Tuesday, March 7, 2023

वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!

 वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!




उनके पास अपना कोई कैलेंडर नहीं है। वे हर त्यौहार पर दूसरों से ही त्यौहार की सही तिथि पूछते रहते हैं। इस बार फिर होली आने वाली है। वे पीछले वर्ष वाला ही प्रश्न पत्र लेकर बैठ गए है। सारे प्रश्न पहले वाले हैं। उन्हें नवीनता से एलर्जी है। वे होली सिर्फ़ छोटे से तिलक वाली खेलते हैं। ज्यादा रंग उनके काले-सफेद जीवन में ख़लल डालते हैं। उन्हें हुड़दंग पसंद नहीं है। कभी कभी तो उनकी गली में होली खेलते बच्चों से भी उन्हें खीझ हो जाती है। उन्हें गंवारों वाली होली पसंद नहीं है। वे होली को भी शालिनता से मानने में विश्वास करते हैं। वे संभ्रांत मानुष जो ठहरे ! वे संभ्रांत होली के शौकीन हैं..!

हर बार की तरह उन्होंने अपना पुराना सफेद कुर्ता-पजामा निकाल लिया। उन्होंने इस कुर्ता-पजामा से कितनी ही होली निपटा दी है। पीछले वर्ष बच गई गुलाल की पूढ़ी उन्हें फिर मिल गई है। उनकी मंडली के सदस्यों से उनकी बात हो गई है। होली कब है सभी से उन्होंने कंफर्म कर लिया है। किसके घर रंग गुलाल करने जाना है और किसके घर नहीं, यह निर्णय भी बहुमत से फोन पर ही पारित कर दिया। उन्होंने इस बार की होली पर फिर पानी के प्रबंधन पर लंबा-सा आलेख लिखकर पिच्चतीस अखबारों में भेज दिया है। होली के बाद उनका एक लंगोटिया ठंडाई का भी प्रबंध करेगा। उसके लिए आनलाईन चंदा मांगा गया है। ठंडाई के बाद उनका मन है कि एक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाए। जिससे वे अपने मन की बात कह सके। उन्होंने अपने प्रिय विषय;-“होली पर जानवरों की सुरक्षा व पर्यावरण संरक्षण” पर जोरदार तैयारी कर ली है।

हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने होली पर नेताओं के लिए चुटकी लेकर चुटकी भर लिख डाला है। अब वे इसके छपने की प्रतिक्षा कर रहे है। उनका लिखा होली के रंगों जैसा ही होता है। कौनसा रंग किसके साथ मिला हुआ है यह वे भी नहीं जानते। एक बार जो लिख दिया, वह साहित्य की रंगीन गंगा के हवाले।
होली के एक दिन पहले तक ‛हर वर्ष की तरह इस बार भी वे होली कब है ?’ की रट लगाये हुए है। उन्हें कहीं से सही उत्तर नहीं मिल रहा है। होली की सही तारीख व तिथि पर उनके मन में असमंजस चल रहा है। सरकारी छुट्टी ने अलग से दुविधा में डाल दिया है।

उनकी तैयारियां पूरी हो चुकी है लेकिन होली का रंग कहीं चढ़ता दिख नहीं रहा है। टीवी चैनलों पर भी उन्हें अब तक कोई निमंत्रण नहीं मिला है। उनके पास अब तक वरिष्ठ साहित्यकार का भी फोन नहीं आया है। हालांकि अपने नगर के वे स्वयं सबसे वरिष्ठ साहित्यकार है। ऐसा उनका दृढ़ विश्वास है। भले ही हिन्दी साहित्य के आलोचक उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार ना मानते हो। इसलिए वे ऐसे साहित्यिक साथियों से होली पर दूरी बनाकर रखते हैं।

आखिर में जैसे ही होली का दिन आता है तो सबसे पहले वे अपनी स्वयं की पत्नी को सुबह-सुबह ही एक छोटा सा टीका लगाकर होली का श्रीगणेश करते है। पाँच-पंद्रह वाट्सएप समूहों में भी वे होली की पंक्तियां फेंकते है। फेसबुक पर एक कालजयी रंगारंग पंक्ति लिखकर होली का डिजिटल श्रीगणेश भी कर देते है। अपने ही बच्चों को केमिकल रंगों से कैसे बचें व इको फ्रेंडली होली कैसे खेलना है इस विषय पर भी सुबह सुबह ही संक्षिप्त भाषण सुनाते हैं। अपने प्रिय कुत्ते को भी एक छोटा सा टीका लगा देते है और उसे कड़ा संदेश देते है कि उसे आज घर से बिल्कुल बाहर नहीं निकलना है ना ही पड़ोसी के बच्चों के साथ भौं-भौं खेल खेलना है।
वहीं इस दिन वे आस पड़ोस वालों से बात तक नहीं करते। उन्हें होली के दिन भी आसपड़ोस वालों को ना ही मुँह लगाना पसंद है और ना ही रंग ! उन्हें लगता है कि इससे उनकी वरिष्ठता में कमी आ सकती है । इसलिए वे सुबह सुबह अपने घर में ही होली का श्रीगणेश करके वीआईपी कॉलोनी में रहने वाले अपने स्तर के साथियों के बीच पहुंच जाते है। आखिर में अपने स्तर के वरिष्ठ लोगों के बीच पहुंचकर होली का रंग लेना शुरू करते है। आखिर वे वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

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