Monday, October 18, 2021

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम-वाल्मीकि संवाद

 श्रीरामचरितमानस में श्रीराम-वाल्मीकि संवाद


         



श्रीरामचरितमानस में गोसाईं तुलसीदास जी सातों सोपान में अलग-अलग मधुर व रोचक संवादों के माध्यम से राम कथा प्रस्तुत करते हैं। बालकाण्ड में वे कहते है;-

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥

अथार्त:- इस कथा में बुद्धि से विचारकर जो चार अत्यंत सुंदर और उत्तम संवाद (काकभुशुण्डि-गरुड़, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुंदर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं।

यह पवित्र व सुंदर सरोवर रामचरितमानस ही है और इसकी प्रमुख सुंदरता श्रीराम कथा है। रामचरितमानस के दूसरे सोपान अयोध्याकांड में श्रीराम-महर्षि वाल्मीकि संवाद अद्भुत है। इस संवाद में वाल्मीकि जी मुख्यतः श्रीराम को वे सब सुंदर स्थान बताते हैं जहां रामचन्द्र जी को निवास करना चाहिए। ये निवास स्थान साधारण नहीं है न ही भौतिक जगत में व्याप्त रहने के स्थान जैसे। “ये सब स्थान मुख्यतः श्रेष्ठ मानव के मुख्य जीवन मूल्य व प्रभु भक्ति के अलग अलग रूप ही है।” श्रीराम मुनि वाल्मीकि जी की इस सुंदर बात पर मन ही मन मंद मंद मुस्कुराते है। गोसाईं तुलसीदास जी ने इस संवाद के माध्यम से मुनि वाल्मीकि के विशेष गुणों को भी यहां बताया है। वाल्मीकि जी सबकुछ जानते है। वे ही इस लोकमंगलकारी कथा को “वाल्मीकि रामायण" के माध्यम से जन जन तक सर्वप्रथम पहुंचाते हैं। गोसाईं तुलसीदास जी इस संवाद में सिर्फ श्रोता है। वे इस सुंदर भक्ति की सरिता का आनंद लेते है और जो बात तुलसीदास जी स्वयं नहीं कह पाते वह वे मुनि वाल्मीकि जी के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। श्रीरामचरितमानस में श्रीराम-वाल्मीकि संवाद बहुत ही भक्तिमय व लोककल्याणकारी है।

वनवास के समय जब श्रीराम, लक्ष्मण व सीताजी वाल्मीकि आश्रम पर आते हैं तो सर्वप्रथम मुनि को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेते है और फिर श्रीराम मुनि वाल्मीकि से वन में रहने के लिए उचित स्थान के विषय में पूछते हैं, मुनि पहले तो रामचन्द्रजी की अपरम्पार महिमा का सुंदर वर्णन करते हैं। प्रभु की भक्ति व उनके दर्शन कर के प्रेममय होकर गदगद हो जाते है। आसन पर बिठाकर मधुर फल, कंद व मूल खिलाते हैं। फिर श्रीराम ने वनवास के विषय में मुनि के जानते हुए भी सारी बातें बताईं। फिर मुनि से वन में रहने के लिए उचित स्थान के बारे में पुछा। मुनि वाल्मीकि जी बहुत सहजता से कहते है;-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥

भावार्थ:-आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिए। तब मैं आपके रहने के लिए स्थान दिखाऊँ।

यह सुनकर प्रभु श्रीराम मन ही मन मुस्कुराए, वे मुनि के बारे में सबकुछ जानते है और थोड़ा सकुचाए भी कि कहीं सारा रहस्य खुल न जाए। रामचन्द्रजी मुनि की मधुर वाणी सुनते रहे। पूरे संवाद में कहीं ऐसा नहीं लगता है कि दोनों में कौन बड़ा है और कौन महान है ! भक्त व भगवान की अद्भुत महिमा का रहस्य व आनंद संपूर्ण संवाद में बना रहता है।
मुनि आगे कहते है;-

