“सर्वर डाउन” पर लचकलाल व मेरी बातचीत....!!
ऊँचा-नीचा होना प्रकृति के प्रमुख लक्षणों में है। यह अब तक जीवों में ही था। लेकिन अब यह सेवा क्षेत्र में ज्यादा पाया जाता है। कोई चीज ऊँची जाऐगी तो उसका नीचे भी आना जरूरी है। ओर वह आऐगी ही। जो ऊपर लटका है वह नीचे भी गिरेगा ही। यह हमें न्यूटन बाबा से पहले वाले बाबा बता गए हैं। ‛अप-डाउन जीवन का नियम है। लेकिन वर्तमान में “सर्वर डाउन होना” नया नियम हो गया है।
आप सोच रहेंगे होगे, ‛यह ऊपर-नीचे की ओर जाना कौनसा नया दर्शन है ?’ यह तो सबको पता है। यह सब तो प्रतिदिन हर व्यक्ति के जीवन में चलता रहता है और चलता रहेगा। आप सही सोच रहे हैं। मैं भी मानता हूं, सही भी है। मैं आपकी भावना समझ रहा हूँ। बस इसमें मैं इतना ही जोड़ना चाहता हूँ कि ऊँचा-नीचा होना, उठना-गिरना, चढ़ना-उतरना आदि मानवीय व मशीनी क्रियाओं में अब “सर्वर डाउन होना” भी जोड़ा जाना चाहिए। पिछले एक दशक से यह मेरे दैनिक जीवन में अक्सर होता आ रहा है। मैं जानता हूँ कि आपके जीवन में भी यह हो रहा है। आप भी कभी इसका आनंद उठाते हैं और कभी इसके दुखानंद में उठट-बैठक करते रहते हैं।
वैसे यह “सर्वर डाउन होना” क्या होता है, इसे समझना इतना भी आसान नहीं है। इसको समझने के लिए सरकारी कार्यालयों, बैंकों, सायबर कैफे, आनलाईन साईट, बाबूजी की टेबल आदि के चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे में बहुत बार किसी साईट के सर्वर डाउन के चक्कर में आपका मानसिक-शारीरिक सर्वर भी डाउन हो सकता है...!
विगत दिनों मेरे परम् मित्र लचकलाल जी का सर्वर डाउन हो गया था। उनकी जैब का डाटा उड़ चुका था। वे एक सेवा कार्यालय से स्वयं भी डाउन होते हुए आ रहे थे, तभी मुझे मिल गए। मैंने पूछा, ‛क्यों लचकलाल आज तो बड़े बैठे-बैठे से लग रहे हो ?’ कहने लगा, मत पूछ मित्र;- “मैं तो इस सर्वर डाउन चल रहा है !” जवाब को सुन सुन कर परेशान हो गया हूँ। आजकल जिस भी कार्य को करो, सर्वर डाउन की समस्या सबसे पहले आ जाती है। जिस भी कार्यालय में जाओं सर्वर डाउन का हल्ला मचा हुआ है। बाबूजी की टेबल के सामने सही से खड़े ना हो, उसके पहले वे कह देते है, “अभी सर्वर डाउन चल रहा है कल आना।"
एक तरफ तो केन्द्र से लेकर पंचायत तक सरकारें 5जी गति से योजनाओं की घोषणा कर रही है, वहीं योजनाओं की फाईलें सर्वर डाउन की शिकार हो रही हैं। इससे तो पहले का सिस्टम अच्छा था। सबकुछ कागजों पर होता था। जैसा माल-वैसा काम। जो चाहो वह कागज पर चितर दो ! फाइलें जैब के डाटा से 5जी गति से आगे बढ़ती थी। कई मामलों में फाइलें कूदा दी जाती थी।
उस दिन लचकलाल बहुत चिंतित लग रहा था ! एक्टिविस्टों की भाषा शैली में बोल रहा था, “अब तो इस इंटरनेट सेवा ने मेवा भी कम कर दिया और माथापच्ची ज्यादा। लगता है, “भ्रष्टाचार, कामचोरी व लेटलतीफी का नया औजार सर्वर-डाउन हो गया है।”
लचकलाल फिर 4जी स्पीड से कह रहा था कि सोशल मीडिया साईट्स का सर्वर डाउन हो जाये तो जनता आंदोलन पर उतारू हो जाए ! वहीं हमारे जैसे लाभार्थियों की फाईलों की बात हो तो सर्वर डाउन से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ! आजकल के स्मार्ट बाबूजी भी “सर्वर डाउन” को पेरासिटामोल की गोली की तरह उपयोग करते हैं। कोई भी सरकारी मरीज हो “सर्वर डाउन” की गोली दे दो।
लचकलाल के इस आनलाईन दुख में मैं भी कुछ देर तक शामिल रहा। हमने इस प्रोद्योगिकी औजार पर बुद्धिजीवियों जैसी लंबी बातचीत की। जिससे मेरा भी सर्वर डाउन होने लगा। मैंने अपने आप को संभाला। बातचीत को दो चाय से शांत करने की कोशिश। पर जैसे कि अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों, यूएनओ की महासभा, विधानसभा-संसद की चर्चाओं व राज्यों के सम्मेलनों के आयोजनों का निचोड़ ज्यादा कुछ नहीं निकलता। उसी तरह हमारी भी बातचीत दो चाय से आगे नहीं बढ़ पाई....!!
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
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