Friday, April 8, 2022

जातिवाद के ताल में प्रश्न के कंकर....!!

 जातिवाद के ताल में प्रश्न के कंकर....!!

   

          इंदौर समाचार में....!!

देखो, मैं तुम्हें अपनी रिक्श पर जाति की मिटिंग में ले चल रहा हूँ। जाति के बाकि सदस्यों ने तो मना कर दिया था। कह रहे थे, यार उसे मत बुलाना। वह प्रश्न करता है ! जाति के भवन के लिए मांगे गए चंदे के हिसाब-किताब से संबंधित प्रश्न करता है ! मेरा मित्र लचकराम, फिर मुझसे कहने लगा देखो, तुम वहां अपनी जाति की मिटिंग में किसी तरह का प्रश्न मत करना। तुमने पिछली बार भी परिवारवाद से संबंधित प्रश्न पूछ लिया था। बड़े पटेल साहब को बुरा लग गया था। बाद में मुझे बुलाकर पटेल साहब के खास ठाकुर साहब ने कहा था कि अब से इस ‛विवादित’(शिकायती) व्यक्ति को मत बुलाना।

मैंने अपने जाति मित्र लचकराम से कहा;- मीटिंग है तो विधिवत सूचना तो होना चाहिए ना। मार्क जुकरबर्ग की किताब व उसके थोबड़ेनुमा वाट्सएप पर एक सार्वजनिक संदेश लिख देने से क्या सबको सूचित हो जाऐगा ? क्या सभी युवा, प्रौढ़, वरिष्ठ व जाति के सभी बुजुर्ग सदस्य सोशल मीडिया के ओटलों पर हमेशा बैठे रहते हैं ? जो सबको ही स्वतः सूचित हो जाये ! इस मँहगाई में इंटरनेट डाटा का भाव देखा, कितना बढ़ गया है। ऐसे जाति सुधार होता है ?
मित्र बोला, बस तुम्हारी इसी आदत के कारण मैं तुम्हें किसी मिटिंग व जाति की बैठक में नहीं ले जाता हूँ ! तुम कोई न कोई खल्बां(विवाद) रोप ही देते हो। तुमको क्या मतलब था, “यह प्रश्न पूछने से कि जाति के पुराने छात्रावास को बेचने पर आई भारी-भरकम रकम का क्या हुआ...!” ‛उस जगह का आड़े-छीपड़े(चोरीछिपे) सौदा हुआ हो या फिर सबके सामने..!’ तुम्हें क्या मतलब !
मेरा जाति मित्र आगे फिर चिढ़कर बोला;- वहां तथाकथित सम्माननीय बड़े जातिगत लोगों से पिछली बैठक में यह पूछने की क्या जरूरत थी, कि जाति के सामूहिक कार्यों के लिए नई ली गई जमीन पर निर्माण कार्य कब शुरू होगा...! “उस जमीन को इतने ऊंचे दामों में क्यों लिया गया ?” कितने ही लाखों की जमीन हो। तुम्हें उससे क्या मतलब ? तुम क्या पूरी जाति के ठेकेदार हो ? “सिलगा(जला) तुम देते हो आग मुझे बुझाना पड़ती है।” जबरन लड़ाई मोल लेते हो। तुम्हें पता है ! वे सब बड़े लोग हैं। सैकड़ों बिघा जमीन है उनके पास। उनके बड़े-बड़े धंधे चलते हैं। तुम्हारे घर में जितनी जगह है उतनी जगह में उनका पखाना होता है ! तुम्हारे दादा-परदादा के समय से उनकी जागीरी चलती आ रही है। दो मिनट में तुम्हें व तुम्हारे घर वालों को जमीन पर ला देगें। कल से तुम्हारे बच्चों की रिश्ते-नाते नहीं होगें। यार जबरन फटे में टांग मत अड़ाया करो।
मैं धीरे से बोला, “पर सार्वजनिक कार्यों में पारदर्शिता के सिद्धांत नाम की भी तो कोई बात होती है ?”
बस तुम्हारे ‛सिद्धांत’ ! इनसब झमेलों के चक्कर के कारण ही मैं तुम्हें जाति व सार्वजनिक कार्यों की किसी भी मिटींग में नहीं ले जाता। तुम्हें हर बात का स्पष्टीकरण चाहिए। हर बात में सिद्धांतों का झंडा मत तोका करो। अब हर बात में हिसाब-किताब मांगने के जमाने गए ! तुमसे बने तो तुम एक कट्टा छपा लो और जाति उद्धार-सुधार के नाम पर खुब काटों रशीद। तुम्हें किसी ने रोका है ? क्या अपनी इस जाति में तुम ही पढ़े लिखे व जागरूक हो ? बाकि लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? बाकी सब गवांर हैं ? “बड़े आये जाति सुधार करने वाले...!”

     

    नईदुनिया अधबीच स्तंभ में...

लचकराम आगे फिर बकता गया; जो जाति का चंदा खा रहा है उसे खाने दो। कहाँ उसने सारा चंदा तुमसे ही लिया है...! तुमकों चंदा नहीं देना है अगली बार मत देना। लेकिन हाँ अब से यदि तुम मेरे साथ अपनी जाति की किसी मीटिंग या सभा में चलो तो भला करके तुम्हारी यह प्रश्नों की दुकान घर पर रखकर ही चलना। पिछली बार जब हम अपनी जाति की एक बैठक के लिए तुम्हारे घर से निकले थे, तो भाभीजी ने भी मुझसे सही ही कहा था, कि भय्या इनका ध्यान रखना, ‛इन्हें बीच-बीच में बड़बड़ाने की बड़ी बेकार आदत है।’ भाभीजी सही कहती है ! तुम समझते क्यों नहीं, “तुमको पता नहीं है तुम्हारे कारण मुझे जाति के बड़े लोगों को कितना समझाना पड़ता है। वह तो मेरे पिताजी भी हमारी जाति में बड़ा रसूख रखते हैं व उनका दबदबा है। इस कारण ये सब तथाकथित बड़े लोग मेरे सामने ज्यादा कुछ चूं-चपड़ नहीं कर पाते हैं व तुमको मेरा साथी समझकर तुम्हारे खिलाफ खुलकर बोल नहीं पाते हैं, नहीं तो ये लोग तुम्हारे टांगड़े(टांगें) कब के तोड़ देते।” इसलिए कहता हूँ अपने को क्या ! जाने दो सालों को भाड़ में..! जनता का चंदा हैं, वह कहां हमने अपनी जेब से दिया है..! जब जनता ही जागरूक होना नहीं चाहती है तो हम फोकट में क्यों किसी से बैर ले....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

2 comments:

  1. पटेल और ठाकुर...एक ही "जात" के हैं

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  2. ओढ़क(टाईटल) है। मध्यप्रदेश राजस्व संहिता में तो बकायदा पटेल पद है। कलेक्टर नियुक्त करता है। ये जाति से भी खतरनाक होते है। सही कहा। आभार 🌻🙏

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