Friday, February 25, 2022

स्वीट साहित्यकार....!!

 स्वीट साहित्यकार....!!

           

                      इंदौर समाचार में.....

“वे बड़े ही मीठे आदमी है !” यदि सार्वजनिक रूप से गलती से भी किसी ने ऐसा किसी को कह दिया तो बवाल खड़ा हो जाता है। भले ही कोई मीठे नेताजी अपने आप को “स्वीट आतंकवादी” घोषित कर दे ! आम जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुमको मीठा, तीखा, कढ़वा, चॉकलेटी, स्वीट, स्पाइसी जो बनना है बनो। बस पूर्ण रूप से नेता मत बनना ! नहीं तो अगले पांच साल तक सबसे ज्यादा आम आदमी ही ना जाने क्या-क्या बनते-बिगड़ते रहेंगे। पीछले दिनों एक “स्वीट साहित्यकार” ने अपने पूर्व राजनीतिक प्रेमी की दुखती रग को दबा दिया, फिर क्या था ! उनके प्रेमी ने अपने आप को “स्वीट आतंकवादी” तक घोषित कर दिया। “स्वीट साहित्यकार" व “स्वीट नेता” के बीच चली आपसी जबानी जंग की चासनी सोशल मीडिया पर फेल गई ! सोशल मीडिया के कितने ही भँवरे स्वीट-स्वीट करने लगे।

वैसे मुझसे कोई मीडिया वाला लंबा सा माईक लेकर पूछे कि मैं क्या हूँ ? तो, मैं तो “स्वीट साहित्यकार" कहलाना ही पसंद करूंगा। अब आप सोच रहें होगें कि भला ये “स्वीट साहित्यकार" वाली बला क्या है ! जब से मेरे जैसे साहित्यकारों को नये-नये सोशल मीडिया के मंच मिल गए हैं, तब से हमारे में कुछ स्वीटपन के लक्षण आ गए है। वैसे पहले के समय में साहित्यकार तीखे व अधिकांश साहित्यकार भड़कीले ही होते थे। पहले के साहित्यकारों से हर कोई पाठक डरता था, शायद इस डर से भी पहले पढ़ने वाले पाठक बहुत हुआ करते थे। आजकल साहित्यकार बड़ा प्रेमी व स्वीट बाबू जैसा होता जा रहा है। आज के साहित्यकार को वास्तविक पाठक मिले या फिर नहीं। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ उसे सोशल मीडिया पर लाईक, कमेंट व शेयर करने वाले आभासी पाठक मिल जाए तो समझो वह साहित्य की त्रिवेणी में नहा लिया। जैसे पहले के साहित्यकारों पर सबसे ज्यादा बसंत छा जाता था, आजकल के साहित्यकारों पर सोशल मीडिया रूपी टेसूओं के कारण प्रतिदिन ‛साहित्यिक स्वीटपन’ छाया रहता है। हिन्दी साहित्य में जैसे एक समय छायावाद छाया था, वर्तमान साहित्यिक युग में ‛स्वीटवाद’ चल रहा है। तुम मेरे स्वीट साहित्य को चखो - मैं तुम्हारे स्वीटेस्ट साहित्य को चाखूंगा।

“स्वीट साहित्यकार” का लेखन चाटने के लिए नहीं होता हैं। जैसे पहले के साहित्यकारों का लेखन पाठक पढ़-पढ़कर चाट जाते थे। वर्तमान के स्वीट साहित्यकार अपने साहित्य को चाटने के लिए नहीं लिखते। वे तो अपने प्रिय पाठकों को रचना भेंट करने, आनलाइन साईट पर बिकने व पुस्तकालयों में अपने कालजयी साहित्य को रखने के लिए लिखते हैं। ‛आज के स्वीट साहित्यकार की जेब भरी है, पर उसके साहित्य में खालीपन-सा है !’ वह अकादमिक स्वीटपन से नीचें नहीं आना चाहता है। स्वीट साहित्यकारों की इतनी भर ही इच्छा रहती हैं कि उन्हें कोई न कोई पुरस्कार ही मिल जाए। भले नगरपालिका या गांव सभा पुरस्कार के नाम पर ही छोटा मोटा प्रशस्ति पत्र ही स्वीट साहित्यकार को कोई दे दे। उसे उस छोटे-मोटे पुरस्कार को बस सोशल मीडिया पर बढ़ा-चढ़ा के बताकर लाईक-कमेंट ही तो बटोरना है।

मेरा मानना है कि हम स्वीट साहित्यकारों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने ही वाली हैं। स्वीट साहित्यकार पाठकों के लिए वरदान साबित होते जा रहे हैं। ये स्वीट साहित्यकार ही है जिनके कारण पाठक को पुस्तकें खरीदना नहीं पड़ती। क्योंकि पाठकों को स्वीट साहित्यकारों की ओर से मुफ्त में पढ़ने के लिए पुस्तकें भेंट स्वरूप आ जाती हैं। पाठक को बस स्वीट साहित्यकार की मीठी-मीठी प्रशंसा व उनके द्वारा भेंट की गई पुस्तक की भी मीठी चासनी युक्त समीक्षा करनी है। पाठक को यदि यह कला आ गई तो बगैर किसी खर्च के घर बैठे-बैठे एक फोकट का पुस्तकालय मिल सकता है।

मेरा मानना है कि “स्वीट साहित्यकार" ही राष्ट्र की प्रगति में अहम भूमिका निभा रहा है। भला कोई नेता इतना स्वीट हो सकता है ! जो स्वीट साहित्यकार जितना मीठा हो सके। स्वीट साहित्यकार लोकतंत्र का पांचवां आधार स्तंभ होता जा रहा है। उसकी साहित्यिक चासनी में ही सारी सरकारी योजनाएं आकर ले रही हैं। “मैं एक स्वीट साहित्यकार के तौर पर बताना चाहता हूँ कि स्वीट साहित्यकार वहीं है जो ‛जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का मीठा-मीठा साहित्यिक विकास करता रहे।' और पाठक, संपादक व प्रकाशक से इसके बदले में किसी तरह की साहित्यिक सेवा की मांग ना करें....!!”


