Friday, June 18, 2021

कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

 कोरोना गाइडलाइन का पाठ करते रहे....!!

            
                  
दैनिक ट्रिब्यूनल में प्रकाशित....


हम तो उनकी गाइडलाइन पढ़कर ही दो साल से टाईम-पास कर रहे हैं। भला है बौद्धिक प्रबंध पहलवानों का, जो आम जनता के लिए गाइडलाइन निकालने का प्रबंध कर दिये ! नहीं तो इस कोरोना महामारी में जनता घर बैठे बैठे भला करती ही क्या ! अब हर नागरिक के पास ठेला तो है नहीं, कि भरचक लॉकडाउन में चल दीये फल-सब्जी बेचने। ओर गाइडलाइन भी छोटी-मोटी नहीं ! हर आठ दिन में पन्द्रह-पन्द्रह पन्नों की गाइडलाइन। मेरे जैसा तो अपनी दसवीं-बाहरवीं की फाईनल परीक्षा में इतना गंभीरता से नहीं पढ़ा। जितना ध्यान लगाकर इन कोरोना गाइडलाइनों को जनता जनार्दन चाव से पढ़ती है और सोशल मीडिया पर दनादन शेयर करती हैं !

मुझे अब भी पूरा विश्वास है। यदि कोरोना विषाणु को पकड़कर ये गाइडलाइनें पढ़कर सुना दी जाए, तो कोरोना गाइडलाइन के सम-विषम नियम से ही ढेर हो जाये। इन गाइडलाइंस को पढ़कर पहली बार पता चला कि विषाणुओं को भी सप्ताह में एक दिन छुट्टी पसंद है। हो सकता है कि सरकार को विषाणुओं के किसी गुप्त संगठन ने पहले ही गुपचुप छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया हो ? कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कोरोना के सारे लक्षण मानवीय लक्षणों जैसे ही क्यों है ? उसके लिए भी रात में रात्रीकालीन कोरोना कर्फ्यू लगता है ! मतलब कोरोना को भी रात में ही सोना पसंद है ! उसे किसी तरह का मानवीय व्यवधान पसंद नहीं ! आश्चर्य है ! कोरोना को पब-पार्टीयां पसंद ही नहीं है ?

गाइडलाइन के गहन अध्ययन से ज्ञात हुआ कि कोरोना को शहरी क्षेत्र पसंद है ! वैसे वह भी शहरी लोगों की तरह कभी कभी हवाखोरी करने ग्रामीण क्षेत्रों के ओर निकल जाता है। ये गाइडलाइनें ही है, जो हमें समझाती है कि अभी मानव को बहुत कुछ समझने जानने की जरूरत है। “मानवीय बुद्धि के अलावा भी कोई अदृश्य शक्ति है जो कोरोना गाइडलाइनों को बनाती है।” आज यदि आइंस्टीन भी होते तो जरूर ऐसी गाइडलाइनें पढ़कर चक्कर खा जाते है ! उन्हें सिर्फ़ इन गाइडलाइनों को पढ़ने के लिए ही कोई नया सिद्धांत खोजना पड़ता।

कभी कभी तो गाइडलाइनों का पालन करना माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जैसा ही लगता है। सोचता हूँ कोई जनरल स्टोर वाला ऐसी स्थिति में क्या करता होगा ? जब उस जनरल स्टोर में सुईं से लेकर हेलीकॉप्टर तक के सामान मिलतें हो ! वह बेचें तो क्या और बंद रखें तो क्या ? वहीं पीने की दुकान को खोलने की अनुमति हो, पर पीके साहब पीकर खाने कहां जाए ? वहीं सबसे बड़ी चुनौती है मास्क लगाने की ! जब मास्क लगाना अनिवार्य है। तो फिर हर बार मास्क लगाने के लिए हर आठ दिन में गाइडलाइन की क्या जरूरत ? लगता है जनता को नई-नवेली दुल्हन की तरह गाइडलाइनों से प्यार हो गया है। उसे भी गाइडलाइनों की लत लग गई है।

खैर, "जान है तो जहान है !" लगता है “गाइडलाइन की गाइड-लाइन पर चलना ही नियति हो गई है।” हो सकता है कोरोना विषाणु गाइडलाइनों की मार से ही मात खा जाये। मेरा तो मत है कि जनता एक दिन अपनी-अपनी छत से गाइडलाइनों का सामुहिक पाठ करें। जिससे हो सकता है कोरोना इस सामुहिक गाइडलाइन पाठ से निपट जाये। और हम उसके बाद गाइडलाइनों के चंगुल से बाहर निकल सकें। इसलिए आम आदमी “गाइडलाइनों का पाठ करते रहे....!!”


