Tuesday, August 17, 2021

लो जी आ गए हम....!!

दैनिक जनवाणी

 लो जी आ गए हम....!! 


हाँ जी हम आ ही जाते है, जैसे किसी भी विवाह में फुफा-मौसा जी बीन बात पर बिगड़कर आते है ! वैसे ही हम हर बड़े आयोजन-उत्सव-त्यौहार पर आ ही जाते है। कभी किसी की जात पूछने या फिर किसी का धर्म पूछने, हम आ ही जाते है। किसको किस उत्सव या त्यौहार पर फटाके फोड़ना है और किसे नहीं फोड़ना है, किस तरह के कपड़े पहनना है आदि पर रायचंद बनकर हम आ ही जाते है। अच्छी भली दौड़ रही ज़िंदगी में हम खलल डालने आ ही जाते है। हमें आना ही पड़ता है क्योंकि हमें बगैर बुलाये आने की आदत है। 


हमें सड़क पर बेवजह आना अच्छा लगता है क्योंकि यह हमारा संवैधानिक अधिकार है ! हम ही तो वो जागरूक नागरिक हैं जो अपने संवैधानिक मौलिक अधिकारों को पूरी निष्ठा से उपयोग करते है। हमें ही सड़क जाम करके लोकतंत्र की रक्षा करते हैं। संसद में सभापति की ओर कागजों की गेंद बनाकर फेंकने वाले, वो भी हम ही होते है। क्योंकि हमें जनता संसद व विधानसभा में फेंका-फांकी करने ही तो चुनाव में चुनकर पहुंचाती है ! जनता हमें अपनी इसी सर्वकालिक प्रतिभा के कारण तो संसद में चुनकर भेजती है। हम ही है वो जो अपने क्षेत्र में जाने पर भी कहतें है कि “लो जी आ गए हम....!!” ‛हमारा स्वागत नहीं करोगें ?’ हमें सबसे ज्यादा राजनीतिक क्षेत्र में बगैर बुलाएं घुसना अच्छा लगता है।


हम ही है वे आदर्श मेहमान होते है जो किसी की भी रसोई में घुसकर अपनी चतुर बुद्धि से हर भोजन में मीनमेख निकाल सकते है। हमें यह बताना भी अच्छा लगता है कि किसे क्या खाना चाहिए और किसे क्या नहीं ! हमारे ही कारण कहीं पर भी पहुंच जाने से वहां के माहौल में खलबली मच जाती है। हमनें ही अपने राष्ट्र में संसद से सड़क तक वादों की झड़ी लगा रखी है। हम जहां भी पहुंच जाते है “लाईन वहीं से शुरू हो जाती हैं।” हम ही हर सभा में सबपर भारी पड़ते है ! सरकारी संस्थाओं व कार्यालयों में हम ही सबसे पहले पहुंचते हैं। सरकारी योजनाओं पर सर्वप्रथम हमारा ही अधिकार होता है ! 

       


अपना पड़ोसी हो या फिर हमारे देश का पड़ोसी, हमारे आने-जाने से ही तो आपसी संबंधों में ‛गर्माहट’ बनी रहती है। लेकिन जब हम अपने ही घर पहुंकर कहते है कि ‛लो जी आ गए हम !’ तो घर वाले कहते है ‛कोई अहसान नहीं किया है !’ “पहले अपने जूते बाहर उतारों व हाथ-पांव साफकर अंदर आना !” कहाँ तो हमारे आने-जाने से दुनियाभर में मान-सम्मान है लेकिन अपने ही घर में हमें “घुसपैठिये” कहा जाता है। इसी पीड़ा के कारण हम बहुत बार रूठकर विदेश चले जाते है। आखिर हमें वहां भी तो अपनी “लो जी आ गए हम” वाली प्रतिभा दिखाना होती है। 


आजकल हम सोशल मीडिया पर भी छाती चौड़ी करके कहते है, “लो जी आ गए हम !" हमने वाट्सएप विश्वविद्यालय के माध्यम से इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया है कि हम हर विषय पर धाराप्रवाह बोल सकते है। हमने कॉपी-पेस्ट करना इतना अच्छे से सीख लिया है कि हम घर बैठे-बैठे ही चार-पांच पीएचडी वालों जितना ज्ञान बांट सकते है। वे हम ही है जो हर सोशल मीडिया मंच की बहस में लाईक-कमेंट से ही अपनी विद्वता सिद्ध करते है। हमारे ही मार्गदर्शन में हर क्षेत्र में पुरस्कार बांटे जाते है। और फिर हम ही होते है जो पुरस्कार वापसी अभियान चलाते हैं। हम जब लंबा कुर्ता पहनकर कला के मंच पर चढ़ते है तो अच्छे-अच्छे कलाकार रास्ता नाप लेते है। कला व साहित्य के मंचों पर भी हमारी ही जागीरी चलती है। कुल मिलाकर हम कहीं भी जाए हमें कभी नहीं कहना पड़ता है कि “लो जी आ गए हम....!!" हमें सब जानते-पहचानते हैं।


भूपेन्द्र भारतीय 

९९२६४७६४१०

Sunday, August 1, 2021

समाचार में सक्रिय माननीय....!!