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Monday, February 14, 2022

वे बिक रहे हैं, उन्हें बिकना ही था....!!

 वे बिक रहे हैं, उन्हें बिकना ही था....!!

    

              दैनिक ट्रिब्यून पंजाब में.....

वे बिक गए, बिकना ही था। पूँजीवाद के दौर में क्या नहीं बिक रहा है ! आजकल यह बिकने का खेल वैश्विक बाजार की जरूरत हो गया है। बिकने की कला जिसे आ गई, वह रातोंरात जीरो से हीरो बन सकता है। बिकने के खेल में, चतुर लोग गंजे को कंघी बेच रहे हैं। बस आपका कुछ ना कुछ भाव-ताव व किसी ओर झुकाव होना चाहिए, आपको बिकने से कोई नहीं रोक सकता है। किसी की मजाल की आजकल कोई किसी को बिकने से रोक सकें। जब दसों दिशाओं में बाजार गुलजार है तो फिर कुछ ना कुछ बिकने के लिए ही बाजार सजा है! अब बाजार में कोई खेल के माध्यम से बिके या फिर बिकने का खेल खेल रहे हैं। वहीं बहुत से होनहार-बिरवान नौजवान बेरोजगारी के नाम पर जॉब फेयर या फिर कॉलेज प्लेसमेंट में भी बिक रहे हैं !

आखिरकार अपने भाव का मान रखने के लिए थोड़ा बहुत तो बिकना ही पड़ता है। और कोई नेता किसी तरह की टिकट पाने के लिए पूरा ही बिक जाए तो वह जनता की सेवा के नाम पर ही बिकता है ! वह कहाँ अपने निजी स्वार्थ के लिए बिकता है। वह तो अंतरात्मा की आवाज़ पर जनता की सेवा के लिए राजनीति की मंडी में बिकने के लिए अपने आप को पेश करता है।

मंडी की बात करे तो मंडी सिर्फ़ राजनीति की ही नहीं होती। वह कई प्रकार की हो सकती हैं। अनाज-सब्जी, पालतू-पशु- जानवर आदि की मंडी अब पुरानी बात हो गई। अब बेरोजगारों व बड़े पैकेज की मंडीयों का जमाना है। वैसे पाकिस्तान के अधिकांश हिस्सों में अब भी गधों की मंडी लगती हैं। लेकिन हमारे इधर गंधों को छोड़कर आजकल अलग ही तरह की मंडीयां लगती हैं। इन मंडीयों में आजकल प्रतिभाओं की बोलियां लगती हैं ! कुछ प्रतिभाएं असली होती हैं और कुछ अपने जुगाड़ व जोड़तोड़ से स्वयं को इन मंडीयों में बिकने को स्वयं को प्रतिभाशाली बनाकर प्रस्तुत हो जाती हैं। रूपये व आदमी का जैसे जैसे मूल्य घट रहा है नई-नई प्रतिभाएं बिकने को बढ़ रही है। पुराने खनकदार सिक्के तो अब बाजार में बहुत कम ही दिखते है। जो थोड़े बहुत बचे हैं उन्हें नये सेठों ने मार्गदर्शक मंडल रूपी लॉकर में डाल रखा है। कुछ सिक्के बरसों से बिकने को बैठे हैं लेकिन उन्हें कोई खरीदार ही नहीं मिल रहा है। ये बार-बार ट्विटर बाजार में अपने बिकने की तख्तियां लेकर खड़े हो जाते हैं, पर इन्हें यह कहकर बिठा दिया जाता है कि पहले अपना भाव बढ़ाओं फिर बाजार में बिकने आना। इन बेचारों को पता ही नहीं है कि भाव कैसे बढ़ाया जाता है। शायद इन्हें अबतक डिजिटल करेंसी का पता नहीं चला है। सोशल मीडिया की भी कम जानकारी रखते हैं, नहीं तो कब के बिक जाते।

इधर जब से सोशल मीडिया की मंडी का उदय हुआ, पूंजीवाद व बाजारवाद के लिए जैसे स्वर्णिम काल आ गया हो। इस मंडी के कारण “12 साल में तो घुरे के भी दिन फिरते हैं” वाली लोकोक्ति सच हो गई है। ‛कंडे से लेकर कलम तक इस मंडी में शान से बिक रहे है।’ वहीं बार-बार सोशल मीडिया के मंचों से बिकने वाले कह रहे हैं ! ‛ये रही हमारी लिंक-हमें खरीदों। आज दिनभर हम व हमारा माल भारी छूट पर बिकने को तैयार है। आपकी सुविधा व आपके बजट को देखते हुए हमने अपना मूल्य व मूल्यांकन कम कर लिया है। अब तो हमें खरीद ही लो।’ “आश्चर्य है वे हर हाल में बिकने को तैयार है।" येन-केन-प्रकारेण बाजार में बिकने के लिए अपनी कीमत दिनोंदिन घटाते जा रहे हैं !

बिकने की उनकी मजबूरी भी है। वे बेचारे नहीं बिके तो फिर क्या करें ? आखिर कब तक विपक्ष में बैठे रहे। उन्हें हमेशा से ही लोकतंत्र के गुलज़ार बाजार में रहने की आदत रही हैं। उन्हें बड़े सेठों के हाथों में रहना ही पसंद आया है। क्या थोड़ी बहुत बचीं कुची जिंदगी भी मार्गदर्शक मंडल में बैठकर ही निकाल दें ? अब बिकने के लिए भला उन्होंने दल ही तो बदला है, कहाँ दिल बदल लिया है। ओर फिर उन्होंने अपनी जनता व देश की सेवा के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर ही बिकने के लिए अपने-आप को तैयार किया है। मेरे एक प्रौढ़ मित्र का तो यहां तक कहना है कि “जो इस बाजार में जैसे-तैसे बिक गया, सो बच गया।” इसलिए ही “वे बिक रहे हैं, क्योंकि उन्हें ‛जनता की सेवा’ के लिए जिंदा जो रहना था....!!”