भूपेन्द्र भारतीय



Wednesday, June 9, 2021

वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!

 वरिष्ठ-जी 23 का पत्राचार करना....!!


कार्टून गुगल से साभार



वैसे तो यह युग इंटरनेट के माध्यम से मोबाईल-क्रांति का हो गया है, फिर भी राजनीति में हाशिये पर आ गए एक दल के कुछ बचे कुचे वरिष्ठ वयोवृद्ध नेता अब भी पत्र लिखना जानते है ! जहां आज की युवा पीढ़ी वाट्सएप भाषा शैली में तीन शब्दों में एक पत्र का सारा कच्चा चिट्ठा बयां कर देती है ओर संदेश को पूर्ण आहुति दे देती है। फिर भी आत्मा की आवाज़ सुनकर व बची कुची राजनीति को दाव पर लगाकर इन तथाकथित वरिष्ठ वयोवृद्ध नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपने दल की रानी साहिबा को सत्ता से विहीन होने के दर्द में अब कही जाकर एक पत्र लिखकर ‛पत्रचार' किया। जो मोटे-मोटे तौर पर कुछ इस तरह से कागज़ पर उतरा:-     
                                                  इस पत्र में दल की दुर्दशा के बारे मे कम ओर अपनी दिशा-दशा पर वरिष्ठ सदस्य खुल कर बोले होगे। रानी साहिबा से दल की वस्तुस्थिति पर सिर्फ़ भूरी-भूरी तौर पर चिंता व्यक्त की होगी, क्योंकि रानी से प्रश्न तो कोई पुछ सकते नहीं। वैसे ही जैसे बिल्ली के गले में घंटी बांधे कैसे और कौन ? इस पत्र में रानी के पुत्र की अयोग्यता पर भी दबी-दबी जुबान मे बातें कहीं गई होगी, “पर रानी ने इस बात पर वरिष्ठों के कान मरोड़ दिये होगें !” वरिष्ठ नेताओं मे कुछ फुलटाइम वकालत करने वाले भी है उन्हें रानी के पारिवारिक कानून के तहत दोषी ठहराकर दंड दिया गया है, ऐसा सूत्रों से पता चला है ।

इन वयोवृद्ध वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने पत्र सिर्फ़ दल का कल्याण चाहने की मनसा से लिखा होगा न कि अपना ! इसमें मुझे भारी संशय है! लेकिन हर बार की तरह रानी ने इसे अपने परिवार के खिलाफ षड्यंत्र समझा होगा ओर फिर रानी ने पत्र पर बगैर किसी चिंतन-मनन के एकतरफा एक ही दिन में फैसला कर लिया कि वे स्वयं फिर अगले छः माह तक दल की रानी साहिबा बनी रहेगी । एक दो सदस्यों ने दल के आंतरिक लोकतंत्र व सूचिता की भी बात इस पत्र में उठाई होगी, पर उस पर रानी ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा- “हमें लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाये, हमारे परिवार ने लोकतंत्र की देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक पुजा-पाठ की है!”


वैसे पत्र लिखने की परंपरा रानी साहिबा के परिवार में बहुत पुरानी है। इनके एक पूर्वज अपनी पुत्री को जेल में से पत्र लिखते थे ओर उन पत्राचारों मे देश-दुनिया की खबर देतें थे। लेकिन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का पत्र गलती से रानी साहिबा के ही परिवार की खबर लेता होगा ! जो कि रानी के लिए नाराजग़ी का विषय बन गया होगा। ओर इसके ही कारण रानी की नाक चण गई होगी ! ‛नाक’ की बात से याद आया, “रानी की पुत्री राजकुमारी की नाक अपनी दादी की नाक से मिलती है, इसके ही दम पर कुछ दिनों से राजकुमारी दल मे दमखम रखना चाहती है !” ओर रानी साहिबा के बुजुर्ग दल का नाक के दम पर नेतृत्व करना चाहती है !