“हे रामजी! सुनिए, अब मैं वे स्थान बताता हूँ, जहाँ आप, सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास कीजिए। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक सुंदर नदियों से निरंतर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शन रूपी मेघ के लिए सदा लालायित रहते हैं।”

मुनि वाल्मीकि जी भौतिक जगत से परे सर्वप्रथम भक्तों के हृदय में निवास करने के लिए प्रभु श्रीराम को कहते है। यहां भक्ति रस अपने चरम पर है। भगवान से बड़ा भक्त हो गया है। मुनि ने राम भक्तों का कल्याण किया है। वाल्मीकि जी रामचन्द्रजी का ध्यान लोककल्याण की ओर कराते हैं। आम जनमानस के भक्ति रूपी मंदिर में आप निवास करें। ओर फिर कहते है;-
  “सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥"

फिर कहते है, जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए। जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निंदा) समान है, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं। ऐसे चरित्रवान भक्तों के हृदय में निवास करें। जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं।

पुनः मुनि वाल्मीकि जी कहते है कि;-

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥
भावार्थ:-जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किए रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदय में रहिए।

अंत में उस भक्त का भी वर्णन करते है जो “स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदय में डेरा कीजिए। जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है।" ऐसे सुंदर निवास स्थान में भी रहकर भक्तों का व जगत का कल्याण करें। ऐसे भक्तों का निर्मल हृदय ही प्रभु का अपना घर है।

तो भक्ति की महिमा व एक आदर्श समाज की ओर भी मुनि ध्यानाकर्षण करते हैं। श्रीराम जब इन सब स्थानों का भी ध्यान रखते है तो ये सब बातें ही लोकजीवन में श्रीराम को मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम बनाती है। अंत में वाल्मीकि जी कहते है कि निस्वार्थ भाव से जो आपकी भक्ति में रहता है और सदा आपका ही नाम लेता रहता है ऐसे सहज हृदय वाले भक्तों के हृदय में प्रभु पहले निवास कीजिए। पाठक रामचरितमानस में जब यह श्रीराम-वाल्मीकि संवाद पुरा पढ़ेंगे तो उन्हें अलग ही आनंद की अनुभूति होगी। साथ ही वाल्मीकि जी ने जो भक्तों के गुण व मानव मूल्यों के बारे में वर्णन किया है उस ओर भी पाठकों का निश्चित ही ध्यान जाएगा।

मुनि वाल्मीकि जी ने श्रीराम को यहां अवतारी पुरूष न मानते हुए सामान्य लोककल्याणकारी महापुरुष माना है। भले वे प्रभु श्रीराम के विषय में सबकुछ जानते थे। मानव कल्याण के लिए सामान्य मानव बनकर कार्य किया जाए, उसे ही वाल्मीकि जी यहां सही मान रहे हैं। यह उन्होंने “वाल्मीकि रामायण" में भी किया है। वे श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में ही चरितार्थ करते है। इसलिए उन्होंने श्रीराम को रहने के इतने स्थान बताये जो सब श्रेष्ठ मानव मूल्य ही तो है। ये सब मूल्य ही तो एक साधारण पुरूष को पुरूषोत्तम बनाते है।

इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्री रामचन्द्रजी को घर दिखाए। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्री रामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा- हे सूर्यकुल के स्वामी! सुनिए, अब मैं इस समय के लिए सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवास स्थान बतलाता हूँ)। आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए, वहाँ आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुंदर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है। वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसुयाजी अपने तपोबल से लाई थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पाप रूपी बालकों को खा डालने के लिए डाकिनी (डायन) रूप है।

गोसाईं तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस संवाद के माध्यम से प्रभु भक्ति व मानव कल्याण के लिए ऐसे अद्भुत आलौकिक, करूणामयी व दिव्य चित्रकूट जैसे सुंदर स्थान बताए । वैसे तो संपूर्ण रामचरितमानस भक्ति व मानव कल्याण का दिव्य भंडार है। लेकिन आदिकवि मुनि वाल्मीकि-श्रीराम का यह मधुर संवाद श्रीरामचरितमानस की रामकथा में विशेष स्थान रखता है।
जय श्री राम

संदर्भ :-
श्रीरामचरितमानस-गोसाईं तुलसीदास (टीकाकार-हनुमानप्रसाद पोद्दार)


©भूपेन्द्र भारतीय 
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Monday, October 4, 2021

मंच की लहर को ‛मिस’ कर रहा था....!!

