मलखंभ व हमारी शिक्षा व्यवस्था....!!
“मलखंभ खेल को हमारे देश में कुछ राज्यों ने अपना राजकीय खेल बना रखा है। इस अद्भुत तथ्य का जब जब भी ध्यान आता है, मेरा शैक्षणिक अनुभव मुझसे मलखंभ करने लगता हैं ! मेरा तो बचपन से यही अनुभव रहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंभ का खेल पहले से ही शामिल है ! शिक्षक प्रतिदिन शासन की शिक्षा नीतियों से मलखंभ करता रहता है। ऐसे में छात्रों को पढ़ाने के लिए कम ही अवसर मिलते हैं और मलखंभ के करतब जैसे कार्य हमारे राष्ट्र निर्माता शिक्षकों को प्रति कार्यदिवस करना होते हैं ! माड्साब कभी नेतागिरी-बाबुगिरी करके मलखंभ करते है, तो कभी जनगणना करके, कभी मलेरिया की दवा पिलाकर, कभी चुनाव, टीकाकरण, कभी फलाना ढिकाना सर्वे करके शिक्षण कार्य की खानापूर्ति करते हैं। प्रतिदिन कौन-सा पाठ पढ़ाना है उसके बजाय, इस बात के लिए मलखंभ ज्यादा होता है कि विद्यालय निरक्षण पर आए मंत्रीजी की खातिरदारी कैसे-कैसे करतबों से करना हैं !
मलखंभ भले हमारे देश के कुछ राज्यों का राजकीय खेल घोषित हो। पर राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा तंत्र में मलखंभ आजादी के बाद से आजतक अघोषित रूप से जारी है। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए हर कैलेंडर वर्ष में बड़े बड़े बजट बनते है लेकिन भ्रष्टाचार के मलखंभ के आगे “शिक्षा नाम का खंभा” धड़ाम से धराशायी हो जाता हैं ! शिक्षा के नाम पर स्कूल भवन हमने बड़े बड़े बनाएं, पर इन भवनों में राजनीति के खिलाड़ी मलखंभ करते रहते हैं ! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए बने हैं या राजनीतिक मलखंभ करने के लिए ? शिक्षकों के स्थानंतरण का खेल इतने हुनर से होता है कि अच्छे से अच्छा मलखंभ का खिलाड़ी मलखंब पर इस सरकारी करतब के बारे में सोचकर ऊलटा लटक जाए।
शिक्षा क्षेत्र में जितने प्रयोग हमारे देश की सरकारों ने किए, यदि उतने में से आधे भी मलखंभ का खिलाड़ी कर ले तो पहले प्रयास में ही ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत ले। कभी कभी तो शिक्षा व्यवस्था से इतना डर लगता है कि उसके आगे मलखंभ का खेल बहुत आसान लगता है ! विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र सबसे ज्यादा टीका-टिप्पणी यदि किसी पर करते हैं तो वह स्वयं के शिक्षा विभाग ही पर। “जिस देश में शिक्षा मंत्री बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है लेकिन उसी शिक्षा विभाग के कार्यालय का चपड़ासी दसवीं पास होना चाहिए !” ऐसी स्थिति में शिक्षा संस्थानों से छात्रों को ज्ञान मिलना मुश्किल है, हाँ वे मलखंभ खेल के दर्शक आसानी से बन सकते हैं !
खैर, इस मलखंभी शिक्षा व्यवस्था में भी कुछ शिक्षा का काम भी हुआ है लेकिन ऐसी शिक्षा मिली कि कितनों की ही बुद्धि मलखंभ खिलाड़ियों के शरीर जैसी मोटी व चिकनी हो गई। वे सरकारी सेवा में भी इस मोटी बुद्धि के दम पर ही जाते हैं और जिंदगी भर इस मोटी बुद्धि के सहारे सरकारी कुर्सियों पर बैठे बैठे मलखंभ करते रहते हैं और मोटी-मोटी रकम बनाते हैं। जिसके कारण आज तक देश की कितनी ही पीढ़ियों की मिट्टी पलित हो गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षण के अलावा सारे काम होते रहें और दिनोंदिन अन्य कार्यों की सूंची मलखंभ की ऊचाई इतनी बढ़ती जा रही हैं ! लेकिन आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंब का खेल प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय की शिक्षण संस्थानों तक खेला जा रहा है। अब एक बार फिर नई शिक्षा नीति आ गई है। देखते है, इस बार नई शिक्षा नीति में नये-नये करतब देखने को मिलते है या फिर शिक्षा के मंदिरों में वहीं पहले वाला मलखंभ का खेल पुनः नये नियमों से खेला जाता रहेगा....!!
भूपेन्द्र भारतीय
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