Tuesday, April 20, 2021

टीका-उत्सव में टीका-टिप्पणी....!!

 मैं सामान्यतः टीका-टिप्पणी से बचता हूँ। ओर जब कोरोना का टीका लग रहा है तो किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करना चाहिए। चुपचाप टिका लगा लो और अपनी फटी बनियान के साथ टीका लगाते हुए फोटो खींचाकर घर बैठो ! वैसे भी मेरे जैसे घरघुस्सू टिप्णीकार की टीका टिप्पणी से क्या होने वाला है ! ज्यादा से ज्यादा संपादक की कृपा से स्वतंत्र टिप्णीकार मान लिया जाऊंगा। या फिर जबरन की टिप्पणी पर किसी तरह का साहित्यिक टूंटा भी खड़ा हो सकता है।


कोरोना कर्फ्यू में घर पर निवरे बैठे-बैठे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर किसी मामलें में टिप्पणी करने से अपने आप को रोके रखा हूँ। लाकडाउन का कोई कितना ही विरोध करें मैं तो चूप बैठने में ही भला समझ रहा हूँ। कोई रैली-रैला-खेला कुछ भी करे मुझे तो अपने ही कमरे में टीका लगाकर बैठना है। टीवी चैनलों के उकसावे में नहीं आऊंगा। भले कितने ही मजदूरों का रैला घर के पास से निकल रहा हो। अपनी खिड़की में काढ़ा पीते हुए भी किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करना है।

किसी भी राज्य में चुनाव हो, कहीं भी कैसा भी महोत्सव हो, मुझे तो बस अपने घर पर टीका महोत्सव का आनंद लेना है ! कोई कैसा भी ट्वीट करें, किसी भी बुद्धिजीवी के झांसे में नहीं आना है। न ही कोई संपादकीय लिखना है न ही कोई व्यंग्य व न कोरोना-लाकडाउन पर कोई कविता-वविता लिखना है। न ही व्यंग्यकारों से सरकार व लालफीताशाही की कोरोना नीति पर बात करना है। नोट व वोट के चक्कर में कोई टीका टिप्पणी बिल्कुल नहीं करना है। सिर्फ़ नोटा की तरह निष्पक्ष रहना है।


भले ही कोई भला मानस कैसे भी व्यंजन बनाकर फेसबुक, ट्विटर पर डाले, मुझे कोई भी जवाबी टिप्पणी नहीं करना है। अपने कमरे में रूखी सूखी खाकर काम चलाना हैं। जरूरी काम से यदि घर से निकला भी तो सभ्य नागरिकों को मास्क के बारे में कोई ज्ञान नहीं देना है। किसी भी तरह का काढ़ा पत्नी बनाकर लाये तो सोशल मीडिया पर साझा नहीं करना है, बस चुपचाप बगैर किसी चूचपड़ के गटक जाना है। मेरी किसी भी पोस्ट पर कोई कैसी भी टीका टिप्पणी करें, मुझे साईलेंट मोड में रहना है।

सरकार कब तक कोरोना कर्फ्यू रखेगी, आगे बढ़ायेगी, रात का लाकडाउन है या सप्ताह में दो दिन जैसी छद्म टिप्पणियां नहीं करना है। टीका लगने पर क्या लक्षण आते हैं उसपर भी कोई लक्षणात्मक टिप्पणी नहीं करना है। प्रतिदिन कोरोना के कैसे भी और किस तरह के भी कोरोना पोजिटिव-नेगेटिव आकड़े आये, मुझे अपने आप को बगैर किसी टीका टिप्पणी के सकारात्मक रखना है ! ओर अंत में जब इतनी सब बातें अपने आप से ही कहने के लिए टंकित कर रहा हूँ तो फिर अन्य कोई टीका टिप्पणी नहीं करना चाहता हूँ।


भूपेन्द्र भारतीय

Friday, April 2, 2021

मन लगने लगा यार फकीरी में....!!

 दूसरी लहर में फकीरी महोत्सव••••!!


            दैनिक ट्रिब्यूनल समाचार पत्र में प्रकाशित


फकीरी बड़ी काम की चीज है। इसे कोई सरकार नहीं हिला सकती है। यदि जनता ने ठान लिया है कि हम तो ठहरे फकीर, हमको मजा है सबुरी में ! फिर सरकार बनाते रहे बड़े बड़े बजट ! कोई आर्थिक क्रांति नहीं होगी। ओर मैं तो कहता हूँ कि अब जनता को फकीरी के मार्ग पर अग्रसर हो ही जाना चाहिए। वोट मांगने की यात्रा के इस अमृत महोत्सव में जनता को एक फकीरी महोत्सव की भी शुरुआत कर ही देना चाहिए। क्या रखा है बजट की चर्चा में ! आप तो सदन का बहिर्गमन करते रहो। जनता फकीरी में जीना सीख लेगी। आपकी यात्रा का बजट कम नहीं होना चाहिए। वोट लेने के बाद आपकी मगरूरी में कोई कमी नहीं होना चाहिए !