खैर रानी साहिबा ने पत्र का सरसरी तौर पर अध्ययन किया होगा ओर यह पाया होगा कि “ये सत्ता के लालची वयोवृद्ध कार्यकर्ता सत्ताधारी दल से मिले हुए हैं, इनकी आपस में मिलीभगत है!” रानी के ‛चिरकुट युवा पुत्र’ ने भी वरिष्ठ सदस्यों पर आरोप लगाया होगा कि इनकी दूसरे दल से मिलीभगत है। ओर इसी के आधार पर रानी ने पत्र को कागज़-पत्तर समझकर फाईलों में दबा दिया होगा। शायद इसलिए ही अपने कुनबे पर आंच न आये रानी ने फिर अपना चलताऊ निर्णय सुना दिया कि अभी वे पत्र का छः माह तक ओर गहन अध्ययन करेगी, ओर फिर वे स्वंय भी एक पत्र लिखेगी ! जैसे दुनिया उम्मीद पर टीकी है, वैसे ही इस दल के वरिष्ठ कार्यकर्ता पगड़ी बांधकर मंच सजाये बैठ गए हैं, कि चलों शायद रानी साहिबा का अगले छः माह बाद आने वाले पत्र में इस वयोवृद्ध वरिष्ठ नेताओं के दल को कोई नया राजकुमार-राजकुमारी मिल जाए।

ओर अंत में जब लेखक इन सब बातों की कल्पना कर रहा था, तो न जाने क्यों लेखक के मन में बाबा नागार्जुन की लिखी कविता ‛आओ रानी’ की पंक्तियाँ घनघना रही थी !!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !!



भूपेन्द्र भारतीय


Thursday, June 3, 2021

आनलाईन “योग” व मेरी साँसें....!!

 आनलाईन “योग” व मेरी साँसें....!!




                            
                      पत्रिका समाचार पत्र में प्रकाशित. 


महामारी से दुनिया की साँसें एवरेस्ट-कन्याकुमारी हो रही हैं। वहीं मैं लॉकडाउन में अपने ही घर पर कभी पहली मंजिल पर तो कभी ग्राऊंड फ्लोर के बीच ‛योग’ कर रहा हूँ। कभी फेसबुक योग, तो कभी ट्विटर, इंस्टाग्राम, वाट्सएपः पर योगस्थः हो रहा हूँ। मुझे लगा यह मेरे ही साथ हो रहा है। पर जब मैंने इंटरनेट के माध्यम से महाभारत के संजय की तरह अपनी दृष्टि दूरी फेंकी, तो पता चला “मेरे सरकार भी माईक्रो ब्लागिंग साईटों के चक्कर में ‛योग’ कर रहे हैं !” कहाँ पहले ऋषि-मुनि पर्वतों-पहाड़ों पर योग करते थे। और आज हर कोई मोबाइल पर ही योगस्थः हुए जा रहा है।

योग करना अच्छा है। बाबा जी भी कहते हैं कि ‛करो’, ‛योग’ करने से होता है। लेकिन कुछ अच्छा हो, तो अच्छा है। वरना फिर वहीं दाग अच्छे है ! पर “अंडबंड योगासन” के दाग निकले नहीं, तो वह धब्बा अच्छा नहीं लगता है। वहीं ऐसे में महामारी से मेरी साँसें फुल रही हैं और जमाना है कि दनादन आनलाईन ‛योग’ किये जा रहा है। कोई वाट्सएपः पर न जाने कौन-कौन से योगासनों के विडियों फार्वर्ड कर रहा है। कुछ वाट्सएपः समूह में ऐसे-ऐसे योगासन होते है कि आये दिन समूह से “लेफ्ट” का राईट विकल्प दबाना पड़ता है।
कुछ है कि ट्विटर पर टूलकिटनुमा योग कर रहे हैं ! कहीं से फॉरवर्ड दिव्य ज्ञान आ रहा है। कही से सीधे ग्राउंड फ्लोर गुप्त सूत्रनुमा खबर आ रही है। विपक्ष है कि आनलाईन ‛योग’ से ही अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर रहा है ! कुछ छद्म पाकशास्त्री भोजनालय में घूसपैठ कर गए हैं। जिसके कारण जीभ आनलाईन लपलपा रही है ! ऐसी आनलाईन योग मुद्राओं से प्रतिदिन मेरे जैसे कि साँसें प्रातःकालीन योग से स्थिर जब तक ही रहती है जबतक की ऑफलाईन रहो। जैसे ही ऑनलाइन हुए कि साँसें अलग ही तरह का “योग” करने लगती हैं । लॉकडाउन में ऐसा दोधारी योग कितना घातक है यह स्वयं यमराज भी ठीक से जान ले तो पृथ्वीलोक तरफ झांकें नहीं !

