यात्राएं नये संसार से मिलाती है....!!
अमर उजाला में....दिल्ली
यात्रा आपको स्वयं व संसार से मिलाती है। यात्राओं पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन हर यात्रा पहले वाली से पूरी तरह अलग ही होती है। इसलिए यात्राओं का महत्व मनुष्य के विकास में आदिकाल से रहा है। नये लोगों से मिलना, नयी जगह देखना भर यात्रा नहीं, बल्कि यह अपने आप में एक पूरा जीवन दर्शन है।
दो साल से पापी कोरोना के कारण कोई लंबी यात्रा नहीं हुई थी। आखिर में मैं, मेरे मित्र सचिन सिंह परिहार व विजयंत सिंह ठाकुर हम तीनों अपनी अपनी व्यस्तताओं को छोड़कर घुमने के लिए घुमन्तुओं की तरह निकल पड़े। पहले से कोई निश्चित नहीं था कि कहां जाना है, बस निकल गए घर से...! सबसे पहले भोपाल से होते हुए सागर व फिर छतरपुर के पास भीमकुण्ड पहुंचे। भीमकुण्ड में पानी सुंदर व पारदर्शी (जैसे मिट्टी का तेल) बहुत गहराई तक भरा हुआ है। कई कहानियां व किवदंतियां है इस कुंड की। जिसमें प्रमुख महाभारत में अज्ञातवास के समय भीम ने पानी के लिए गंगा जी को यहां प्रकट होने का निवेदन किया था और उसके बाद से आजतक यह भीमकुण्ड अस्तित्व में है। एक स्थानीय व्यक्ति ने इस कुंड के बारे में बताया कि सुनामी 2004 के समय इस कुंड के पानी का रंग बदल गया था व बहुत सी हलचलें हुई थी।
भीमकुण्ड के बाद अगला पड़ाव खजुराहों..., बीच में एक जगह एक ताल के किनारे किसी समय बनाई एक सराई दिखी, कुछ देर फोटोबाजी की व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। फिर खजुराहों पहुंचे। गाईड ने सबसे पहले अपने कमाऊ व चलताऊ ज्ञान से खजुराहों के मंदिरों व मूर्तियों का अजब गजब विवरण प्रस्तुत किया। हम तो मूर्तियां ही देखते रहे। पहले से हमें कोई जानकारी इन कलाओं की आत्माओं का नहीं था। फिर भी बहुत कुछ देखने पर पता चला कि ऐसा भी हो सकता है ! इन मूर्तियों व मंदिरों पर ज्यादा कुछ कहना मेरे जैसे व्यक्ति के बस का नहीं हैं...हो सके तो एक बार जरूर जायें व देखें, बस इतना कह सकता हूँ कि हमारा इतिहास गौरवशाली व सांस्कृतिक रूप से समृद्धशाली रहा है। हम न जाने क्यों अक्सर हर मामले में पश्चिम की ओर देखते हैं ? एक पूरा दिन चाहिए खजुराहों की सुंदरता को देखने के लिए ओर शायद इससे भी ज्यादा। और मेरे जैसा व्यक्ति जब एक दिन इस सुंदरता को देख ले तो मुझे इस पर कुछ कहने व लिखने के लिए एक माह चाहिए।
खैर, दही के साथ मस्त पनीर पराठे ग्रहण करके खजुराहों की इस सुंदरता से किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रयागराज की ओर बढ़ गए। गूगल मेप के ज्ञान पर ज्यादा भरोसा करके निर्माणाधीन खराब रास्ते पर फस गए। जैसे तैसे राजनीतिक देवदूतों व गूगल को कोसते हुए रात 12 बजे 31 दिसंबर 2021 को प्रयागराज (इलाहाबाद) पहुंच ही गए। इतना प्राचीन नगर व चारों ओर कचरा व गुटखाबाजों का थूंक फेला था...! मुझे इंदौर जैसे नगर में युवा होते हुए सफाई देखकर आजकल हर नगर में यही आशा रहती है कि वहां भी साफ-सफाई हो। योगीजी को मामाजी से बहुत कुछ सिखना है और अभी यूपी में बहुत कुछ करना है। 2022 के आगमन पर प्रयागराज वाले भी फटाखे फोड़ रहे थे और हम तीन मित्र अपनी मस्ती में मस्त थे। जिस होटल में रूके थे, वहां का एक कर्मचारी कुछ देर के लिए हमारा हमजाम साथी हो गया था और कह रहा था कि योगीजी फिर आ जाऐंगे। ओर कोई उनके मुकाबले में नहीं है। बंदा अपनी जाति से हटकर राय दे रहा था....!!
