हम नहीं मानने वाले....!!
प्रजातंत्र समाचार पत्र में....
जैसा कि हमारे संविधान में लिखा गया है, “हम भारत के लोग....!” ये शुरूआती शब्द जनता को आत्मविश्वास से पूर्णतः भर देते हैं। हमारे संविधान ने अपने नागरिकों की कई तरह के अधिकारों से झोली भरी हुई है। वो बात अलग है कि इसी संविधान में नागरिकों के लिए कर्तव्यों की भी बात की गई है। लेकिन कर्त्तव्य-कर्म की बातें तो भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। कर्त्तव्य-कर्म के चक्कर में आदमी पड़े तो जीवन के मजे कब ले ? आम आदमी हर एक दिशानिर्देश मानने लगे तो फिर जीवन के आनंद का क्या ? वह क्यों मानें शासन के नियम ? क्या सरकार हम भारत के लोगों की सुनती है ? क्या हम कभी वीआईपी भारतीयों जैसे नहीं रह सकते ? अब हम किसी तरह के बंधन को नहीं मानने वाले हैं। हर बात में हमें कीर्तिमान बनाना अच्छा लगता है। वो फिर जनसंख्या का हो या फिर कोरोना के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण !
हम सड़क पर यातायात नियमों को नहीं मानने के लिए ही चलते हैं। आखिर हम यात्रा के लिए सड़क टैक्स देते हैं या फिर नियम मानने के लिए ! “कैसी भी लहर आये हम नहीं मानने वाले हैं।” हमने लहरों से टकरा कर कितने ही समंदर पार कर दिये हैं। ऐसा हमको बॉलीवुड वाले गाना गाकर बताते रहते हैं। हम भर कोरोना लहर में भी भारी-भरकम विवाह करने से नहीं मानने वाले हैं। हम उसी गली में बारात निकालना पसंद करते हैं जिसमें विवाद की संभावना अधिक रहती है। फूंका-मौसा की इच्छा पर ऐसा करना पड़ता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो दुनिया आगे कैसे बढ़ेगी ? सामाजिक समरसता का क्या होगा ! जनसंख्या वृद्धि का फिर क्या होगा ! हम अपना समृद्धि सूचकांक कैसे दिखायेंगे। फिर ऐसी निरंतर आने-जाने वाली लहरों का कारवां कैसे चलेगा।
सरकारी कार्यालयों में हम कठिन प्रतियोगिता परीक्षाएं पास कर घुसते है, फिर हम घूस लेने-देने में विश्वास क्यों न करें। हम नियमों में रहना नहीं जानते। ना ही हम उधार लेने से मानते है और न ही उधार चुकाने में विश्वास करते हैं। हमारे ऐसा करने से बैंको का बैलेंस बना रहता है ! फिर भले ही हमें ऋण चुकाने के चक्कर में अपना देश छोड़कर विदेश में बसने का भारी कष्ट सहना पड़े। हम राष्ट्र के ऋणी होने से मानने वाले नहीं है।
हम तो किसी को कुछ नहीं मानते है। वो फिर अपना घर हो या फिर पड़ोसी का। हम जहां भी जाते है, उस जगह पर अपना अधिकार जमा लेते है। हमें कुर्सियों से बहुत प्रेम है। हम सिर्फ़ बैठकों में शामिल होने को मानने वाले हैं। हम अतिक्रमण व विस्तारवाद का सिद्धांत मानने वाले लोग हैं। हम अपनी गली से संसद तक में हँगामा करने से नहीं मानने वाले माननीय है ! हम विदेश में भी जाकर अपने देश की निंदा करके निंदारस लेने से नहीं मानते। हम सरकार में हो या फिर विपक्ष में, हम जोड़-तोड़ किये बगैर नहीं मानने वाले ! आखिर हम माने तो क्यों माने ? क्या हमने ही सबकुछ मानने का ठेका लिया है।
हम किसी को कुछ मानते है तो सिर्फ़ अपने आप को सम्माननीय मानते है। “हमारे बयानों का कोई कैसा भी अर्थ निकाले, हम प्रतिदिन टीवी व सोशल मीडिया पर बयान देने से नहीं मानने वाले हैं।” हम न मिलावट करने से मानने वाले हैं और न ही मामला रफा-दफा करने से ! हम टेबल के नीचें से व परदे के पीछे से ही लेने-देने के लिए मानते हैं। “हम नाक की सीध में चलने वाले लोग हैं”, बाकी कैसे भी दायें-बायें वाले मामलों में हम मानने वाले नहीं है....!!
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
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