 समाचार में सक्रिय माननीय....!!

दैनिक जनवाणी में प्रकाशित....



आम आदमी की शिकायत रहती है कि नेता कुछ नहीं करते है। लेकिन उनकी दिनचर्या देख व पढ़कर लगता है कि दुनिया में सबसे व्यस्ततम् यदि कोई है तो यही माननीय ‛जन-गण-मन’ है। कैसे-कैसे चमत्कारिक रूप है इनके ! क्या तो अफलातूनी दिनचर्या रहती है ! और इनके साथी ! इनके पीछे अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे। अखबारों व मीडिया में भी इनकी खबरें बड़े चाव से छपती व पढ़ी जाती हैं। इनके समाचारों के शीर्षक एक बार पढ़ना शुरू करो तो रूक ही नहीं सकते....!!

आज माननीय ने दिनभर फोटू खिचाओं प्रतियोगिता में भाग लिया ! प्रभारी मंत्री जी का हार-फूल से स्वागत हुआ। चार पांच शोकाकुल परिवारों के घर जाकर संवेदना व्यक्त कर ढांढस बंधाया। चुनावी क्षेत्र में तीन स्कूलों में पौधारोपण किया। कई दिनों से इंतजार कर रहे ग्रामीणों से मिले प्रभारी मंत्री, जमकर लगे नारे ! बापड़े दिनभर क्षेत्र में धूल खाते रहे। शाम तक मंत्रीजी की कार पर एक कुंटल फुल मालाएं सवार हो गई !

एक नया-नया शीर्षक था, “हमारे दल में आए हो तो पार्टी का चाल-चलन व रिवाज अपनाना पड़ेगा”- एक बड़ी राजनैत्री ने दलबदलू नेता से कहा। अगले पृष्ठ पर कुछ ओर पंक्तियां थी... ‛विधानसभावार समस्या समाधान शिविर आयोजित करते रहें !’ एक क्षेत्रीय कद्दावर कार्यकर्ता के यहां एक बेशरम का व एक बांस का पौधा लगाया।
आज के दिन हाईवे से सटी गरीब बस्ती में नंगे-पुंग्गे बच्चों को चड्ढी-बनियान का वितरण किया।
चुनावी क्षेत्र में ग्रामीणों की समस्याएं अनसुनी कर, बहुत से कपड़े बांटे ! क्षेत्र के दौरे पर निकले जनप्रतिनिधि बाढ़ में फंसे, “आम जनता ने चार-पाई के सहारे राजधानी पहुंचाया !”

प्रभारी मंत्री ने दिनभर सैकड़ों समस्याओं से संबंधित ज्ञापन लियें और निजी सचिव को दे दिये। शाम तक सचिव ने आवेदनों को कुड़ादान को समर्पित कर दियें।
“पद और दायित्व बदलते रहते हैं, लेकिन कार्यकर्ता नींव का पत्थर होते है” :- एक तेजस्वी माननीय ने मंच पर भाषण के दौरान यह चमत्कारी वक्तव्य उछाला !

किसी समाचार पत्र में छपता है, ‛रिमझिम फुहारों के बीच क्षेत्र में दिनभर खुली जिप्सी में डमते रहे मुख्यमंत्री !’ “विपक्ष आरक्षण की राजनीति कर रहा है” :- सामाजिक विकास मंत्री ने कहा।
एक दिन में सुबह-दोपहर-शाम को मिलाकर तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को महामहिम राज्यपाल ने दिलाई शपथ।
मानसून सत्र के सातवें दिन भी विपक्षी दलों का दोनों सदनों में जोरदार हंगामा। सरकार ने कहा, विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं। सत्ता पक्ष कह रहा है, “चर्चा से क्यों भाग रहा विपक्ष ?"
वहीं एक राष्ट्रीय अखबार का शीर्षक, “ठहरी हुई संसद और जनता की साँसें फुल रही !”
संपादकीय पृष्ठ पर संपादक के मन की बात:- ‛दो घंटे की “मन की बात” में पीएम ने पांच हजार शब्दों में जन की बात की ! श्रोता सुनकर अभिभूत हुए।’