 मंच की लहर को ‛मिस’ कर रहा था....!!


नईदुनिया के अधबीच में...



कोरोना विषाणु की दो लहरों ने एकदम घरघुस्सू बना दिया है। इस क्वॉरेंटाइन समय में मैंने सबसे ज्यादा मंचीय लहर को “मिस” किया। कोरोना से पहले कैसे कैसे मंचीय आयोजन होते थे और इन आयोजनों में कितने अद्भुत मंच सजते थे। अंतरराष्ट्रीय मंच से लेकर गली मोहल्लों के मंचों का अपना ही रंग रहता था। इन मंचों से आती भाती-भाती की लहरों से आजतक कौन बचा है ! वैसे कोरोना काल में आनलाईन मंचों से भी बहुत सारी उलटी-सुलटी लहरें निकली, लेकिन इन लहरों का काल अल्पकाल का ही रहा। अब जब कि कोरोना से तीसरी लहर की उम्मीद कम ही है तो विभिन्न ऑफलाईन मंचों से अद्भुत लहरें आना शुरू हो गई है। मेरे जैसा मंच प्रेमी तो इन लहरों की कब से बाट देख रहा था !

  


मंचों में मुझे राजनीतिक मंच सबसे अधिक प्रिय लगते रहे हैं। “राजनीतिक मंचों पर गजब का रंगमंच जमता है !” सफेदझग परिधानों में विराजमान माननीय नेता जी इस मंच की शान होते है ! कैसी आक्रामक व तूफानी लहरें इस मंच से चलती हैं ! एक से बढ़कर एक वक्ता अपनी ओजस्वी वाणी से राजनीतिक मंचों की शोभा बढ़ाते हैं। देश-दुनिया तो क्या ही, अखिल ब्रह्मांड तक इन लहरों से गजगजा सकता है। हर सभा में मंच की ओर से आ रही लहर मानों ऐसी हो जैसे आकाशवाणी हो रही है। कभी विकास की लहर चलती है तो कभी उम्मीदों का तूफान चलने लगता है। आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे-ऐसे शब्द भेदी बाण चलते है, जिससे अंत में बेचारी जनता ही लहुलुहान होती हैं। भरोसे की लहर का तो कहना है क्या ! ऐसी लहर जनता की आंखों में आखिरकार अतिविश्वास की धूल ही झोकती हैं।

मंच से दूसरी सबसे तगड़ी लहर कवि सम्मेलनों में चलती हैं। इस लहर से साहित्य की आत्मा कांप जाती है। वहीं कुछ साहित्यकार कहते हैं इस मंचीय लहर से साहित्य का उत्थान होता है ! ऐसे मंचों से भाषा अपनी लुंगी उठाकर सबसे पहले दौड़ लगाती है। बड़े बड़े दरबारी कवियों का मंच से बांहें फैलाकर काव्य करना, मंचीय कविता का प्रथम श्रृंगार रस होता है। “भले ही कविता में रस हो न हो !” पर इस लहर से पीड़ित जनता का सबसे अधिक मनोरंजन होता है। रस विहीन कवि सम्मेलनों में जनता के लिए “लाफ्टर” की लहर भरपूर होती है। आजकल इस मंच पर ठेका पद्धति आने से इस लहर ने हर गली-मौहल्ले में रस बरसा रखा है।