भूपेन्द्र भारतीय 
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उनका बजट - अपना जुगाड़....!!

 उनका बजट - अपना जुगाड़....!!

           

                        सुबह सवेरे अखबार में.....

भला छोटे लोगों का कोई बजट होता है ! अपन तो बस जुगाड़-पानी के माध्यम से अपने अर्थ का ‛अर्थिंग’ जुगाड़ अर्थव्यवस्था से लेते रहते हैं। बजट बड़े लोगों का होता है। बजट की बात भी उन्हें ही समझ आती है। और वे ही बजट की बातें अंग्रेजी में करते जमते हैं। बजट का भाषण उनके लिए ही होता है। अपन तो बजट भाषण में पेश की गई कविता-शायरी से ही संतुष्ट हो जाते हैं। अपने लिए वहीं आर्थिक विकास व उन्नति है।

जिनके पास बजट का कोई आधार ही नहीं है तो उन्हें बजट की बारिकियां कैसे समझ आ सकती है ? आप लाख समाचार चैनलों में बजट भाषण सरपट चलाओं या फिर चार दिनों तक पूरा का पूरा अखबार बजट की खबरों से भर दो, हल्के-फुल्के आदमी के बसका नहीं है बजट को समझना। और ‛फिर बजट जब अंग्रेजी भाषा में पेश नहीं हो तो कैसा बजट !’ आम आदमी जीवन भर अपनी आर्थिक गाड़ी जुगाड़ के ईंधन से धकाता रहता है, उसके लिए सरकार कितना ही “आम आदमी का बजट” पेश करें। पर वह बजट कभी धरातल पर आम आदमी के हित में सिद्ध हुआ ? जहां बजट में बात सभी आमोखास की होना चाहिए, वहां बजट में सिर्फ़ खास-खास लोगों की बात होना “घाटे का बजट” जैसा ही है !

जैसे बजट की तैयारी हलवा बनाते-खाते हुए समाचार चैनलों वाले दिखाते हैं ! वहीं आम आदमी के हलवे का बजट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। वह जैसे तैसे जुगाड़ करके ही रुखी-सूखी खिचड़ी के सहारे अपने जीवन की अर्थ-व्यवस्था चला रहा है। जिस उत्साह व जिज्ञासा से बजट को सुनते किसी बुद्धिजीवी को देखता हूँ, तो लगता है ये जरूर कोई बड़ा आदमी है । क्योंकि आम आदमी बजट भाषण को कितना ही सुने-पढ़े , उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ता है। वह आम आदमी तो कभी अपने लंगोटिया यार से जुगाड़ करके अपनी अर्थव्यवस्था चलाता है, या फिर कभी ब्याज-बट्टे के दम पर अपने जीवन की गीली पीच पर धीरे धीरे बल्लेबाजी करता रहता है।
               

‛उनका’ बजट अपन के लिए “अपना” आजतक नहीं हो पाया। उन्होंने वह बजट बनाया ही दूसरों के लिए था।फिर निवरे अर्थशास्त्री बनकर बजट को अपना कहना मानसिक दिवालिया होने जैसा है। एक-डेढ़ घंटे के बजट भाषण को कई बार मन की बात की तरह सुना, पर इन बजट भाषणों में अपन को अपने ‛अर्थ की धुनें’ आजतक सुनाई नहीं दी। दो एक बार बजट को बहीखाता समझकर देशी अंदाज़ में भी समझने की कोशिश की, पर बजट रहा वहीं का वहीं अंग्रेजी नुमा लाल सूटकेस लपटन साहब !

बजट का घर ‛लाल सूटकेस’ को हाथों में थामे बड़े हॉउस में प्रवेश करते कवि-शायरों नुमा वित्तमंत्रियों को भी सुना, पर अपन बजट को कविता व शायरी के माध्यम से भी नहीं समझ पाये। हाँ, आजतक बजट भाषणों में पेश की गई कविताएँ व शायरी मुझे पसंद जरूर आई हैं। मैं तो वित्त मंत्रालय से निवेदन करता हूँ कि अबतक सभी बजट भाषणों में पेश की गई कविता व शायरी का एक साझा संकलन निकाला जाये। इससे साहित्य व साहित्यकारों के लिए अच्छा-खासा बजट तैयार हो सकता हैं। जिससे कि उनकी आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया जा सके व साहित्य समाज ‛आत्मनिर्भर’ बन सके। इस साझा संकलन को पेश करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ व्यंग्यकारों को दी जाना चाहिए। वहीं इस साहित्यिक बजट के माध्यम से नवोदित लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए भी एक नई जुगाड़ तो हो ही जाऐगी। उनका बजट कितना ही आर्थिक विकासोन्मुखी हो, पर ‛अपने विकास का जुगाड़’ तो बजट की कविता व शेरोशायरी का साझा संकलन निकालने से ही हो सकता हैं....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Monday, February 7, 2022

यात्राएं नये संसार से मिलाती है....!!

 यात्राएं नये संसार से मिलाती है....!!