सदन में गूंजा ‛खेला होबे’, विपक्षी सदस्यों ने खेल-खेल में आसंदी पर फेंके कागज। सदन की कार्यवाही जरूरी कागजों के फाड़ने से रूकी। सदन की मर्यादा भूले सांसद, स्पीकर की ओर फेंके पर्चे...! ‛संसद में तनातनी आर-पार की ओर बढ़ी !’
अगले पृष्ठ पर बड़ा सा शीर्षक:- एक बड़े नेता ने कहा, “जासूसी, महंगाई और किसानों पर समझौता नहीं ! वहीं पृष्ठ के बुंदे में छपता है, “दल के ई-चिंतन में दल के बड़े नेता का कार्यकर्ताओं ने उद्बोधन सुना।" आखिर में आता है, ‛सभी क्षेत्रीय दलों पर भरोसा करें राष्ट्रीय दल, रचेंगे इतिहास:- एक राज्य स्तरीय राजनैत्री का बयान !’

अब जब इस तरह के आश्चर्यजनक समाचार शीर्षक पढ़ने-देखते में आते है तो लगता ही नहीं, कि हमारे माननीय कुछ काम नहीं करते है ! वे तो हर शीर्षक में भी कितनी सक्रियता से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 

Thursday, July 29, 2021

आरक्षण, जाति और मैं....!!

 आरक्षण, जाति और मैं !!

      
इमेज गुगल से...



आरक्षण व जाति जब तक अलग-अलग रहे इन शब्दों से मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं रही हैं, लेकिन जब से ये दोनों एकदूसरे के साथ आए हैं। मुझे इस ‛जोड़ी से नफ़रत’ है। इसलिए नहीं कि इनने मेरा कोई नुकसान किया हो। पर इनके साजिशन साथ आने से कितनों के ही साथ सामाजिक अन्याय हुआ है। वैसे मेरा तो इन दो शब्दों से इतना ही संबंध रहा है कि यदाकदा कोई नौकरी या शिक्षा से संबंधित फार्म भरा तो किसी कालम में जरूरी होने पर “जाति व आरक्षण की हाँ या नहीं में मौन स्वीकृति” दी है ! लेकिन मैंने कभी भी इन दोनों सामाजिक व राजनीतिक हथियारों का कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ नहीं लिया। क्योंकि “मेरे जैसा निम्न मध्यवर्गीय “भारतीय” समय पर भारतीय रेलवे में सीट आरक्षित नहीं करा पाता है, तो आरक्षण से नौकरी क्या ओर कैसे सुरक्षित करता !”

जब भी हमारे देश या किसी राज्य में चुनाव होते हैं तो इन दो शब्दों को बहुत ऊछाला जाता है। आरक्षण व जाति रूपी दो हथियारों से हमारे देश के नेता अधिकांश समय राजनीतिक फसल काटते आये हैं। फिर वो बलात्कार जैसे जघन्य अपराध हो या आत्महत्या जैसे कृत्य, हमारी राजनीति कहीं न कहीं जाति या आरक्षण का राजनीतिक फार्मूला निकाल ही लेती है। मैं जब भी किसी नेता से हमारे देश के विकास की बात करता हूँ तो वह मुझे मेरी जाति की याद दिला देता है ओर जब नौकरी की बात करता हूँ तो आरक्षण का रोना रोते हैं। ओर अंत में “आत्मनिर्भर” बनने की सलाह देकर मेरा वोट ले जाते है !

मैंने कितनी ही बार माननीय सर्वोच्च न्यायालय व कई विधि के विद्वानों के माध्यम से इन दो शब्दों के गुढ़ अर्थ व रहस्य को समझना चाहा है। लेकिन ‛हर तीन-चार महीनों में इनकी परिभाषाएं बदलती रहती है !’ “कभी मायलार्ड के पावरफुल माईंड की वजह से, तो कभी पोलिटिक्स के पावरफुल प्लान के कारण !” वहीं जिसके लिए वास्तविकता में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। वे लोग आजतक इन दो राजनीतिक-सामाजिक सांडों की आपसी लड़ाई में बागर(बाड़) की तरह नुकसान उठाते आए हैं। ओर स्वतंत्रता के दिनों से लेकर अबतक वहीं के वहीं हैं।
हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कोई तथाकथित दलित नेता चुनाव में आरक्षित सीट का फार्म भरता है लेकिन उसी फार्म में उसकी सम्पत्ति का विवरण करोड़ों में रहता है ! सात बार के सांसद-विधायक आठवीं बार भी चुनाव में उम्मीदवारी आरक्षित वर्ग की सीट से रहेगें, ऐसा सुनता हूँ तो लगता है “आरक्षण की प्रणाली के पीछे कौन-से सामाजिक न्याय का सिद्धांत काम करता है ?” इस दुविधा पर सामाजिक न्याय मंत्रालय को कितने ही पत्र लिखें, लेकिन आजतक उधर से जवाब नहीं आया। अब बेचारे मंत्रीजी जवाब दे भी तो कैसे ? वे स्वयं दलित उद्धार के नाम पर राजनीति करते-करते यहां तक पहुंचे हैं !

