Saturday, October 1, 2022

बापू की बकरी फिर खो गई....!!

 बापू की बकरी फिर खो गई....!!


अधबीच-नईदुनिया


एक बार फिर बापू की बकरी कहीं खो गई है। सारे समाज व देश में चर्चा चल पड़ी की अब क्या होगा ? बापू सुबह की प्रार्थना के समय से परेशान हैं। मीडिया में बड़ी खबर की भूमिका बन गई है। सूचना मंत्रालय में खलबली मच गई है। बापूवादी चिंतक चिंतित हो रहे हैं कि आखिर यह किसने किया होगा। कहीं किसी ने बापू के साथ मजाक तो नहीं किया ! वह बकरी बापूजी की सबसे प्रिय बकरियों मे से एक बकरी है। कल रात ही उस बकरी के दूध से बापू ने भोजन किया था। कल सांध्य प्रार्थना में वह बकरी बापू जी के साथ प्रार्थना सभा में बैठी थी।
इधर विपक्ष के नेताओं ने आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि यह सरकार का ही कोई षड्यंत्र लगता है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति फिर शुरू हो गई है।

बापू की बकरी को ढ़ूँढने के लिए एक खोजी दल का गठन किया गया। बापू के न्यास से इस दल के लिए धन आबंटित किया गया। दल के सदस्यों को चारों दिशाओं में भेजा गया। ये सदस्य हर किसी से पूछने लगे, “आपने बापू की बकरी को देखा है।” कोई कहता मैंने तो ना पहले देखा था- ना ही अब उनकी बकरी को देखा। एक गाँव वाले ने कहा कि कल सहकारिता भवन में घुसते देखा था। उसके बाद से पता नहीं किधर गई। कोई कहता, “दो पुलिस वालें एक बकरी को थाने ले गए थे। हो सकता है वह बापू की ही बकरी हो। मैं ठीक से नहीं बता सकता कि वह बापू की ही बकरी थी ! मामला पुलिस का है। ओर आप जानते है कि पुलिस के मामले में कौन हाथ डाले।"

इधर उत्तर भारत से खबर आ रही है कि कहीं बाढ़ में तो बापू की बकरी नहीं खो गई ? “बाढ़ व भ्रष्टाचार के कारण इधर प्रति वर्ष हजारों जानवरों व मनुष्य खो जाते हैं।” भला एक बकरी ऐसे में कैसे बच सकती है ! दल के एक सदस्य के पास चाँदनी चौंक से फोन आया कि कल रात को उसने अपनी गली में एक काली बकरी को घुमते देखा था। कुछ बच्चें उसे पत्थर मारकर बार बार परेशान कर रहे थे। देखने से लग रहा था, बड़ी गऊ बकरी थी। वहीं ‛बकरी खोजों दल’ के एक वरिष्ठ बापू चिंतक को वाट्सएप आया। उस वाट्सएप संदेश में भूरे रंग की एक बकरी का फोटो भी था और साथ में लिखा था, ‛क्या यही बापू की बकरी है ?’ उस बापू चिंतक ने वाट्सएप रिपलाय किया कि बापू की बकरी आगे से थोड़ी सफेद व पीछे से लाल रंग की है। वह तो बड़ी ही शांति प्रिय व समाजवादी स्वभाव की है। आपके इस फोटो वाली खुंखार जैसी बकरी नहीं है।

बापू की बकरी को खोजने के लिए ‘बकरी खोजों दल’ के कुछ सदस्यों को सुदूर दक्षिण भारत की ओर भी भेजा गया। उन्हें बापू ने पहले दक्षिण की एक-दो भाषाओं का प्रारंभिक ज्ञान भी दिया। “बापू के इस देश में अब भी, दक्षिण वालों को उत्तर वालों की-उत्तर वालों को दक्षिण की भाषा नहीं आती व पूरब वालों को पश्चिम वालों की भाषा नहीं आती। अधिकांश पढ़ें-लिखें भारतीय अब भी अंग्रेजी से ही चिपके हैं।” वहीं बकरी खोजों दल में बापू ने भाषाई प्रतिनिधित्व का पूरा ध्यान रखा है। पूरे देश के लिए बापू की बकरी चिंता का विषय बन गया है लेकिन अब भी भाषा के विषय पर हमारा एकमत होना बाकी है !

दक्षिण से खबर आई कि बापू की बकरी को कुछ मछवारों द्वारा श्रीलंका की ओर जाते देखा गया है। प्रार्थना सभा में बैठे एक भूदानी ने कहा कि बापू की बकरी को तो तैरना आता ही नहीं है। यह खबर गलत लग रही है। यह खबर जरूर किसी सूत्र के हवाले से आईं होगी। भला बापू की बकरी कभी विदेश भी जा सकती है ? जितना प्रेम बापू को अपने इस देश से है उनकी बकरी को भी अपनी मिट्टी से उतना ही प्रेम है।

कई दिनों तक बापू की बकरी को खोजा गया। चारों दिशाओं में खोजी दल बकरी की पूछताछ करता रहा। सरकार के द्वारा सीबीआई, एनआईए, ईडी, सीआईडी आदि बड़ी-बड़ी जाँच ऐजेंसियों को बकरी खोजने में लगा दिया गया। लेकिन बापू की गऊ बकरी कहीं नहीं मिली। इस चिंता में बापू का स्वास्थ्य खराब होने लगा। बापू इस स्थिति में भी नहीं रहे कि वह सरकार के खिलाफ उपवास या अनशन करे ! “विपक्ष का कहना है कि देश में बढ़ती हिंसा व फांसीवादी सरकार के कारण ही बापू की बकरी नहीं मिल रही है। इस कारण ही विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा है !” इधर नियमित प्रार्थना में भी बापू ने आना बंद कर दिया। बापूवादीयों की दिनोंदिन परेशानी बढ़ती जा रही हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर बापू की बकरी कहाँ खो गई....?



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

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