मेरे जैसे साधारण लेखक ने तो फकीरी में मन लगाना सीख लिया है। “मन लागो यार फकीरी में” भजन शुरू कर दिया है। कुछ ज्ञानी पेट पर प्रश्न करते हैं कि पेट कैसे भरेगें ? पेट का क्या है ! सोशल मीडिया है ही। भर लेगें लाईक-कमेंट के सहारे। वादों की ढकारें खाते रहो ! कम से कम फकीरी के माध्यम से हर माह की आर्थिक चिंता से तो बच ही जाऐंगे ! फकीरी से आशा तो है कि इससे ही व्यक्ति ‛आत्मनिर्भर’ बना जा सकता है! निकल चलों फकीरी की राह पर। वैसे भी आजकल आंदोलनजीवी है ही हर चौराहे पर ! खाने पीने का जुगाड़ तो धरने-आंदोलनजीवीयों के माध्यम से हो ही जाऐगा। और ज्यादा नहीं तो फकीर बनकर चुनावी राज्य में तो जाया ही जा सकता है। पेट व कोरोना की चिंता से चुनावी राज्य में फकीरी अच्छे से कट सकती हैं।

क्या रखा है अमीरी में, कबीर साहब खुद कह गये है। कुछ नी रखा है अमीरी में ! दिनरात आखिर कब तक हर चीज की फिक्र करो। फकीरी में मजा ही अलग है। फकीरी मोड में रहकर किसी को भी गरीया दो तो कोई बुरा नहीं मानते। वैसे आप सच को सच कहोगे तो हर मोर्चा आपके खिलाफ हो जाऐगा। फाईलों में आपके नाम के आगे “लाल निशान” लग जाऐगा। हो सकता है फकीरी अंदाज़ में आप सत्ता के शिखर तक पहुंच जाओ !बस इतना करना होगा कि निस्वार्थ भाव से राजनीति करते रहो !

ऐसा लगने लगा है कि फकीरी वह संजीवनी बूटी है जिससे रामराज्य प्राप्त किया जा सकता है ! कोरोना जैसी महामारी में हमने फकीरी के सिवाय किया ही क्या ! फाकामस्ती में पड़े रहे और रोटी तोड़ते रहे। बेचारी सरकार ने हमारी कितनी खिदमत की ! और अब देखो हमारा आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए वैक्सीन ले आई। इस दूसरी लहर के आगमन पर सरकार हमें एक ओर अवसर देना चाहती है फकीरी के लिए। वैक्सीन लगाओ ओर फकीरी बुस्ट करो !

क्या रखा है फोकट की होशियारी में ! भेले हो जाओ फकीरों की टोली में। आत्मनिर्भर तो बन ही जाओगे, साथ ही साथ आपका इम्यूनिटी अलग से बढ़ जाऐगा। फकीरों से कोई नेता ‛मत मांगने’ भी नहीं आता ! आप लोकतांत्रिक रूप से भी स्वतंत्र हो जाओगे। तो इतना सोच विचार क्यों कर रहे हैं? जल्दी से फकीरी के कपड़े सीला लो और निकल पड़ो तड़के ही फकीरी के पथ पर। भले ही कोई साथी मिले या न मिले “एकला चलो” के ध्येय मार्ग पर ही बढ़े चलो। क्योंकि फकीरी भी आजकल एकला चलों राजमार्ग पर चल पड़ी है।



भूपेन्द्र भारतीय

Sunday, March 21, 2021

पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय....!!

      

अमर उजाला समाचार पत्र में...


पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय !


मैं जब भी किसी सरकारी पद के विषय में सोचता हूँ, तो मन पद की लालसा में गदगद हो जाता हैं ! काश मेरे भी पास कोई सरकारी पद होता ! मैं भी सरकारी गाड़ी से क्षेत्र का ‛भ्रमण’ करता। मेरी भी गाड़ी में लाल बत्ती की जगह बड़े-बड़े ‛हूटर’ लगे होते। सपने तो अब भी आते हैं, कि मैं पद पा चुका हूँ और सरकारी बंगले के बगीचें में सुबह सुबह पौधों को पानी दे रहा हूँ, पर पत्नी स्वप्न में से एकदम से जगा देती हैं और कहती हैं ‛उठो प्राणनाथ, “सरकारी नल में जल आ गया है!” पानी भर लो, आज फिर मेरी कमर में दर्द है !’