जाति का वर्गीकरण जिस गति से हमारे देश में होता आया है, कोई आश्चर्य नहीं कि अगले दस बीस सालों में हर दूसरा व्यक्ति अपनी अलग जाति की तख़्ती लेकर आरक्षण की भीख मांगता मिले ! ऊंच-नीच इन दोनों शब्दों में इतनी व्यापक स्तर पर है कि इनके चक्कर में कितने ही दलों की सत्ता कितनी ही बार ऊँची-नीची हो गई। कितने ही नेताओं के कुर्तें-पयीजामो का रंग बदल गया। कितने ही नौकरशाहों के बंगले बदल गए, कितने ही सरकारी कार्य जातिगत समीकरण देखकर फाईलों में रोके गए। हमारे नेताओं ने देश को चलाने के लिए नीतियां पश्चिमी देशों से आयात की ओर सत्ता में आने के लिए जाति व आरक्षण का सहारा लिया ! ओर इसी कारण यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं कि “जाति और आरक्षण का चश्मा, हम भारतीयों को कभी एक नहीं होने देगा ! जिसके कारण नेता अपनी-अपनी रोटी सेकते रहेंगे और आम आदमी गरीबी की आँच में जलता रहेगा !”

मैं तो ईमानदारी से कहता हूँ कि मुझे आज तक आरक्षण व जाति से कोई शिकायत नहीं रही। क्योंकि मैं न तो आरक्षण के दायरें में आता हूँ, न ही मुझे जाति शब्द से कोई गिला-शिकवा है। मुझे तो खुशी है कि चलो इन दोनों से कुछ लोगों की राजनीतिक-सामाजिक दुकानें तो चलती हैं। हाँ इन दोनों के साथ आने से मुझे साजिश की बू आती है। जिस तरह से हर चुनाव में आरक्षण को यथावत कायम रखने के किसी साश्वत नियम की तरह वादें कीए जाते हैं ! मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि हमारे देश से कोई “माई-का-लाल” आरक्षण व जाति के वर्तमान स्वरूप में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। क्योंकि यदि ऐसा कुछ भी गलती से हो गया तो कितनों की ही राजनीतिक दुकाने बंद हो जाएगी।



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Wednesday, July 21, 2021

जा रही है यह लहर भी....!!

 


जा रही है यह लहर भी....!!

         
                   दैनिक जनवाणी मेरठ में.... 

हमारे उत्सव प्रधान देश में हर बात पर उत्साह से उत्सव मनाना जरूरी है। यदि हम ऐसा न करें तो हमें किसी भी काम को करने में मज़ा नहीं आता है। भले किसी के बालक का मुंडन संस्कार हो या फिर हमारी गाय को बछड़ा हुआ हो या फिर पड़ोसी देश की क्रिकेट टीम, मैच में हमसे हारी हो। कुछ तो गाजा-बाजा बजना ही चाहिए ! हम तो आपदा में भी उत्सव का अवसर निकाल ही लेते है। हमें कोई न कोई आयोजन करना ही होता है। आखिर हम उत्सव प्रेमी जो ठहरे।
ऐसे ही उत्सव रूपी आयोजनों की ‛लहरें’ हमारे यहां सालभर आती जाती रहती हैं। कोरोना की लहरें तो पीछले दो साल से आ रही है लेकिन हमारे भारतवर्ष में हजारों सालों से जाने कितनी लहरें आती जाती रही है।

     
कभी ज्ञान की लहर आई थी, तो कभी-कभी अज्ञान की भी तगड़ी लहर आती रही है। कभी विदेशी यात्रियों की लहर आई और उनके पीछे बाहरी लूटरों का भी काफिला घुस आया। कभी धर्मनिरपेक्षता की लहर आती है ओर अर्धम का बवंडर खड़ा कर जाती है। सदियों पहले धर्म परिवर्तन की लहर आई जो अब तक भी देखी जा सकती है। लहरों के हम जनक है ! हमने ही आधुनिक युग को “भ्रष्टाचार लहर” से लाभान्वित किया है। कभी हमारे गाँवो में दूध-दही की धाराप्रवाह लहर रहती थी और आज है कि हर गांव में देशी शराब व रसायनिक दवाइयों की लहर से वर्तमान पीढ़ी पिलपिलाकर लपलपा रही है।  
             

          दैनिक ट्रिब्यूनल पंजाब में.....