ऐसे ही अंडबंड योगासन की बहस में मेरे ‛सरकार’ कोरे ही उलझते रहते है। जो कि छोटे से छोटे आनलाईन योगी को “म्यूट, अनफॉलो व ब्लॉक” के विकल्प पता है। जब अभिव्यक्ति की होड़ में ऐसे सहज विकल्प उपलब्ध है तो फिर कड़ी निंदा के नाम पर शीर्षासन क्यों ? “जब मुँह ढकने तक के लिए गाइडलाइन जारी है तो फिर खालिमाली मुँह खोलने जैसी चेतावनियों से क्या होना है।”

लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में मैंने भी भोलेपन में दो-चार बार आनलाईन ‛योग’ करने का प्रयास किया। फिर क्या था ! आनलाईन योगीयों की कुछ ही कमेंट्स से मेरी साँसें फुलने लग गई। “जैसे-तैसे श्रीमतिजी के द्वारा बनाए काढ़े को पीने पर व सासुमां के कड़े निर्देशों के पालन से साँस में साँस आई।” बच्चों के माध्यम से मेरे मोबाइल पर कब्जा किया गया। कठोर निर्देशों के साथ चेतावनी दी गई, कि अपनी साँसों की सलामती चाहते हो तो खबरदार, “आनलाईन मत आना !”

खैर, जैसे कि “यह भी बीत जाऐगा !” वाट्सएप यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम अनुसार “फार्वर्ड” होते रहो और अपनी साँसों को ‛आल इस वेल-आल इस वेल’ अंदाज़ में शांति से समझाते रहो।
मित्रों, अब मेरी साँसें कह रही है कि उनके “नियमित योग” का समय हो गया है। आखिर मुझे भी तो योग करते हुए ‛आनलाईन’ आना है !
“योगस्थः कुरु कर्माणि ”....!!


भूपेन्द्र भारतीय 

Thursday, May 20, 2021

हे मधुशाला वीरो, अब तुम्हारी बारी....!!


               चित्र गूगल से साभार...


दानवीर कर्ण ने सबकुछ लुटा दिया अपने दानवीर गुण के कारण, शायद उससे भी बड़ी वीरता मधुशाला वीरो ने दिखाई है कि उन्होने अबतक की दोनों कोरोना लहर में मधुरस जिसे सनातन काल से सोमरस के नाम से जाना जाता है ! जिसे वर्तमान में मानक भाषा के गिरते स्तर के कारण इसे कुछ पियक्कड़ लोग शराब या दारू जैसे हल्के नाम से जानते है। ऐसे पवित्र रस का एक बार भी रसरंजन नहीं किया ! यह कहना सरकारी व्यवस्था व गिरते-उठते सामाजिक चरित्र पर शंका करना होगा।

इन महान मदिरा-मर्दो ने मद्यपान इतिहास के क्षेत्र में खलबली मचा दी हैं, वहीं सरकार भी बेसब्री से इन वीरो की तृष्णा को देखकर अपनी दयालुता दिखाने में बड़ी देर से आई, ऐसा सरकार को अब भान हुआ है ! उचित मूल्य की दुकान, अंग्रेजी-देशी माध्यम की दुकान से प्रगति करते हुए, सरकार अब आनलाइन शराब बिक्री योजना पर पहुंच चुकी। इस महामारी में भी सरकार के गहन चिंतन वाले इस मास्टर स्ट्रोक से “अद्भुत सामाजिक उद्धार नीति निकल कर आई है ।” भले बड़ी दरों के साथ आई पर लगता है दुरस्त आई !

जहाँ दुनियाभर के आम आदमी एक अदृश्य विषाणु से बचकर घरों में बैठे हो ओर रूखी सूखी खाकर काम चला रहे हैं । वही इतिहास में यह भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है कि मधुशाला वीर बगैर पीए जिये है ! जिस दिन से तालाबंदीयां हुई हैं, ‛सबसे ज्यादा चर्चा आम आदमी की जान की नहीं, अर्थव्यवस्था के प्राण की हो रही हैं।’ सरकार को अब कही जाकर अज्ञात सूत्रों से पता चला है कि अर्थव्यवस्था की चाल सिर्फ़ मधुशाला की ओर अग्रसर हो कर बढ़ सकती है ! “पीने-पीलाने से पनपेंगी अर्थव्यवस्था !” शायद यही है सरकार का मास्टर स्ट्रोक !