जब जब पद के बारे में सोचता हूँ तो मन कहता है, काश संविधान में सबके लिए एक ‛सरकारी पद’ होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में “पद जो देखन मैं चला” पद की महिमा अपरम्पार देखी। चपड़ासी से लेकर पंतप्रधान तक पदों के असंख्य प्रकार है। और हर पद के लिए पंक्तियों में खड़े लाखों-करोड़ों बूढ़े-महिला-नौजवान है। पर मुझे तो एक ही पद चाहिए था। काश कैसे भी मिल जाता। कभी-कभी तो अपनी जाति को ही कोसता हूँ कि भला ये भी कोई जाति है ! आरक्षण तक न मिलता इसमें तो, न ही “इसमें कोई भी सरकारी लाभ !” आखिर कब तक सामान्य होने के चक्कर में असमानता का बोझ ढोता रहूंगा ?

अब पद की इस पद-लोलुपता में पागल हुए जा रहा हूँ। कहीं किसी काम में मन नहीं लगता। सरकार भले मुझे सरकारी पद पर वेतन ‛एक रूपया’ दे, पर किसी निगम-मंडल में ही सही पद का कोई छोटा-मोटा प्रभार दे दे ! क्योंकि मैंने सुना है कि सरकारी पद प्रभारी एक रुपया वेतन में भी भत्तों से ही जीवनयापन कर लेता है। और फिर पदासीन होने पर टेबल के नीचें से मिलने वाले आभारों का कोई मोलभाव हो सकता है ? पद की इस सरकारी महिमा का चमत्कार लोकतंत्र के तीनों खंभों के ईर्दगिर्द रहता है। यह भी मैंने लोकतंत्र में अनुभव किया है। बस सबसे बड़ी चुनौती पद प्राप्त करना है। इस चुनौती के चक्कर में अब तक प्रतियोगिता परीक्षाओं के सैकड़ों फार्म भर चुका हूँ ! और मुझे पूरा विश्वास है कि इन सरकारी परीक्षाओं के आवेदनों से ही मैंने व मेरी चीर युवा पीढ़ी ने अबतक सरकार का अच्छा खासा राजस्व बढ़ा दिया होगा।

मेरे कुछ साथियों ने पद पाने के लिए अपनी रीढ़ की हड्डी तक निकलवा ली और अच्छा खासे पद प्राप्त कर लिये। एक मैं ही मूर्ख हूँ जो अबतक स्वाभिमान के चक्कर में ’आत्मनिर्भर’ नहीं बन पा रहा हूँ। मैंने देखा है सरकारी पद्जीवी बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बन जाता है। किसी से पूछा यह चमत्कार कैसे होता है तो बोले, “आपकी आय के स्त्रोतों में दोतरफ़ा वृद्धि हो जाती हैं ! “डबल इंजन की सरकार की तरह”। एक सीधे खाते में, एक टेबल के नीचें से !” कुछ पद तो इतने औजस्वी होते हैं कि उनकी धाक से ही घर में राशन, सब्जी, बच्चों की फीस आसानी से आ जाती हैं।
काश, मेरे भी भाग्य में कोई सरकारी पद होता ! मेरे भी पीछे पीछे गरज करने वाले दुम हिलाते फिरते रहते। मैं भी पद के नशे में चुर रहता, जिससे मुझे अन्य कोई नशा करने पर रुपया खर्च नहीं करना पड़ता। नेता मेरे चुनावी कौशल पर मुग्ध रहते। आस-पड़ोस में धाक रहती। रिश्तों की भरमार रहती। रिटायरमेंट के बाद कोई चिंता न होती। सेवानिवृत्ति के उपरांत किसी आयोग, प्राधिकरण, समिति, जाँच दल का सदस्य तो बन ही जाता !
पर लगता है इस जन्म में पद नहीं मिलने वाला है। आज यदि कबीर साहब होते तो पद के लिए मेरी इस लालसा व दुखड़े पर इतना ही कहते.....
“पद जो देखन मैं चला, पद न मिलिया कोय !
जो कद खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय !!”



