कोई लहर नहीं आ रही है....!!
सुबह सवेरे समाचार पत्र में....
जी हाँ, आप निश्चिंत होकर शादी-बिहा-चुनाव रैलियां अटेन्ड कीजिये। कोई तीसरी-उसरी लहर नहीं आने वाली है। मेरे अनुभवी व जमे-ठमे मित्र लचकरामजी ने ऐसा कहा है। वो तो यहां तक कह रहे है कि जितने बड़े व भव्य आयोजन होगें, उनसे ही कोरोना-ओरोना जैसा विषाणु का अगला वेरिएंट मारा जाऐगा। ये तो जनता पिछली दो लहरों में मानसिक तनाव व अपच (बदहज़मी) के कारण अस्पताल तक पहुंची थी। और फिर बाकी सारा मामला अस्पताल वालों ने समझदारी से निपटाया। लचकरामजी तो यहां तक कह रहे हैं कि हमारी संसद के शीतकालीन सत्र को लंबा कर देना चाहिए, कोरोना जैसा वायरस अपने आप सदन में किसी बिल की तरह धड़ाम से गिर जाऐगा। और फिर कोरोना का बाकी का क्रियाक्रम सांसद महोदयगण खुद कर देगें। लचकरामजी ने किसान आंदोलन के सामने कोरोना को झुकते देखा है !
बात तीसरी लहर की चली तो लचकरामजी आगे कहने लगे, जितने ज्यादा लंबे चौड़े भव्य आयोजन वाले विवाह होगें, तीसरी लहर की संभावना उतनी ही कम होती जाऐगी। थाली कुटने वाले व खचाखच थाली भरने वाले आखिर कबतक खाली पेट बैठे ? ये लहरें कुँवारे युवक-युवतियों की तड़प व कुँवारेपन के कारण ही आ रही है। भला वैवाहिक जीवन के सामने कौन-सी लहर टिक सकी है ? और फिर जब विवाह में सात जन्मों का दाम्पत्य स्थापित हो जाता है तो कौन कोरोना इसे अलग कर सकता है ? ऐसे सात जन्मों वालें अनुबंध से कौन टक्कर ले सकता है। यमराज तक को इन संबंधों के विषय में निर्णय लेने में पचास-साठ साल लग जाते हैं।
लचकराम जी तनावमुक्त मुद्रा में आकर आगे सुझाते है कि चुनाव आयोग को भी अब तो पांच राज्यों के चुनाव की बजाए देशव्यापी चुनाव करवा देना चाहिए। फिर देखों, कोरोना वोरोना के बचें खुचे मामले भी समाप्त हो जाऐंगे। चुनावी रैलियों में नेताओं के कुकुरहाव से यह देश फिर कोरोना मुक्त हो सकता है ! राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के आपसी सौहार्द व प्रेम से भी भय खाकर कोरोना चीन की ओर पलायन कर जाऐगा। और जब हम राजनीति के माध्यम से चीन का अदृश्य माल उन्हें वापस प्रेमपूर्वक तरीकें से लौटा देगें, तो फिर से हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा सकेंगे। साथ ही एक बार फिर पंचशील का झंडा लिये नाथूला दर्रा में एक-दो एक-दो की लय में कदमताल कर सकते है !
लचकरामजी पीछले सप्ताह एक दाल-बाटी पार्टी में भी बता रहे थे कि उन्हें बारातें व चुनावी रैलियां बहुत पसंद है। वे कैसी भी जुगाडू बारात में “माले मुफ्त दिले बेरहम" वाली कहावत को पूरी तन्मयता से चरितार्थ करने के शौकीन रहे हैं। ऐसे में बारात में बज रहे डीजे से कौन सा कोरोना वेरिएंट नहीं मर सकता है ? एक बार कोरोना वेरिएंट की गली से बारात निकालों तो सही ! देखें फिर नागिन डांस करने वाले बारातियों के सामने कौनसी तीसरी लहर आती हैं । “ये बाराती अपने आप में किसी लहर से कम रहते हैं ?” वहीं चुनावी रैलीयों का अलग जीव-विज्ञान रहता है। चुनावी रैलियों के जितने वेरिएंट रहते हैं उतने कोरोना के शायद ही हो सकते है। जितने नेताओं व उनके कर्मठ कार्यकर्ताओं के वेरिएंट उससे चौसठ गुना ज्यादा रैलियों के रंग। अब भला इतने रंगारंग आयोजनों में कोरोना का नया वेरिएंट टिक पाऐगा ?
भूपेन्द्र भारतीय
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