद्ज्ञान और भगवद् प्राप्ति कैसे हो इसका मार्ग सुझाया गया है। ध्यानयोग में बताया गया है कि अष्टांगयोग मन तथा इन्द्रियों को कैसे नियंत्रित करता है। भगवद्ज्ञान में भगवान श्रीकृष्ण को समस्त कारणों के कारण व परमसत्य माना गया है।

नवें और दशवें अध्याय में परम गुह्य ज्ञान व भगवान के ऐश्वर्य का उल्लेख है। कहा गया है कि भक्ति के मार्ग से जीव अपने को ईश्वर से सम्बद्ध कर सकता है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान का विराट रुप और बारहवें में भगवद् प्राप्ति का सबसे सुगम और सर्वोच्च मार्ग भक्ति को बताया गया है। तेरहवें और चौदहवें अध्याय में प्रकृतिपुरुष और चेतना के माध्यम से शरीरआत्मा और परमात्मा के अंतर को समझाया गया है। बताया गया है कि सारे देहधारी जीव भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अधीन हैंवे हैं सतोगुणरजोगुण व तमोगुण। कृष्ण ने वैज्ञानिक तरीके से इसकी व्याख्या की है। पंद्रहवें अध्याय में वैदिक ज्ञान का चरम लक्ष्य भौतिक जगत के पाप से अपने आप को विलग करने की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। सोलहवेंसत्रहवें और अन्तिम अठारहवें अध्याय में दैवी और आसुरी स्वभावश्रद्धा के विभाग व संन्यास सिद्धि का उल्लेख है। श्रीगीता ज्ञान का सागर ही नहीं बल्कि जीवन रुपी महाभारत में विजय का मार्ग भी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में महायोगेश्वर के मुखारबिंद से कहें गए एक एक शब्द व श्लोक का महत्व प्राणी मात्र के लिए अपार लाभकारी है। लेकिन यदि मेरा जैसा गीतापाठी कोई पाँच श्लोक चुनना चाहे तो वे नीचे दीए श्लोक है। पर इससे यह बिल्कुल न समझा जाए कि ये श्लोक किसी श्रेणी में रखने का प्रयास किया है। ये सिर्फ़ दृष्टांत के लिए ही है। जिससे पाठक यह जाने की गीताजी की महिमा हर शब्द व श्लोक में पूर्णरूप मे झलकती है। हम गीताजी का पाठ कही से भी शुरू कर सकते हैं।

– योगस्थकुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थ– हे धनंजय (अर्जुन), कर्म न करने का आग्रह त्यागकरयशअपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकरकर्म कर, (क्योंकिसमत्व को ही योग कहते हैं।

– विहाय कामान् यकर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ– जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता हैउसे ही शांति प्राप्त होती है।

– न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यशकर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

अर्थ– कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

– नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।

अर्थ– तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म करक्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

– कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ– भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

युवाओं के लिए वरदान से कम नहीं गीताजी

गीता मृत्यु के प्रसंग पर दोहराई जाने वाली धार्मिक क्रिया का हिस्सा भर नहीं है। वह जीवन से भरपूर है। उसमें पदपद पर संकेतक लगे हुए हैंजो भगवान द्वारा निर्दिष्ट है। गीता हमें एक सुरक्षित संकल्प देती हैं। वह संकल्प हमें मान्यताओंजड़ हो चुकी प्रथाओंअंधविश्वासों और इतिहास के निर्णयों से मुक्त कर ऐसे वृहत्तर संसार में ले जाती हैजहां सुंदर भविष्य हमारी प्रतिक्षा कर रहा हैजहां विश्वास की अग्नि प्रज्वलित हैजहां अगणित संभावनाएं हमारे सामने खुलने के लिए खड़ी हुई मिलती हैं ।

