कवि पर व्यंग्यकार होने का आरोप हैं !
कवि कुछ वर्षों पहले तक के समय में सिर्फ़ कविता ही लिखता-पढ़ता था। अपने अच्छे दिनों को प्रेम व श्रृंगार रस के माध्यम से काव्य में पिरोया करता रहता था। कवि जैसे जैसे दुनिया जहान के झंझटों में उतरता गया, उसके कवि ने उससे मुख मोड़ लिया ! कहाँ वह प्रकृति कुमार जैसी बातें करता था और अब उसकी बातों में विकार आने लगे हैं। कवि अब न जाने कौन-सी ऊलटी-सीधी, उलजलूल, उलझी, तिखी-तिरछी-तेड़ी नजर, उलटबांसी, कटाक्ष, हास्यरंजनी, नश्तर-पस्तर, अधबीच वाली बातें करने लगा है ! कवि के साथियों का उसपर आरोप है कि वह व्यंग्यकार हो गया है ! कवि जब कभी कवि था ! तो क्या गजब की मन की बातें करता था ! अपनी काव्य रचनाओं से मंच सजा-मचा देता था। ओर अब देखों ! अपने मन की बात से हटकर जन-जन की बात करता है !
लेकिन कवि को स्वंय पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है। वह तो अब भी अपने अच्छे दिनों को ही याद करके दिन काट रहा है। कॉलेज के दिनों में कवि बैक-बेंचर था। अब वह मतदाता के तौर पर मतदान केंद्र की पंक्ति में वोट बैंक की तौर पर खड़ा है। कहीं रेलवे स्टेशन की लाईन में खड़ा है। तो कहीं सरकारी कार्यालय के बाबूजी की कुर्सी के सामने मुँह लटकाए खड़ा है। देखो, “कवि बैक-बेंचर से आगे बढ़कर मतदाता पंक्ति में खड़ा आम आदमी बन गया है।” वह अब कविता नहीं लिखता है। लिखे भी कैसे, उसके पीछे घर के खर्चों के तमाम बिल जो पड़े हैं। कवि से उसके साथी कहते हैं कि वह सरकार की आलोचना क्यों करता है ? कवि का कहना है कि उसने किसी सरकार के बारे में कुछ नहीं कहा है। वह तो अधिकांश दिन घर पर बैठकर पकोड़े तल रहा है। और अपनी ही सरकार अपनी ही पत्नी का हाथ बटा रहा है।
कवि पर आरोप है कि वह सरकारी कर्मचारियों की कथनी और करनी की चिकनी-चुपड़ी बातें करता है। कवि कविता को छोड़कर व्यंग्य की पगडण्डी पकड़ लिया है ! प्रकृति का वर्णन करते करते, वह सामाजिक-राजनीतिक विकृति की चर्चा कर रहा है। उसे किसने अपना क्षेत्र बदलने की आज्ञा दी ? उसपर आरोप है कि उसके ही कारण कविता के रसिक कम होते जा रहे हैं। वह अब अपनी कविताएँ सिर्फ़ अपनी ही प्रेमिका बिकम् पत्नी को ही सुनाता है ! जिससे उसके पड़ोसी परेशान हैं। कहाँ कवि बहारों की बातें करता था। और अब देखों अंधे-बेहरौ को समझाने में लगा है।
कवि से सवाल पुछे जा रहे हैं कि उसे क्या पड़ी है ? जो हर दिन वह सोशल मीडिया पर नेताओं से प्रश्न कर रहा है। उसे क्या मतलब, जो वह शिक्षा व स्वास्थ्य की स्थिति पर कलम घसीटता है। “वह अपनी कविता क्यों नहीं लिखता है ?” क्या है जो उसे बात बात पर उकसाता है, जो वह इतना सब कुछ लिखता है ! अब तो उसके मित्र भी कहने लगे हैं कि वह पहाड़ो पर चढ़ जाये। वहाँ उसे कविता लिखने का सुहाना मौसम व सुंदर नजारें मिलेंगे। कवि कहां यहां अपना कवित्व बर्बाद कर रहा है। पर कवि ढीढ हो गया है ! कविता जैसे दिव्य मार्ग को छोड़कर कवि ऊबड़ खाबड़ व्यंग्य पगडंडी पर चल निकला है ! यह अब आरोप ही नहीं, धीरे धीरे सिद्ध भी हो रहा है कि वह जो कवि था ! वह अब कुछ भी उलजलूल, परदे के पीछे की छीपी बातों को लिखकर व्यंग्यकार जैसा कुछ हो गया है ! ऐसे ही बेचारे कवि पर कभी दुष्यंत कुमार जी ने कहा था:-
मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो,
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ।
©भूपेन्द्र भारतीय
हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित।

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