Thursday, July 29, 2021

आरक्षण, जाति और मैं....!!

 आरक्षण, जाति और मैं !!

      
इमेज गुगल से...



आरक्षण व जाति जब तक अलग-अलग रहे इन शब्दों से मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं रही हैं, लेकिन जब से ये दोनों एकदूसरे के साथ आए हैं। मुझे इस ‛जोड़ी से नफ़रत’ है। इसलिए नहीं कि इनने मेरा कोई नुकसान किया हो। पर इनके साजिशन साथ आने से कितनों के ही साथ सामाजिक अन्याय हुआ है। वैसे मेरा तो इन दो शब्दों से इतना ही संबंध रहा है कि यदाकदा कोई नौकरी या शिक्षा से संबंधित फार्म भरा तो किसी कालम में जरूरी होने पर “जाति व आरक्षण की हाँ या नहीं में मौन स्वीकृति” दी है ! लेकिन मैंने कभी भी इन दोनों सामाजिक व राजनीतिक हथियारों का कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ नहीं लिया। क्योंकि “मेरे जैसा निम्न मध्यवर्गीय “भारतीय” समय पर भारतीय रेलवे में सीट आरक्षित नहीं करा पाता है, तो आरक्षण से नौकरी क्या ओर कैसे सुरक्षित करता !”

जब भी हमारे देश या किसी राज्य में चुनाव होते हैं तो इन दो शब्दों को बहुत ऊछाला जाता है। आरक्षण व जाति रूपी दो हथियारों से हमारे देश के नेता अधिकांश समय राजनीतिक फसल काटते आये हैं। फिर वो बलात्कार जैसे जघन्य अपराध हो या आत्महत्या जैसे कृत्य, हमारी राजनीति कहीं न कहीं जाति या आरक्षण का राजनीतिक फार्मूला निकाल ही लेती है। मैं जब भी किसी नेता से हमारे देश के विकास की बात करता हूँ तो वह मुझे मेरी जाति की याद दिला देता है ओर जब नौकरी की बात करता हूँ तो आरक्षण का रोना रोते हैं। ओर अंत में “आत्मनिर्भर” बनने की सलाह देकर मेरा वोट ले जाते है !

मैंने कितनी ही बार माननीय सर्वोच्च न्यायालय व कई विधि के विद्वानों के माध्यम से इन दो शब्दों के गुढ़ अर्थ व रहस्य को समझना चाहा है। लेकिन ‛हर तीन-चार महीनों में इनकी परिभाषाएं बदलती रहती है !’ “कभी मायलार्ड के पावरफुल माईंड की वजह से, तो कभी पोलिटिक्स के पावरफुल प्लान के कारण !” वहीं जिसके लिए वास्तविकता में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। वे लोग आजतक इन दो राजनीतिक-सामाजिक सांडों की आपसी लड़ाई में बागर(बाड़) की तरह नुकसान उठाते आए हैं। ओर स्वतंत्रता के दिनों से लेकर अबतक वहीं के वहीं हैं।
हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कोई तथाकथित दलित नेता चुनाव में आरक्षित सीट का फार्म भरता है लेकिन उसी फार्म में उसकी सम्पत्ति का विवरण करोड़ों में रहता है ! सात बार के सांसद-विधायक आठवीं बार भी चुनाव में उम्मीदवारी आरक्षित वर्ग की सीट से रहेगें, ऐसा सुनता हूँ तो लगता है “आरक्षण की प्रणाली के पीछे कौन-से सामाजिक न्याय का सिद्धांत काम करता है ?” इस दुविधा पर सामाजिक न्याय मंत्रालय को कितने ही पत्र लिखें, लेकिन आजतक उधर से जवाब नहीं आया। अब बेचारे मंत्रीजी जवाब दे भी तो कैसे ? वे स्वयं दलित उद्धार के नाम पर राजनीति करते-करते यहां तक पहुंचे हैं !

जाति का वर्गीकरण जिस गति से हमारे देश में होता आया है, कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दस बीस सालों में हर दूसरा व्यक्ति अपनी अलग जाति की तख़्ती लेकर आरक्षण की भीख मांगता मिले ! ऊंच-नीच इन दोनों शब्दों में इतनी व्यापक स्तर पर है कि इनके चक्कर में कितने ही दलों की सत्ता कितनी ही बार ऊँची-नीची हो गई। कितने ही नेताओं के कुर्तें-पयीजामो का रंग बदल गया। कितने ही नौकरशाहों के बंगले बदल गए, कितने ही सरकारी कार्य जातिगत समीकरण देखकर फाईलों में रोके गए। हमारे नेताओं ने देश को चलाने के लिए नीतियां पश्चिमी देशों से आयात की ओर सत्ता में आने के लिए जाति व आरक्षण का सहारा लिया ! ओर इसी कारण यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं कि “जाति और आरक्षण का चश्मा, हम भारतीयों को कभी एक नहीं होने देगा ! जिसके कारण नेता अपनी-अपनी रोटी सेकते रहेंगे और आम आदमी गरीबी की आँच में जलता रहेगा !”

