लेखक स्वतंत्र इतिहासकार है....!!
अक्सर मैं जब भी अखबार या किसी पत्र-पत्रिका में किसी लेख-आलेख के आखिर में “लेखक स्वतंत्र इतिहासकार है....!!” लिखा पढ़ता हूँ तो चकित हो जाता हूँ ! आखिर कोई लेखक स्वतंत्र इतिहासकार, स्वतंत्र टिप्पणीकार, स्वतंत्र लेखक, स्वतंत्र पत्रकार आदि कैसे होते हैं ? वह सिर्फ़ लेखक क्यों नहीं होता और फिर बाकि लेखक या पत्रकार क्या किसी के अधीन या दबाव में होकर लिखते हैं ? यदि वह निष्पक्ष है तो उसके लिए ऐसा क्यों लिखना पड़ता है !
कुछ टिप्पणीकार स्वतंत्र है तो फिर दास टिप्पणीकार कैसे होते होगें ? भला स्वतंत्र इतिहासकारों का जन्म या फिर कहें उनका आविष्कार किसने किया होगा ? शायद इसलिए ही अक्सर इतिहास के तथ्यों पर बड़े-बड़े झगड़े होते रहे हैं। इन दिनों फिर एक बार इतिहास के एक नायक पर झगड़ा चल रहा है। दोनों ओर के वक्ता अपना-अपना इतिहास लेकर टीवी बहसों में जमकर एक दूसरे के इतिहास को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं। बच्चे पूछ रहे है यह इतिहास तो हमें कभी पढ़ाया ही नहीं गया। यह किस किताब में लिखा था ? और हमारे पाठ्यक्रम में क्यों नहीं था ? वर्तमान में इसपर बहस करके क्या हासिल होगा ?
क्या स्वतंत्र इतिहासकार हमेशा सच्चा इतिहास लिखता है ? वो कौनसी शक्ति है जो एक लेखक को स्वतंत्र बनाती है ? बहुत से लेखक तो कहते रहे है कि इतिहास कभी पूर्ण नहीं होता और फिर जो लेखक स्वतंत्र नहीं रहे या है, क्या उन्होंने सब कुछ झूठा इतिहास ही लिखा है ? कुछ बुद्धिजीवी तो ऐसे इतिहासकारों को दरबारी लेखक भी कहते है ! मेरे जैसे लेखक के लिए यह हमेशा से बहुत कठिन प्रश्न रहा है कि ये सब तरह के लेखकों का जो वर्गीकरण किया जाता है, वह किस आधार व मापदंडों के आधार पर होता है ? वह कौनसा लेखन है जो एक लेखक को स्वतंत्र लेखक बनाता है और अन्य लेखक को कुछ ओर ! क्या स्वतंत्र इतिहासकार ही असली इतिहास सर्वज्ञ है ? इनके प्रेरणा स्त्रोत कौन होते है ?
स्वतंत्र इतिहासकार ने जो लिख दिया, क्या वहीं सही इतिहास है ? एक इतिहासकार दूसरे इतिहासकार के स्त्रोत का सहारा लेकर इतिहास लिख रहा है। सच किसने देखा या फिर किसने कितना सच सुना, यह कौन-सा लेखक बताऐगा ? या फिर कोई आकाशवाणी होती है जो ऐसे ही लेखकों को सुनाती है ! शायद इसलिए ही बहुत बार इतिहास की काल कोठरी से बड़े बड़े जिन्न निकाले जाते हैं और ये वर्तमान में खलबली मचा देते हैं। फिर खाली बैठे स्वतंत्र इतिहासकार जैसे कुछ लेखक इन जिन्नों पर अपनी स्वयंभू स्वतंत्र कलम धड़ाके से चलाने लगते है। संपादक जी के लिए कठिनाई हो जाती होगी कि कौन स्वतंत्र इतिहासकार है और कौन परतंत्र ! इतिहास के बड़े बड़े नायकों खलनायकों को कब कौन क्या बना दे ! टीवी बहसों व अकादमिक जगत में यह आश्चर्य का विषय रहता है। कुछ स्वतंत्र इतिहासकारों व लेखकों की दुकानें तो इससे ही चल रही है। इतिहास के ये नायक-खलनायकों की आत्मा भी जब यह सब देखती होगीं तो सोचती होगी, “हमनें यह सब कब किया था ?”
वर्तमान में क्या हो रहा है उसकी बात बाद में करेंगे, पहले इतिहास की करेंगे ! इसलिए की समस्याओं से ध्यान भटकाना है ? पार्टी एजेंडा चलते रहना चाहिए। सत्ता सुंदरी कहीं हाथ से न निकल जायें या फिर इतिहास के भूतों के सहारे वर्तमान को डराना है ! आप स्वतंत्र इतिहासकार हो तो आपके पास लाईसेंस आ गया कि कैसे भी इतिहास से खेलते रहों। जो सत्य इतिहास में होना चाहिए था उसे दबा दो। उसे जनमानस के सामने नहीं लाना है। इसलिए कि हम विचारधारा के खूटे से बंधे है। निजी विचारों के माध्यम से हम सत्य को गड़ने का हरदम प्रयास करते है ! लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के नाम पर स्वतंत्र इतिहासकार सिर्फ़ अपने ही मन का इतिहास प्रस्तुत करते रहते हैं। जिससे उनकी दुकानें चलती रहें। सत्य उनके लिए प्रयोग है जो उनकी ही प्रयोगशाला में होता रहता है और नये-नये तथ्यों के जन्म होते रहते हैं। जिससे कि उनके मालिक खुश रहें।
ऐसे ही स्वतंत्र इतिहासकारों का इन दिनों हर ओर बोलबाला है। ये किसी भी जाति को श्रेष्ठ बना दे, तो श्रेष्ठ को निम्न व दयनीय ! ये संसद चला भी सकते हैं और बंद भी। इतिहास के नाम पर ये सरकारें बदल सकते है। किसी के भी धर्म-पंथ-समुदाय पर टीका-टिप्पणी करके अधर्म करते रहते हैं। कौन स्वतंत्र रहा और कौन परतंत्र इनके इतिहास में सब सच-सच ही लिखा होता है ! इतिहास के तथ्यों से खेलना, इनका प्रमुख खेल रहा है। यदि ओलंपिक खेलों में इसकी प्रतियोगिता हो तो चार-पांच सोने के पदक इनके ही नाम हो। स्वतंत्र इतिहासकार ही वर्तमान में सबसे बड़े बुद्धिजीवी है और इन्हें ही तीनों काल का ज्ञान है। शायद इसलिए ही इनके नाम के साथ लिखा होता है कि “लेखक स्वतंत्र इतिहासकार है....!!”
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
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