साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम बच जाय....!!
आजकल हर पल लगता है कि बस अब तो मेरी जैब पर डाका डलने ही वाला है। कभी मोबाइल पर बैंक से लिये लोन की किस्त का संदेश आ रहा है, तो कोई कार खरीदने का मेल कर रहा है ! जीवन बीमा वालों के द्वारा मरने के बाद दिखाये हसीन सपनों की आशा में ‛अच्छे दिन भी’ किस्तों में हाथ से जा रहे हैं। विज्ञापन वाले हल्का होने वाले स्थान पर भी अपना मार्केटिंग प्रबंध कौशल दिखाने से बाज नहीं आते। उन्हें लगता है कि कुछ ही दिनों में दुनिया किसी गुमनाम लहर से खत्म होने वाली है सारा माल जल्दी से जल्दी बेच दो ! “मांग बढ़ावो मांग बढ़ावो” उनका प्रिय नारा रहता है। आनलाईन शापिंग ने इस आग में घी का काम कर दिया है। साईं ने जितना दिया उससे ज्यादा का आर्डर हो रहा है !
घर वालों के अलग डिमांड ड्राफ्ट हमेशा तैयार ही रहते है। सरकारी कार्यालय में घुसे नहीं की बाबूजी अपना वाला कबीर भजन शुरू कर देते हैं;-
“साईं इतना दीजिये, जा मे मेरा कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साहब की भी भूख मिट जाय ॥”
मुझे उस पल समझ नहीं आता कि साधु कौन है और भूखा कौन ? कहाँ है साधु-संत ? वे भी आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं ! जिन्हें मेरे जैसा निम्न मध्यवर्गीय कुछ दे सकता है ! अभी तो मेरी ही भूख शांत नहीं हुई है। ऐसे में मेरे घर के द्वार पर कौन भला साधु आऐगा ?
घर से बाहर पहला कदम रखते ही अंदर से घर वालों की मांग भरी ऊंची आवाज़ें आतीं है। सुनों जी, शाम को बाजार से कुछ जरूरी चीजें लेते आना। मैं आपको चीजों की सूची दिन में वाट्सएप कर दूगीं। शाम आते आते कुछ चीजें की सूंची एक बड़ा मांग पत्र हो जाता है ! जैसे मेरे घर में ही कोई बड़ा संगठन अपनी मांगों की सूचीं दिनरात बनाता रहता है। अपने ही घर के अंदर ही अंदर कोई बड़ा आंदोलन होने वाला हो। अब भला कबीर साहब का साईं दे भी तो कितना दे ? ऐसे मांग पत्रों के सामने साईं कितना व क्या दे सकते हैं ? हो सकता है साईं इस थोड़े-बहुत में से भी कुछ मांग ले !
वहीं इन दिनों घर से कार्यालय पहुंचने के बीच एक बड़ा जंक्शन खड़ा हो गया है। जिसे ‛पेट्रोल-डीजल पंप टोल टैक्स स्थान’ कहना ही उचित होगा। इसके मीटर को देखकर हर बार लगता है कि कहीं सांसें ही नहीं रूक जाए ! लगता है जैसे देश की अर्थव्यवस्था इसी स्टेशन से ही चल रही हो। शायद कबीर साहब के जमाने में भी कुछ ऐसे ही ‛रोका’ विशेष स्थल रहे होगें। तभी उन्होंने ऐसी दोहामय अमृतवाणी लिखी। अब एक भला मध्यवर्गीय आदमी इस रोका-डाका डालों से बचें तो अपनी पहली मांग सूचीं की भरपाई करें ? ऊपर से दिन में बच्चों के विचित्र महंगी मांग भरे फोन अलग दनदनाते रहते हैं।
ऐसे में अब कोई कैसे ‛आत्मनिर्भर’ बने ! जब हर कोई आपसे कुछ न कुछ मांग ही रहा है। देने वाला कहीं दिख नहीं रहा है। “क्योंकि आप एक वर्ग विशेष श्रेणी में नहीं आते। आपके पास कोई संगठन नहीं है और न ही किसी तरह का संगठित वोटबैंक !” वहीं आनलाईन मांगने वाले की तो लाईन लंबी ही होती जा रही है। हर दूसरे वर्ष वोट मांगने वाले अलग नहीं मानतें। पड़ोसी अब चाय पत्ती, चीनी और दुध से आगे बढ़ते हुए पेट्रोल-डीजल-गैस सिलेंडर की मांग पर आ गया है। गनीमत है कि चंदा मांगने वालों को अब तक कोरोना ने क्वॉरेंटाइन कर रखा है। खेतों में कीटनाशक दवाओं की मांग बढ़ती जा रही है ! वहीं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता दिनोंदिन घटती-जा रही हैं। इस स्थिति में बेचारे साईं से कितना और क्या मांगे ? जिससे की इस छोटीसी जैब की आर्थिक स्थिति का सूचकांक भी बढ़ जाए।
मेरी इस मांगीलाल वाली स्थिति में आज कबीर साहब होते तो इस मांग-भरी महंगी दुनिया पर शायद मूल दोहे की जगह यह ही लिख पाते ;-
“साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम बच जाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, बाकी की मांग पूरी हो जाय ॥”
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
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