जबतक दुनिया की किसी भी गंभीर समस्या की चर्चा मधुशाला में बैठकर नहीं होती, तब तक उस समस्या का कोई समाधान और उसका कोई ओर-छोर नहीं मिल सकता हैं। इसलिए देर आए दुरूस्त आए कहावत पर अब खरा उतरते हुए, मधु-वीरो को नमन करना चाहिए। तथा ज्यादा पीने वालो को क्वारेंटाईन करके हर एक बैवड़े को अंग्रेज़ी-भाषा का एक-एक क्वाटर अतिरिक्त में मुफ्त में देना चाहिए। जिससे वे अपनी भाषा के माध्यम से विषाणु के विरुद्ध ऐंटीबॉडी बना सके। साथ में नामचीन साहित्यकारो की आनलाईन काव्य गोष्ठी का आयोजन हो। चुनौती पेश की जाए कि मधुशाला जैसे कविता संग्रह से भी बढ़-चढ़कर नये-नये काव्य संग्रह की रचनाओं का सजृन हो ! मधुशाला वारियर्स को काव्यांजलि अर्पित की जाए। इनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए सरकार “मद्दश्री जैसे पुरस्कार” की घोषणा भी सरकार शीघ्रता से करें।

सरकारी राजस्व की भी कुंजी मधुशाला के आबकारी कार्यालय से ही होकर खजाने की ओर जाती है, जिसे हम राजस्व कहते हैं वह वास्तव में मद्य पान करने वाले वीरो का ही आर्थिक बलिदान है। जिसे कोई भी अर्थव्यवस्था नकार नहीं सकती ! भले ही फिर वह पूँजीवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, गांधीवाद आदि कैसी भी व्यवस्था हो।

प्राचीन काल से लेकर कोराना काल तक ,स्वर्ग से लेकर पाताल तक अलग अलग रूपो-रंगों में वीर शिरोमणि मधु नरेश मद्य धारक रसरंजन कर्ता इतिहास ओर इस मानव जाति के सदा-सदा भाग्य निर्धारक व कल्याण करता रहे हैं !

अब जब कि सरकार ने बगैर कोरोना से डरे ओर मानवता को दाव पर लगाते हुए, अपने इन मद्य वारियर्स का उचित समय पर सम्मान ओर मधुशाला को पुनः खोलने का मन बना लिया है ! तो आम आदमी की जिम्मेदारी बन जाती हैं कि अपने-अपने राशन व प्राणवायु में से कटौती करते हुए, इन मधुशाला प्रेमियों के लिए अपनी-अपनी छत और बालकनी से चखना व खार-मंजन भी बरसाना चाहिए तथा देश की प्रगति में इनके इस महा-त्याग को देखकर बरसाना की होली में बरसाते रंगों की तरह अपने अपने घरों से नीर बरसाना चाहिए। जिससे ये मद्य नरेश हम सब के लिए कोरोना विषाणुओं की कोई अन्य लहर आने से पहले उसे अपनी पवित्र व ओजस्वी वाणी से आसानी से घर के बाहर ही सदा सदा के लिए सेनेटाईज कर दे। “तो हे मधुशाला वीरो ! अब एंटीबॉडी बनाने की तुम्हारी बारी....!!”


©भूपेन्द्र भारतीय

Tuesday, May 18, 2021

वे अब भी “निःशब्द” है....!!

हरिभूमि समाचार पत्र में...

वे सुबह से निःशब्द है। भले ही उन्होंने सुबह से आधी रात तक फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर पर पच्चीस पचास स्वर्गीयों के लिए शोक संदेश लिख दीए हो। नयी नयी इमोजी को बौना कर दिया हो। अपनी एक निःशब्दता में “तील का ताड़ बना” दिया हो। उनके साथ पीछले कई सालों से यही समस्या है कि “वे बात-बात में निःशब्द हो जाते हैं !” उनकी इस मौन अभिव्यक्ति में कितने ही तूफान उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।