2022 की पहली सुबह त्रिवेणी(संगम) पर पहुंचे। मकर संक्रांति के मेले की तैयारी शुरू हो गई है। बहुत भव्य दृश्य है गंगा, जमुना व सरस्वती जी(त्रिवेणी) का। केवट निषादराज जी की मदद से संगम तट से आगे बीच संगम नाव से पहुंचकर पांच डुबकी लगाई। फोटोबाजी चल रही है...! निषादराज जी बहुत सी बातें बता रहे थे, हमने खुशी खुशी उन्हें उनका मेहनताना दिया। आखिर में केवट निषादराज फिर कहने लगे, अगली बार ओर आईऐगा भाईलोग, तब तक योगीजी माँ गंगाजी की कृपा से घाट पर ओर अच्छी सुविधाएं कर देगें। हमने अपनी अपनी बाटल में संगम से नीर भर लिया और निषादराज जी से प्रणाम कर विदा ली।
संगम से सीधे माँ भारती के लाड़ले क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान पहुंचे। आजादी के दीवाने-रक्षक-संरक्षक के चरणों में नमन कर फोटोबाजी की। कुछ पल के लिए इस वीर की मूर्ति के सामने खड़े होने पर शरीर कापने लगा व आंखों में गलगलिया भी अई गया। वहीं कुछ युवा अपनी अपनी जाति व कौमों के हिसाब से नारे लगा रहे थे ! और फोटोबाजी कर रहे थे...! मुझसे वहां ज्यादा देर नहीं रूकाया। मन में प्रश्न आ रहे थे क्या हम इस आजादी के काबिल है ?
विगत दो वर्ष से ट्विटर से जुड़े व मिले प्रोफेसर साहब रमाकान्त राय जी से भी इलाहाबाद में मिलना हुआ। प्रोफेसर साहब के साथ भोजन किया। उन्होंने हमें बहुत सी रोचक व अच्छी बातें बताई व चर्चा की। काफी मजेदार भोजन रहा व उसके बाद प्रोफेसर साहब के स्नेह पर इलाहाबाद के प्रसिद्ध रसगुल्लों का सेवन किया। प्रोफेसर साहब बड़े मस्तमौला व हिन्दी साहित्य के विद्वान है। उनके माध्यम से भी प्रयागराज व इलाहाबाद को जाना... प्रोफेसर साहब ने अगली बार इटावा आने का वादा लेकर हमें वाराणसी के लिए विदा किया।
वाराणसी (बनारस) के ईमानदारी पूर्ण निर्माण किये चर्चित मार्ग काशी_कोरिडोर के माध्यम से गोधूलि बेला में कुछ मधुर लोकगीतों व बालीबुडीया गीतों को सुनते हुए, प्रयागराज से जल्दी ही काशी विश्वनाथ पहुंच ही गए। पर इस मनमौजी नगर में जनसंख्या वृद्धि के कारण व ट्राफिक में फसने के कारण गंगा आरती का अद्भुत नजारा नहीं देख पाये। पर जैसे तैसे अस्सी घाट पर पहुंच ही गए। यहां का भी वर्णन करना मेरे बस का नहीं है। हां फोटोबाजी सतत चल रही थी! हर घाट का अपना इतिहास रहा है। कौन नहीं आया है गंगाजी के घाट पर ? राजा हो या फिर रंक..., रात को लाईट शो के कारण दृश्य मनोरम लग रहा था। गुलाबी ठंड अलग ही मजा दे रही थी। देवि अहिल्या बाई घाट पर पहुंचकर मन फिर भावुक हो गया, हाँ अभिमान भी हुआ कि मालवा की रानी ने आज से करीब 250 वर्ष पहले काशी में मालवा से आकर सनातन धर्म व संस्कृति के लिए कितना बड़ा कार्य किया है। देवी अहिल्याबाई ने सनातन धर्म के लिए कितना कुछ किया है।