भूपेन्द्र भारतीय

Tuesday, March 2, 2021

भारतवर्ष के हृदय में बहती सुंदर सरिता:- माँ नर्मदा

 

एक ऐसी नदी जिसको जितना देखो मन नहीं भरता। इसका जल मानों अमृत। घाटों की बात करो तो शब्दों से इनके सौंदर्य का वर्णन न हो पाए। इस कवितामय सरिता का वर्णन करने में अच्छे-अच्छे कवि व लेखक निःशब्द हो जाए। नर्मदा जी को जब भी देखो यह काव्यात्मक सरिता सी लगती है जिसमे सभी छंद समय-समय पर अपने रंग बिखेरते रहते हैं।


भारत की प्रमुख नदियों में नर्मदा नदी का स्थान है। नदी न कहते हुए अधिकांश लोग माँ नर्मदा जी ही कहते है। नर्मदा जी के किनारे बसे गाँवों के लोग “नर्मदे हर” अभिवादन से ही अपनी बात शुरू करते हैं। नर्मदा नदी का हर घाट अद्भुत सौंदर्य से भरा है। नदी के बहते पानी से संगीतमय ध्वनि आती है। जब भी नदी पर जाओं हर बार स्नान करने का मन होता हैं। मैं सबसे पहले २० वर्ष पहले नर्मदा जी के धारा जी घाट पर अपने दादाजी के साथ गया था। तब से लेकर आज तक बहुत बार इस सौंदर्य की नदी के दर्शन प्राप्त करने का फल प्राप्त हुआ है। बाँधों ने इसके कई घाटों को जलमग्न कर दिया जिससे इसके सौंदर्य को बहुत क्षति पहुंची है।


नर्मदा नदी के तट पर मोहन जोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। भारतीय संस्कृति मूलत:आरण्यक संस्कृति है। नर्मदा तटवर्ती वनों में मार्कण्डेय, भृगु, कपिल, जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मँडराता रहता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा-तट पर ही करनी चाहिए।
इन्हीं ऋषियों में से एक ने नर्मदा का नाम रेवा भी रखा। रेव यानी कूदना। उन्होंने इस नदी को जब चट्टानों में कूदते-फाँदते देखा, तो इसका नाम रेवा रखा। एक अन्य ऋषि ने इस नदी का नाम नर्मदा रखा। नर्म यानी आनन्द। उनके विचार से यह सरिता सुख या आनन्द देने वाली नदी हैं, इसलिए उन्हें नर्मदा नाम ठीक जान पड़ा।
हजारों वर्षों से नर्मदा नदी पौराणिक गाथाओं में स्थान पाती रही। पुराणों में इस पर जितना लिखा गया उतना और किसी नदी पर नहीं। स्कन्दपुराण का रेवा-खंड तो पूरा का पूरा सौंदर्य की नदी नर्मदा जी पर ही है।


नर्मदा, जिसे रेवा के नाम से भी जाना जाता है, मध्य भारत की एक नदी और भारतीय उपमहाद्वीप की पांचवीं सबसे लंबी नदी है। यह गोदावरी नदी और कृष्णा नदी के बाद भारत के अंदर बहने वाली तीसरी सबसे लंबी नदी है। विंध्याचल पर्वत माला व सतपुड़ा के पहाड़ों को चिरती जब यह नदी बहती है मानों कोई क्षत्राणी शत्रु की सेना को तहस-नहस करते सघन वनों में से शर्प की तरह चल रही है। मध्य प्रदेश राज्य में इसके विशाल योगदान के कारण इसे "मध्य प्रदेश की जीवन रेखा" भी कहा जाता है। यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक पारंपरिक सीमा की तरह कार्य करती है। यह अपने उद्गम अमरकंटक से पश्चिम की ओर 1,312 किमी चल(बहकर) कर खंभात की खाड़ी, अरब सागर में जा मिलती है।


नर्मदा हमारे देश की नदियों के बड़े परिवार की एक सदस्या है। लम्बाई के लिहाज से ही इसका नम्बर सातवाँ है। लेकिन इसकी विशेषता इसके जल की मात्रा में नहीं, इसके चट्टानी स्वभाव में है। इसके उन्मत्त प्रपातों में है। इसके प्रपाती दर्रों में है। इसकी सँकरी घाटियों में है, इसके वनों में है, इसके तट पर निवास करती जनजातियों में है और इसके पहाड़ी परिवेश में है। साहस और शौर्य का इतिहास नदियों ने रचा है, वैसा प्रकृति के और किसी घटक ने नहीं रचा। नदियाँ मानो हमसे कहती हैं--राही ! राह कहीं नहीं होती। राह बनाने से बनती है। ऐसे ही साहस का नाम नर्मदा है।


नर्मदा, समूचे विश्व में दिव्य व रहस्यमयी नदी है, इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण के रेवाखंड़ में किया है। विश्व में नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है और पुराणों के अनुसार जहाँ गंगा में स्नान से जो फल मिलता है नर्मदा के दर्शन मात्र से ही उस फल की प्राप्ति होती है। यहां तक कि मार्कांडेय परिक्रमा तो बारह बरस तक चलती हैं। नर्मदा नदी पुरे भारत की प्रमुख नदियों में से एक ही है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।