              

                          अमर उजाला में....दिल्ली 
यात्रा आपको स्वयं व संसार से मिलाती है। यात्राओं पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन हर यात्रा पहले वाली से पूरी तरह अलग ही होती है। इसलिए यात्राओं का महत्व मनुष्य के विकास में आदिकाल से रहा है। नये लोगों से मिलना, नयी जगह देखना भर यात्रा नहीं, बल्कि यह अपने आप में एक पूरा जीवन दर्शन है।

दो साल से पापी कोरोना के कारण कोई लंबी यात्रा नहीं हुई थी। आखिर में मैं, मेरे मित्र सचिन सिंह परिहार व विजयंत सिंह ठाकुर हम तीनों अपनी अपनी व्यस्तताओं को छोड़कर घुमने के लिए घुमन्तुओं की तरह निकल पड़े। पहले से कोई निश्चित नहीं था कि कहां जाना है, बस निकल गए घर से...! सबसे पहले भोपाल से होते हुए सागर व फिर छतरपुर के पास भीमकुण्ड पहुंचे। भीमकुण्ड में पानी सुंदर व पारदर्शी (जैसे मिट्टी का तेल) बहुत गहराई तक भरा हुआ है। कई कहानियां व किवदंतियां है इस कुंड की। जिसमें प्रमुख महाभारत में अज्ञातवास के समय भीम ने पानी के लिए गंगा जी को यहां प्रकट होने का निवेदन किया था और उसके बाद से आजतक यह भीमकुण्ड अस्तित्व में है। एक स्थानीय व्यक्ति ने इस कुंड के बारे में बताया कि सुनामी 2004 के समय इस कुंड के पानी का रंग बदल गया था व बहुत सी हलचलें हुई थी।
                       
    


भीमकुण्ड के बाद अगला पड़ाव खजुराहों..., बीच में एक जगह एक ताल के किनारे किसी समय बनाई एक सराई दिखी, कुछ देर फोटोबाजी की व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। फिर खजुराहों पहुंचे। गाईड ने सबसे पहले अपने कमाऊ व चलताऊ ज्ञान से खजुराहों के मंदिरों व मूर्तियों का अजब गजब विवरण प्रस्तुत किया। हम तो मूर्तियां ही देखते रहे। पहले से हमें कोई जानकारी इन कलाओं की आत्माओं का नहीं था। फिर भी बहुत कुछ देखने पर पता चला कि ऐसा भी हो सकता है ! इन मूर्तियों व मंदिरों पर ज्यादा कुछ कहना मेरे जैसे व्यक्ति के बस का नहीं हैं...हो सके तो एक बार जरूर जायें व देखें, बस इतना कह सकता हूँ कि हमारा इतिहास गौरवशाली व सांस्कृतिक रूप से समृद्धशाली रहा है। हम न जाने क्यों अक्सर हर मामले में पश्चिम की ओर देखते हैं ? एक पूरा दिन चाहिए खजुराहों की सुंदरता को देखने के लिए ओर शायद इससे भी ज्यादा। और मेरे जैसा व्यक्ति जब एक दिन इस सुंदरता को देख ले तो मुझे इस पर कुछ कहने व लिखने के लिए एक माह चाहिए।

खैर, दही के साथ मस्त पनीर पराठे ग्रहण करके खजुराहों की इस सुंदरता से किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रयागराज की ओर बढ़ गए। गूगल मेप के ज्ञान पर ज्यादा भरोसा करके निर्माणाधीन खराब रास्ते पर फस गए। जैसे तैसे राजनीतिक देवदूतों व गूगल को कोसते हुए रात 12 बजे 31 दिसंबर 2021 को प्रयागराज (इलाहाबाद) पहुंच ही गए। इतना प्राचीन नगर व चारों ओर कचरा व गुटखाबाजों का थूंक फेला था...! मुझे इंदौर जैसे नगर में युवा होते हुए सफाई देखकर आजकल हर नगर में यही आशा रहती है कि वहां भी साफ-सफाई हो। योगीजी को मामाजी से बहुत कुछ सिखना है और अभी यूपी में बहुत कुछ करना है। 2022 के आगमन पर प्रयागराज वाले भी फटाखे फोड़ रहे थे और हम तीन मित्र अपनी मस्ती में मस्त थे। जिस होटल में रूके थे, वहां का एक कर्मचारी कुछ देर के लिए हमारा हमजाम साथी हो गया था और कह रहा था कि योगीजी फिर आ जाऐंगे। ओर कोई उनके मुकाबले में नहीं है। बंदा अपनी जाति से हटकर राय दे रहा था....!!

2022 की पहली सुबह त्रिवेणी(संगम) पर पहुंचे। मकर संक्रांति के मेले की तैयारी शुरू हो गई है। बहुत भव्य दृश्य है गंगा, जमुना व सरस्वती जी(त्रिवेणी) का। केवट निषादराज जी की मदद से संगम तट से आगे बीच संगम नाव से पहुंचकर पांच डुबकी लगाई। फोटोबाजी चल रही है...! निषादराज जी बहुत सी बातें बता रहे थे, हमने खुशी खुशी उन्हें उनका मेहनताना दिया। आखिर में केवट निषादराज फिर कहने लगे, अगली बार ओर आईऐगा भाईलोग, तब तक योगीजी माँ गंगाजी की कृपा से घाट पर ओर अच्छी सुविधाएं कर देगें। हमने अपनी अपनी बाटल में संगम से नीर भर लिया और निषादराज जी से प्रणाम कर विदा ली।

संगम से सीधे माँ भारती के लाड़ले क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान पहुंचे। आजादी के दीवाने-रक्षक-संरक्षक के चरणों में नमन कर फोटोबाजी की। कुछ पल के लिए इस वीर की मूर्ति के सामने खड़े होने पर शरीर कापने लगा व आंखों में गलगलिया भी अई गया। वहीं कुछ युवा अपनी अपनी जाति व कौमों के हिसाब से नारे लगा रहे थे ! और फोटोबाजी कर रहे थे...! मुझसे वहां ज्यादा देर नहीं रूकाया। मन में प्रश्न आ रहे थे क्या हम इस आजादी के काबिल है ?