तीसरी मेरी पसंदीदा लहर “अकादमिक लहर” है। मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में ही यह लहर चलती है। यह बड़ी ही लचीली व कोमल-कमनीय होती है ! अकादमिक मंच की लहर पहली नजर में बड़ी ही शालीन व सुहानी लगती है ! पर यह लहर कुछ देर बाद असर करती है। कभी कभी तो अकादमिक मंचों की लहरें दस-बीस वर्ष बाद अपना असली चरित्र दिखाती हैं। इस मंच की लहरों से या तो पीढ़ियां तर जाती हैं या फिर पीढ़ियां की पीढियां इस लहर में उड़ जाती हैं। इस मंच पर विराजमान होने वाले अधिकाशतः बौद्धिक प्राणी ही होते है और जो बौद्धिक एक बार इस मंच पर जम जाता है वह इससे बड़ी मुश्किल से उतरता है। इस मंच की लहरें अधिकतर समय चार दिवारी में ही चलती हैं, इसलिए आम जनता को कम ही महसूस होती हैं। लेकिन इस लहर के थपेड़े खाकर अकादमी से बाहर निकला मानव बड़ा लहरबाज़ होता है !

खैर, ऊपर बताई गई तीन प्रमुख मंचीय लहरों के अलावा भी अन्य मंचों की लहरों अपनी ही निराला रंग होता है। इनके अलावा भी जाने कितनी ही तरह की लहरें अलग अलग मंचों से चलती रहती है। सारी लहरों का यहां वर्णन करना पाठक के मन में रसायनिक लौचा कर सकता हैं। मंचीय दुनिया में कभी अपने ही घर से कोई लहर निकलती है, तो कभी मंच पर विराजमान होते समय मंचासीन के स्वयं के अंदर से भी कुछ लहरें चलती रहती हैं। जमाना भरा पड़ा है इन मंचों की लहरों के थपेड़ों से ! वैसे कुछ लहरें अच्छी भी होती हैं। कुछ खट्टी-मीठी, कुछ ठंडी-गर्म भी ! हमने तो वास्तविक रूप में इन दो साल में दो ही लहरों का ही सामना किया है और भगवान बचाएं किसी “तीसरी-चौथी लहर” से ! पर मन बहलाने के लिए मंचीय लहरें चलती रहना चाहिए।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410 

Sunday, September 26, 2021

श्रीमान का “मास्टर प्लान”....!!

 श्रीमान का “मास्टर प्लान”....!!

                   
                        जनवाणी में प्रकाशित 

श्रीमान के पास एक से बढ़कर एक “मास्टर प्लान” हैं। वे पीछले जन्म में नगर सभ्यता के बड़े कर्ताधर्ता रहे होगें ! हमारे नगर का कैसा भी विकास हो, उनके पास सभी विकास कार्यों के लिए स्मार्ट “मास्टर प्लान” हैं। मास्टर प्लान के क्रियान्वयन में नगर दसों दिशाओं से खुला रहता है। लगता है नगर कुछ ही दिनों में विकास की चरम सीमा पर पहुंचने वाला है। हर नगर ‛स्मार्ट सिटी' बनने ही वाला है। ऊपर से श्रीमान के सर पर विकास पुरूष का साफा पहले से ही बंधा हुआ है।

श्रीमान विकास पुरूष ऐसे ही नहीं बने है, उन्होंने पहले बड़े-बड़े मास्टर प्लान को अपने भागिरथी प्रयासों से इस पुण्य सलिला नगर सभ्यता में उतारा है। उसके बाद ही हमारे हर नगर में चारों ओर जल का जलजला हो रहा है। बच्चों के लिए इस मास्टर प्लान की बदौलत ही श्रीमान ने प्राकृतिक तरणताल बनाने का ऐतिहासिक कार्य किया हैं। जलमग्न नगर में बच्चे कागज की नाव चलाकर नगर भ्रमण का आनंद आसानी से व निशुल्क उठा रहे हैं। नगर में वाहनों की कम आवाजाही से ट्राफिक समस्या भी श्रीमान के मास्टर प्लान के कारण स्वतः ही समाप्त हो गई है।
                              