मैं तो ईमानदारी से कहता हूँ कि मुझे आज तक आरक्षण व जाति से कोई शिकायत नहीं रही। क्योंकि मैं न तो आरक्षण के दायरें में आता हूँ, न ही मुझे जाति शब्द से कोई गिला-शिकवा है। मुझे तो खुशी है कि चलो इन दोनों से कुछ लोगों की राजनीतिक-सामाजिक दुकानें तो चलती हैं। हाँ इन दोनों के साथ आने से मुझे साजिश की बू आती है। जिस तरह से हर चुनाव में आरक्षण को यथावत कायम रखने के किसी साश्वत नियम की तरह वादें कीए जाते हैं ! मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि हमारे देश से कोई “माई-का-लाल” आरक्षण व जाति के वर्तमान स्वरूप में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। क्योंकि यदि ऐसा कुछ भी गलती से हो गया तो कितनों की ही राजनीतिक दुकाने बंद हो जाएगी।



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Wednesday, July 21, 2021

जा रही है यह लहर भी....!!

 


जा रही है यह लहर भी....!!

         
                   दैनिक जनवाणी मेरठ में.... 

हमारे उत्सव प्रधान देश में हर बात पर उत्साह से उत्सव मनाना जरूरी है। यदि हम ऐसा न करें तो हमें किसी भी काम को करने में मज़ा नहीं आता है। भले किसी के बालक का मुंडन संस्कार हो या फिर हमारी गाय को बछड़ा हुआ हो या फिर पड़ोसी देश की क्रिकेट टीम, मैच में हमसे हारी हो। कुछ तो गाजा-बाजा बजना ही चाहिए ! हम तो आपदा में भी उत्सव का अवसर निकाल ही लेते है। हमें कोई न कोई आयोजन करना ही होता है। आखिर हम उत्सव प्रेमी जो ठहरे।
ऐसे ही उत्सव रूपी आयोजनों की ‛लहरें’ हमारे यहां सालभर आती जाती रहती हैं। कोरोना की लहरें तो पीछले दो साल से आ रही है लेकिन हमारे भारतवर्ष में हजारों सालों से जाने कितनी लहरें आती जाती रही है।

     
कभी ज्ञान की लहर आई थी, तो कभी-कभी अज्ञान की भी तगड़ी लहर आती रही है। कभी विदेशी यात्रियों की लहर आई और उनके पीछे बाहरी लूटरों का भी काफिला घुस आया। कभी धर्मनिरपेक्षता की लहर आती है ओर अर्धम का बवंडर खड़ा कर जाती है। सदियों पहले धर्म परिवर्तन की लहर आई जो अब तक भी देखी जा सकती है। लहरों के हम जनक है ! हमने ही आधुनिक युग को “भ्रष्टाचार लहर” से लाभान्वित किया है। कभी हमारे गाँवो में दूध-दही की धाराप्रवाह लहर रहती थी और आज है कि हर गांव में देशी शराब व रसायनिक दवाइयों की लहर से वर्तमान पीढ़ी पिलपिलाकर लपलपा रही है।  
             

          दैनिक ट्रिब्यूनल पंजाब में.....

बहुत बार ऐसा लगता है कि “जा रही है यह लहर भी” पर फिर कोई नई लहर जन्म लेती है। लगता है हमारे यहां लहरों के लिए सबसे ज्यादा ऊपजाऊ भूमि है। “भले नई लहरों के बीज देश के बाहर से आये, पर हम इन लहरों को सिंचित-पोषित-पुष्पित करने में बड़े जुगाड़ी है।” और क्यों न हो ! जुगाड़ी होने की विश्वख्याति से हमें ही मनोनीत किया गया है। हम जिस ओर चल दे, लहरें अपने-आप बनने लगती है।