इस निःशब्दता की उलझन में उन्हें कितनी ही बार अपनी मतलबी चुप्पी को तोड़ना पड़ता हैं। वे जब भी अपने से ज्यादा किसी को मुखर होते देखते हैं। तो वे फिर निःशब्द हो जाते है। कई बार उनकी इस निःशब्दता को सोशल मीडिया भी नहीं समझ पाता है। बड़ी बड़ी सभाओं में मुखर रहने वाले, वे अक्सर अपनी ही पत्नी के सामने निःशब्द हो जाते है। शोकाकुल वातावरण में भी वे आधा घंटे के भाषण के बाद निःशब्द बोलकर बैठ जाते है। वे अक्सर अपनी वाणी पर पूर्णविराम तब ही लगाते है, जब वे अल्पविराम के चक्कर में निःशब्द हो जाते है। वह सुख की घड़ी हो या फिर दुःख के पल, वे कैसी भी परिस्थिति में निःशब्दता का सुर साध सकते हैं। वे अद्भुत व्यक्ति है जो अपनी अभिव्यक्ति को भी निःशब्दता से व्यक्त करते है !

उनके पास गजब की शब्दावली है ! जहां विराम लगाना हो, वे अल्पविराम लगा जाते हैं। और जहां निःशब्द होना हो, वहां बात-बात में वाचाल हो जाते है। अपने लंबे लंबे लेखों में अक्सर वे अंत में निःशब्द हो जाते हैं। बात एक लाईन की होती हैं और वह उसकों अच्छा खासा कहानी नुमा लिख जाते हैं। ऐसा कोई अवसर नहीं जब उन्हें निःशब्द ही लिखा हो और बाद में उसे विस्तार से अपने मित्रों को न समझाया हो।

वे अक्सर पड़ोसी के लड़के लड़कियों पर बड़ी बड़ी आदर्शवादी बातें बघारते है, पर अपनी औलाद के कर्मों पर पूर्णतः निःशब्द हो जाते है। कार्यालय में बाबूजी को भ्रष्टाचार का पाठ सुनाते रहते हैं और स्वंय की टेबल पर आने वाले लिफाफों पर निःशब्द हो जाते हैं। दूसरों की पत्नी का सौंदर्य बखान बड़े रस ले-लेकर करते हैं। और जैसे ही किसी ने इनकी धर्मपत्नी के रूप लावण्य पर चर्चा छेड़ी की, ये साईलेंट मोड में आ जाते है। जब भी निःशब्दता इन्हें बहुत बार बीच चौराहे पर घेर लेती है। तो ये वहीं पर मंचीय कवि बन जाते है।

वैसे इनकी निःशब्दता जब भी टूटती है। ये अक्सर यह कहते है कि भूकंप आने वाला है। एक निःशब्द प्रेमी ने तो संसद में भूकंप आने की चेतावनी दे दी थी। वो तो गनीमत रही कि ट्विटर था, उसपर ही सारी निःशब्दता उड़ेल दी ! ऐसे लोग जब जब सत्ता पक्ष की ओर होते हैं तो विपक्ष के सवालों पर निःशब्द हो जाते हैं। जनता इनसे जब भी विकास पर सवाल करती हैं, ये अपनी निःशब्द मुद्रा में ही विज्ञापनों से मुखर मुस्कान बिखेरते रहते हैं। वैसे अच्छा ही है कुछ लोग निःशब्द ही रहें। “क्योंकि वे जब जब कुछ बोलते हैं शब्द निःशब्द हो जाते है।”


भूपेंद्र भारतीय

 

Friday, April 30, 2021

कवि पर व्यंग्यकार होने का आरोप हैं !

 कवि पर व्यंग्यकार होने का आरोप हैं !


कवि कुछ वर्षों पहले तक के समय में सिर्फ़ कविता ही लिखता-पढ़ता था। अपने अच्छे दिनों को प्रेम व श्रृंगार रस के माध्यम से काव्य में पिरोया करता रहता था। कवि जैसे जैसे दुनिया जहान के झंझटों में उतरता गया, उसके कवि ने उससे मुख मोड़ लिया ! कहाँ वह प्रकृति कुमार जैसी बातें करता था और अब उसकी बातों में विकार आने लगे हैं। कवि अब न जाने कौन-सी ऊलटी-सीधी, उलजलूल, उलझी, तिखी-तिरछी-तेड़ी नजर, उलटबांसी, कटाक्ष, हास्यरंजनी, नश्तर-पस्तर, अधबीच वाली बातें करने लगा है ! कवि के साथियों का उसपर आरोप है कि वह व्यंग्यकार हो गया है ! कवि जब कभी कवि था ! तो क्या गजब की मन की बातें करता था ! अपनी काव्य रचनाओं से मंच सजा-मचा देता था। ओर अब देखों ! अपने मन की बात से हटकर जन-जन की बात करता है !