वर्षा जल का संरक्षण श्रीमान के मास्टर प्लान के कारण ही नगर में ही संरक्षित हो जाता है। “मजाल की बारिश का पानी नगर के बाहर निकल जाए !” भला जल प्रबंधन का ऐसा मास्टर स्ट्रोक दुनिया में कहीं ओर देखने को मिल सकता है ? मास्टर प्लान के कारण पूरा नगर पर्यटन की दृष्टि से दर्शनीय स्थल बन गया है। मुझे तो कभी कभी लगता है कि हमारे श्रीमान के इन मास्टर प्लानों के कारण हमारे नगर स्वर्ग के नगरों से भी अच्छे ही बनने वाले हैं। आखिर क्या कमी है नगर में ? चारों ओर बड़े बड़े ओवरब्रिज बनते जा रहे हैं। मॉल संस्कृति ने नगरीय सभ्यता में क्रांति ला दी है ! नगर के किसी भी व्यक्ति को पैदल चलने की जरूरत ही नहीं पड़ती हैं। एक गाड़ी में से उतरे तो दूसरी चढ़ने के लिए पहले से ही खड़ी है ! पैदल चले भी तो कैसे ? “कहीं मास्टर प्लान का काम न रूक जाए।”

श्रीमान का स्मार्ट मास्टर प्लान सरकार चलाने में भी बहुत काम आता है। राज्य सरकार मास्टर प्लान के लिए केन्द्र सरकार से उम्मीद रखती है। मंत्री जी मास्टर प्लान के लिए राज्य सरकार से उम्मीद रखते है। नगर का प्रथम नागरिक मास्टर प्लान के लिए मंत्री जी से उम्मीद रखता है। पार्षद-पति मास्टर प्लान के लिए नगर के प्रथम नागरिक से उम्मीद रखते हैं। वार्ड के युवा नेता मास्टर प्लान के लिए पार्षद-पति से उम्मीद रखते हैं ! “केंद्र से लेकर नगर वार्ड तक सब एक दूसरे से उम्मीद रखते हैं!” और ऐसे ही सरकार चलती रहती है। वहीं वार्ड की भली जनता श्रीमान के मास्टर प्लान से उम्मीद रखें है !

श्रीमान के मास्टर प्लान के कारण महानगर में भी जलक्रीड़ा आयोजन करने वालों की चाँदनी हो गई है। महानगर की मुख्य सड़कें जलमग्न है, पर नाव वालों की चाँदनी हो गई है ! श्रीमान रोजगार के लिए गजब का मास्टर स्ट्रोक लाये है। हो सकता है यातायात के कुछ ही दिनों में हवाई सेवाएं ही बचें। कोरोना के कारण बच्चों की पहले से मौज मस्ती थी और ऊपर से मास्टर प्लान के कारण विद्यालय की छुट्टियां ओर आगे बढ़ गई है। मास्टर प्लान के कारण नवनिर्मित जलमार्ग पर नगर के प्रेमी युगल नाव चलाते हुए जलक्रीड़ा का आनंद ले रहे हैं। श्रीमान के मास्टर प्लान ने महानगर सभ्यता में भी चार-चाँद लगा दिये हैं। अंत में श्रीमान के मास्टर प्लान के कारण ही पूरे देश के नगर-महानगर एक दिन “स्मार्ट सिटीमय्” हो जाऐगा !!


भूपेन्द्र भारतीय 
 

Friday, September 10, 2021

हिन्दी पखवाड़े में माड्साब....!!

 हिन्दी पखवाड़े में माड्साब....!!