“लहरों पर सवार होना”, हमें बचपन से सिखाया जाता है। कभी होनहार बालक बनने की लहर पर, तो कभी कामयाब युवा होने के लिए लहरों में धकेल दिया जाता है। पीछले दिनों ऐसी लहर आई कि उसके कारण अबतक शौक संवेदनाओं की लहर चल रही है। वहीं शौक संवेदनाओं की लहर को माननीयों ने ऐसा लपका की उसके कारण गांव-कस्बों में अबतक राजनीतिक बवंडर चल रहे हैं। वहीं स्वतंत्रता के बाद से आजतक ‛विकास’ की लहर चलाने के भी वादें होते आए हैं ! लेकिन विकास की लहर का हम अबतक इंतज़ार कर रहे है।
विगत दिनों दूसरी लहर में लॉकडाउन के कारण अपने ही घर में घीर गई जनता अब घर से ऐसे निकल रही है ! मानों पर्यटन और सेर-सपाटे के लिए जैसे कोई सरकारी आदेश निकला हो और यहीं भोली जनता उस आदेश का ईमानदारी से पालन कर रही हो ! हमारे देश की सड़कों, चौराहों, सरकारी भवनों के आसपास प्रतिदिन ऐसी कोई न कोई “जन-गण-मन की लहर” बैठती-उठती-दौड़ती ही रहती है। प्रतिदिन समाचार पत्रों व सूत्रों के हवाले से आई खबरों में नीत-नई लहरों की तूफानी जानकारी रहती हैं। इन दिनों इन्हीं आती-जाती लहरों के घटाटोप से मन बौराया जा रहा है....!!



भूपेन्द्र भारतीय 

Tuesday, July 6, 2021

व्यस्त लोगों की दुनिया....!!

 

नईदुनिया अधबीच में प्रकाशित....


 व्यस्त लोगों की दुनिया....!!


व्यस्त लोगों की दुनिया भी विचित्र घटनाओं से भरी चलती है। आप वर्तमान समय में व्यस्त भले न हो पर लोगों की नज़र में दिखना जरूर चाहिए। आपका कोई मित्र आपसे घर मिलने आये और आप उसको सीधे फोकटिया टाईप टीवी देखते मिल जाओ ! आपकी कोई इज्ज़त नहीं करेगा। लेकिन आप बाथरूम में हो ओर आपकी पत्नी आपके मित्र से कहें कि ‛भय्या वे तो अभी पुजा कर रहे है’ ! “यहीं बात आपके सम्मान में चार चाँद लगा देगी।" मित्र भी सोचने लगेंगा !, “ये आजकल भक्ति-भाव में कितना व्यस्त रहता है।”

मेरे एक मित्र ने व्यस्त दिखने के लिए अपने घर की छत पर एक छोटी-सी वाटिका तैयार कर ली। एक दिन उसी मित्र से मिलने गया। “भले ने मिलने के लिए एक घंटा प्रतिक्षा करवाई !” ओर ऊपर से कहता है क्षमा करना यार, आजकल व्यस्तता बढ़ गई है। इतने सारे काम हो गए हैं कि पता ही नहीं चलता दिन कैसे निकल जाता है। ऊपर से इन पौधों का भी ध्यान मुझे ही रखना पड़ता हैं ! ‛हमारे घर में सभी बहुत व्यस्त रहते हैं।’ जो कि सारे मोहल्ले को पता है, “भला पत्नी की नौकरी पर ही सारे मजे छान रहा है।” दिनभर घर के ही काम में व्यस्त रहकर आराम फरमाता है। शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि “काम कोड़ी का नी और फुर्सत घड़ी भर की नहीं।”

ऐसे ही घरघुस्सू व्यस्त श्रीमानों के रखरखाव के लिए सरकारों को आगे चलकर “बिजी बंदों का रखरखाव” जैसी योजना बनाना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं होना होगा। कुछ व्यस्त लोग गलती से कभी कहीं घर से बाहर निकल जाये, तो पुरी दुनिया इनकों आफत लगती है। हर चीज में ये नुक्स निकालेंगे। सड़क पर कचरा दिखा तो सरकार को कोसेंगे, गाय इनके रास्ते में आ गई तो गौ रक्षकों को गाली देगें, सड़क पर ट्राफिक है तो पूंजीवादियों को बुरा-बुरा कहेंगे, गतिरोधक आ गया तो पड़ोसी की माँ-बहन करेंगे, अचानक से बारिश होने लगे तो सीधे इन्द्र देव को ही दो चार गाली बक देते हैं ! न जाने क्यों इन व्यस्त जैसे दिखने वालें लोगों को हर एक बात से परेशानी होती है ? मौसम व प्रकृति तक को ये अपनी प्रतिक्रियाओं से नहीं छोड़ते हैं !