विगत दो वर्ष से ट्विटर से जुड़े व मिले प्रोफेसर साहब रमाकान्त राय जी से भी इलाहाबाद में मिलना हुआ। प्रोफेसर साहब के साथ भोजन किया। उन्होंने हमें बहुत सी रोचक व अच्छी बातें बताई व चर्चा की। काफी मजेदार भोजन रहा व उसके बाद प्रोफेसर साहब के स्नेह पर इलाहाबाद के प्रसिद्ध रसगुल्लों का सेवन किया। प्रोफेसर साहब बड़े मस्तमौला व हिन्दी साहित्य के विद्वान है। उनके माध्यम से भी प्रयागराज व इलाहाबाद को जाना... प्रोफेसर साहब ने अगली बार इटावा आने का वादा लेकर हमें वाराणसी के लिए विदा किया।

वाराणसी (बनारस) के ईमानदारी पूर्ण निर्माण किये चर्चित मार्ग काशी_कोरिडोर के माध्यम से गोधूलि बेला में कुछ मधुर लोकगीतों व बालीबुडीया गीतों को सुनते हुए, प्रयागराज से जल्दी ही काशी विश्वनाथ पहुंच ही गए। पर इस मनमौजी नगर में जनसंख्या वृद्धि के कारण व ट्राफिक में फसने के कारण गंगा आरती का अद्भुत नजारा नहीं देख पाये। पर जैसे तैसे अस्सी घाट पर पहुंच ही गए। यहां का भी वर्णन करना मेरे बस का नहीं है। हां फोटोबाजी सतत चल रही थी! हर घाट का अपना इतिहास रहा है। कौन नहीं आया है गंगाजी के घाट पर ? राजा हो या फिर रंक..., रात को लाईट शो के कारण दृश्य मनोरम लग रहा था। गुलाबी ठंड अलग ही मजा दे रही थी। देवि अहिल्या बाई घाट पर पहुंचकर मन फिर भावुक हो गया, हाँ अभिमान भी हुआ कि मालवा की रानी ने आज से करीब 250 वर्ष पहले काशी में मालवा से आकर सनातन धर्म व संस्कृति के लिए कितना बड़ा कार्य किया है। देवी अहिल्याबाई ने सनातन धर्म के लिए कितना कुछ किया है।

देर रात तक बनारस की गलियों में डमते(घुमते) रहे। बनारस, बनारस से वाराणसी होता जा रहा है। यहां मोदीजी ने बहुत सारा काम कराया है। निर्माण सतत चल रहा है। बनारस की ठंड भी धीमे धीमे मजा देने वाली थी...! इस प्राचीनतम नगर में घुमते हुए लगा कि यह कब काशी से बनारस व बनारस से वाराणसी हो जाता है, पता ही नहीं चलता है...! पर वाराणसी वासीयों को भी अपने इस पल-पल परिवर्तित होते धाम व तीर्थ की स्वच्छता के लिए भी जागरूक होना पड़ेगा...। तब कहीं जाकर यह नगर अपने गौरव को यथावत रख पाऐगा।

काशी में सुबह बाबा काशी विश्वनाथ भगवान के दर्शन किये। जब दर्शन कर रहा था मैंने देखा, “एक महिला के दर्शन करते हुए आंसू नहीं रूक रहे थे !” उनखे देखी के माहरी आंख में गलगलीया अई गया। बाबा बाबा हे.., बोला था बूला लूगाँ। बाबा ने बूला लिया। ओर बाबा ने बोला भी जा बेटा थारा साथे तो धर्मराज है। सब अच्छा होगा। धर्म ,आस्था व भक्ति का संगम काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में चहु ओर था। प्रांगण में फोटोबाजी प्रतिबंधित है। अवैध निर्माण व कब्जे का जाल बिछा था, वर्तमान में उसे साफ किया जा रहा है।
बनारस की गलियों में सुबह भी फोटोबाजी चल रही थी...! बनारस की चटपटी पपीता खाकर वहां से आगे बढ़े। वाराणसी से रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या जाना था, पर फिर वही जीवन की व्यस्तताओं व भागादौड़ी के कारण बात नहीं बन पाई...! घर की ओर आने का फरमान आ गया। शायद रामलला जी की अभी बुलाने की इच्छा नहीं है। दिशाधारी जयश्रीराम बोलकर आगे बढ़ गए।

एक बात तो रह ही गई, आखिर बनारस आये और यहां का पान न खायें ऐसा कैसे हो सकता है...! बनारस का पान तो खाना ही था, आधा घंटा इंतजार करने के बाद पान बना और फिर सीधे माता मैहर शारदा जी के दर्शन के लिए होंडा अमेज कार को परिपक्व कार चालक मित्र सचिन परिहार ने आगे बढ़ा दिया। गंतव्य के दौरान साधा भोजन करके बनारसी पान का आनंद लेकर व मिर्जापुर में चाय पीकर( चाय वाले से कालीन भय्या की भी बात की, बोला, बालीवुड वाले कुछ भी बना देते हैं ! फोकट में भय्या को बदनाम कर रहे हैं...!) बनारस का पान इतना अच्छा लगा कि ओर पान बना लाने थे। आगे दौड़ा भागी करते हुए शाम को, माँ शारदा मैहर माता जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रात कटनी में एक अच्छी होटल मिल गई तो वहीं रूके और 2022 के पहले सोमवार की सुबह मित्र व माड्साब संजू सर ने दमोह, भोपाल होते हुए कार को सोनकच्छ नगर के लिए दबा दिया....!!

यह यात्रा वृतांत, सिर्फ़ यात्रा वृत्तांत से थोड़ा आगे बढ़कर तीन घुमन्तुओं का आंखों देखा है। क्या कभी यात्राएं समाप्त होती हैं...?


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Thursday, January 27, 2022

शब्दों की दुनिया से आगे....

 शब्दों की दुनिया से आगे....


