Tuesday, May 18, 2021

वे अब भी “निःशब्द” है....!!

हरिभूमि समाचार पत्र में...

वे सुबह से निःशब्द है। भले ही उन्होंने सुबह से आधी रात तक फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर पर पच्चीस पचास स्वर्गीयों के लिए शोक संदेश लिख दीए हो। नयी नयी इमोजी को बौना कर दिया हो। अपनी एक निःशब्दता में “तील का ताड़ बना” दिया हो। उनके साथ पीछले कई सालों से यही समस्या है कि “वे बात-बात में निःशब्द हो जाते हैं !” उनकी इस मौन अभिव्यक्ति में कितने ही तूफान उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।

इस निःशब्दता की उलझन में उन्हें कितनी ही बार अपनी मतलबी चुप्पी को तोड़ना पड़ता हैं। वे जब भी अपने से ज्यादा किसी को मुखर होते देखते हैं। तो वे फिर निःशब्द हो जाते है। कई बार उनकी इस निःशब्दता को सोशल मीडिया भी नहीं समझ पाता है। बड़ी बड़ी सभाओं में मुखर रहने वाले, वे अक्सर अपनी ही पत्नी के सामने निःशब्द हो जाते है। शोकाकुल वातावरण में भी वे आधा घंटे के भाषण के बाद निःशब्द बोलकर बैठ जाते है। वे अक्सर अपनी वाणी पर पूर्णविराम तब ही लगाते है, जब वे अल्पविराम के चक्कर में निःशब्द हो जाते है। वह सुख की घड़ी हो या फिर दुःख के पल, वे कैसी भी परिस्थिति में निःशब्दता का सुर साध सकते हैं। वे अद्भुत व्यक्ति है जो अपनी अभिव्यक्ति को भी निःशब्दता से व्यक्त करते है !

उनके पास गजब की शब्दावली है ! जहां विराम लगाना हो, वे अल्पविराम लगा जाते हैं। और जहां निःशब्द होना हो, वहां बात-बात में वाचाल हो जाते है। अपने लंबे लंबे लेखों में अक्सर वे अंत में निःशब्द हो जाते हैं। बात एक लाईन की होती हैं और वह उसकों अच्छा खासा कहानी नुमा लिख जाते हैं। ऐसा कोई अवसर नहीं जब उन्हें निःशब्द ही लिखा हो और बाद में उसे विस्तार से अपने मित्रों को न समझाया हो।

वे अक्सर पड़ोसी के लड़के लड़कियों पर बड़ी बड़ी आदर्शवादी बातें बघारते है, पर अपनी औलाद के कर्मों पर पूर्णतः निःशब्द हो जाते है। कार्यालय में बाबूजी को भ्रष्टाचार का पाठ सुनाते रहते हैं और स्वंय की टेबल पर आने वाले लिफाफों पर निःशब्द हो जाते हैं। दूसरों की पत्नी का सौंदर्य बखान बड़े रस ले-लेकर करते हैं। और जैसे ही किसी ने इनकी धर्मपत्नी के रूप लावण्य पर चर्चा छेड़ी की, ये साईलेंट मोड में आ जाते है। जब भी निःशब्दता इन्हें बहुत बार बीच चौराहे पर घेर लेती है। तो ये वहीं पर मंचीय कवि बन जाते है।

वैसे इनकी निःशब्दता जब भी टूटती है। ये अक्सर यह कहते है कि भूकंप आने वाला है। एक निःशब्द प्रेमी ने तो संसद में भूकंप आने की चेतावनी दे दी थी। वो तो गनीमत रही कि ट्विटर था, उसपर ही सारी निःशब्दता उड़ेल दी ! ऐसे लोग जब जब सत्ता पक्ष की ओर होते हैं तो विपक्ष के सवालों पर निःशब्द हो जाते हैं। जनता इनसे जब भी विकास पर सवाल करती हैं, ये अपनी निःशब्द मुद्रा में ही विज्ञापनों से मुखर मुस्कान बिखेरते रहते हैं। वैसे अच्छा ही है कुछ लोग निःशब्द ही रहें। “क्योंकि वे जब जब कुछ बोलते हैं शब्द निःशब्द हो जाते है।”


भूपेंद्र भारतीय

 

No comments:

Post a Comment

हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...