फिर भी समाज में इनकी बड़ी इज्ज़त रहती है ! इन्हें फोन करो तो फटाक से कहते है, “अभी बिजी हूँ थोड़ी देर से लगाता हूँ !” इनके जैसों के बारें में सोचकर लगता है कि कहीं ‛बिजी’ शब्द, “लेजी” का पर्यायवाची तो नहीं हो गया है ? किसी भी जगह या कार्यक्रम में देर से पहुंचना इनकी व्यस्तता का पैमाना है। इन्हें लगता है कि देर से पहुंचने पर लोग इज्ज़त करते हैं। “जैसे नेताओं के देर से आने की आदत के कारण उनका मान-सम्मान होता है ! और उन्हें बड़ा आदमी माना जाता है।”

“व्यस्त रहो और मस्त रहो”, नारें का असली आनंद यही ‛व्यस्त’ रहने वाले महामानव ले रहे हैं। ऐसे ही व्यस्त लोगों से हमारे देश के सरकारी भवन भरें पड़े। शिक्षा संस्थानों के आसपास घांस काटते ऐसे “व्यस्ततम्” नौजवान आसानी से देखें जा सकते है। इनकी व्यस्त दिनचर्या में सरकारी फाईलों को तकिया बनाकर व्यस्तता को जीवंत रखा जाता है।

आजकल तो व्यस्तता का पावर-पैक हर किसी ने अपने मोबाइल में डलवा लिया है। ऐसा लगता है जैसे दसों दिशाओं में कुकुरमुत्तों की तरह व्यस्त लोगों का खेला हो रहा है। इनकी व्यस्तता जंगल के उस सरपंच(बंदर) की तरह है जो एक डाल से दूसरी डाल पर दिनभर कूदा-फाँदी ही करता रहता है लेकिन उसकी नीयत सभी जानते है।
खैर, आजकल की इस “व्यस्त” दिनचर्या में मानव आखिर कितना व्यस्त रहे और कितना दिखें, यह शोध का विषय है ! पर शोध में भी बौद्धिक परिश्रम लगता है और ऐसे में व्यस्तता की मस्ती से फुर्सत मिले तो कुछ ओर सोचें....!!


भूपेन्द्र भारतीय 


Friday, June 18, 2021

कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

 कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

            
                  
दैनिक ट्रिब्यूनल में प्रकाशित....


हम तो उनकी गाइडलाइन पढ़कर ही दो साल से टाईम-पास कर रहे हैं। भला है बौद्धिक प्रबंध पहलवानों का, जो आम जनता के लिए गाइडलाइन निकालने का प्रबंध कर दिये ! नहीं तो इस कोरोना महामारी में जनता घर बैठे बैठे भला करती ही क्या ! अब हर नागरिक के पास ठेला तो है नहीं, कि भरचक लॉकडाउन में चल दीये फल-सब्जी बेचने। ओर गाइडलाइन भी छोटी-मोटी नहीं ! हर आठ दिन में पन्द्रह-पन्द्रह पन्नों की गाइडलाइन। मेरे जैसा तो अपनी दसवीं-बाहरवीं की फाईनल परीक्षा में इतना गंभीरता से नहीं पढ़ा। जितना ध्यान लगाकर इन कोरोना गाइडलाइनों को जनता जनार्दन चाव से पढ़ती है और सोशल मीडिया पर दनादन शेयर करती हैं !

मुझे अब भी पूरा विश्वास है। यदि कोरोना विषाणु को पकड़कर ये गाइडलाइनें पढ़कर सुना दी जाए, तो कोरोना गाइडलाइन के सम-विषम नियम से ही ढेर हो जाये। इन गाइडलाइंस को पढ़कर पहली बार पता चला कि विषाणुओं को भी सप्ताह में एक दिन छुट्टी पसंद है। हो सकता है कि सरकार को विषाणुओं के किसी गुप्त संगठन ने पहले ही गुपचुप छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया हो ? कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कोरोना के सारे लक्षण मानवीय लक्षणों जैसे ही क्यों है ? उसके लिए भी रात में रात्रीकालीन कोरोना कर्फ्यू लगता है ! मतलब कोरोना को भी रात में ही सोना पसंद है ! उसे किसी तरह का मानवीय व्यवधान पसंद नहीं ! आश्चर्य है ! कोरोना को पब-पार्टीयां पसंद ही नहीं है ?