                
                        अमर उजाला में....


अक्सर हमारे साथ ऐसी स्थितियां आती हैं जब हम प्राकृतिक दृश्य या फिर मानव भावनाओं को शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकते। ऐसे पल मुझे बहुत बार प्रिय व मन को सुखद लगते हैं। क्योंकि कभी-कभी किसी बात को हम शब्दों के माध्यम से व्यक्त करके उस बात या भावना को सीमित कर देते हैं। शब्द बहुत सी अभिव्यक्तियों में छोटे लगते हैं। शब्दों से उस पल या दृश्य को पूर्णता नहीं मिल पाती है। उसे हमे सिर्फ़ महसूस करना चाहिए। उस पल को देखकर सिर्फ़ आनंद ही लेना चाहिए। हम बहुत बार बुद्धि का ज्यादा उपयोग करते है, जबकि अधिकांश मामलों में हृदय से ही काम चल जाता है। जहां मौन से काम चल रहा है वहां शब्द शक्ति क्यों खर्च करें ।

उदाहरण के लिए बात करें तो, बहुत बार हम एकदम से प्रकृति का कोई सुंदर दृश्य देखते हैं और भावविभोर हो जाते हैं। लेकिन उस दृश्य को शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर पाते। कभी कभी ऐसा नहीं भी करना चाहिए। क्योंकि उस दृश्य के सौंदर्य का वास्तविक आनंद उसे धैर्यपूर्वक देखने में ही निहित है। वहीं उस समय जब हमें दिल से काम लेना होता है वहां हम दिमाग(बुद्धि) को दौड़ाने की कोशिश करते है और उस सुंदर व सुखद पल के असली आनंद लेने से हम वंचित हो जाते है। हमारा मन-मस्तिष्क हमसे तर्क करने लगता है, जो कि हर परिस्थिति में सही नहीं होता है।

एक बच्चे की मधुर मुस्कान को परिभाषित करने के लिए शब्दों में ढ़ुंढ़ना मुश्किल है, उसी तरह कोई सुंदर फूल बगिया में खिला है तो उसे देखकर ही ज्यादा आनंद लिया जा सकता है, न की बुद्धि बल का उपयोग कर उसे शब्दों की सीमाओं में बांधने से। कोई अच्छी कविता, कहानी, पुस्तक, अच्छे व्यंजन का स्वाद, अपने गाँव बहुत दिन बाद जाना, दादा-दादी की बातें सुनना, अपने खेत की मेढ़ पर धीमे-धीमे टहलना, अपनी प्रिय स्मृतियों में खो जाना आदि स्तिथियों को बताने के लिए जरुरी नहीं है कि शब्द मिले ही, इन्हें अनुभव करके ही इनका महत्व समझा जाता है। वहीं जहां सहजता में शब्दों के माध्यम से बात कहीं जा सके, वहां कहना भी चाहिए। लेकिन जहां शब्द की सीमा व क्षमता समाप्त हो जाए, वहां से मौन व मधुर मुस्कान के माध्यम से ही अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त की जा सकती है।

यह निर्विवाद है कि शब्द की शक्ति बहुत बड़ी व अद्भुत है। पर फिर भी जब यह शक्ति हमारे पास पर्याप्त मात्रा में नहीं है या फिर इस शक्ति की आवश्यकता हर स्थिति में नहीं है तो फिर हम हर पल व बात को शब्दों के माध्यम से ही परिभाषित व कहने की क्यों कोशिश करें ? हम उसे सिर्फ़ दिल से समझ भी सकते है। आंखों व चहरे के आव-भाव से भी व्यक्त कर सकते है। शांत व धैर्यपूर्वक भी बात को समझा व समझ सकते है। क्योंकि प्रकृति व जीवन के हर दृश्य व भाव को शब्दों के माध्यम से समझना व समझाना मानव शक्ति के बहुत बार बाहर होता है। और जब हम यह कोशिश हर एक भावना व पल को व्यक्त करने में लगाते हैं तो उस भाव के वास्तविक सौंदर्य से छेड़छाड़ ही करते हैं। उसमें सफल होना मुश्किल ही होता है। ध्यान व योग के माध्यम से इस विषय में हमारे शास्त्रों में बहुत विस्तार से बताया गया है।

हम सहजता में जीवन को देखने की दृष्टि उत्पन्न करें। यह जरूरी नहीं है कि हर स्थिति के लिए शब्द जाल में उलझते रहे। अपनी बात को मौन भावों व कला के माध्यम से भी प्रेषित किया जा सकता है। वर्तमान में जिस तरह से सोशल मीडिया पर होड़ मची है कि हर बात को दुनिया को सोशल मीडिया पर उढेल कर दिखाना व फोटो-विडियों के द्वारा परोसा जा रहा है, उससे उस पल व स्थिति के सौंदर्य में कमी ही आती है। इससे उस बात में वजन भी कम ही होता है। अच्छा है कि जो भी हम सुखद व सुंदर अनुभव कर रहे है, उसे आभासी दुनिया के कचरें में हल्के व निर्थक शब्दों के माध्यम से डालने से बचें। क्योंकि कुछ ऐसा भी बचा रहना चाहिए जिसे हम उसे अपने हृदय की अंतरंग गहराई से ही महसूस कर सकें। जिससे उस पल शब्द मौन धारण करें व हृदय सबकुछ धीमे धीमे समझता रहे।



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Friday, January 21, 2022

बड़े लोगों का लोगत्व....!!

 बड़े लोगों का लोगत्व....!!

    

                                हरिभूमि में....

