ब्रांड मूल्य का बाजार
जीवन के हर क्षेत्र में ब्रांड वैल्यू(मूल्य) का आजकल बहुत बोलबाला बढ़ गया है। जैसे मार्केटिंग का हिन्दी अर्थ ‛विपणन’ जटिल शब्द है, उसी तरह से मार्केटिंग प्रबंधकों का तंत्र व उनके मंत्र भी बड़े ही विचित्र है। किस मीडिया मंच से कौनसा मंच आपके घर व मस्तिष्क में कब घर कर जाए ! इस विषय में सही सही कोई कुछ नहीं कह सकता है। “गंजे को कंघी बेचने” वाले मार्केटिंग मंत्र से बात बहुत आगे निकल गई है।
वहीं किसी को सोशल मीडिया पर कम लाईक्स व शेयर मिलने लगे तो समझो, उस मीडिया महावीर का मूल्य गिर रहा है। जैसे उसका सबकुछ लूट गया हो ! जीवन में किन्हीं अज्ञात अशांति ही अशांतियों ने घेर लिया हो। अबतक अक्सर सुनने में आता था कि बॉलीवुड व क्रिकेटरों का ब्रांड घटता-बढ़ता है। लेकिन जनता इन दो ब्रांडों से इनता प्रभावित हो गई है कि उसने अपना मूल्यांकन स्वयं करना शुरू कर दिया है। आभासी दुनिया ही उसके लिए परम् सुख होने लग गई! एक तरफ महानायक जैसों का पान-सुपारी-गुटखा बेचने के विज्ञापन से ब्रांड मूल्य क्या गिरने लगा ! जनता का मूल्य सूचकांक ऊपर-नीचें होने लगा। जनता ने अलग अलग ब्रांड में नये-नये मानक खोजना शुरू कर दिये।
जो जितना बड़ा अभिनेता वह उतना ऊँचे दाम का ब्रांड मूल्य रखता है ! और बिकता भी हैं। क्या तो इन्हें जनता की भावनाओं का ध्यान और क्या तो जनता इनकी बात मानने को तत्पर खड़ी ! आजकल कैसे कैसे विज्ञापन गुरू बैठे है, दोनों को गच्चा खिला रहे हैं। और बाजार को गुलजार कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे ब्रांड मूल्य का मामला नहीं है, ब्राह्मण गद्दी का हो। बाजार गुरूओं ने जनता को बाजारू बना रखा है।
वहीं जैसे जैसे जनता की भावनाएं ब्रांड मूल्य धारियों से आहत हो रही है जनता अपना ब्रांड खुद बना रही है। इन दिनों जैसे जैसे बाजार का बोलबाला दिनोंदिन बढ़ रहा है, जनता अपने ब्रांड की बखत स्वयं बढ़ाने में लग गई है। इस वैश्विक अभियान में जनता का साथ आभासी दुनिया सर्वाधिक दे रही है। हर हाथ को मोबाईल ने काम दे दिया है। वहीं बाजार ने ब्रांड मूल्य का पैमाना इतना बढ़ा दिया है कि इस पैमाने तक पहुंचने में हर कोई औंधे मुंह गिर रहा है।
एक समय जब युवाओं का विद्यालय में अच्छे नंबर लाना अपने घर व आस-पड़ोस में ब्रांड था, आज वहीं बड़ी कंपनीयों का मोबाईल खरीदना बच्चों का ब्रांड मूल्य बन गया है। बाजार अच्छे दिनों की आस में सब कुछ परोस रहा है। जनता चहुँ ओर से हर वस्तु के मूल्य मानकों के दबाव के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। वह भी चाहती हैं कि ‛लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके भी मत की ब्रांड वैल्यू हो।’ भले वह पांच साल में एक बार ही हो ! जब हर चवन्नी छाप चीज का मूल्य स्तर बढ़ रहा है तो फिर “जनता के बेलट ब्रांड का मूल्य स्तर भी बढ़ना चाहिए।”
आज बाजार ने हर घर के प्रत्येक सदस्य के लिए आनलाईन दुकानें खोल रखी है। सबकी पसंद-नापसंद का पल-पल पर विज्ञापन गुरू-घंटाल पैनी निगाह से ध्यान रख रहे हैं। यदि आपने ठंड में आग में तापने का मन बनाया और उधर जैसे ही सोशल मीडिया खोला, हर प्लेटफार्म पर चार-चार तरह की माचिस व लाईटर के विज्ञापन दनादन आने लग जाते है ! जैसे आभासी दुनिया का इशारा हो “गुरू लगाओं आग, जिधर लगाना हो ! ये रही आग लगाने के साधनों के विकल्पों की लड़ी।” ब्रांड मूल्य बाजार ने दुनिया को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है और वही एड गुरु जनता से कह रहे हैं कि एक आइडिया जो दुनिया बदल दे ! अब बेचारी जनता दुनिया को मुठ्ठी में करें या फिर दुनिया को बदलें ?
इसी ऊहापोह में जनता की दुखती नश को ब्रांड मूल्यधारी समय-समय पर टटोलते रहते हैं। और अपने मालिकों के इशारे पर नश को दबाते हुए बाजार के सूचकांकों को बढ़ाते रहते हैं। अब जनता को समझना है कि उसका ब्रांड वह स्वयं चुने और बाजार को अपनी मुठ्ठी में रखें या फिर कटपुतली बनकर आभासी दुनिया से संचालित होती रहे ! क्योंकि ब्रांड मूल्य-धारीयों के अश्वमेध घोड़े सरपट दौड़े जा रहे हैं, इन्हें नियंत्रित करने के लिए जनता को अपना ब्रांड मूल्य बढ़ाना होगा। ब्रांड मूल्य के इस चक्रव्यूह से बचने के लिए जनता को इसे बेधना व इसमें से फिर बाहर निकलने वाली दोनों विद्याओं को सीखना होगा।
भूपेन्द्र भारतीय
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