गाइडलाइन के गहन अध्ययन से ज्ञात हुआ कि कोरोना को शहरी क्षेत्र पसंद है ! वैसे वह भी शहरी लोगों की तरह कभी कभी हवाखोरी करने ग्रामीण क्षेत्रों के ओर निकल जाता है। ये गाइडलाइनें ही है, जो हमें समझाती है कि अभी मानव को बहुत कुछ समझने जानने की जरूरत है। “मानवीय बुद्धि के अलावा भी कोई अदृश्य शक्ति है जो कोरोना गाइडलाइनों को बनाती है।” आज यदि आइंस्टीन भी होते तो जरूर ऐसी गाइडलाइनें पढ़कर चक्कर खा जाते है ! उन्हें सिर्फ़ इन गाइडलाइनों को पढ़ने के लिए ही कोई नया सिद्धांत खोजना पड़ता।

कभी कभी तो गाइडलाइनों का पालन करना माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जैसा ही लगता है। सोचता हूँ कोई जनरल स्टोर वाला ऐसी स्थिति में क्या करता होगा ? जब उस जनरल स्टोर में सुईं से लेकर हेलीकॉप्टर तक के सामान मिलतें हो ! वह बेचें तो क्या और बंद रखें तो क्या ? वहीं पीने की दुकान को खोलने की अनुमति हो, पर पीके साहब पीकर खाने कहां जाए ? वहीं सबसे बड़ी चुनौती है मास्क लगाने की ! जब मास्क लगाना अनिवार्य है। तो फिर हर बार मास्क लगाने के लिए हर आठ दिन में गाइडलाइन की क्या जरूरत ? लगता है जनता को नई-नवेली दुल्हन की तरह गाइडलाइनों से प्यार हो गया है। उसे भी गाइडलाइनों की लत लग गई है।

खैर, "जान है तो जहान है !" लगता है “गाइडलाइन की गाइड-लाइन पर चलना ही नियति हो गई है।” हो सकता है कोरोना विषाणु गाइडलाइनों की मार से ही मात खा जाये। मेरा तो मत है कि जनता एक दिन अपनी-अपनी छत से गाइडलाइनों का सामुहिक पाठ करें। जिससे हो सकता है कोरोना इस सामुहिक गाइडलाइन पाठ से निपट जाये। और हम उसके बाद गाइडलाइनों के चंगुल से बाहर निकल सकें। इसलिए आम आदमी “गाइडलाइनों का पाठ करते रहे....!!”


भूपेन्द्र भारतीय



Wednesday, June 9, 2021

वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!

 वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!


कार्टून गुगल से साभार



वैसे तो यह युग इंटरनेट के माध्यम से मोबाईल-क्रांति का हो गया है, फिर भी राजनीति में हाशिये पर आ गए एक दल के कुछ बचे कुचे वरिष्ठ वयोवृद्ध नेता अब भी पत्र लिखना जानते है ! जहां आज की युवा पीढ़ी वाट्सएप भाषा शैली में तीन शब्दों में एक पत्र का सारा कच्चा चिट्ठा बयां कर देती है ओर संदेश को पूर्ण आहुति दे देती है। फिर भी आत्मा की आवाज़ सुनकर व बची कुची राजनीति को दाव पर लगाकर इन तथाकथित वरिष्ठ वयोवृद्ध नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपने दल की रानी साहिबा को सत्ता से विहीन होने के दर्द में अब कही जाकर एक पत्र लिखकर ‛पत्रचार' किया। जो मोटे-मोटे तौर पर कुछ इस तरह से कागज़ पर उतरा:-     
                                                  इस पत्र में दल की दुर्दशा के बारे मे कम ओर अपनी दिशा-दशा पर वरिष्ठ सदस्य खुल कर बोले होगे। रानी साहिबा से दल की वस्तुस्थिति पर सिर्फ़ भूरी-भूरी तौर पर चिंता व्यक्त की होगी, क्योंकि रानी से प्रश्न तो कोई पुछ सकते नहीं। वैसे ही जैसे बिल्ली के गले में घंटी बांधे कैसे और कौन ? इस पत्र में रानी के पुत्र की अयोग्यता पर भी दबी-दबी जुबान मे बातें कहीं गई होगी, “पर रानी ने इस बात पर वरिष्ठों के कान मरोड़ दिये होगें !” वरिष्ठ नेताओं मे कुछ फुलटाइम वकालत करने वाले भी है उन्हें रानी के पारिवारिक कानून के तहत दोषी ठहराकर दंड दिया गया है, ऐसा सूत्रों से पता चला है ।

इन वयोवृद्ध वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने पत्र सिर्फ़ दल का कल्याण चाहने की मनसा से लिखा होगा न कि अपना ! इसमें मुझे भारी संशय है! लेकिन हर बार की तरह रानी ने इसे अपने परिवार के खिलाफ षड्यंत्र समझा होगा ओर फिर रानी ने पत्र पर बगैर किसी चिंतन-मनन के एकतरफा एक ही दिन में फैसला कर लिया कि वे स्वयं फिर अगले छः माह तक दल की रानी साहिबा बनी रहेगी । एक दो सदस्यों ने दल के आंतरिक लोकतंत्र व सूचिता की भी बात इस पत्र में उठाई होगी, पर उस पर रानी ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा- “हमें लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाये, हमारे परिवार ने लोकतंत्र की देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक पुजा-पाठ की है!”