बड़े लोग ‛बड़े महान होते है।’ यहां मुझसे जो सिर्फ़ आयु में बड़े लोग हैं उनकी तो मैं बात नहीं कर रहा हूँ ना ही कद में जो बड़े हैं। यहां मैं उन ‛बड़े लोगों’ की चर्चा कर रहा हूँ जिनकी नजर में मैं हमेशा छोटा ही रहता हूँ। आपके साथ भी ऐसा हो सकता है या फिर हो रहा होगा। आप कितनी ही प्रगति व सफलता प्राप्त कर लें, कुछ बड़े लोगों की दृष्टि में आप छोटे ही रहेंगे। ओर न सिर्फ़ ये बड़े लोग आपको छोटा समझते हैं बल्कि वे आपको हर समय नजरअंदाज भी करेंगे।

गलती से आपने अपनी किसी उपलब्धि या खुशी को सोशल मीडिया पर साझा किया, तो बड़े लोग उस पोस्ट को नजरअंदाज करने के साथ ही, गलती से भी उसपर लाईक या कमेंट का बटन नहीं दबाएंगे। वहीं बाबू-शोना वाली पोस्ट पर दिनभर लाईक-कमेंट चलती रहती हैं। कभी गलती से बड़े लोगों के सामने चले जाओं तो वे आपको पहचानने से साफ मना कर देते हैं। भले आप उन्हें वर्षों से जानते हो और वे भी आपको जानते हो। पर जानबूझकर ऐसा व्यवहार करेंगे कि अरे, “तुम छोटे लोग, जाओ हम तुम्हें नहीं पहचानते।

‛बड़े लोग’ विभिन्न प्रकार के होते हैं। वह आपका चड्ढी मित्र भी हो सकता है ! जो अब सरकारी आदमी हो गया है। और बड़े शहर में रहने लग गया है। वहीं आपके पहले के कोई पड़ोसी भी बड़े लोग हो सकते हैं। वे अब अपने लड़के के बड़े अधिकारी बन जाने के कारण, बड़े लोगों की श्रेणी में आ गए हैं। और उन्होंने अपने लड़के की उच्च व गुप्त आय से बड़े से शहर में बड़ा सा मकान बना लिया है। इसलिए वे अपने आप को बड़ा मानते हैं। इसके अलावा भी बड़े लोग होने व “बड़ा लोगत्व” प्राप्त करने के विभिन्न प्रकार व ठीये है। बड़े लोग अक्सर आपको सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, राजनीतिक कार्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, विवाह कार्यक्रमों आदि सार्वजनिक स्थलों पर आसानी से मिल सकते हैं। यहां तक कि धार्मिक स्थल पर भी “विशेष पूजा के समय” बड़े लोगों के दर्शन आसानी से किये जा सकते हैं।

जैसे ही आपने इन बड़े लोगों के ‛लोगत्व’ से कोई छेड़छाड़ की, ये आपको अपने बड़े लोगत्व का प्रभाव दिखाने लग जाते हैं। इनके समूह द्वारा आप अच्छे भले सामान्य व्यक्ति से “छोटे लोग” घोषित कर दिये जाओगें। पीठ पीछे कहेंगे, “छोटे लोग हैं इन्हें मुँह नहीं लगाना चाहिए।” कोई बड़ी बात नहीं कि बड़े लोगों का लोगत्व आपके सहज छोटत्व को बड़ा छत-विछत कर दे।

कोई व्यक्ति आपको यदि पांच मिनट के कार्य के लिए एक घंटा प्रतिक्षा करवाये तो समझ लिजिये, वह पक्का ‛बड़ा लोगत्व’ श्रेणी वाला व्यक्ति है। जो कभी किसी लाईन में नहीं लगें, वे भी स्वाभाविक बड़े लोग ही होते हैं। आखिर ‛वे बड़े लोग कैसे जो सामान्य इंसानों जैसे रहे !’ बड़े लोग विशिष्ट होते हैं। उनके लिए सरकार से लेकर सड़क तक सब जगह विशेष मार्ग बने-बनाये होते हैं। और नहीं होगें तो वे ‛ध्वनिमत’ से बना लेते हैं। यहां तक कि बड़े लोगों के लिए हर जगह पीछे का रास्ता ही होता है। वे सामान्य लोगों की तरह कभी सामने से किसी जगह पर नहीं जाते। “बड़े लोग बैकडोर का उपयोग कर किसी भी बड़े सदन में आसानी से पहुंच जाते हैं।”
आम आदमी अक्सर विंडो पर खड़ा रहकर अपनी टिकट का इंतज़ार करता रहता है, वहीं बड़े लोगों के लोगत्व प्रभाव में बेचारी विंडो ही उनके पास चलकर आ जाती है। इन दिनों ऐसा लोगत्व सर्वत्र देखा जा सकता है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Tuesday, January 11, 2022

स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।

 स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।


    



“जो आपके पास मौलिक गुण है उससे ही जीवन में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त की जा सकती है।” स्वामी विवेकानंद विश्व के सबसे बड़े धर्म सम्मेलन ११ सितम्बर १८९३ अमेरिका में अपने आध्यात्मिक ज्ञान के बलबूते पर ही गए थे। भारत के इस क्षत्रिय सन्देश वाहक की चिंतनधारा की अमेरिका पर गहरी छाप पड़ी। इस गुण के अलावा उनके पास उस समय कुछ नहीं था। लेकिन यह शक्ति कोई साधारण नहीं थी। उनके इस गुण में भारतवर्ष की हजारों वर्षों की आध्यात्मिक ऊर्जा सिंचित थी। वे भारतीय आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत थे। वे भारत के प्राचीन साहित्य व अपने समय के यथार्थ को भलीभांति जानते थे। स्वामी विवेकानंद जी भारतवर्ष के अपने समय के ज्ञान रूपी सूर्य से कम नहीं थे। वे वेदों व प्राचीन भारतीय शास्त्रों के ज्ञाता थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उनके बतायें मार्ग व दर्शन से भारत में नवजागरण हुआ और आजतक वे युवाओं के लिए महानायक है।


