उनकी सपाटबयानी और हमारा व्यंग्य....!!
जैसे ही कोई सफेद झक परिधान पहने मंच पर चढ़ता है तो ऐसे लोग सबसे पहले अपनी सपाटबयानी अंदाज़ में कहते हैं, “भाईयों-बहनों हम आपकी पीड़ा बाटने ही यहाँ आये हैं। जब तक हम राजनीति में हैं आपके संवैधानिक अधिकारों को कोई आपसे छीन नहीं सकता है।” ऐसे ही सपाटबयानी लोग हर मंच से जनता का विश्वास हर पाँच वर्ष में एक बार जीत ही लेते हैं ! वहीं हमारे जैसे व्यंग्यकार कितना ही कहें कि “लोकतंत्र की मंडी में हर मतदाता का मत ऊँचे दामों में बिक रहा है !” तो इसे कोई नागरिक नहीं मानता। उन्हें कहो कि देश में सबका विकास हो रहा है तो एक बार मान जाऐंगे। लेकिन फिर आगे कहो कि सरकार नागरिकों का दमन कर रही है तो मतदाता इस सपाटबयानी पर व्यंग्यकार से रूठ जाती है। व्यंग्यकार पर असहिष्णु होने के आरोप लगना शुरू हो जाते हैं।
सपाटबयानी करने वाले लोग भी बड़े कमाल के होते है। वे जब भी व्यवस्था की आलोचना करते हैं तो कानून में खराबी निकालते हैं और जब भी कानून की आलोचना करते हैं तो व्यवस्था में मीनमेख निकालने लगते हैं ! सपाटबयानी उनके लिए सिर्फ़ अपनी बात को अपने तरीक़े से कहने का माध्यम है। उन्हें क्या मतलब सच से। वहीं व्यंग्यकार कितना ही सत्य को सामने लाने का प्रयास करें, पाठक उन्हें हँसकर हल्का कर देता है। व्यंग्यकार स्वयं के पंचों से घायल होकर आहत होता रहता है। और अपने घावों को सोशल मीडिया के लाईक, कमेंट व शेयर बटन से सहलाता रहता है। आगे इससे भी मन नहीं मानें तो आखिर में किसी न किसी अखबार में छपकर अगला व्यंग्य लिखने लग जाता है।
आजकल तो बड़े बड़े दलों की प्रमुख वार्ताओं में उनके स्वघोषित अध्यक्ष सपाटबयानी कर रहे है कि दल के हम ही कर्ता-धर्ता है। “हमारे पारिवारिक दल में लोकतंत्र भी हम ही है और सभी तरह के चुनावों का निर्णय हमारा अंतिम निर्णय रहता है।” अब इतनी सीधी-सपाट बात को कोई लोकतंत्र में विसंगतियों का रफ्फ़ू लगाकर व्यंग्य की बांसुरी बजाकर कहना भी चाहें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को क्या फर्क पड़ता है ? आखिर कहां तक कोई व्यवस्था के सीमित कपड़ो को बार बार उतारे। जिससे कि जनता उसे अच्छे से ऊपर से लेकर नीचें तक देख सके। वैसे भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की जनता पहले भी अपनी व्यवस्था को कितनी ही बार बगैर कपड़ों के ऊपर से लेकर नीचें तक देख चुकी हैं। लेकिन व्यवस्था के इस निर्वस्त्रीकरण में कोई खास बदलाव आया है ?
वहीं आजकल देखने में आ रहा है कि सपाटबयानी करने वाले अक्सर व्यंग्यकारों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहे हैं। कभी संसद में सपाटबयानी होती है तो वहीं अक्सर टीवी चैनलों की बहसों में धमाकेदार शब्दों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सपाटा मारा जाता है। वहीं अब ये कहना कि “हम विकास की गंगा बहा देगें!” किस तरह की सपाटबयानी है ! वरिष्ठ व्यंग्यकार तो बहुत बार इस तरह की भाषाशैली से खिन्न हो जाते हैं और कहते है कि ‛ये सफेद कपड़े वाले हमारी भाषाशैली का उपयोग क्यों करते है ?’ यह तो सरासर चोरी है। ऐसे में वरिष्ठ व्यंग्यकार को बड़ी मुश्किल से कोई न कोई पुरस्कार स्वरूप प्रशस्ति पत्र देकर समझाना पड़ता है।
मेरे परिचित एक व्यंग्यकार कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री की एक सपाटबयानी पर दिनभर कुढ़-मुढ़ाते रहें है ! जो कि प्रधानमंत्री ने सिर्फ़ इतना ही कहा था कि “भारत फिर से विश्व गुरू बनने ही वाला है।" अब बताओं वरिष्ठ व्यंग्यकार को इसमें चिढ़ने की क्या जरूरत थी। इस कारण तो व्यंग्यकारों से सपाटबयानी वालें रूष्ट रहते हैं।
यदि कभी-कभार सपाटबयानी वालें जनता की बात रखने के लिए कोई बात व्यंग्य के ढ़ंग में कह भी दे तो हमारे वरिष्ठ व्यंग्यकार महोदय को रूष्ट नहीं होना चाहिए। वैसे भी वरिष्ठ व्यंग्यकार को व्यंग्य की कालकोठरी से बाहर निकलकर अपने मन की बात सपाटबयानी में करने को किसने रोका हैं ? अंततोगत्वा इन दिनों दोनों ओर शब्दों की ही तो गुंगी कबड्डी खेली जा रही है....!!
भूपेन्द्र भारतीय
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