आंचलिक उपन्यासों में एक नया उपन्यास;- “चाँदपुर की चंदा”
लंबे अंतराल के बाद हिन्दी का कोई नया उपन्यास पढ़ा। वह भी युवा लेखक का पहला उपन्यास। अतुल कुमार राय को सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर पढ़ता रहा हूँ। उनके ब्लॉग भी पढ़े। इस उपन्यास में भी भाषा सोशल मीडिया वाली ही है। ज्यादा साहित्यिक हिन्दी जैसा कुछ नहीं है। पर अपनी लोकभाषा को इस उपन्यास के माध्यम सुंदर प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास में ग्रामीण परिवेश को जीवंत रखने के लिए भाषा भी गाँव समाज की ही है। आंचलिक उपन्यासों की कड़ी में यह वर्तमान में पठनीय उपन्यास बन गया है। इस उपन्यास के शुरुआत में कई जगह पर लेखक श्रीलाल शुक्ल के “राग दरबारी” उपन्यास से जरूर प्रभावित नजर आते हैं। पर “चाँदपुर की चंदा” उपन्यास 21वीं सदी के पहले दशक के भारतीय ग्रामीण समाज की झलक दिखाता है। वैसे यह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के ग्रामीण जनजीवन की कहानी कहता है। लेकिन भारत के अधिकांश गाँवो की आज से दस वर्ष पहले की कहानी कहने में माना जा सकता है।
इस उपन्यास में हर दूसरे-चौथे पृष्ठ पर बॉलीवुड के गीतों के बोल आये हैं। वैसे लेखक मूलतः मन मिजाज व उच्च शिक्षा से संगीतकार है तो स्वाभाविक है कि गीत-फिल्मों की चर्चा तो उपन्यास में होगी ही। पर उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है पूर्वांचल समाज की संस्कृति, लोकगीत, भोजपुरी सिनेमा, ग्रामीण जीवन, अपनी बोली आदि को लेखक ने उपन्यास में बहुत ही सहज व सरल तरीकें से उतारा है। इसे पढ़ते हुए आंखों के सामने ग्रामीण भारत की झलक स्पष्ट होती रहती हैं। पीछले 10-15 वर्षों में ग्रामीण भारत बहुत बदल गया है। टीवी व मोबाइल ने पीछले दस वर्षों में बहुत कुछ बदल दिया है। आधुनिकता ने गांव के लोगों का पलायन बहुत बड़ी मात्रा में बड़ा दिया है। आजकल गाँव पहले के गाँवों जैसे नहीं रहे। वर्तमान में भारत की बड़ी आबादी पीछले 20 वर्षों से गाँव-कस्बों व शहरों के बीच की खाई में ही संतुलन बनाने में अपना जीवन खपा रही है। उपन्यास में कई जगह पर व्यंग्य, कटाक्ष के माध्यम से ग्रामीण भारत की विसंगतियों पर भी करारा प्रहार किया गया है। लोकमानस की सहज व सरल प्रवृत्तियों को भी उपन्यास में सुंदर ढंग से बताया गया है।
प्रेम पत्र व प्रेम प्रसंग की खुबसूरती को भी उपन्यास में बहुत रोचक तरीक़े से बताया है। उपन्यास में कई बार सहज ही व्यंग्य व हास्य का सुंदर मेल कराने में लेखक सफल हुए है। वर्तमान भारतीय समाज की विसंगतियों को भी लेखक ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से छुआ है और तीखे प्रश्न भी उठाये हैं। विकास अब भी भारत के अंतिम नागरिक के पास पहुंच नहीं पाया है।
इस उपन्यास का ताना बाना प्रेम कहानी के माध्यम से ही बुना गया है। सदा से भारत की आत्मा गाँवों में ही बसती रही हैं। लेखक ने अपने इस उपन्यास में उसी आत्मा का सुंदर चित्रण किया है व साथ ही उसे सहेजने के लिए यह उपन्यास लाया गया है। लोक गीत, गाँवों में विभिन्न आयोजनों में गाने जाने वाले गीत, कहावतें, अपनी भाषा-बोली का संरक्षण भी इस उपन्यास के माध्यम से करने का सुंदर व सफल कार्य लेखक ने किया है।
लेखक अपने उपन्यास में यह बताने में सफल हुए है कि गाँवों में भी बहुत से दुख है लेकिन ग्रामीण समाज व उसकी जीवनशैली इन दुखों को एक साथ रहकर कम कर देती हैं। ग्रामीण जीवन में अब भी भाईचारा, एकता व स्नेह बचा है, जो कि यह शहरों में दिनोदिन लुप्त हो रहा है।
इस उपन्यास में 21वी सदी के पहले दशक के भारतीय ग्रामीण जीवन का संपूर्ण चित्रण करने में लेखक सफल हुए। आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँव मूलभूत सुविधाओं व विकास से दूर है। स्वास्थ्य की सेवाएं नगण्य है, गांव में ठेकेदारों ने सभी विभागों से सांठगांठ करके भवन तो बना दिये हैं लेकिन उनमें काम करने वाले कर्मचारी बहुत कम ही समय नजर आते हैं। राष्ट्रीय भाव की कमी अब भी है। इस उपन्यास के चाँदपुर में आई बाढ़ के बाद का नजारा भारत के ऐसे कितने ही गाँवों की बहुत कुछ सही स्थिति बताता है। बेटी होना ओर उसके बाद उसकी शिक्षा, घर से बाहर निकलना, विवाह, दहेज, आत्महत्या बहुत सी परेशानियां व कुरीतियां अब भी बहुत से गाँवों में यथावत बनी हुई है।