श्रीमद्भागवतगीता भारतीय धर्म और दर्शनशास्त्र के साथ उस अध्यात्मविद्या का भी स्थापित ग्रंथ हैजिसने मनुष्य जाति को आत्मा की अमरता का संदेश दे कर कर्मशील जीवन की आधारशिला रखी। यहां जो बात सबसे अधिक ध्यान देने की हैवह है– भगवान का उस युवक के साथ संवादजो निराश हैकर्म से छुटकारा चाहता है और आत्मा संताप से घिरा हुआ उदासीनता के किनारे निढाल बैठा है। यहां संकेत यह भी है कि आप चाहे जितने भी नीचे आ जाएंभगवान आपकी उंगली छोड़ते नहीं । वे अंत तक चाहते हैं कि मनुष्य उनका सहारा लेकर ऊपर उठ जाए।

भगवान को मनुष्य पर बड़ा भारी भरोसा हैऔर उनके ध्यान में वह युवक पल प्रतिपल हैजिसके पास जीवन से जुड़े हुए प्रश्न हैजो समाधान के लिये प्रणिपात की संपूर्ण तैयारी के साथ खड़ा हैभले वह अंदर से टूट चुका होकिन्तु जिसकी चेतना धुली हुई और जिसका मन अंधेरे में से बाहर निकल आने के लिए छटपटा रहा हो।

अर्जुन युवाचेतना का आदर्श प्रतिनिधि है। उसके पास योग हैयोग से उपजी स्थिरबुद्धि हैस्थिरबुद्धि के वे परिणाम है जो जीवन को प्रबंधित करते हैंऔर वह जीवन कौशल है जो आन्तरिक अनुशासन के साथ आचरण की पवित्रता के लिये आग्रह करता है। भगवान के सामने खड़े होने का जो साहस अर्जुन के पास हैवहीं साहस युवकों की मांग होनी चाहिए। यह साहस होतो युवा अपनी आत्मा के सामने खड़ा होकर कठिन से कठिन समस्या को सुलझा ले। यह सरल नहीं है। अर्जुन होने के लिए केवल धनुर्धर होना ही पर्याप्त नहींहृदय का सर्वोच्च शक्ति के प्रति पूरी तरह से खुला होना भी अपरिहार्य है। हृदय का यह खुला होना समर्पण का भाव लाता है। अर्जुन की यही सबसे बड़ी योग्यता थीजिसके कारण भगवान को आगे हो कर अपना विराट स्वरूप भी दिखाना पड़ाऔर जीवन के वे रहस्य भी बताना पड़ेजिनकी मिमांसा करतेकरते हमारी सदियाँ बीत गई।

उपसंहार

वैसे तो गीताजी का हर एक पद व श्लोक वेद रूपी अमृत है। वर्तमान युग में भी गीता उतनी प्रासंगिक है जितने धर्म क्षेत्र महाभारत के समय थी। इस सुंदर जीवन रूपी दर्शन का उद्देश्य प्राणीमात्र का कल्याण करना है। नर से नारायण बनने की सरलतम प्रक्रिया इस भगवत ज्ञान में दी है। बस हमें अर्जुन जैसा जिज्ञासु बनकर इसको आत्मसात करना है। हर युग में मानव के सामने कुरुक्षेत्र जैसी परिस्थितियां आती हैलेकिन उनसे डटकर मुकाबला करना है तो उसके लिए सबसे सुलभ मार्ग गीताजी में दिया है। श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा अनंत हैं। इस भगवत ज्ञान ‛गीताजी’ का सारांश आसानी से इस श्लोक से प्रकट होता है

एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्
एको देवों देवकीपुत्र एव ।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।

संदर्भ

गूगल पर श्रीमद्भागवतगीताविकिपीडिया साईट 
गीता का महत्व पर विभिन्न निबंध इंटरनेट गूगल
मनीष गीते– गीता व प्रबंधनगूगल साईट
युवाओं के लिए वरदान से कम नहीं गीता– डॉ.मुरलीधर चांदनीवाला नईदुनियाझंकार अंक २५/१२/२०२०)

संदर्भ ग्रंथ

श्रीमद्भागवतगीता यथारूप— स्वामी प्रभुपाद
यथार्थ गीता — स्वामी अड़गड़ानंद
अनासक्तियोग— महात्मा गांधी
गीता प्रवचन— विनोबा भावे
सूक्ति सागर— रमाकांत गुप्त
महायोगेश्वर(प्रबंध काव्य)–डॉओम् जोशी


---भूपेंद्र भारतीय 

९९२६४७६४१०

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