बहुत बार ऐसा लगता है कि “जा रही है यह लहर भी” पर फिर कोई नई लहर जन्म लेती है। लगता है हमारे यहां लहरों के लिए सबसे ज्यादा ऊपजाऊ भूमि है। “भले नई लहरों के बीज देश के बाहर से आये, पर हम इन लहरों को सिंचित-पोषित-पुष्पित करने में बड़े जुगाड़ी है।” और क्यों न हो ! जुगाड़ी होने की विश्वख्याति से हमें ही मनोनीत किया गया है। हम जिस ओर चल दे, लहरें अपने-आप बनने लगती है।

“लहरों पर सवार होना”, हमें बचपन से सिखाया जाता है। कभी होनहार बालक बनने की लहर पर, तो कभी कामयाब युवा होने के लिए लहरों में धकेल दिया जाता है। पीछले दिनों ऐसी लहर आई कि उसके कारण अबतक शौक संवेदनाओं की लहर चल रही है। वहीं शौक संवेदनाओं की लहर को माननीयों ने ऐसा लपका की उसके कारण गांव-कस्बों में अबतक राजनीतिक बवंडर चल रहे हैं। वहीं स्वतंत्रता के बाद से आजतक ‛विकास’ की लहर चलाने के भी वादें होते आए हैं ! लेकिन विकास की लहर का हम अबतक इंतज़ार कर रहे है।
विगत दिनों दूसरी लहर में लॉकडाउन के कारण अपने ही घर में घीर गई जनता अब घर से ऐसे निकल रही है ! मानों पर्यटन और सेर-सपाटे के लिए जैसे कोई सरकारी आदेश निकला हो और यहीं भोली जनता उस आदेश का ईमानदारी से पालन कर रही हो ! हमारे देश की सड़कों, चौराहों, सरकारी भवनों के आसपास प्रतिदिन ऐसी कोई न कोई “जन-गण-मन की लहर” बैठती-उठती-दौड़ती ही रहती है। प्रतिदिन समाचार पत्रों व सूत्रों के हवाले से आई खबरों में नीत-नई लहरों की तूफानी जानकारी रहती हैं। इन दिनों इन्हीं आती-जाती लहरों के घटाटोप से मन बौराया जा रहा है....!!



भूपेन्द्र भारतीय 

Tuesday, July 6, 2021

व्यस्त लोगों की दुनिया....!!

 

नईदुनिया अधबीच में प्रकाशित....


 व्यस्त लोगों की दुनिया....!!


व्यस्त लोगों की दुनिया भी विचित्र घटनाओं से भरी चलती है। आप वर्तमान समय में व्यस्त भले न हो पर लोगों की नज़र में दिखना जरूर चाहिए। आपका कोई मित्र आपसे घर मिलने आये और आप उसको सीधे फोकटिया टाईप टीवी देखते मिल जाओ ! आपकी कोई इज्ज़त नहीं करेगा। लेकिन आप बाथरूम में हो ओर आपकी पत्नी आपके मित्र से कहें कि ‛भय्या वे तो अभी पुजा कर रहे है’ ! “यहीं बात आपके सम्मान में चार चाँद लगा देगी।" मित्र भी सोचने लगेंगा !, “ये आजकल भक्ति-भाव में कितना व्यस्त रहता है।”

मेरे एक मित्र ने व्यस्त दिखने के लिए अपने घर की छत पर एक छोटी-सी वाटिका तैयार कर ली। एक दिन उसी मित्र से मिलने गया। “भले ने मिलने के लिए एक घंटा प्रतिक्षा करवाई !” ओर ऊपर से कहता है क्षमा करना यार, आजकल व्यस्तता बढ़ गई है। इतने सारे काम हो गए हैं कि पता ही नहीं चलता दिन कैसे निकल जाता है। ऊपर से इन पौधों का भी ध्यान मुझे ही रखना पड़ता हैं ! ‛हमारे घर में सभी बहुत व्यस्त रहते हैं।’ जो कि सारे मोहल्ले को पता है, “भला पत्नी की नौकरी पर ही सारे मजे छान रहा है।” दिनभर घर के ही काम में व्यस्त रहकर आराम फरमाता है। शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि “काम कोड़ी का नी और फुर्सत घड़ी भर की नहीं।”

