उनका बजट - अपना जुगाड़....!!
सुबह सवेरे अखबार में.....
भला छोटे लोगों का कोई बजट होता है ! अपन तो बस जुगाड़-पानी के माध्यम से अपने अर्थ का ‛अर्थिंग’ जुगाड़ अर्थव्यवस्था से लेते रहते हैं। बजट बड़े लोगों का होता है। बजट की बात भी उन्हें ही समझ आती है। और वे ही बजट की बातें अंग्रेजी में करते जमते हैं। बजट का भाषण उनके लिए ही होता है। अपन तो बजट भाषण में पेश की गई कविता-शायरी से ही संतुष्ट हो जाते हैं। अपने लिए वहीं आर्थिक विकास व उन्नति है।
जिनके पास बजट का कोई आधार ही नहीं है तो उन्हें बजट की बारिकियां कैसे समझ आ सकती है ? आप लाख समाचार चैनलों में बजट भाषण सरपट चलाओं या फिर चार दिनों तक पूरा का पूरा अखबार बजट की खबरों से भर दो, हल्के-फुल्के आदमी के बसका नहीं है बजट को समझना। और ‛फिर बजट जब अंग्रेजी भाषा में पेश नहीं हो तो कैसा बजट !’ आम आदमी जीवन भर अपनी आर्थिक गाड़ी जुगाड़ के ईंधन से धकाता रहता है, उसके लिए सरकार कितना ही “आम आदमी का बजट” पेश करें। पर वह बजट कभी धरातल पर आम आदमी के हित में सिद्ध हुआ ? जहां बजट में बात सभी आमोखास की होना चाहिए, वहां बजट में सिर्फ़ खास-खास लोगों की बात होना “घाटे का बजट” जैसा ही है !
जैसे बजट की तैयारी हलवा बनाते-खाते हुए समाचार चैनलों वाले दिखाते हैं ! वहीं आम आदमी के हलवे का बजट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। वह जैसे तैसे जुगाड़ करके ही रुखी-सूखी खिचड़ी के सहारे अपने जीवन की अर्थ-व्यवस्था चला रहा है। जिस उत्साह व जिज्ञासा से बजट को सुनते किसी बुद्धिजीवी को देखता हूँ, तो लगता है ये जरूर कोई बड़ा आदमी है । क्योंकि आम आदमी बजट भाषण को कितना ही सुने-पढ़े , उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ता है। वह आम आदमी तो कभी अपने लंगोटिया यार से जुगाड़ करके अपनी अर्थव्यवस्था चलाता है, या फिर कभी ब्याज-बट्टे के दम पर अपने जीवन की गीली पीच पर धीरे धीरे बल्लेबाजी करता रहता है।
‛उनका’ बजट अपन के लिए “अपना” आजतक नहीं हो पाया। उन्होंने वह बजट बनाया ही दूसरों के लिए था।फिर निवरे अर्थशास्त्री बनकर बजट को अपना कहना मानसिक दिवालिया होने जैसा है। एक-डेढ़ घंटे के बजट भाषण को कई बार मन की बात की तरह सुना, पर इन बजट भाषणों में अपन को अपने ‛अर्थ की धुनें’ आजतक सुनाई नहीं दी। दो एक बार बजट को बहीखाता समझकर देशी अंदाज़ में भी समझने की कोशिश की, पर बजट रहा वहीं का वहीं अंग्रेजी नुमा लाल सूटकेस लपटन साहब !
बजट का घर ‛लाल सूटकेस’ को हाथों में थामे बड़े हॉउस में प्रवेश करते कवि-शायरों नुमा वित्तमंत्रियों को भी सुना, पर अपन बजट को कविता व शायरी के माध्यम से भी नहीं समझ पाये। हाँ, आजतक बजट भाषणों में पेश की गई कविताएँ व शायरी मुझे पसंद जरूर आई हैं। मैं तो वित्त मंत्रालय से निवेदन करता हूँ कि अबतक सभी बजट भाषणों में पेश की गई कविता व शायरी का एक साझा संकलन निकाला जाये। इससे साहित्य व साहित्यकारों के लिए अच्छा-खासा बजट तैयार हो सकता हैं। जिससे कि उनकी आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया जा सके व साहित्य समाज ‛आत्मनिर्भर’ बन सके। इस साझा संकलन को पेश करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ व्यंग्यकारों को दी जाना चाहिए। वहीं इस साहित्यिक बजट के माध्यम से नवोदित लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए भी एक नई जुगाड़ तो हो ही जाऐगी। उनका बजट कितना ही आर्थिक विकासोन्मुखी हो, पर ‛अपने विकास का जुगाड़’ तो बजट की कविता व शेरोशायरी का साझा संकलन निकालने से ही हो सकता हैं....!!
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
बजट का घर ‛लाल सूटकेस’ को हाथों में थामे बड़े हॉउस में प्रवेश करते कवि-शायरों नुमा वित्तमंत्रियों को भी सुना, पर अपन बजट को कविता व शायरी के माध्यम से भी नहीं समझ पाये। हाँ, आजतक बजट भाषणों में पेश की गई कविताएँ व शायरी मुझे पसंद जरूर आई हैं। मैं तो वित्त मंत्रालय से निवेदन करता हूँ कि अबतक सभी बजट भाषणों में पेश की गई कविता व शायरी का एक साझा संकलन निकाला जाये। इससे साहित्य व साहित्यकारों के लिए अच्छा-खासा बजट तैयार हो सकता हैं। जिससे कि उनकी आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया जा सके व साहित्य समाज ‛आत्मनिर्भर’ बन सके। इस साझा संकलन को पेश करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ व्यंग्यकारों को दी जाना चाहिए। वहीं इस साहित्यिक बजट के माध्यम से नवोदित लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए भी एक नई जुगाड़ तो हो ही जाऐगी। उनका बजट कितना ही आर्थिक विकासोन्मुखी हो, पर ‛अपने विकास का जुगाड़’ तो बजट की कविता व शेरोशायरी का साझा संकलन निकालने से ही हो सकता हैं....!!
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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