देर रात तक बनारस की गलियों में डमते(घुमते) रहे। बनारस, बनारस से वाराणसी होता जा रहा है। यहां मोदीजी ने बहुत सारा काम कराया है। निर्माण सतत चल रहा है। बनारस की ठंड भी धीमे धीमे मजा देने वाली थी...! इस प्राचीनतम नगर में घुमते हुए लगा कि यह कब काशी से बनारस व बनारस से वाराणसी हो जाता है, पता ही नहीं चलता है...! पर वाराणसी वासीयों को भी अपने इस पल-पल परिवर्तित होते धाम व तीर्थ की स्वच्छता के लिए भी जागरूक होना पड़ेगा...। तब कहीं जाकर यह नगर अपने गौरव को यथावत रख पाऐगा।
काशी में सुबह बाबा काशी विश्वनाथ भगवान के दर्शन किये। जब दर्शन कर रहा था मैंने देखा, “एक महिला के दर्शन करते हुए आंसू नहीं रूक रहे थे !” उनखे देखी के माहरी आंख में गलगलीया अई गया। बाबा बाबा हे.., बोला था बूला लूगाँ। बाबा ने बूला लिया। ओर बाबा ने बोला भी जा बेटा थारा साथे तो धर्मराज है। सब अच्छा होगा। धर्म ,आस्था व भक्ति का संगम काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में चहु ओर था। प्रांगण में फोटोबाजी प्रतिबंधित है। अवैध निर्माण व कब्जे का जाल बिछा था, वर्तमान में उसे साफ किया जा रहा है।
बनारस की गलियों में सुबह भी फोटोबाजी चल रही थी...! बनारस की चटपटी पपीता खाकर वहां से आगे बढ़े। वाराणसी से रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या जाना था, पर फिर वही जीवन की व्यस्तताओं व भागादौड़ी के कारण बात नहीं बन पाई...! घर की ओर आने का फरमान आ गया। शायद रामलला जी की अभी बुलाने की इच्छा नहीं है। दिशाधारी जयश्रीराम बोलकर आगे बढ़ गए।
एक बात तो रह ही गई, आखिर बनारस आये और यहां का पान न खायें ऐसा कैसे हो सकता है...! बनारस का पान तो खाना ही था, आधा घंटा इंतजार करने के बाद पान बना और फिर सीधे माता मैहर शारदा जी के दर्शन के लिए होंडा अमेज कार को परिपक्व कार चालक मित्र सचिन परिहार ने आगे बढ़ा दिया। गंतव्य के दौरान साधा भोजन करके बनारसी पान का आनंद लेकर व मिर्जापुर में चाय पीकर( चाय वाले से कालीन भय्या की भी बात की, बोला, बालीवुड वाले कुछ भी बना देते हैं ! फोकट में भय्या को बदनाम कर रहे हैं...!) बनारस का पान इतना अच्छा लगा कि ओर पान बना लाने थे। आगे दौड़ा भागी करते हुए शाम को, माँ शारदा मैहर माता जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रात कटनी में एक अच्छी होटल मिल गई तो वहीं रूके और 2022 के पहले सोमवार की सुबह मित्र व माड्साब संजू सर ने दमोह, भोपाल होते हुए कार को सोनकच्छ नगर के लिए दबा दिया....!!
यह यात्रा वृतांत, सिर्फ़ यात्रा वृत्तांत से थोड़ा आगे बढ़कर तीन घुमन्तुओं का आंखों देखा है। क्या कभी यात्राएं समाप्त होती हैं...?
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
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