     


               इंदौर समाचार में प्रकाशित ....
जैसे जैसे हिन्दी पखवाड़ा के दिन आते हैं माड़साब को लगता है कि हिन्दी के ‛अच्छे दिन’ आने ही वाले हैं। इसी उम्मीद पर हर वर्ष माड्साब हिन्दी पखवाड़ा मनाते हैं। वह अपने छात्र-छात्राओं को निर्देश देते हैं, “सुनो रे छोरा-छोरी, इन सप्ताह सब हिन्दी दिवस मनाएँगे ओर हिन्दी का विकास के लिए नयी नयी कहानी, कविता व निबंध लिखड़ा है। साथ ही साथ हम सब के ‛शुद्ध हिन्दी’ भाषा में ही अपने काम व बातचीत करना है।”

हिन्दी नवाचार के नाम पर जुनी से नयी हिन्दी के सभी साहित्यकारों के साहित्य की धूल झाड़ी जाती है। हिन्दी के सभी पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी नव-उत्थान के लिए कोरस में हिन्दी नव गीत गाये जाते है। कुछ हिन्दी प्रेमी हिंदी की चिंदी करते रहते हैं और कुछ हिन्दी के झंडाबदर इस पर ढोल पिटते रहते हैं कि बिंदी कहाँ लगानी है।

इस पखवाड़े भर ऐसा लगता है जैसे विश्व में हिन्दी अपने शिखर पर है, पर कोई ‛हरिश्चंद्र भारतेंदु’ नहीं जानता कि “हिन्दी भाषा” हमारी शिक्षा व शिक्षण व्यवस्था में कहाँ खड़ी है ? सरकार के सभी कार्यालयों को केंद्रीय गृह मंत्रालय उसकी कार्य भाषा ‛अंग्रेज़ी’ में निर्देश देता है कि सरकार के सभी विभाग ‛हिन्दी पखवाड़ा’ में हिन्दी भाषा में ही काम करेगें व पखवाड़ा धूमधाम से मनाया जाऐगा। “इसके लिए बजट की रेवड़ी सबको अलग से बटेगी।" भाषा पर बड़े-बड़े भाषण होते हैं। वही हिन्दी दिवस पर व्याख्यान माला में भाषा की स्थिति पर चर्चा कम और चाय-पानी की व्यवस्था पर अधिक बहस होती है।

माड़साब अपने विद्यालय में हिन्दी व राज भाषा ज्ञान पर प्रतियोगिता आयोजित करते हैं और मातृभाषा का मान बढ़ाते हैं। ऐसा उन्हें लगता है। ‛सरकार व माड्साब इस पखवाड़े भाषा के गुणगान करके अपने आप को गौरवान्वित समझते हैं।’

हर वर्ष जिस तरह से अन्य पर्व-वार-त्योहार मनाए जाते हैं, हिन्दी पखवाड़ा भी उसी तैयारी से धूमधाम से मनाया जाता रहा है। राष्ट्रीय एकीकरण की लुगदी लगाकर हर आम आदमी को हिन्दी का महत्व समझाया जाता है! लेकिन वहीं आम आदमी अब भी अपना बैंक खाता अंग्रेज़ी में ही फार्म भरकर खोलता है। भाषा की इस दुर्दशा पर हर आम हिन्दी प्रेमी का खून खौलता रहता है, लेकिन सरकार व हिन्दी अकादमियाँ समय समय पर इस आम हिन्दी भाषा प्रेमी की भावनाओं पर हिन्दी साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित कर ठंडा पानी डालती रहती हैं !

हर वर्ष हिन्दी पखवाड़े पर माड़साब के मन में हिन्दी के लिए ‛छायावादी’ बादल छा जाते है। माड़साब इस पखवाड़े सरकार के सारे सरकारी काम-काज जैसे जनगणना, मतदाता सूची बनाना, स्वच्छता अभियान, महिला बाल विकास, टीकाकरण आदि काम छोड़कर हिन्दी के विकास में लग जाते हैं। जो माड़साब गाँव के विद्यालय में पढ़ाते हैं, वहाँ उनके छात्र विद्यालय में कम खेत-खलिहान पर ज्यादा मिलते हैं। जैसे तैसे माड़साब बच्चों को एकत्रित करके प्रतियोगिता सम्पन्न कराते है और हिन्दी भाषा की लाज रखते है।

