भौंकने की कला व भूख सूचकांक....!!
वे भौंकने में निपुण है। उनकी बिरादरी का काम ही यही है। भौंकने में वे बड़े कलाकार हैं। उन्हें इसके लिए कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उन्हें जब भी भौंकने का मौका मिलता है वह किसी भी विषय में भौंक लेते हैं। वैसे तो भौंकने व भूख में कोई ज्यादा समानता नहीं है लेकिन उनके भौंकने के पीछे किसी ना किसी तरह की भूख ही काम करती हैं। कभी पुरस्कारों की भूख, तो कभी किसी पद की भूख, वहीं अंध विरोध भौंकने का प्रमुख कारण बनता है ! उनके समय-समय पर भौंकने का चिंतन कुछ तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र व सोशल मीडिया मंच भी करते हैं। भले उनकी भौंकने की कला से उनके सगे मालिक तक प्रभावित ना हो। लेकिन वे अपनी विचारधारा की भूख के लिए भौंकना पसंद करते हैं। उन्हें सिर्फ़ भौंकने वाला श्वान कहना, श्वान संगठन व समाज का अपमान माना जाऐगा। वे इससे भी बड़े सम्मान के अधिकारी है।
वे जब भी भौंकने लगते हैं जनता को चोर-चोर सुनाई देता है। लेकिन उनके भौंकने के पीछे उनके ही बनाये मापदंड वालें वैश्विक भूख सूचकांक काम करते हैं। इधर उनके भौंकने पर जनता चोर व चोरी की चर्चा में लग जाती हैं और वे अपनी इस कला से जेब भर लेते हैं। जनता को कितने ही मंचों से उनके भौंकने की आवाज तो सुनाई देती है लेकिन वे कब भौंकने की आड़ में आंकड़ों की हेराफेरी कर देते है, बड़े-बड़े बुद्धि-प्रसादों को इसकी भनक तक नहीं लगती !
हर समय भौंकने की प्रतिभा के दम पर उनके कितने ही संगठन विश्व के कितने ही मंचों पर दमखम दिखाते रहते हैं। उनका पेट भरा हो या फिर खाली, वे हर हाल में हर विषय पर भौंकते हैं। विगत दिनों वे फिर दुनियाभर में अपने ही बनाये “ वैश्विक भूख सूचकांक” के आधार पर भौंके। उनके भौंकने से एक बार फिर सिद्ध हुआ कि उन्होंने आगे लंबे समय के लिए अपने पेट भरने के लिए तगड़ा माल लपक लिया है। भौंकने से जारी हुए आंकड़े बता रहे हैं कि एक बार फिर किसी ओर के इशारे पर भौंका जा रहा है।
वैसे उनके भौंकने की यह कला नई नहीं है। वे सदियों से भ्रामक प्रचार-प्रसार भरे तथ्यों के आधार पर संगठित रूप से भौंकते आये हैं। वे अपने पेट खाली होने पर नहीं भौंकते, “दूसरों के भरे हुए पेट पर भौंकने लगते हैं ! और उस भौंकने को नाम देते हैं- गरीबी, भूखमरी, शोषण, असहिष्णुता, अत्याचार आदि।" यह कला ही उनकी काबिलियत है। इसके ही आधार पर उनका हर एक सूचकांक आता है। वे दिनभर भौंकते हैं गरीबों के लिए और रातें गुजारते है अमीरों के साथ ! गरीबों की गरीबी के साथ फोटोशूट करवाते हैं और भौंकते हैं अपनी अमीरी बढ़ाने के लिए।
वे भौंकने के आदि हो चुके हैं। वे किसी दिन ना भौंके तो उनकी पाचन क्रिया खराब हो जाये। उनके भारी-भरकम आंकड़े उनसे ही पचाना मुश्किल हो जाए। उनका भूख सूचकांक उन्हें ही “गरीबी की रेखा” से नीचें गिरा दें। आखिर वे क्या करें ? वैश्विक स्तर पर भौंकने से ही उनकी दुकानें जो चलती हैं। अब क्या अच्छे-प्यारे पप्पी-टामी जैसा बनकर एक कोनें में पड़े रहे ? लोकतंत्र में उन्हें भौंकने का भी अधिकार नहीं है ? अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत क्या वे अब भौंक भी नहीं सकते। भौंकना उनकी कला है। अब वे भ्रामक भूख सूचकांक के दम पर भौंके भी नहीं ? उनका इस कहावत से भी कोई लेना-देना नहीं है कि ‛हाथी चले बाजार, श्वान भौंके...!’ आखिर हमें अब यह मान लेना चाहिए कि “वे भौंकते थे, भौंकते हैं और भौंकते ही रहेंगे....!!”
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com
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