विगत दिनों जब मैंने अमृतलाल वेगड़ की किताब “तीरे-तीरे नर्मदा” पढ़ी, तो इस पुस्तक में नर्मदा नदी का अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य चित्रण पढ़ने को मिला। यह पुस्तक पढ़ते ऐसा लगता है जैसे लेखक के साथ पाठक भी नर्मदा जी की परिक्रमा कर रहा है। नर्मदा नदी इकलौती नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती हैं। अभी पीछले सप्ताह नर्मदा जी में स्नान करने गये तो परिक्रमावाशीयों का दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्हें देखकर मन ऊर्जा व आस्था से भर गया। वेगड़ जी अपनी पुस्तक में नदी के सौंदर्य का ऐसे चित्र खीचते है मानों जीवंत हो, एक जगह वे लिखते हैं कि:- “रात को नर्मदा की मर्मर ध्वनि बराबर सुनायी देती। प्रायः हर रात कल-कल बहती नर्मदा का रव सुनाई देता। दिन में वह भले ही नर्मदा हो, रात में रेवा है। दिन में वह दृश्य है तो रात में श्रव्य।” ऐसे ही वेगड़ जी इस नदी के अद्भुत सौंदर्य का जीवंत चित्रण अपनी पुस्तक में अपनी नर्मदा परिक्रमा के माध्यम से करते हैं।


सुदूर केरल से आकर एक बालक शंकर ने नर्मदा नदी के सबसे महत्वपूर्ण घाटों में एक ओंकारेश्वर पर गुरु गोविन्दपाद के आश्रम में रहकर विद्याभ्यास किया था। वह बालक ओर कोई नहीं आद्य शंकराचार्य थे, जो हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ परिव्राजक रहे। भारत की भावनात्मक एकता के लिए उन्होंने जो किया, वह अनुपम है। ऐसे आद्य शंकराचार्य की पावन स्मृति ओंकारेश्वर से जुड़ी है। “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे!” ( चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा), जैसी महान रचना आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित नर्मदा स्तुति या कहें नर्मदा जी का काव्य के माध्यम से सौंदर्य का चित्रण है।


मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी या कहें कि ऐसी नदी जिसका कंकर-कंकर शंकर है। जिसके हर घाट की अपनी विशेषता है। शायद ही किसी नदी में इतने मोड़, घुमाव, लचक, अल्हड़पन, नैसर्गिक सौंदर्य, कही शांति, तो कहीं पहाड़ों को चिरती हुई सतत बहती यह चिरकुँमारी किसी कविता की सरिता से कम नहीं है। लेकिन पीछले ३० वर्षों में जितना नर्मदा-तट का भूगोल बदला है, उतना इससे पहले २,५०० वर्षों में नहीं बदला होगा। कुछ कुछ यह बात मन को दुखी करती हैं। बाँधों व जंगलों की कटाई से इस नदी के सामने भी आज बहुत से संकट आ खड़े हैं। रेत माफियाओं ने इस सौंदर्य की सरिता का हृदय छलनी कर दिया हो। जिससे कि इसका प्रवाह तो बाधित हुआ ही है। लेकिन आज इसके साथ रहने वाले हजारों जीव जंतुओं पर भी गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। लोकसंस्कृति व प्रकृति को साथ लेकर चलने वाली इस नदी का वास्तविक स्वरूप बना रहे, इसके लिए जनमानस को साथ आना होगा। जिस नदी ने हमेशा से भारतीय लोकजीवन को समृद्ध किया व जीवंत रखा। उस संस्कृति सरिता की ओर भी हमें ध्यान देना चाहिए।



भूपेन्द्र भारतीय

Sunday, February 14, 2021

अंतरात्मा की आवाज़ का जादू...!!

