जिह्वा में फिर गुप्त रोग....!!
इंदौर समाचार में.....
जैसे ही हमारे देश में चुनाव आते हैं नये-नये जुमलों, गालियों, फब्तियां, मुहावरों की बाढ़-सी आ जाती है । आम आदमी महामारी, आपदा या बाढ़ से इतना परेशान नहीं होता है, जितना इन जबानी संज्ञा-सर्वनाम-विशेषणों रूपी गाली से आहत होता है। अब नेता करे भी तो क्या करे ? “दिनोंदिन जागरूक होते मतदाता को कहीं न कहीं तो उलझाना पड़ता है।” यदि नेताजी सीधी बात व सभ्य भाषा में वोट मांगने जाए तो कोई क्यों नेताजी को विजय का आशीर्वाद दे ? हो सकता है वहीं मतदाता नेताजी को गाली देकर या दो चार जूते देकर भगा न दे ? इसलिए ही नेताओं की अपनी मर्ज़ी से या किसी गंभीर रोग के कारण ज़बान फिसल जाती हैं। अब उसमें किसी महिला को नेताजी ने आयटम, टंच माल, हरामखोर या बार बाला कह दिया तो क्या हुआ ? बेचारे नेताजी के यहां क्या पता माँ-बहन-बेटी-बहु है भी या नहीं ? हो सकता है नेताजी राजनीति में दुल्हा बनने के लिए सामाजिक जीवन में अबतक कुँवारे हो ! नेताजी तो भोले है ! उन्हें क्या पता नारी का सम्मान क्या होता है ! उन्हें तो “सत्ता सुंदरी ही चहुंओर दिखती हैं।”
पाँच साल में एक बार तो क्षेत्र में वोट मांगने जाते हैं। ओर ऊपर से यदि “उपचुनाव” आ जाए तो गलती से जबान फिसल ही जाती है। पूर्व में इस पर एक नेताजी कह भी चुके हैं कि “जवान लड़कों से गलतियां हो जाती हैं!” वैसे ही नेताजी की सदाबहार जवान जिह्वा में चुनाव के समय हार-जीत के तनाव में गुप्त रोग हो जाता हैं। वैसे भी सत्ता पाने के बाद हमारे देश में नेता बिरादरी को कहाँ आम आदमी की तरह रहना है। वे तो जीतते ही माननीय, आदरणीय, हरदिल अजीज, मंत्रीजी, बड़े भाई साहब आदि हो जाते है। यदि कुछ थोड़ी बहुत जिबान भी फिसलती है, तो लोकतंत्र में नई गालीयों, मुहावरों, जुमलों, फब्तियों का ही अविष्कार होगा ! जो कि हमारे समाज को आदर्श समाज बनाने में नेताजी का भारी योगदान ही माना जाता रहा है।
इनकी इसी आदर्श वाणी से चुनाव आचार संहिता व उसको बनाने वाले आयोग का भी पता चलता है कि वह अभी अस्तित्व में है ! वे नेताजी ही है जो आम जनता को चुनावी समय में याद दिलाते हैं कि हमारे देश में अभी संवैधानिक मर्यादाएं बची है। नेताजी इसी समय में अपनी जबान निकाल निकाल कर बताते हैं कि “हम है संविधान के रक्षक !” भले चुनाव बाद वे ही संविधान के सबसे बड़े भक्षक निकलते हो ! लोकतंत्र के मंदिर में खड़े होकर शाप तक देते हो...!
जैसे इन दिनों हर क्षेत्र में गला काट प्रतियोगिता है, वैसे ही राजनीति में भी छोटे-बड़े-छुट भैय्या टाईप के नेताओं की बाढ़ आ गई है ओर इसी राजनीतिक तनाव में कभी-कभार जमे-ठमे नेता अपना आपा खो देते हैं। नवोदित नेताओं के दवाब में ओर कुर्सी के मोह में पुराने मठाधीशों की पहले जबान फिसलती है। वे लोकतंत्र के मंदिर संसद को अपना आश्रम समझने लगते हैं और ऋषि-मुनियों जैसे एक दूसरे को शाप दे रहे हो। वैसे भी उन्होंने जनता का धन क्षेत्र के विकास के लिए तो कभी खर्च किया ही नहीं। इसलिए इस तरह के नेता ऐसे में सिर्फ़ जबानी खर्च के ही भरोसे चुनावी मैदान में उतरते है ! ओर फिर यदि किसी नेता ने किसी नेता को कोई गाली-गलौज कर भी दी है तो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि उन्हें तो गाली खाने की आदत पड़ गई है। वे तो अपने आप को भी “कुत्ता या गधा” कहते पाए गए हैं। “नेता शब्द ही गाली हो गया है।” ऐसा हमारे देश की एक बड़ी महिला नैत्री कह चुकी है। क्योंकि शायद उन्हें यह सब अनुभव लोकतांत्रिक मंदिर के स्पीकर रहते हुए बहुत बार हुआ होगा !
खैर, जबान की आदत ही फिसलने की रही है ! ओर यदि चुनाव हो तो कितने ही नेताओं की जबान में कई तरह के अलग-अलग गुप्त रोग होते रहते हैं। ओर फिर वो नेता ही क्या जिसकी जबान न चले या दौड़े, ऐसे जबानी दौड़-भाग में ही कभी कोई फिसल जाए तो किस बात की माफी ? ओर फिर हर किसी मंच पर ऐसे माफी मांगते रहें तो पांच साल तो माफी मांगने में ही निकल जाए। फिर सत्ता सुंदरी के सहारे सैर-सपाटे कौन करे ? जनता का क्या, जनता को तो ऐसे नेताओं की आदत पड़ गई है ! चुनाव में ही सही पांच साल में कम से कम नेताजी कुछ दिन तो क्षेत्र की जनता का मनोरंजन तो करते हैं। बाकि समय तो वहीं सत्ता सुंदरी के साथ....!!
भूपेन्द्र भारतीय
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