Sunday, February 12, 2023

बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

 बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

       



अक्सर देखा गया है कि बसंत व बजट एक साथ आते हैं। वैसे इन दोनों में ज्यादा कोई समानता नहीं है फिर भी इनकी वाहवाही में बहुत-सी समानताएं देखी जा सकती हैं। इसी कारण बसंत व बजट के राग दरबारी हर चौराहे पर देखें जा सकते हैं। कोई कहता है वाह ! क्या मौसम आया है, तो वहीं यह कहने वाले भी मिल जाऐंगे कि;- “एक तो मौसम बहुत खराब है और ऊपर से ऑफिस जाना है !” वहीं कुछ अर्थशास्त्री बजट को आंकड़ों की बाजीगरी बता कर मुँह फुला रहे हैं। ऐसे में जिसके पास कोई बजट नहीं, वह बसंत से क्या कहें ? उसका कैसा बसंत-बहार...! बिन बजट बसंत सुन बटा सन्नाटा।

फिर भी बहुत से राग दरबारी बजट पर बड़े बड़े स्तंभ लिख रहे हैं। मीडिया को बाईट दे रहे हैं। बजट की दो सप्ताह पहले से समीक्षा करना शुरू कर दी है। कोई कह रहा, यह बजट आम आदमी के लिए रामबाण सिद्ध होगा। भविष्य के लिए यह बजट अमृत के समान सिद्ध होगा। हार्वर्ड में बैठे लाल बादशाह अर्थशास्त्री बजट को आम आदमी के खिलाफ बता रहे हैं। ऐसे में बजट बाबू है कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है। वह अपनी ही धुन में घटते-बढ़ते ही जा रहे है।
जिसे दो समय की रोटी की भी चिंता नहीं है, जो हर बात में कबीरा खड़ा बाजार धुन बजाने लग जाते है। पत्रकार उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि इस बार बजट आपके लिए कैसा रहा ! आप इसे कितने नंबर देने वाले हैं ? जो कभी किसी परीक्षा में कभी अच्छे नंबर नहीं लाया, उससे बजट के लिए नंबर मांगे जा रहे हैं। बजट यह सब देखकर घाटे वाली हँसी में हँस रहा है। उसकी मुस्कान के सूचकांक कुछ ओर ही आंकड़े बता रहे हैं। इस बजट-बसंत के राग पर हर माली एक बार फिर मंद-मंद लोकतांत्रिक लहजे में हँस रहा है।
            


एक स्थिति यह भी है कि बजट की अफरातफरी में बसंत ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा है। बसंत सप्ताह बीतने को है पर बहार के अते-पते नहीं है। राग दरबारी अपने-अपने दिन मना रहे हैं। सबने अपने-अपने बजट का जुगाड़ पहले से ही कर रखा था। बसंत एक बार फिर बजट का कर्जदार हो गया। कहाँ तो बुद्धिजीवीयों को बजट में दो जून की रोटी तक नजर नहीं आ रही है ! वहीं बसंत के माध्यम से राग दरबारियों ने बजट की चर्चा में चार चाँद लगा दिये। हर बार की तरह इस बार भी बसंत सप्ताह में छोटे से बड़े नगर तक बाजार गुलज़ार है। सात दिनों की इस बहार में बाजार उछाले मार रहा है। सौछल मीडिया पर 70 साल से ऊपर वाले राग दरबारी भी वेलेंटाइन डे के संदेश उछाल रहे हैं। बसंत बहार के पवाड़े गा रहे हैं। “संसद भवन बजट-बजट के शोर से गुंजायमान हो रही है और उसके बाहर लोकतंत्र बसंत से कलियां चुरा रहा है। एक तरफ आलोचनाओं का गुलाल है। तो दूसरी ओर गंगा-जमुनी रंग से भरी प्रेम की पिचकारियां छोड़ी जा रही है।”

‛कलियों के खिलने’ व ‛संसद में हलवा’ बनाने वाले इस कोमल काल में ; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे राग दरबारी काल में क्या करूं ? मैं अपने मन को सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों के माध्यम से समझाने का भी प्रयास रहा हूँ ;-
“खिलतीं मधु की नव कलियाँ, खिल रे, खिल रे मेरे मन!
नव सुखमा की पंखड़ियाँ, फैला, फैला परिमल-घन!”

लेकिन वहीं सब कह रहे हैं कि ये दोनों अपनी चरम सीमा पर है। लेकिन ना मैं बजट को पढ़-समझ पा रहा हूँ और ना ही बसंत की बहारों का आनंद ले पा रहा हूँ। बजट के आंकड़े मेरे लिए हमेशा से एक कठिन रसायन शास्त्र की तरह रहे हैं और वहीं बसंत का रसायन जब तक मेरे समझ में आता है, कमबख़्त यह बसंत-बहार मेरे हाथ से निकल जाता है ! लगता है इसबार भी आभासी बजट व बसंत के राग दरबारी रंगों से ही काम चलाना होगा....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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मोब. 9926476410
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