“कड़ी निन्दा रस का सुख....!!"
सुबह सवेरे में .....
गांव के पेले पार रहने वाले मेरे मित्र लचकरामजी को जब भी किसी से असहमति रहती है, तो वे उस व्यक्ति की ‛कड़ी निन्दा’ करना ही सर्वोत्तम प्रतिक्रिया मानते है। लचकरामजी का कहना है कि जो सुख निंदा रस में है भला बाकी नौ रसों में से किसी एक में भी हो सकता है ? और उस पर भी कड़ी निंदा तो उनका प्रिय तीर है। बुद्धिजीवी व विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के लंबे चौड़े बौद्धिक लेखों व भाषणों के सामने लचकरामजी के ये दो शब्द अक्सर भारी पड़ते हैं। ऐसा लचकरामजी का मानना है। और उनका कड़ी निन्दा में न सिर्फ़ दृढ़ विश्वास है, पर यह उनका प्रमुख हथियार है।
इधर जब से अधिकांश लेखक आलोचना के लिए व्यंग्य की नदी में दिनरात गोते लगा रहे हैं ! और सोशल मीडिया पर अपने अपने खेमे में साहित्य साधना कर रहे हैं...! लचकरामजी का कहना है कि कोई भी बात हो उसके उत्तर में अपन तो बुराई, आलोचना, विरोध, करारा जवाब, व्यंग्य, प्रतिक्रिया, अभिव्यंजना जैसा कुछ करना नहीं जानते है। “बस उनका काम कड़ी निन्दा करना ही है।” लचकरामजी का मानना है कि आधुनिक समय में लोकतांत्रिक ढंग से वक्रोक्ति का सबसे बड़ा हथियार “कड़ी निन्दा” ही है।
सरकारें बात-बात में हर मामले में जाँच, आयोग व समिति बनाना शुरू कर देती है, जब कि कड़ी निन्दा से भी समस्या का समाधान हो सकता है। कड़ी निन्दा में वो बल है जो किसी भी विपक्षी की जमीन हिला सकती है। और कड़ी निन्दा से न सिर्फ़ विपक्षी दलों की खटिया खड़ी हो सकती है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी कड़ी निन्दा से चारों खाने चित किया जा सकता है। आगे लचकरामजी अपने इस तीर की विशेषता पर कहने लगे, एक बार रात के समय चोर उनकी भैंस चुरा ले गये। उन्होंने चहु दिशाओं को चुनौती देते हुए इस चोरी पर चोरों की “कड़ी निन्दा” की, अगले दिन उनकी भैंस उनके ग्वाड़े में आकर अपने आप खूंटे के पास आकर खड़ी हो गई और जैसे ही लचकरामजी दूध दोहने भैंस के पास बैठे, भैंस ने फट से दो समय का दूध एक बार में ही दे दिया। उनका कहना है, इसलिए वे “कड़ी निन्दा को ही सर्वोत्तम” हथियार मानते है। “भैंस तक इस तरह की प्रतिक्रिया को समझती है।”
बातचीत ओर आगे बढ़ी तो लचकरामजी चाय पर चर्चा करते हुए कड़ी निन्दा के विषय में फूर्ति से कह रहे थे, कि बताओं निन्दा कौन नहीं करता ? सास बहू की कर रही है, पत्नी पड़ोसी की पत्नी से अपने पति की कड़ी निंदा करती है, विधायक मंत्रियों की, छोटे कार्यकर्ता बड़े नेताओं की, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की, बच्चे बड़ों की, राजनीतिक मंचों से तो अक्सर कड़ी निन्दा सुनाई ही देती हैं। न्याय की मूर्तियां तक बहुत से गंभीर मामलों में कड़ी निन्दा करके पूर्ण न्याय कर कानूनी कलम तोड़ती रहती हैं...! भ्रष्टाचारी बाबू पर लगे आरोपों पर कार्यवाही के नाम पर उसके बड़े बाबू छोटे बाबू की कड़ी निंदा करते हुए कहते है, “बड़ा खऊ है यार, सारा माल अकेले ही गप कर जाता है !” बड़े साहब से इसकी कड़ी निन्दा करनी पड़ेगी। चाय पी लेने पर लचकरामजी अपने हाथों को अजीब मुद्रा में लाते हुए कहते है, आजकल तो इससे भी ज्यादा गजब हो रहा है ! जब से कोरोना आया है शिक्षक अपने छात्रों को कड़ी निन्दा करते हुए ही परीक्षा में उत्तीर्ण कर रहे हैं । बच्चे भी शिक्षा व्यवस्था की इस वैकल्पिक व्यवस्था “कड़ी निन्दा” से गदगद है।
अंत में लचकरामजी निन्दा रस से ओतप्रोत होते हुए कह रहे थे, अब बताओं जब सभी अपना-अपना काम कड़ी निन्दा करके ही चला रहे है तो हम क्यों नहीं “कड़ी निन्दा” करे ? एक दिन हमने अपने एक पुराने खटारा मित्र की आनलाईन कड़ी निन्दा कर दी तो वह बुरा मान गया। कहता फिर रहा है कि उसकी मानहानि हुई है ! अब बताओं हर घटना की इतिश्री “कड़ी निन्दा” से हो रही हैं, तो हमने क्या उसे कोई देवताओं की तरह कोई श्राप दे दिया है ?
