Friday, April 2, 2021

मन लगने लगा यार फकीरी में....!!

 दूसरी लहर में फकीरी महोत्सव••••!!


            दैनिक ट्रिब्यूनल समाचार पत्र में प्रकाशित


फकीरी बड़ी काम की चीज है। इसे कोई सरकार नहीं हिला सकती है। यदि जनता ने ठान लिया है कि हम तो ठहरे फकीर, हमको मजा है सबुरी में ! फिर सरकार बनाते रहे बड़े बड़े बजट ! कोई आर्थिक क्रांति नहीं होगी। ओर मैं तो कहता हूँ कि अब जनता को फकीरी के मार्ग पर अग्रसर हो ही जाना चाहिए। वोट मांगने की यात्रा के इस अमृत महोत्सव में जनता को एक फकीरी महोत्सव की भी शुरुआत कर ही देना चाहिए। क्या रखा है बजट की चर्चा में ! आप तो सदन का बहिर्गमन करते रहो। जनता फकीरी में जीना सीख लेगी। आपकी यात्रा का बजट कम नहीं होना चाहिए। वोट लेने के बाद आपकी मगरूरी में कोई कमी नहीं होना चाहिए !

मेरे जैसे साधारण लेखक ने तो फकीरी में मन लगाना सीख लिया है। “मन लागो यार फकीरी में” भजन शुरू कर दिया है। कुछ ज्ञानी पेट पर प्रश्न करते हैं कि पेट कैसे भरेगें ? पेट का क्या है ! सोशल मीडिया है ही। भर लेगें लाईक-कमेंट के सहारे। वादों की ढकारें खाते रहो ! कम से कम फकीरी के माध्यम से हर माह की आर्थिक चिंता से तो बच ही जाऐंगे ! फकीरी से आशा तो है कि इससे ही व्यक्ति ‛आत्मनिर्भर’ बना जा सकता है! निकल चलों फकीरी की राह पर। वैसे भी आजकल आंदोलनजीवी है ही हर चौराहे पर ! खाने पीने का जुगाड़ तो धरने-आंदोलनजीवीयों के माध्यम से हो ही जाऐगा। और ज्यादा नहीं तो फकीर बनकर चुनावी राज्य में तो जाया ही जा सकता है। पेट व कोरोना की चिंता से चुनावी राज्य में फकीरी अच्छे से कट सकती हैं।

क्या रखा है अमीरी में, कबीर साहब खुद कह गये है। कुछ नी रखा है अमीरी में ! दिनरात आखिर कब तक हर चीज की फिक्र करो। फकीरी में मजा ही अलग है। फकीरी मोड में रहकर किसी को भी गरीया दो तो कोई बुरा नहीं मानते। वैसे आप सच को सच कहोगे तो हर मोर्चा आपके खिलाफ हो जाऐगा। फाईलों में आपके नाम के आगे “लाल निशान” लग जाऐगा। हो सकता है फकीरी अंदाज़ में आप सत्ता के शिखर तक पहुंच जाओ !बस इतना करना होगा कि निस्वार्थ भाव से राजनीति करते रहो !

ऐसा लगने लगा है कि फकीरी वह संजीवनी बूटी है जिससे रामराज्य प्राप्त किया जा सकता है ! कोरोना जैसी महामारी में हमने फकीरी के सिवाय किया ही क्या ! फाकामस्ती में पड़े रहे और रोटी तोड़ते रहे। बेचारी सरकार ने हमारी कितनी खिदमत की ! और अब देखो हमारा आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए वैक्सीन ले आई। इस दूसरी लहर के आगमन पर सरकार हमें एक ओर अवसर देना चाहती है फकीरी के लिए। वैक्सीन लगाओ ओर फकीरी बुस्ट करो !

क्या रखा है फोकट की होशियारी में ! भेले हो जाओ फकीरों की टोली में। आत्मनिर्भर तो बन ही जाओगे, साथ ही साथ आपका इम्यूनिटी अलग से बढ़ जाऐगा। फकीरों से कोई नेता ‛मत मांगने’ भी नहीं आता ! आप लोकतांत्रिक रूप से भी स्वतंत्र हो जाओगे। तो इतना सोच विचार क्यों कर रहे हैं? जल्दी से फकीरी के कपड़े सीला लो और निकल पड़ो तड़के ही फकीरी के पथ पर। भले ही कोई साथी मिले या न मिले “एकला चलो” के ध्येय मार्ग पर ही बढ़े चलो। क्योंकि फकीरी भी आजकल एकला चलों राजमार्ग पर चल पड़ी है।



भूपेन्द्र भारतीय

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