लेकिन कवि को स्वंय पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है। वह तो अब भी अपने अच्छे दिनों को ही याद करके दिन काट रहा है। कॉलेज के दिनों में कवि बैक-बेंचर था। अब वह मतदाता के तौर पर मतदान केंद्र की पंक्ति में वोट बैंक की तौर पर खड़ा है। कहीं रेलवे स्टेशन की लाईन में खड़ा है। तो कहीं सरकारी कार्यालय के बाबूजी की कुर्सी के सामने मुँह लटकाए खड़ा है। देखो, “कवि बैक-बेंचर से आगे बढ़कर मतदाता पंक्ति में खड़ा आम आदमी बन गया है।” वह अब कविता नहीं लिखता है। लिखे भी कैसे, उसके पीछे घर के खर्चों के तमाम बिल जो पड़े हैं। कवि से उसके साथी कहते हैं कि वह सरकार की आलोचना क्यों करता है ? कवि का कहना है कि उसने किसी सरकार के बारे में कुछ नहीं कहा है। वह तो अधिकांश दिन घर पर बैठकर पकोड़े तल रहा है। और अपनी ही सरकार अपनी ही पत्नी का हाथ बटा रहा है।

कवि पर आरोप है कि वह सरकारी कर्मचारियों की कथनी और करनी की चिकनी-चुपड़ी बातें करता है। कवि कविता को छोड़कर व्यंग्य की पगडण्डी पकड़ लिया है ! प्रकृति का वर्णन करते करते, वह सामाजिक-राजनीतिक विकृति की चर्चा कर रहा है। उसे किसने अपना क्षेत्र बदलने की आज्ञा दी ? उसपर आरोप है कि उसके ही कारण कविता के रसिक कम होते जा रहे हैं। वह अब अपनी कविताएँ सिर्फ़ अपनी ही प्रेमिका बिकम् पत्नी को ही सुनाता है ! जिससे उसके पड़ोसी परेशान हैं। कहाँ कवि बहारों की बातें करता था। और अब देखों अंधे-बेहरौ को समझाने में लगा है।

कवि से सवाल पुछे जा रहे हैं कि उसे क्या पड़ी है ? जो हर दिन वह सोशल मीडिया पर नेताओं से प्रश्न कर रहा है। उसे क्या मतलब, जो वह शिक्षा व स्वास्थ्य की स्थिति पर कलम घसीटता है। “वह अपनी कविता क्यों नहीं लिखता है ?” क्या है जो उसे बात बात पर उकसाता है, जो वह इतना सब कुछ लिखता है ! अब तो उसके मित्र भी कहने लगे हैं कि वह पहाड़ो पर चढ़ जाये। वहाँ उसे कविता लिखने का सुहाना मौसम व सुंदर नजारें मिलेंगे। कवि कहां यहां अपना कवित्व बर्बाद कर रहा है। पर कवि ढीढ हो गया है ! कविता जैसे दिव्य मार्ग को छोड़कर कवि ऊबड़ खाबड़ व्यंग्य पगडंडी पर चल निकला है ! यह अब आरोप ही नहीं, धीरे धीरे सिद्ध भी हो रहा है कि वह जो कवि था ! वह अब कुछ भी उलजलूल, परदे के पीछे की छीपी बातों को लिखकर व्यंग्यकार जैसा कुछ हो गया है ! ऐसे ही बेचारे कवि पर कभी दुष्यंत कुमार जी ने कहा था:-
मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो,
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ।




©भूपेन्द्र भारतीय
हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित।

Friday, April 23, 2021

कवि की फोटोजेनिक जनसेवा....!!


   कवि जनसेवा में ही अपने जीवन को सार्थक समझता है। ‛कविता भले कैसी हो, कवि का अखबार में फोटो अच्छा छपता रहे।’ कवि जब भी समाज को कुछ देता हैं तो फोटो खेंचने वालें को पहले आगे करता है। कवि का फोटोग्राफर आधी रात को भी तैयार रहता है। इधर कवि ने हाथ ऊंचा करके “अपनी जनवादी-कविता” की पंक्ति श्रोताओं की ओर फेकी उधर फोटोग्राफर फोटो के लिए लपका। वर्तमान में जनता को जनसेवा के नाम पर कुछ दान में दो ओर फोटोशूट न हो फिर कैसा दान ! ओर फिर अगले दिन अखबार में यह सब न छपे तो दान करना मानों व्यर्थ सा लगता है !