ऐसे ही घरघुस्सू व्यस्त श्रीमानों के रखरखाव के लिए सरकारों को आगे चलकर “बिजी बंदों का रखरखाव” जैसी योजना बनाना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं होना होगा। कुछ व्यस्त लोग गलती से कभी कहीं घर से बाहर निकल जाये, तो पुरी दुनिया इनकों आफत लगती है। हर चीज में ये नुक्स निकालेंगे। सड़क पर कचरा दिखा तो सरकार को कोसेंगे, गाय इनके रास्ते में आ गई तो गौ रक्षकों को गाली देगें, सड़क पर ट्राफिक है तो पूंजीवादियों को बुरा-बुरा कहेंगे, गतिरोधक आ गया तो पड़ोसी की माँ-बहन करेंगे, अचानक से बारिश होने लगे तो सीधे इन्द्र देव को ही दो चार गाली बक देते हैं ! न जाने क्यों इन व्यस्त जैसे दिखने वालें लोगों को हर एक बात से परेशानी होती है ? मौसम व प्रकृति तक को ये अपनी प्रतिक्रियाओं से नहीं छोड़ते हैं !

फिर भी समाज में इनकी बड़ी इज्ज़त रहती है ! इन्हें फोन करो तो फटाक से कहते है, “अभी बिजी हूँ थोड़ी देर से लगाता हूँ !” इनके जैसों के बारें में सोचकर लगता है कि कहीं ‛बिजी’ शब्द, “लेजी” का पर्यायवाची तो नहीं हो गया है ? किसी भी जगह या कार्यक्रम में देर से पहुंचना इनकी व्यस्तता का पैमाना है। इन्हें लगता है कि देर से पहुंचने पर लोग इज्ज़त करते हैं। “जैसे नेताओं के देर से आने की आदत के कारण उनका मान-सम्मान होता है ! और उन्हें बड़ा आदमी माना जाता है।”

“व्यस्त रहो और मस्त रहो”, नारें का असली आनंद यही ‛व्यस्त’ रहने वाले महामानव ले रहे हैं। ऐसे ही व्यस्त लोगों से हमारे देश के सरकारी भवन भरें पड़े। शिक्षा संस्थानों के आसपास घांस काटते ऐसे “व्यस्ततम्” नौजवान आसानी से देखें जा सकते है। इनकी व्यस्त दिनचर्या में सरकारी फाईलों को तकिया बनाकर व्यस्तता को जीवंत रखा जाता है।

आजकल तो व्यस्तता का पावर-पैक हर किसी ने अपने मोबाइल में डलवा लिया है। ऐसा लगता है जैसे दसों दिशाओं में कुकुरमुत्तों की तरह व्यस्त लोगों का खेला हो रहा है। इनकी व्यस्तता जंगल के उस सरपंच(बंदर) की तरह है जो एक डाल से दूसरी डाल पर दिनभर कूदा-फाँदी ही करता रहता है लेकिन उसकी नीयत सभी जानते है।
खैर, आजकल की इस “व्यस्त” दिनचर्या में मानव आखिर कितना व्यस्त रहे और कितना दिखें, यह शोध का विषय है ! पर शोध में भी बौद्धिक परिश्रम लगता है और ऐसे में व्यस्तता की मस्ती से फुर्सत मिले तो कुछ ओर सोचें....!!


भूपेन्द्र भारतीय 


Friday, June 18, 2021

कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

 कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

            
                  
दैनिक ट्रिब्यूनल में प्रकाशित....


हम तो उनकी गाइडलाइन पढ़कर ही दो साल से टाईम-पास कर रहे हैं। भला है बौद्धिक प्रबंध पहलवानों का, जो आम जनता के लिए गाइडलाइन निकालने का प्रबंध कर दिये ! नहीं तो इस कोरोना महामारी में जनता घर बैठे बैठे भला करती ही क्या ! अब हर नागरिक के पास ठेला तो है नहीं, कि भरचक लॉकडाउन में चल दीये फल-सब्जी बेचने। ओर गाइडलाइन भी छोटी-मोटी नहीं ! हर आठ दिन में पन्द्रह-पन्द्रह पन्नों की गाइडलाइन। मेरे जैसा तो अपनी दसवीं-बाहरवीं की फाईनल परीक्षा में इतना गंभीरता से नहीं पढ़ा। जितना ध्यान लगाकर इन कोरोना गाइडलाइनों को जनता जनार्दन चाव से पढ़ती है और सोशल मीडिया पर दनादन शेयर करती हैं !