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
गांव के पेले पार रहने वाले मेरे मित्र लचकरामजी को जब भी किसी से असहमति रहती है, तो वे उस व्यक्ति की ‛कड़ी निन्दा’ करना ही सर्वोत्तम प्रतिक्रिया मानते है। लचकरामजी का कहना है कि जो सुख निंदा रस में है भला बाकी नौ रसों में से किसी एक में भी हो सकता है ? और उस पर भी कड़ी निंदा तो उनका प्रिय तीर है। बुद्धिजीवी व विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के लंबे चौड़े बौद्धिक लेखों व भाषणों के सामने लचकरामजी के ये दो शब्द अक्सर भारी पड़ते हैं। ऐसा लचकरामजी का मानना है। और उनका कड़ी निन्दा में न सिर्फ़ दृढ़ विश्वास है, पर यह उनका प्रमुख हथियार है।
इधर जब से अधिकांश लेखक आलोचना के लिए व्यंग्य की नदी में दिनरात गोते लगा रहे हैं ! और सोशल मीडिया पर अपने अपने खेमे में साहित्य साधना कर रहे हैं...! लचकरामजी का कहना है कि कोई भी बात हो उसके उत्तर में अपन तो बुराई, आलोचना, विरोध, करारा जवाब, व्यंग्य, प्रतिक्रिया, अभिव्यंजना जैसा कुछ करना नहीं जानते है। “बस उनका काम कड़ी निन्दा करना ही है।” लचकरामजी का मानना है कि आधुनिक समय में लोकतांत्रिक ढंग से वक्रोक्ति का सबसे बड़ा हथियार “कड़ी निन्दा” ही है।
सरकारें बात-बात में हर मामले में जाँच, आयोग व समिति बनाना शुरू कर देती है, जब कि कड़ी निन्दा से भी समस्या का समाधान हो सकता है। कड़ी निन्दा में वो बल है जो किसी भी विपक्षी की जमीन हिला सकती है। और कड़ी निन्दा से न सिर्फ़ विपक्षी दलों की खटिया खड़ी हो सकती है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी कड़ी निन्दा से चारों खाने चित किया जा सकता है। आगे लचकरामजी अपने इस तीर की विशेषता पर कहने लगे, एक बार रात के समय चोर उनकी भैंस चुरा ले गये। उन्होंने चहु दिशाओं को चुनौती देते हुए इस चोरी पर चोरों की “कड़ी निन्दा” की, अगले दिन उनकी भैंस उनके ग्वाड़े में आकर अपने आप खूंटे के पास आकर खड़ी हो गई और जैसे ही लचकरामजी दूध दोहने भैंस के पास बैठे, भैंस ने फट से दो समय का दूध एक बार में ही दे दिया। उनका कहना है, इसलिए वे “कड़ी निन्दा को ही सर्वोत्तम” हथियार मानते है। “भैंस तक इस तरह की प्रतिक्रिया को समझती है।”
बातचीत ओर आगे बढ़ी तो लचकरामजी चाय पर चर्चा करते हुए कड़ी निन्दा के विषय में फूर्ति से कह रहे थे, कि बताओं निन्दा कौन नहीं करता ? सास बहू की कर रही है, पत्नी पड़ोसी की पत्नी से अपने पति की कड़ी निंदा करती है, विधायक मंत्रियों की, छोटे कार्यकर्ता बड़े नेताओं की, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की, बच्चे बड़ों की, राजनीतिक मंचों से तो अक्सर कड़ी निन्दा सुनाई ही देती हैं। न्याय की मूर्तियां तक बहुत से गंभीर मामलों में कड़ी निन्दा करके पूर्ण न्याय कर कानूनी कलम तोड़ती रहती हैं...! भ्रष्टाचारी बाबू पर लगे आरोपों पर कार्यवाही के नाम पर उसके बड़े बाबू छोटे बाबू की कड़ी निंदा करते हुए कहते है, “बड़ा खऊ है यार, सारा माल अकेले ही गप कर जाता है !” बड़े साहब से इसकी कड़ी निन्दा करनी पड़ेगी। चाय पी लेने पर लचकरामजी अपने हाथों को अजीब मुद्रा में लाते हुए कहते है, आजकल तो इससे भी ज्यादा गजब हो रहा है ! जब से कोरोना आया है शिक्षक अपने छात्रों को कड़ी निन्दा करते हुए ही परीक्षा में उत्तीर्ण कर रहे हैं । बच्चे भी शिक्षा व्यवस्था की इस वैकल्पिक व्यवस्था “कड़ी निन्दा” से गदगद है।
अंत में लचकरामजी निन्दा रस से ओतप्रोत होते हुए कह रहे थे, अब बताओं जब सभी अपना-अपना काम कड़ी निन्दा करके ही चला रहे है तो हम क्यों नहीं “कड़ी निन्दा” करे ? एक दिन हमने अपने एक पुराने खटारा मित्र की आनलाईन कड़ी निन्दा कर दी तो वह बुरा मान गया। कहता फिर रहा है कि उसकी मानहानि हुई है ! अब बताओं हर घटना की इतिश्री “कड़ी निन्दा” से हो रही हैं, तो हमने क्या उसे कोई देवताओं की तरह कोई श्राप दे दिया है ?
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
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