वैसे पत्र लिखने की परंपरा रानी साहिबा के परिवार में बहुत पुरानी है। इनके एक पूर्वज अपनी पुत्री को जेल में से पत्र लिखते थे ओर उन पत्राचारों मे देश-दुनिया की खबर देतें थे। लेकिन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का पत्र गलती से रानी साहिबा के ही परिवार की खबर लेता होगा ! जो कि रानी के लिए नाराजग़ी का विषय बन गया होगा। ओर इसके ही कारण रानी की नाक चण गई होगी ! ‛नाक’ की बात से याद आया, “रानी की पुत्री राजकुमारी की नाक अपनी दादी की नाक से मिलती है, इसके ही दम पर कुछ दिनों से राजकुमारी दल मे दमखम रखना चाहती है !” ओर रानी साहिबा के बुजुर्ग दल का नाक के दम पर नेतृत्व करना चाहती है !

खैर रानी साहिबा ने पत्र का सरसरी तौर पर अध्ययन किया होगा ओर यह पाया होगा कि “ये सत्ता के लालची वयोवृद्ध कार्यकर्ता सत्ताधारी दल से मिले हुए हैं, इनकी आपस में मिलीभगत है!” रानी के ‛चिरकुट युवा पुत्र’ ने भी वरिष्ठ सदस्यों पर आरोप लगाया होगा कि इनकी दूसरे दल से मिलीभगत है। ओर इसी के आधार पर रानी ने पत्र को कागज़-पत्तर समझकर फाईलों में दबा दिया होगा। शायद इसलिए ही अपने कुनबे पर आंच न आये रानी ने फिर अपना चलताऊ निर्णय सुना दिया कि अभी वे पत्र का छः माह तक ओर गहन अध्ययन करेगी, ओर फिर वे स्वंय भी एक पत्र लिखेगी ! जैसे दुनिया उम्मीद पर टीकी है, वैसे ही इस दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता पगड़ी बांधकर मंच सजाये बैठ गए हैं, कि चलों शायद रानी साहिबा का अगले छः माह बाद आने वाले पत्र में इस वयोवृद्ध वरिष्ठ नेताओं के दल को कोई नया राजकुमार-राजकुमारी मिल जाए।

ओर अंत में जब लेखक इन सब बातों की कल्पना कर रहा था, तो न जाने क्यों लेखक के मन में बाबा नागार्जुन की लिखी कविता ‛आओ रानी’ की पंक्तियाँ घनघना रही थी !!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !!



भूपेन्द्र भारतीय


Thursday, June 3, 2021

आनलाईन “योग” व मेरी साँसें....!!

 आनलाईन “योग” व मेरी साँसें....!!




                            
                      पत्रिका समाचार पत्र में प्रकाशित. 


महामारी से दुनिया की साँसें एवरेस्ट-कन्याकुमारी हो रही हैं। वहीं मैं लॉकडाउन में अपने ही घर पर कभी पहली मंजिल पर तो कभी ग्राऊंड फ्लोर के बीच ‛योग’ कर रहा हूँ। कभी फेसबुक योग, तो कभी ट्विटर, इंस्टाग्राम, वाट्सएपः पर योगस्थः हो रहा हूँ। मुझे लगा यह मेरे ही साथ हो रहा है। पर जब मैंने इंटरनेट के माध्यम से महाभारत के संजय की तरह अपनी दृष्टि दूरी फेंकी, तो पता चला “मेरे सरकार भी माईक्रो ब्लागिंग साईटों के चक्कर में ‛योग’ कर रहे हैं !” कहाँ पहले ऋषि-मुनि पर्वतों-पहाड़ों पर योग करते थे। और आज हर कोई मोबाइल पर ही योगस्थः हुए जा रहा है।