जब जब देश दुनिया में संकट की घंटी बजतीं हैं कवि अपने फोटोग्राफर को साथ लेकर दीन दुखियों के बीच पहुंच जाता हैं। ‛कवि से दुख देखा नहीं जाता हैं !’ शायद इसलिए ही बिरहा व करुण रस कवि के प्रिय रस है। अब देखो न कोरोना काल में कवि ही तो हर जगह बढ़ चढ़कर मदद कर रहा है। किसी को फिरि का मास्क पहना रहा है, तो किसी को दो किलों अनाज दे रहा है। वहीं हर दिन फेसबुक के माध्यम से अपनी जनवादी कविताओं द्वारा जनता को क्वारेंटाईन कर रहा है। कभी कभी ट्वीट करके आम आदमी की पीड़ा को सेनेटाईज कर रहा है ! लोगों की मदद करते हुए कैसी-कैसी मनोहर फोटो कवि की अखबार, फेसबुक, टीवी, ट्विटर पर आ रही है। कवि इस महामारी में मास्क, दवाईयां, आक्सीजन सिलेंडर आदि बांटकर डॉक्टर व सरकार से भी बड़ा काम कर रहा है। कवि ने कोरोना टीका लगाया तो फोटोशूट करवाया, ओर क्या ही गजब फोटो आया ! ऐसा फोटोशूट तो कवि का अपनी शादी में भी नहीं हुआ था। “ऐसा लगता है कि कवि ने अपनी फोटो से सबकुछ लाकडाउनमय् कर दिया है।”

जब भी कवि चौराहे पर खड़ा होकर बगैर मास्क वालों का चालान काटता है तो फोटो में चालान दिखे या न दिखे पर कवि का फोटो मुस्कुराते हुए आ जाता है। कवि को जनसेवा में कोरोना का खतरा दिखता है पर व्यापार-धंधा करते समय कोरोना-वोरोना कोई संक्रमण का डर नहीं लगता है। कवि राजनीतिक रैलियों में फोटोशूट करवाये बगैर नहीं रह सकता है। कवि को पूरा विश्वास है कि अपनी कविताओं के माध्यम से की गई राजनीतिक भीड़ से कोरोना समाप्त हो जायेगा। कवि को लगता है कि हर चौराहे पर उसके फोटो का बड़ा सा कटआऊट होना चाहिए। जिससे जनता में उसके सक्रिय होने का भ्रम बना रहे व कोरोना का कहर अपने आप कम हो जाए। ‛कवि आपदा में ही अपने फोटोस् से अपनी सफलता का अवसर खोज रहा है।’

कवि के इस फोटोजेनिक कर्मकांड व जनसेवा का असर हर ओर हो रहा है ! कभी वह कोविड सेंटर में दवाई व आक्सीजन सिलेंडर दान करते हुए फोटो खींचा रहा है तो कभी मुक्तिधाम में मुर्दों के साथ विडियों बना रहा है। कवि अपने मीडिया साथियों के साथ चप्पे चप्पे पर डटा है। कवि के फोटो में बस कोरोना विषाणु ही नहीं आ रहे है नहीं तो कवि उसे भी अपनी कविता से काल-कवलित कर दे। “कवि ने मानव संवेदना पर महाकाव्य लिख दिया है!”

कवि के घर वाले परेशान हैं, कही कवि जनसेवा में कोरोना संक्रमित न हो जाये। वैसे कवि के कवित्व की प्रतिरोधक क्षमता इतनी अच्छी है कि उसने बड़े-बड़े कविता मंच बैठा दीए है। ये छोटा मोटा संकट उसके कालजयी कवित्व का क्या बिगाड़ लेगा ! कवि के घर वालों से कहना चाहता हूँ कि वे कोई भी फिक्र न करें। कवि अपनी कविताओं के साथ फोटो खिंचवाते हुए जनसेवा में लगा हुआ है।

                           (ईमेज गूगल से साभार)

©भूपेन्द्र भारतीय
२०५, प्रगति नगर, सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(४५५११८)
मो. ९९२६४७६४१०

हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...