स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय बताता है कि उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। आज जब हम स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस १२ जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाते हैं तो यह हमारे लिए गर्व का विषय है। एक ऐसा युवा जिसने अपने छोटे से जीवन में न सिर्फ़ भारतवर्ष को छान दिया, बल्कि विश्व में भारतवर्ष के अद्भुत धर्म शास्त्रों का परचम लहराया। सनातन हिंदू धर्म की ध्वजा को उन्होंने बड़ी ही कुशलता व श्रेष्ठता के साथ विश्व के सामने लहराया। यह सब करना इतना भी आसान नहीं था, जबकि भारत में ही उनके अनेकों दुश्मन हो गए थे। पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर अंततः विश्व की बड़ी संख्या का दिल जीत लिया।


यह सब इसलिए हुआ कि वे भारतवर्ष में बहुत घूमे साथ ही दुनिया के कितने ही देशों में लोगों के बीच जाकर अपने सच्चे सनातन धर्म की बात कहीं। वे सिर्फ़ हिमालय की कंदराओं में बैठकर ध्यान करने वाले योगी नहीं थे, वे जनमानस के बीच रहकर आध्यात्म की लौ जगाने वाले योगी थे। उन्हें पता था कि खाली पेट भजन नहीं हो सकता है।

उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस जी से सच्ची शिक्षा प्राप्त कर सबसे पहले भारत को जाना। शुरुआत में अपने गुरू की कितनी ही बातों का वे विरोध करते थे। वे इतनी आसानी से अपने गुरू की बातें भी स्वीकार नहीं करते थे। वे हर बात व तथ्य को कसौटी पर कसते हुए उसकी गहराई तक जाते थे। इसलिए ही बाद में उन्होंने कहा कि “स्वयं पर विश्वास करो।” वे हमेशा कहते थे किसी भी बात पर आंख मूंदकर भरोसा मत करो, उसे स्वयं से जानों। वे भारतीय प्राचीन ज्ञान की शक्ति की क्षमता को जान गए थे। जिसके लिए वे भारत को जानने के लिए वे भारत के कौने-कौने मे गए। आम लोगों के बीच रहे। उनके दुख दर्द को जाना। भारत की वास्तविक शक्ति व गुण को पहचाना। सैकड़ों वर्षों की दासता के बाद उन्होंने भारतीयों को जागृत किया कि अपनी मूल शक्ति आध्यात्म की ओर लौटो। वेद व प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति को पहचानों। आत्मनिर्भर बनो। उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए।



स्वामी विवेकानंद के बारे में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।" रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"


देश की उन्नति–फिर चाहे वह आर्थिक हो या आध्यात्मिक–में स्वामी विवेकानंद शिक्षा की भूमिका केन्द्रिय मानते थे। भारत तथा पश्चिम के बीच के अन्तर को वे इसी दृष्टि से वर्णित करते हुए कहते हैं, "केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ ? जवाब पाया – शिक्षा!" स्वामी विवेकानंद का विचार था कि उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकसित होना चाहिए और चरित्र की उन्नति होनी चाहिए। सन् १९०० में लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी यही बात सामने रखते हैं, "हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।"



स्वामी विवेकानन्द की वाणी में गजब का आकर्षण रहता था। वे जो भी बात कहते उसमें व्यवहारिक ज्ञान होता था। उनका कहना था:- “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।” यह बात भले साधारण लग रही हो। लेकिन इस एक बात से उन्होंने भारत में वर्षों से पनप रहे पाखंड व अनेक कुरीतियों पर आक्रमण किया था। शायद इसके ही कारण कितनी ही तथाकथित धार्मिक संस्थाएं व धर्म गुरू उनका विरोध करते रहे थे।


जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" इस बात में बहुत गहराई थी, वे जैसा कि कहते थे एक विवेकानंद से कुछ नहीं होगा। वे अपने जैसे विचारों वाले युवाओं का एक बड़ा दल संगठित करना चाहते थे। जो भारत की गरीबी को मिटाने में पूर्ण रूप से समर्पित हो। भारत की अपनी यात्राओं में उन्होंने गरीबी को देखा था। जिससे वे बहुत दुखी भी रहे। पश्चिम का वैभवशाली भौतिक वातावरण उन्हें कभी आकर्षित नहीं कर पाया, क्योंकि वे भारत भूमि के सच्चे राष्ट्र भक्त थे। इसलिए ही वर्षों से निद्रा में पड़े भारतीयों को वे जगाना चाहते थे। वे अच्छे से जानते थे कि यदि यह भारतीय जाग गया तो विश्व का कल्याण ही होगा। वे हमेशा युवाओं के लिए आदर्श रहे।


आज जब विश्व के युवाओं के सामने महामारीयों व नस्लीय हिंसाओं का मकडज़ाल फैला हुआ है तब इस स्थिति में स्वामी विवेकानंद के ही विचार युवाओं के लिए आदर्श होगें। क्योंकि जैसा स्वामी जी मानते थे, युवाओं के द्वारा ही वर्तमान व भविष्य का कल्याण होता है। युवा ही हमारे समाज की रीढ़ है। इसलिए युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात करके वर्तमान व भविष्य का निर्माण करना चाहिए। जिस तरह स्वामी विवेकानंद ने भारत की जनता में खोये हुए आत्मविश्वास को जगाया। उसी तरह आज के युवाओं को भारत के खोये गौरव को वापस प्राप्त करने के लिए भारत में ही रहकर काम करना होगा। सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए हमारे युवा भाईयों बहनों को स्वामी विवेकानंद जी के विचारों व मार्ग पर चलकर इस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। तब कहीं स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को युवा दिवस मनाना सार्थक माना जाऐगा।



भूपेन्द्र भारतीय
पूरा नाम:- भूपेन्द्रसिंह परिहार
मो. ९९२६४७६४१०
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हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...