योग करना अच्छा है। बाबा जी भी कहते हैं कि ‛करो’, ‛योग’ करने से होता है। लेकिन कुछ अच्छा हो, तो अच्छा है। वरना फिर वहीं दाग अच्छे है ! पर “अंडबंड योगासन” के दाग निकले नहीं, तो वह धब्बा अच्छा नहीं लगता है। वहीं ऐसे में महामारी से मेरी साँसें फुल रही हैं और जमाना है कि दनादन आनलाईन ‛योग’ किये जा रहा है। कोई वाट्सएपः पर न जाने कौन-कौन से योगासनों के विडियों फार्वर्ड कर रहा है। कुछ वाट्सएपः समूह में ऐसे-ऐसे योगासन होते है कि आये दिन समूह से “लेफ्ट” का राईट विकल्प दबाना पड़ता है।
कुछ है कि ट्विटर पर टूलकिटनुमा योग कर रहे हैं ! कहीं से फॉरवर्ड दिव्य ज्ञान आ रहा है। कही से सीधे ग्राउंड फ्लोर गुप्त सूत्रनुमा खबर आ रही है। विपक्ष है कि आनलाईन ‛योग’ से ही अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर रहा है ! कुछ छद्म पाकशास्त्री भोजनालय में घूसपैठ कर गए हैं। जिसके कारण जीभ आनलाईन लपलपा रही है ! ऐसी आनलाईन योग मुद्राओं से प्रतिदिन मेरे जैसे कि साँसें प्रातःकालीन योग से स्थिर जब तक ही रहती है जबतक की ऑफलाईन रहो। जैसे ही ऑनलाइन हुए कि साँसें अलग ही तरह का “योग” करने लगती हैं । लॉकडाउन में ऐसा दोधारी योग कितना घातक है यह स्वयं यमराज भी ठीक से जान ले तो पृथ्वीलोक तरफ झांकें नहीं !

ऐसे ही अंडबंड योगासन की बहस में मेरे ‛सरकार’ कोरे ही उलझते रहते है। जो कि छोटे से छोटे आनलाईन योगी को “म्यूट, अनफॉलो व ब्लॉक” के विकल्प पता है। जब अभिव्यक्ति की होड़ में ऐसे सहज विकल्प उपलब्ध है तो फिर कड़ी निंदा के नाम पर शीर्षासन क्यों ? “जब मुँह ढकने तक के लिए गाइडलाइन जारी है तो फिर खालिमाली मुँह खोलने जैसी चेतावनियों से क्या होना है।”

लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में मैंने भी भोलेपन में दो-चार बार आनलाईन ‛योग’ करने का प्रयास किया। फिर क्या था ! आनलाईन योगीयों की कुछ ही कमेंट्स से मेरी साँसें फुलने लग गई। “जैसे-तैसे श्रीमतिजी के द्वारा बनाए काढ़े को पीने पर व सासुमां के कड़े निर्देशों के पालन से साँस में साँस आई।” बच्चों के माध्यम से मेरे मोबाइल पर कब्जा किया गया। कठोर निर्देशों के साथ चेतावनी दी गई, कि अपनी साँसों की सलामती चाहते हो तो खबरदार, “आनलाईन मत आना !”

खैर, जैसे कि “यह भी बीत जाऐगा !” वाट्सएप यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम अनुसार “फार्वर्ड” होते रहो और अपनी साँसों को ‛आल इस वेल-आल इस वेल’ अंदाज़ में शांति से समझाते रहो।
मित्रों, अब मेरी साँसें कह रही है कि उनके “नियमित योग” का समय हो गया है। आखिर मुझे भी तो योग करते हुए ‛आनलाईन’ आना है !
“योगस्थः कुरु कर्माणि ”....!!


भूपेन्द्र भारतीय 

Thursday, May 20, 2021

हे मधुशाला वीरो, अब तुम्हारी बारी....!!


               चित्र गूगल से साभार...


दानवीर कर्ण ने सबकुछ लुटा दिया अपने दानवीर गुण के कारण, शायद उससे भी बड़ी वीरता मधुशाला वीरो ने दिखाई है कि उन्होने अबतक की दोनों कोरोना लहर में मधुरस जिसे सनातन काल से सोमरस के नाम से जाना जाता है ! जिसे वर्तमान में मानक भाषा के गिरते स्तर के कारण इसे कुछ पियक्कड़ लोग शराब या दारू जैसे हल्के नाम से जानते है। ऐसे पवित्र रस का एक बार भी रसरंजन नहीं किया ! यह कहना सरकारी व्यवस्था व गिरते-उठते सामाजिक चरित्र पर शंका करना होगा।

इन महान मदिरा-मर्दो ने मद्यपान इतिहास के क्षेत्र में खलबली मचा दी हैं, वहीं सरकार भी बेसब्री से इन वीरो की तृष्णा को देखकर अपनी दयालुता दिखाने में बड़ी देर से आई, ऐसा सरकार को अब भान हुआ है ! उचित मूल्य की दुकान, अंग्रेजी-देशी माध्यम की दुकान से प्रगति करते हुए, सरकार अब आनलाइन शराब बिक्री योजना पर पहुंच चुकी। इस महामारी में भी सरकार के गहन चिंतन वाले इस मास्टर स्ट्रोक से “अद्भुत सामाजिक उद्धार नीति निकल कर आई है ।” भले बड़ी दरों के साथ आई पर लगता है दुरस्त आई !