बच्चों के विवाह में अब भी उनकी पसंद नापसंद पर जरूरी प्रश्न उठाये गए हैं। लेखक ने यहां अपने पहले ही उपन्यास बहुत ही बेबाकी से सामाजिक-जातिगत बुराईयों पर प्रश्न उठाये हैं। वहीं बड़े बड़े लेखक जो 25-50 पुस्तकें लिखने का दावा करते हैं लेकिन उनकी कृतियों में अब भी आम आदमी की आवाज़ कहीं नहीं सुनाई देती। वे सिर्फ़ धरातल से कटी हुई कृतियां ही रही हैं ! उपन्यास चाँदपुर की चंदा गाँव के जीवन के माध्यम से ग्रामीण भारत की समस्याओं को पाठक के सामने रखने में बहुत हद तक सफल रहा है।
मंटू व चंदा का प्रेम व उनका प्रेम पत्र के माध्यम से संवाद पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के लिए लालायित करता है। मेरे जैसा पाठक इस उपन्यास में बहुत बार हँसता, मंद-मंद मुस्कुराता, भावुक होता व चौंकता भी है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि यह आंचलिक उपन्यासों में एक मसाला उपन्यास है। जिसमें आपको भारत की बड़ी आबादी के जीवन संघर्षों से संबंधित सबकुछ पढ़ने को मिलेगा। कुछ जगह लगता है कि थोड़ी जल्दबाज़ी में लिखा गया है, पर यह मेरा अपना मत हो सकता है।
आज की सोशल मीडिया पीढ़ी पत्रों की दुनिया के सौंदर्य को नहीं जानती हैं। और उसमें भी प्रेम पत्र का संसार तो बहुत ही निराला व सुंदर रहा है, उसकी यह पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती है। अतुल जी ने इस उपन्यास में प्रेम पत्र के माध्यम से इस उपन्यास को बहुत ही रोमांचकारी व पठनीय बना दिया है। आज मोबाइल युग ने प्रेम पत्रों की सुंदरता को हमसे छीन लिया है। शायद इसलिए ही आजकल प्रेम भी लंबे समय तक कहाँ टिकता है। रिचार्ज खत्म, प्रेम एक्पायर...!
अंत से पहले उपन्यास में आई आत्महत्याओं की घटनाओं ने जरूर कुछ चौंकाया और साथ ही उपन्यास को एक रोचक व हृदय स्पर्शी मोड़ पर जाकर इस प्रेम कहानी को जीवन रूपी नदियां से पार कराया। यहां उपन्यास के सार को ज्यादा विस्तार से बताना पाठकों के लिए रूची कम कर सकता है। हो सकता है उपन्यास का सारा रोमांच ही मेरी इस समीक्षा में खुल जाये, इसलिए अंत में एक बार फिर इतना ही कह सकता हूँ कि उपन्यास आंचलिक कथाशिल्प की दृष्टि से रोचक व पठनीय है। उपन्यासकार अपनी बात कहने में सफल हुए है। शुरुआत में जरूर कथा धीरे धीरे ओर इधर उधर हुई पर अंत भला तो सब भला। अपने पहले उपन्यास में ग्रामीण भारत की सच्चाई इतनी ईमानदारी व बेबाकी से रखना प्रशंसनीय है।
आखिर में इसी उपन्यास की पंक्तियां-“ देश के हर चाँदपुर में एक आप जैसा बाबा हो तो देश की चंदाएँ कभी रो नहीं सकती हैं। आपने जो मुझे दिया है, मैं उसका कई गुना चाँदपुर को लौटाने का वादा करती हूँ।” ये ही पंक्तियां इस उपन्यास का सार है और यहीं संदेश...
इससे इतना ही कहा जा सकता है कि उपन्यास में ग्रामीण लड़कियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बातें कही गई है और उनके अधिकारों के लिए एक बेहद सुंदर व आवश्यक उपन्यास को रचा गया है। उसके लिए उपन्यास के लेखक बधाई के पात्र है। साथ ही इस उपन्यास “चाँदपुर की चंदा” के लेखक अतुल कुमार राय से यह आशा की जाती है कि वे फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से सामांजस्य स्थापित करते हुए व इसके तिलस्मी आकर्षण से बचते हुए, इससे भी अच्छा लेखन भविष्य में करते रहेंगे। ऐसी आशा व शुभकामनाएं दोनों....
इससे ज्यादा अभी इस उपन्यास पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इस उपन्यास के एक ही पाठ में सारी बातें कहना अतिश्योक्ति होगी। आगे इस उपन्यास का पुनर्पाठ किया तो जरूर ओर भी इस पर लिखने की कोशिश करूँगा। यह सब एक पाठक के तौर पर ही लिख रहा हूँ, समीक्षा या आलोचना की दृष्टि से नहीं।
पुस्तक : चाँदपुर की चंदा
उपन्यासकार: अतुल कुमार राय
प्रकाशक : हिंद युग्म
मूल्य : 199
पाठक--- भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com



बेहद आभार भूपेंद्र भाई। आपकी टिप्पणी से आगे कुछ और सार्थक लिखने की प्रेरणा मिली।
ReplyDeleteजरूर अतुल भाई, स्वागत है, प्रतिक्षा रहेगी
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