Tuesday, April 5, 2022

कश्मीर, बंगाल जैसे नरसंहार रोकने के लिए भारत में पुलिस सुधार बेहद जरूरी...!

 कश्मीर, बंगाल जैसे नरसंहार रोकने के लिए भारत में पुलिस सुधार बेहद जरूरी...!

               
          



भारत में आमजन के बीच पुलिस का चरित्र स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी भयाक्रांत बना रहता है। सरकारें पुलिस को अपने राजनीतिक हित साधने के लिए कठपुतली की तरह उपयोग करती रही है। 1977 में आपातकाल की स्थितियों को देखते हुए पुलिस सुधार पर चर्चा हुई व स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय पुलिस आयोग भारत में 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार के लिये अनुशंसा करने के लिये 15 नवम्बर 1977 को गठित एक आयोग बना था। श्री धरमवीर इसके अध्यक्ष थे। इस आयोग ने रिपोर्ट देने की शुरुआत 1981 से की। फरवरी 1979 और मई 1981 के बीच इसने कुल आठ रपटें दीं। तब तक देश में पुनः कांग्रेस की सरकार बन चुकी थी। अतः पुलिस आयोग की इस रिपोर्ट को कांग्रेस सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया या फिर कह सकते है कि रिपोर्ट सुस्त अवस्था में पड़ी रही। और ना ही किसी अन्य दल की सरकार ने इस रिपोर्ट को यथावत लागू करने की हिम्मत दिखाई।

इस आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हर प्रदेश में एक “स्टेट सिक्योरिटी कमीशन" का गठन होना चाहिए। उसके अन्वेषण संबंधी कार्य को शांति व्यवस्था संबंधी कार्य से अलग किया जाना चाहिए। पुलिस प्रमुख की नियुक्ति एक विशेष प्रक्रिया द्वारा होनी चाहिए ताकि केवल योग्य व्यक्ति का ही इस जिम्मेदार पद के लिए चयन हो सके। चयन होने के पश्चात उनका न्यूनतम सेवाकाल होना चाहिए तथा एक नये पुलिस अधिनियम को लागू किया जाना चाहिए।” लेकिन कांग्रेस के बाद भी आई किसी भी दल की सरकार ने इन अनुशंसाओं को लागू नहीं किया।

       


15 साल बाद सन् 1996 में सेवानिवृत्त डी.जी.पी. प्रकाश सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में लोकहित याचिका दाखिल करके माँग की, कि पुलिस सुधार आयोग की इस रिपोर्ट को लागू करवाया जाए। 10 वर्षों के बाद, 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के आदेश देते हुए सभी सरकारों को दिशा निर्देशों के सात बिंदुओं का पालन करने का आदेश दिया। इसमें प्रमुखता से यह निर्देशित किया गया कि राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, डी.जी.पी. की नियुक्ति गुण-दोष पर आधारित हो, पुलिस अधिकारी अपना कार्यकाल पूर्ण करें, अनुसंधान पुलिस का पृथक्करण, पुलिस स्थापना परिषद्( जो पुलिस विभाग के स्थानांतरण, नियुक्ति, प्रमोशन एवं सेवा मामले देखेगी), राज्य स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण व केन्द्र स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग आदि। इनमें से कुछ ही निर्देशों का राज्य सरकारों ने पालन किया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को आये 16 वर्ष हो गया है ! पर अबतक पूर्ण रूप से प्रकाश सिंह केस के आदेश का पालन नहीं किया गया ।

इस आदेश के पालन की निगरानी स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने की। अवमानना कार्यवाही भी सरकारों पर चलाई। पुलिस सुधार पर पुलिस आयोग की रिपोर्ट आए 40 वर्ष बीत गए, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आदेश पारित हुए 16 वर्ष बीत गए, अभी तक आदेश का पालन केंद्र व राज्य सरकारों ने क्यों नहीं किया गया है ? क्योंकि आयोग की रिपोर्ट एवं न्यायालय के आदेशानुसार पुलिस को, जो अधिकार एवं स्वायत्तता दी गई है, यदि सरकारों ने पुलिस को दे दी होती तो कई नेताओं व सरकारों के भ्रष्टाचार , आपराधिक कृत्यों व आर्थिक अपराधों का भंडाफोड़ हो जाता। इसी स्थिति से बचने के लिए सभी सरकारों ने पुलिस आयोग की रिपोर्ट को लागू न करके रद्दी में डाल दिया था। पुलिस सुधारों का गर्भपात करवा दिया गया था। यह देश की अपूर्णनीय क्षति थी। तीखे शब्दों में, “यह देश के विरुद्ध षड्यंत्र था।" जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आया उसने अंग्रेजों के बनाये पुलिस कानून का ही सहारा लेकर पुलिस का अपने मनमाफिक उपयोग किया। जिससे भारत में अपराध का स्तर दिनोंदिन बढ़ता ही गया।

केन्द्र व कई राज्यों में पहले कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दल सत्ता में रहे और अब भाजपा पीछले आठ से ज्यादा वर्षों से केन्द्रीय सत्ता में है। लेकिन सबसे बड़ा लोकतांत्रिक दल भाजपा भी पुलिस सुधार (प्रथम पुलिस आयोग की रिपोर्ट) को पूर्णरूप से लागू नहीं करवा पाया। अब जबकि संसद में दंड प्रक्रिया (पहचान) विधयेक 2022 व फॉरेंसिक जाँच बिल पर चर्चा हो रही है तो इसके साथ ही संसद में विस्तृत रूप से पुलिस सुधार व पुलिस अधिनियम 1861 पर भी व्यापक चर्चा होना चाहिए। तथा वर्तमान सरकार को पुलिस सुधारों को जल्दी से जल्दी लागू करना चाहिए।

पुलिस सुधारों के इतने दिनों तक लंबित रहने के कारण ही कश्मीर, बंगाल, केरल, गुजरात, झारखंड, असम, दिल्ली आदि राज्यों में राजनीतिक हिंसा, जघन्य अपराध, बलात्कार, आर्थिक अपराध, दंगे, नरसंहार आदि दिनोदिन बढ़ते गए व अबतक भी हो रहे हैं ! क्योंकि पुलिस के हाथ बंधे रहते हैं। उसे जब भी उचित व त्वरित कार्यवाही करना होती है वह ऊपर के आदेश की प्रतिक्षा में कुछ नहीं कर पाती है और तबतक अपराधी अपराध कर साक्ष्य मिटाकर लोकतांत्रिक समाज में हिंसा का नंगा नाच खेलकर फरार हो जाता है। ओर फिर आखिर में वहीं बॉलीवुड की फिल्मों में जैसा बताया जाता है कि पुलिस अपराध हो जाने के बाद आती है तबतक सब कुछ हो चुका होता है...!


भूपेन्द्र भारतीय (अधिवक्ता व लेखक)
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

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