 जब भी चुनाव आता है तो अंतरात्मा की आवाज़ राजनीतिक चरित्र को अंदर से झँझोड़ती है। यह आवाज़ आकाशवाणी की तरह होती हैं। यह आवाज़ जब जब भी आती है। अच्छे भले आदमी का हृदय परिवर्तन करती हैं। राजनीति में यह आवाज़ जनता की सेवा के लिए आती है, तो कभी देशभक्ति के कारण यह आवाज़ नेता जी का हृदय परिवर्तन करती हैं। “जिससे वे अपने मन का मूड बदलकर दल-बदल करते है।” 



यह आवाज़ बहुत बार सरकारी विभागों में भी सुनाई देती हैं। जबतक सरकारी बाबू को यह आवाज़ नहीं आती, वे फाईलों का स्थान नहीं बदलते ! लेकिन जैसे ही जेब गर्म होती हैं, आम आदमी की गरीबी व पीड़ा को देखकर बाबूजी का इस आवाज़ के कारण हृदय परिवर्तन होता हैं। बड़े साहब भी बहुत बार इस आवाज़ के कारण न्याय व समता-समानता की बातें करते हैं। लेकिन जब तक उनके दो-चार बंगले व बैंक बैलेंस की पुरी तरह व्यवस्था न हो, तब तक उन्हें यह आवाज़ सुनने में कठिनाई होती है।


मुझे ऐसा लगता है कि अंतरात्मा की आवाज़ के संबंध में कोई क्रेश कोर्स होना चाहिए। जिससे कि यह कोर्स हर नेता व सरकारी महकमे के लोगों को आसानी से कराया जा सके या उनके प्रशिक्षण के समय इसपर विशेष बल दिया जाए ! इस अंतरात्मा की आवाज़ को यदि कोई रिकॉर्ड कर सके तो क्या कमाल होगा ! प्रतिदिन इसे सरकारी कार्यालयों में ऊंची आवाज़ से आसानी से सुनाया जाए। जैसे कि मंदिर-मस्जिद से आवाज़े आती हैं। जिससे की कितनों के ही हृदय परिवर्तन हो सकते हैं। यह आवाज़ विकास की बहार ला सकती हैं। जिससे कि भारत फिर सोने की चिड़िया बन सकता है।


इस आवाज़ को चुनाव आयोग अनिवार्य रूप से हर दो तीन वर्ष में नेताओं को सुनाये, जिससे की नेताओं के राजनीतिक कद नपे व आयोग चुनाव में व्यस्त रहे । “भले लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी बड़े या न बड़े।” जब भी चुनाव में कोई उम्मीदवार अपना परचा भरे, चुनाव आयोग उसे पहले अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए शपथपत्र मांगें, “कि क्या उम्मीदवार ने अच्छे से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन ली है?” जब भी कोई राजनीतिक दल अपना घोषणा पत्र जारी करें, उसमें अपने पुराने व मार्गदर्शक मंडल में बैठे नेताओं की अंतरात्मा की आवाज़ का स्पष्ट विवरण हो।


इस आवाज़ के बारे में मैं बचपन से सुनते आ रहा हूँ। लेकिन यह आवाज़ मुझे आज तक न अंदर से सुनाई न बाहर से ! हो सकता है इसलिए नहीं आई हो कि मैं किसी तरह के सरकारी विभाग में नहीं हूँ या फिर राजनीति के क्षेत्र में मैंने कोई रूचि नहीं ली। फिर भी इस आवाज़ का जादू मैंने कितनी ही बार देखा है। यदि इस तरह की आवाज़ में आप विश्वास करते हैं तो इसे सुने। अंतरात्मा की आवाज़ के गुणकारी प्रभाव को मद्देनज़र रखते हुए, संसद व सरकारी विभागों में एक अंतरात्मा कक्ष का भी निर्माण होना चाहिए। जिससे कि जब भी किसी को वर्तमानी कोलाहल में अंतरात्मा की आवाज़ सुनने में परेशानी हो, वह इस कक्ष का उपयोग कर सके। जिससे कि राष्ट्र फिर प्रगति व विकास की ओर अग्रसर हो।



©

भूपेंद्र भारतीय

Sunday, February 7, 2021

आंदोलनजीवीयों के मन-मस्तिष्क का चक्काजाम हो जाना....!!

 


                       (हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित)


आंदोलनजीवीयों के मन-मस्तिष्क का चक्काजाम हो जाना...


लोकतंत्र के इतिहास में चक्का जाम करना आम बात रही है! पर चक्काजाम करते-करते अपना मन-मस्तिष्क जाम कर लेना भी अब कोई आश्चर्य की बात नहीं रही ! जब हर बात पर हटधर्मिता हो तो फिर जाम की ही नौबत आनी है। लेकिन इस अलोकतांत्रिक विरोध में फिर लोकतंत्र का डंडा भी अवरोध बनता है तो हर्ज कैसा ? क्योंकि जाम को खोलना भी तो लोकतंत्र का कर्तव्य है। इस मतिभ्रम से ग्रसित आंदोलनजीवी के आंदोलन में सड़क का जाम तो खुल भी जाता है पर मन-मस्तिष्क का जाम बड़ी मुश्किल से खुलता है। ओर न ही कोई चिकित्सक इस दिमागी जाम को खोल सकता है।