मुझे अब भी पूरा विश्वास है। यदि कोरोना विषाणु को पकड़कर ये गाइडलाइनें पढ़कर सुना दी जाए, तो कोरोना गाइडलाइन के सम-विषम नियम से ही ढेर हो जाये। इन गाइडलाइंस को पढ़कर पहली बार पता चला कि विषाणुओं को भी सप्ताह में एक दिन छुट्टी पसंद है। हो सकता है कि सरकार को विषाणुओं के किसी गुप्त संगठन ने पहले ही गुपचुप छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया हो ? कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कोरोना के सारे लक्षण मानवीय लक्षणों जैसे ही क्यों है ? उसके लिए भी रात में रात्रीकालीन कोरोना कर्फ्यू लगता है ! मतलब कोरोना को भी रात में ही सोना पसंद है ! उसे किसी तरह का मानवीय व्यवधान पसंद नहीं ! आश्चर्य है ! कोरोना को पब-पार्टीयां पसंद ही नहीं है ?

गाइडलाइन के गहन अध्ययन से ज्ञात हुआ कि कोरोना को शहरी क्षेत्र पसंद है ! वैसे वह भी शहरी लोगों की तरह कभी कभी हवाखोरी करने ग्रामीण क्षेत्रों के ओर निकल जाता है। ये गाइडलाइनें ही है, जो हमें समझाती है कि अभी मानव को बहुत कुछ समझने जानने की जरूरत है। “मानवीय बुद्धि के अलावा भी कोई अदृश्य शक्ति है जो कोरोना गाइडलाइनों को बनाती है।” आज यदि आइंस्टीन भी होते तो जरूर ऐसी गाइडलाइनें पढ़कर चक्कर खा जाते है ! उन्हें सिर्फ़ इन गाइडलाइनों को पढ़ने के लिए ही कोई नया सिद्धांत खोजना पड़ता।

कभी कभी तो गाइडलाइनों का पालन करना माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जैसा ही लगता है। सोचता हूँ कोई जनरल स्टोर वाला ऐसी स्थिति में क्या करता होगा ? जब उस जनरल स्टोर में सुईं से लेकर हेलीकॉप्टर तक के सामान मिलतें हो ! वह बेचें तो क्या और बंद रखें तो क्या ? वहीं पीने की दुकान को खोलने की अनुमति हो, पर पीके साहब पीकर खाने कहां जाए ? वहीं सबसे बड़ी चुनौती है मास्क लगाने की ! जब मास्क लगाना अनिवार्य है। तो फिर हर बार मास्क लगाने के लिए हर आठ दिन में गाइडलाइन की क्या जरूरत ? लगता है जनता को नई-नवेली दुल्हन की तरह गाइडलाइनों से प्यार हो गया है। उसे भी गाइडलाइनों की लत लग गई है।

खैर, "जान है तो जहान है !" लगता है “गाइडलाइन की गाइड-लाइन पर चलना ही नियति हो गई है।” हो सकता है कोरोना विषाणु गाइडलाइनों की मार से ही मात खा जाये। मेरा तो मत है कि जनता एक दिन अपनी-अपनी छत से गाइडलाइनों का सामुहिक पाठ करें। जिससे हो सकता है कोरोना इस सामुहिक गाइडलाइन पाठ से निपट जाये। और हम उसके बाद गाइडलाइनों के चंगुल से बाहर निकल सकें। इसलिए आम आदमी “गाइडलाइनों का पाठ करते रहे....!!”


भूपेन्द्र भारतीय



Wednesday, June 9, 2021

वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!

 वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!


