Sunday, February 19, 2023

।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

 ।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

     



अंग्रेजों के शासन में भी ओर उनके जाने के बाद भी उनके मानस पुत्रों के द्वारा यह विमर्श चलाया गया कि भारत अंग्रेजों के आने के पहले एक राष्ट्र नहीं था ! कितना बड़ा झूठ व षड्यंत्र भारत के खिलाफ फैलाया गया। इस झूठे विमर्श से ही पर्दा यहां इस पुस्तक में उठाया गया है। श्री रंगा हरि द्वारा लिखी गई यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रत्व के रोचक व गौरवशाली अनन्त प्रवाह पर प्रकाश डालती है। पुस्तक भारत के गौरवशाली राष्ट्र भाव का तथ्यात्मक वर्णन करती है। 19 विभिन्न तरंगों में विभाजित इस पुस्तक की प्रत्येक तरंग पाठक के रोंगटे खड़े कर देती है। और साथ ही पाठक के मन भारतीय संस्कृति व धर्म के गौरव का भाव ओर बढ़ाती है। आखिर में डॉ. मनमोहन वैद्य, मिलिंद ओक, डॉ. भगवती प्रकाश व श्री रंगा हरि के आलेख राष्ट्र प्रेमी पाठकों के लिए प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक है।

भारत का ‛राष्ट्र’ अंग्रेजी ‛Nation’ से अलग है। यह किस तरह से अलग है यही इस पुस्तक का प्रमुख विषय है। भारतीय जीवनदृष्टि के मूलग्राही चिंतक श्री रंगा हरि ने भारत की राष्ट्र विषयक जो विस्तृत चर्चा की है, वह इस पुस्तक की विशेषता है। पुस्तक में बताया गया है कि भारत का वेदजन्य राष्ट्र नर-केन्द्रित न होकर सृष्टि-केन्द्रित है। (माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः)
इसी पुस्तक में भारतवर्ष व भारत का विस्तृत वर्णन किया गया है। देश, जन और धर्म तीनों मिलकर राष्ट्र बनता है।
अनेकता व विविधता से भरा यह राष्ट्र विश्व में कैसे अपनी अलग पहचान रखता है। यह इस पुस्तक में विस्तार से कहा गया है। पश्चिम के राज्य से भारत का राजत्व व राष्ट्र अलग है। यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि राष्ट्र धर्म और नैतिकता से चलता है। ना की विधायिका के कोरे कानूनों से।

इस पुस्तक में बताया गया है कि राजा, पंतप्रधान या फिर वर्तमान में चुने हुए जनप्रतिनिधि का काम नदियों की तरह होता है। वह किसी से कोई भेदभाव नहीं कर सकता है। वहीं राष्ट्र घराना है तो राज्य उसका मकान है। घराना बंधुता पर आधारित है और मकान व्यवस्था पर। भारतीय राष्ट्रत्व की यह संस्कृति व परंपरा वर्षों से ही नहीं है बल्कि आदि अनंत काल से चलती आ रही है। यह बात इस पुस्तक में प्रमाणिक तथ्यों सहित कही गई है। वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण व प्रमाणिक शास्त्रों के माध्यम से यहां भारत के राष्ट्रत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इसी पुस्तक में ना सिर्फ भारतवर्ष की भौगोलिक सीमाओं का वर्णन है साथ ही भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक व अन्य शास्त्रों की विशेषताओं को भी प्रमाण सहित बताया गया है। संक्षिप्त व कम समय में जो भारत के विशाल जीवन व राष्ट्रत्व को समझना चाहता है। उसे इस पुस्तक को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। विश्व के युवाओं के लिए यह नया मार्गदर्शन व नवीन दर्शन का खजाना है। इसी पुस्तक के माध्यम से कहा गया कि कैसे अन्य पंथ व विचारधाराओं को प्रभावित किया और ये भारत में कैसे घुसे। संक्षिप्त में कहे तो पश्चिम व भारत में क्या अंतर है। यह इसी पुस्तक में कहा गया है कि “भारतीय राष्ट्रत्व और यूरोपीय नेशनलिज्म के बीच मोर -मुर्गे का अंतर, यद्यपि दोनों को कलंगी है।”

भारत अंग्रेजों से कैसे भागे व उन्हें कैसे भगाया गया है उस पर भी एक विस्तृत तरंग है। ‘सेफ्टीवाल्व इंडियन नैशनल कांग्रेस’ से एक तरंग है जिसमें कांग्रेस दल की कथनी और करनी पर विस्तार से कहा गया है। अंत में अंग्रेजों के भारत से भागने व उसके बाद की स्थिति पर कई गंभीर बातें कही गई जो आगे चलकर भारत में घटित होकर अधिकांश सही ही रही। इस पुस्तक को वर्तमान युवा पीढ़ी को जरूर पढ़ना चाहिए और साथ ही दुनिया के उन तमाम लोगों को भी जो भारत को सिर्फ़ एक भौगोलिक दृष्टि से देखतें है। यह पुस्तक आसानी से आनलाईन उपलब्ध है और सिर्फ़ ₹१००/- में विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

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