आंदोलनजीवीयों का मस्तिष्क जाम हुआ तो ऐसे ही नहीं हुआ। जब मुफ्त का माल भरपेट मिले तो फिर स्वभाविक है कि मन भी “माले मुफ्त दिले बेरहम” की कहावत के मार्ग पर चल पड़ता है। जिस चक्काजाम में मुफ्त में भरपेट काजू , बदाम व पिज्जा मिले उससे तो मन मस्तिष्क का जाम होना ही था। अब जब उनके तन-बदन में मुफ्त चक्काजाम लगा तो उनकी बुद्धि ऊपर-नीचे , आगे-पीछे से आग बरसाने लगी। इस आग में सड़क पर चलती-खड़ी गाड़ियां, सरकारी संपत्ति तो जली ही, पर साथ ही आंदोलन की आग भी ओर भभक गई। इसमें उनके अपने झंडे झुलसे अलग। ओर फिर क्या था ! इस आग में राजनीति की रोटी जमकर सेकीं गई। इस राजनीतिक रसोई में कितनों के ही हाथ भी जले ओर लोकतंत्र के स्तंभ पर एकबार फिर आँच आई। गनीमत है कि “खेत पर काम कर रहे किसानों ने इस आग में पानी फेर कर आखिरकार आंदोलनजीवीयों को ठंडा कर दिया।”


अबतक दो तीन बार इस आग को ठंडा किया जा चुका है। लेकिन यदि बुद्धि पर चक्काजाम लग जाए तो फिर कैसी बुद्धिमानी की बात ! उन्हें तो अपनी ही मन की बात माननी है। वे किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं। वहीं जनता कितनी बार ही उन्हें मन से मतदान करके बता चुकी है कि अब आपके अच्छे दिन नहीं रहें। आपका सारा सामाजिक-राजनीतिक पुण्य स्वीस बैंक में सड़ रहा है। प्रभु अब आप हरिद्वार की ओर प्रस्थान करो। आपने बहुत विकास कर लिया ! अब आप लोकतांत्रिक तरीकों से खाते जिमते गठीया गये हो। आपके मस्तिष्क के सारे कलपुर्जे जाम हो गए हैं आप चक्काजाम के चक्कर में मती ही पड़ो। पर वे ठहरे ढीट। वे कहाँ मानने वाले थे। चक्काजाम करने के चक्कर में बुढापे में एक दो ओर अंगों को जाम कराकर ही मानेगें।


उनके मस्तिष्क पर सवार हुए इस चक्काजाम का जुनून यहां तक सर चढ़ा कि उन्होंने अपने ही घर के रास्ते अवरुद्ध कर लिये। चक्काजाम की खुशी में रात को उन्होंने खुब जाम छलकाए ओर अपने चेले चपाटों के साथ नगर को भी देर रात तक जमकर जाम किया। गलती उनकी नहीं है। यह फ्री की आदत का कमाल है। मुझे अब समझ आया कि सरकारें मुफ्त राशन व सरकारी छूट का कार्ड क्यों खेलती है। “उन्हें जनता के मन मस्तिष्क का आसानी से चक्काजाम करने का मार्ग मिल जाता है।” जिससे नेता हमेशा विकास का मार्ग बताते नहीं थकते ! जब “सरकार ने ही तुम्हारी बुद्धि पर मुफ्त की रेवड़ीयों से चक्काजाम लगा रखा है तो तुम क्यों थक रहे हो दिखावे के विरोध में ?


आखिर में उन्हें सिर्फ़ चक्काजाम करना था कर दिया ओर फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर पर जमकर चक्काजाम के फोटो-विडियों से सोशल मीडिया पर चक्काजाम करना था सो भी कर दिया। जिससे कि दिल्ली के उनके चचा यह सब देख सके ! वहीं अगले दिन भोर में ही अखबार बाँटने वाले के पास पहुंच गए अपनी बासी खबर देखने। लेकिन उनके जमाये जाजम का कोई नतीजा नहीं निकला। क्योंकि उनकी चक्काजाम बुद्धि को अबतक भी यह पता नहीं है कि मामला जज साहब के पास लंबित है ओर जिसके लिए चक्काजाम कर रहे हैं वह अपने खेत पर काम कर रहा है। ओर इन दोनों से ये बहुत दूर है। इनको चक्काजाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इनके विवेक का ही चक्का जाम है। अब इनसे विवेक की आशा कैसे करें ? मुफ्त का खाने से मन-मस्तिष्क पर चक्काजाम जो लग गया है..!!