कार्टून गुगल से साभार



वैसे तो यह युग इंटरनेट के माध्यम से मोबाईल-क्रांति का हो गया है, फिर भी राजनीति में हाशिये पर आ गए एक दल के कुछ बचे कुचे वरिष्ठ वयोवृद्ध नेता अब भी पत्र लिखना जानते है ! जहां आज की युवा पीढ़ी वाट्सएप भाषा शैली में तीन शब्दों में एक पत्र का सारा कच्चा चिट्ठा बयां कर देती है ओर संदेश को पूर्ण आहुति दे देती है। फिर भी आत्मा की आवाज़ सुनकर व बची कुची राजनीति को दाव पर लगाकर इन तथाकथित वरिष्ठ वयोवृद्ध नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपने दल की रानी साहिबा को सत्ता से विहीन होने के दर्द में अब कही जाकर एक पत्र लिखकर ‛पत्रचार' किया। जो मोटे-मोटे तौर पर कुछ इस तरह से कागज़ पर उतरा:-     
                                                  इस पत्र में दल की दुर्दशा के बारे मे कम ओर अपनी दिशा-दशा पर वरिष्ठ सदस्य खुल कर बोले होगे। रानी साहिबा से दल की वस्तुस्थिति पर सिर्फ़ भूरी-भूरी तौर पर चिंता व्यक्त की होगी, क्योंकि रानी से प्रश्न तो कोई पुछ सकते नहीं। वैसे ही जैसे बिल्ली के गले में घंटी बांधे कैसे और कौन ? इस पत्र में रानी के पुत्र की अयोग्यता पर भी दबी-दबी जुबान मे बातें कहीं गई होगी, “पर रानी ने इस बात पर वरिष्ठों के कान मरोड़ दिये होगें !” वरिष्ठ नेताओं मे कुछ फुलटाइम वकालत करने वाले भी है उन्हें रानी के पारिवारिक कानून के तहत दोषी ठहराकर दंड दिया गया है, ऐसा सूत्रों से पता चला है ।

इन वयोवृद्ध वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने पत्र सिर्फ़ दल का कल्याण चाहने की मनसा से लिखा होगा न कि अपना ! इसमें मुझे भारी संशय है! लेकिन हर बार की तरह रानी ने इसे अपने परिवार के खिलाफ षड्यंत्र समझा होगा ओर फिर रानी ने पत्र पर बगैर किसी चिंतन-मनन के एकतरफा एक ही दिन में फैसला कर लिया कि वे स्वयं फिर अगले छः माह तक दल की रानी साहिबा बनी रहेगी । एक दो सदस्यों ने दल के आंतरिक लोकतंत्र व सूचिता की भी बात इस पत्र में उठाई होगी, पर उस पर रानी ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा- “हमें लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाये, हमारे परिवार ने लोकतंत्र की देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक पुजा-पाठ की है!”


वैसे पत्र लिखने की परंपरा रानी साहिबा के परिवार में बहुत पुरानी है। इनके एक पूर्वज अपनी पुत्री को जेल में से पत्र लिखते थे ओर उन पत्राचारों मे देश-दुनिया की खबर देतें थे। लेकिन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का पत्र गलती से रानी साहिबा के ही परिवार की खबर लेता होगा ! जो कि रानी के लिए नाराजग़ी का विषय बन गया होगा। ओर इसके ही कारण रानी की नाक चण गई होगी ! ‛नाक’ की बात से याद आया, “रानी की पुत्री राजकुमारी की नाक अपनी दादी की नाक से मिलती है, इसके ही दम पर कुछ दिनों से राजकुमारी दल मे दमखम रखना चाहती है !” ओर रानी साहिबा के बुजुर्ग दल का नाक के दम पर नेतृत्व करना चाहती है !

खैर रानी साहिबा ने पत्र का सरसरी तौर पर अध्ययन किया होगा ओर यह पाया होगा कि “ये सत्ता के लालची वयोवृद्ध कार्यकर्ता सत्ताधारी दल से मिले हुए हैं, इनकी आपस में मिलीभगत है!” रानी के ‛चिरकुट युवा पुत्र’ ने भी वरिष्ठ सदस्यों पर आरोप लगाया होगा कि इनकी दूसरे दल से मिलीभगत है। ओर इसी के आधार पर रानी ने पत्र को कागज़-पत्तर समझकर फाईलों में दबा दिया होगा। शायद इसलिए ही अपने कुनबे पर आंच न आये रानी ने फिर अपना चलताऊ निर्णय सुना दिया कि अभी वे पत्र का छः माह तक ओर गहन अध्ययन करेगी, ओर फिर वे स्वंय भी एक पत्र लिखेगी ! जैसे दुनिया उम्मीद पर टीकी है, वैसे ही इस दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता पगड़ी बांधकर मंच सजाये बैठ गए हैं, कि चलों शायद रानी साहिबा का अगले छः माह बाद आने वाले पत्र में इस वयोवृद्ध वरिष्ठ नेताओं के दल को कोई नया राजकुमार-राजकुमारी मिल जाए।

ओर अंत में जब लेखक इन सब बातों की कल्पना कर रहा था, तो न जाने क्यों लेखक के मन में बाबा नागार्जुन की लिखी कविता ‛आओ रानी’ की पंक्तियाँ घनघना रही थी !!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !!



भूपेन्द्र भारतीय


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