Friday, April 23, 2021
कवि की फोटोजेनिक जनसेवा....!!
कवि जनसेवा में ही अपने जीवन को सार्थक समझता है। ‛कविता भले कैसी हो, कवि का अखबार में फोटो अच्छा छपता रहे।’ कवि जब भी समाज को कुछ देता हैं तो फोटो खेंचने वालें को पहले आगे करता है। कवि का फोटोग्राफर आधी रात को भी तैयार रहता है। इधर कवि ने हाथ ऊंचा करके “अपनी जनवादी-कविता” की पंक्ति श्रोताओं की ओर फेकी उधर फोटोग्राफर फोटो के लिए लपका। वर्तमान में जनता को जनसेवा के नाम पर कुछ दान में दो ओर फोटोशूट न हो फिर कैसा दान ! ओर फिर अगले दिन अखबार में यह सब न छपे तो दान करना मानों व्यर्थ सा लगता है !
जब जब देश दुनिया में संकट की घंटी बजतीं हैं कवि अपने फोटोग्राफर को साथ लेकर दीन दुखियों के बीच पहुंच जाता हैं। ‛कवि से दुख देखा नहीं जाता हैं !’ शायद इसलिए ही बिरहा व करुण रस कवि के प्रिय रस है। अब देखो न कोरोना काल में कवि ही तो हर जगह बढ़ चढ़कर मदद कर रहा है। किसी को फिरि का मास्क पहना रहा है, तो किसी को दो किलों अनाज दे रहा है। वहीं हर दिन फेसबुक के माध्यम से अपनी जनवादी कविताओं द्वारा जनता को क्वारेंटाईन कर रहा है। कभी कभी ट्वीट करके आम आदमी की पीड़ा को सेनेटाईज कर रहा है ! लोगों की मदद करते हुए कैसी-कैसी मनोहर फोटो कवि की अखबार, फेसबुक, टीवी, ट्विटर पर आ रही है। कवि इस महामारी में मास्क, दवाईयां, आक्सीजन सिलेंडर आदि बांटकर डॉक्टर व सरकार से भी बड़ा काम कर रहा है। कवि ने कोरोना टीका लगाया तो फोटोशूट करवाया, ओर क्या ही गजब फोटो आया ! ऐसा फोटोशूट तो कवि का अपनी शादी में भी नहीं हुआ था। “ऐसा लगता है कि कवि ने अपनी फोटो से सबकुछ लाकडाउनमय् कर दिया है।”
जब भी कवि चौराहे पर खड़ा होकर बगैर मास्क वालों का चालान काटता है तो फोटो में चालान दिखे या न दिखे पर कवि का फोटो मुस्कुराते हुए आ जाता है। कवि को जनसेवा में कोरोना का खतरा दिखता है पर व्यापार-धंधा करते समय कोरोना-वोरोना कोई संक्रमण का डर नहीं लगता है। कवि राजनीतिक रैलियों में फोटोशूट करवाये बगैर नहीं रह सकता है। कवि को पूरा विश्वास है कि अपनी कविताओं के माध्यम से की गई राजनीतिक भीड़ से कोरोना समाप्त हो जायेगा। कवि को लगता है कि हर चौराहे पर उसके फोटो का बड़ा सा कटआऊट होना चाहिए। जिससे जनता में उसके सक्रिय होने का भ्रम बना रहे व कोरोना का कहर अपने आप कम हो जाए। ‛कवि आपदा में ही अपने फोटोस् से अपनी सफलता का अवसर खोज रहा है।’
कवि के इस फोटोजेनिक कर्मकांड व जनसेवा का असर हर ओर हो रहा है ! कभी वह कोविड सेंटर में दवाई व आक्सीजन सिलेंडर दान करते हुए फोटो खींचा रहा है तो कभी मुक्तिधाम में मुर्दों के साथ विडियों बना रहा है। कवि अपने मीडिया साथियों के साथ चप्पे चप्पे पर डटा है। कवि के फोटो में बस कोरोना विषाणु ही नहीं आ रहे है नहीं तो कवि उसे भी अपनी कविता से काल-कवलित कर दे। “कवि ने मानव संवेदना पर महाकाव्य लिख दिया है!”
कवि के घर वाले परेशान हैं, कही कवि जनसेवा में कोरोना संक्रमित न हो जाये। वैसे कवि के कवित्व की प्रतिरोधक क्षमता इतनी अच्छी है कि उसने बड़े-बड़े कविता मंच बैठा दीए है। ये छोटा मोटा संकट उसके कालजयी कवित्व का क्या बिगाड़ लेगा ! कवि के घर वालों से कहना चाहता हूँ कि वे कोई भी फिक्र न करें। कवि अपनी कविताओं के साथ फोटो खिंचवाते हुए जनसेवा में लगा हुआ है।
(ईमेज गूगल से साभार)
©भूपेन्द्र भारतीय
२०५, प्रगति नगर, सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(४५५११८)
मो. ९९२६४७६४१०
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