#चक्काजाम  #आंदोलनजीवी

भूपेंद्र भारतीय







Friday, January 8, 2021

वे राजनीति में थे, हैं और बने रहेंगे....!!

 

             नईदुनिया ‛अधबीच’ स्तंभ  में ....


उन्हें ऐसा लगता है कि इस देश की राजनीति में उनका होना बहुत जरुरी है। वे सोचते हैं कि जिस दिन उन्होंने राजनीति से संन्यास लिया, वैसे ही इधर देश का लोकतंत्र पंगु हुआ ! ऐसा उन्हें क्यों लगता है ? जब यह पूछा गया तो वे कहने लगे, “जब जब हम विपक्ष में आते हैं तो लोकतंत्र खतरे में आ जाता हैं !” सत्ताधारी दल लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं। ऐसा उन्हें लगता है ! वे राजनीति के माध्यम से समाज में विकास की नदियाँ बहाने के सपने बेचते रहे हैं। ओर उसी विकास की छद्म नदी में वे अपने कुकर्मो का परिवाहन करते रहे है !


वे जब भी अपने गाँव से राजधानी की ओर जाते हैं तो उन्हें लगता है कि “वे विकास की यात्रा कर रहे हैं।” उन्हें अब भी ऐसा लगता है कि विकास गाँवों से शहरों की ओर जाने से ही होगा। इस आने जाने की भागदौड़ में उन्होंने लोकतंत्र को छका दिया है! वे थकते नहीं है ! उनके कार्यकर्ता हांफते रहते हैं। जनता उनकी विकास मैराथन दौड़ देखकर दंग है ! ओर उनके दल के मूल्य दिनोंदिन इस यात्रा में सिकुड़ते जा रहे है। वहीं लोकतंत्र के मंदिर उनकी प्रतिदिन की कदमताल से हतप्रभ हो रहे हैं।
        

                  अमर उजाला में प्रकाशित....


वो तो अच्छा रहा कि उन्हें चुनाव के चक्कर में राजधानियों से नीचे उतरकर जनता के दरबार में आना-जाना होता है। नहीं तो वे कबके लोकतंत्र को राजतंत्र कर देते। वे जब भी चुनाव के चक्कर में क्षेत्र का दौरा करते हैं तो उन्हें कई दौरें पड़ते हैं। इन क्षेत्रीय दौरों के कारण उन्हें दयनीयता की “बेड फिलिंग” आती है। पर वे बेचारे करें तो क्या करें ? वोटबैंक का भी तो दमखम रहता है लोकतंत्र में। इन्हीं वोट की रेवड़ीयों को बटोरने की जद्दोजहद में वे हरदम चुनावी क्षेत्र में दम-फक्क होते रहते हैं।


वे अब भी सोचते हैं कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र का झंडा उनके ही दल ने तौक रखा है ! भले ही उनकी राजनीति अब तक दल के बड़ो को तौकते-तौकते चल रही हो। वे लोकतंत्र के मामले में “अमेरिका को अपना अभिभावक मानते हैं, भले ही उन्हें उधर से पाकेट मनी मिलना बंद हो गई हो !” वे जब भी लोकतंत्र की बात करते हैं मानो “वाईट हाऊस” के चबूतरे पर खड़े हो ! वो तो क्षेत्र की जनता इस राजनीतिक स्वप्न के बीच आ जाती है, नहीं तो वे कबके “प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका” सपनों में ही बन जाते। उनका लोक-चरित्र राष्ट्रीय मिडिया का कई बार ज्वंलत विषय बना है। फिर भी वे अपने चाल--चलन के दम पर ही अपने क्षेत्र की जनता से जनमत मांगते हैं ! उनका राजनीतिक सफर इतने सफेद-काले कारनामों से भरा पड़ा है कि उनके क्षेत्र का विकास हर बार इन रंगों में धूमिल हो जाता हैं !


खैर, उनके आत्मविश्वास का लेवल उनके दल के अच्छे दिनों जैसा ही अबतक बना हुआ है। वे अब भी जहाँ बैठे हैं, वहीं उनका सदन है ! ओर जिस दिन उस जगह से खड़े हो गए, तो खड़े होते ही अपने राजनीतिक कद को ओर अपने दल को फिर खड़ा कर लेगे ! लोकतंत्र के प्रति उनका समर्पण अब भी इतना है कि वे अब भी अपने दल के अध्यक्ष है ! “वे अपने दल के अध्यक्ष थे, हैं ओर बने रहेंगे !” क्योंकि उनका मानना है कि इससे लोकतंत्र व उनकी राजनीतिक जागीरी सुरक्षित है।



©भूपेंद्र भारतीय

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