जहाँ दुनियाभर के आम आदमी एक अदृश्य विषाणु से बचकर घरों में बैठे हो ओर रूखी सूखी खाकर काम चला रहे हैं । वही इतिहास में यह भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है कि मधुशाला वीर बगैर पीए जिये है ! जिस दिन से तालाबंदीयां हुई हैं, ‛सबसे ज्यादा चर्चा आम आदमी की जान की नहीं, अर्थव्यवस्था के प्राण की हो रही हैं।’ सरकार को अब कही जाकर अज्ञात सूत्रों से पता चला है कि अर्थव्यवस्था की चाल सिर्फ़ मधुशाला की ओर अग्रसर हो कर बढ़ सकती है ! “पीने-पीलाने से पनपेंगी अर्थव्यवस्था !” शायद यही है सरकार का मास्टर स्ट्रोक !

जबतक दुनिया की किसी भी गंभीर समस्या की चर्चा मधुशाला में बैठकर नहीं होती, तब तक उस समस्या का कोई समाधान और उसका कोई ओर-छोर नहीं मिल सकता हैं। इसलिए देर आए दुरूस्त आए कहावत पर अब खरा उतरते हुए, मधु-वीरो को नमन करना चाहिए। तथा ज्यादा पीने वालो को क्वारेंटाईन करके हर एक बैवड़े को अंग्रेज़ी-भाषा का एक-एक क्वाटर अतिरिक्त में मुफ्त में देना चाहिए। जिससे वे अपनी भाषा के माध्यम से विषाणु के विरुद्ध ऐंटीबॉडी बना सके। साथ में नामचीन साहित्यकारो की आनलाईन काव्य गोष्ठी का आयोजन हो। चुनौती पेश की जाए कि मधुशाला जैसे कविता संग्रह से भी बढ़-चढ़कर नये-नये काव्य संग्रह की रचनाओं का सजृन हो ! मधुशाला वारियर्स को काव्यांजलि अर्पित की जाए। इनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए सरकार “मद्दश्री जैसे पुरस्कार” की घोषणा भी सरकार शीघ्रता से करें।

सरकारी राजस्व की भी कुंजी मधुशाला के आबकारी कार्यालय से ही होकर खजाने की ओर जाती है, जिसे हम राजस्व कहते हैं वह वास्तव में मद्य पान करने वाले वीरो का ही आर्थिक बलिदान है। जिसे कोई भी अर्थव्यवस्था नकार नहीं सकती ! भले ही फिर वह पूँजीवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, गांधीवाद आदि कैसी भी व्यवस्था हो।

प्राचीन काल से लेकर कोराना काल तक ,स्वर्ग से लेकर पाताल तक अलग अलग रूपो-रंगों में वीर शिरोमणि मधु नरेश मद्य धारक रसरंजन कर्ता इतिहास ओर इस मानव जाति के सदा-सदा भाग्य निर्धारक व कल्याण करता रहे हैं !

अब जब कि सरकार ने बगैर कोरोना से डरे ओर मानवता को दाव पर लगाते हुए, अपने इन मद्य वारियर्स का उचित समय पर सम्मान ओर मधुशाला को पुनः खोलने का मन बना लिया है ! तो आम आदमी की जिम्मेदारी बन जाती हैं कि अपने-अपने राशन व प्राणवायु में से कटौती करते हुए, इन मधुशाला प्रेमियों के लिए अपनी-अपनी छत और बालकनी से चखना व खार-मंजन भी बरसाना चाहिए तथा देश की प्रगति में इनके इस महा-त्याग को देखकर बरसाना की होली में बरसाते रंगों की तरह अपने अपने घरों से नीर बरसाना चाहिए। जिससे ये मद्य नरेश हम सब के लिए कोरोना विषाणुओं की कोई अन्य लहर आने से पहले उसे अपनी पवित्र व ओजस्वी वाणी से आसानी से घर के बाहर ही सदा सदा के लिए सेनेटाईज कर दे। “तो हे मधुशाला वीरो ! अब एंटीबॉडी बनाने की तुम्हारी बारी....!!”


©भूपेन्द्र भारतीय

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