माड़साब ने इस वर्ष हिन्दी दिवस अपने क्षेत्र के एक मूर्धन्य हिन्दी साहित्यकार को अतिथि के रूप में बुलाया। ये साहित्यकार अपने आप को कवि कहते हैं लेकिन पूरे समय आलोचक का काम करते हैं। जिस तरह से हिन्दी की कई छोटी-बड़ी मुँह बोली बहनें है, उसी तरह ये कविवर हिन्दी के मुंबइया टाईप भाई बने फिरते हैं। इनके जैसें कवियों की ही हिन्दी गुमटियां हर नगर में सरकार की सहायता से चलती रहती है। कवि महोदय ने हिन्दी दिवस पर अपनी ही लिखी चार कविताएँ बच्चों को सुना दी। फिर अंत में बोले, “छात्रों इस पखवाड़े बस इतना। अगले पखवाड़े फिर ‛नयी कविता’ के साथ आपसे मिलूँगा।“ माड़साब को भी समझ नहीं आया कि बच्चे कितनी कविता समझे। अंत में अतिथि महोदय का विद्यालय के ही एक अतिथि माड्साब ने “थैंक यू कहकर” आभार प्रकट कर पखवाड़े से विदाई दी।

प्रतियोगिता का परिणाम यह रहा कि ‛गाँव के लोगों को कई दिन बाद पता चला कि माड़साब जीवित है और गाँव में विद्यालय का भवन विद्या के लिए ही बना है जिसमें माड्साब सरकारी कार्यों से फुर्सत मिलते ही यदा कदा पढ़ाने भी आते हैं।’ उन पर इतनी जिम्मेदारी है कि उन्हें भाषा के साथ राष्ट्र का भी विकास करना है, लेकिन शासन के निर्देशों व चुनाव कार्यों से छुटकारा मिले तो पढ़ने-पढ़ाने का मूल कार्य करें।

खैर, प्रतियोगिता के अंत में माड़साब ने हिन्दी भाषा पर एक भावपूर्ण भाषण दिया। इसमें उनने अपनी हिन्दी कविता के माध्यम से सभी रसों व छंदों का घालमेल करके बच्चों को घनचक्कर कर दिया।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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शांतिदूतों की दुनिया....!!

 शांतिदूतों की दुनिया....!!

    

                        हरिभूमि में प्रकाशित....

बर्तनों का क्या है बजते ही रहते हैं। इनके बजने से क्या हम विश्व शांति की बात करना छोड़ दें ? जब तक अपने ही घर से शांति की बात करना शुरू नहीं करेंगे तो फिर विश्व शांतिदूत कैसे कहलाऐगे! हम शांति की तख्तियां लेकर राजमार्ग पर निकल चुके हैं। हम किसी वाद-विवाद में अपनी मनोहारी शांतिलाल वाली छवि गवाना नहीं चाहते। राष्ट्रीय ही नहीं हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांतिवार्ताओं में शिरकत करना है। भला इन छोटे मोटे ठीकरों की ठें-ठें से हम विचलित होने वाले है ? हम बंदूक की गोली से नहीं, अपनी वाचाल बोली से विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त करेंगे। हमें कोई माई और न ही उसका कोई लाल अपनी शांतिप्रिय कार्यों के लिए नहीं रोक सकता है।

हम ऐसी भाषा के जानकार है जिससे बड़े-बड़े मंच एक झटके में जम सकते है। हमें टीवी बहसों में बतौर मुख्य वक्ता ऐसे ही नहीं बुलाया जाता है ! हमें शांति-वार्ता करने का लंबा अनुभव है। इसकी शुरुआत हमने सबसे पहले अपनी प्रेयसी से ही की थी। हमारी प्रेमिका ने ही हमें शांतिवार्ताओं का गुढ़ रहस्य बताया था और फिर हम उनकी वार्ताओं में नियमित शामिल होकर शांतिदूत कहलाने के सारे तौर-तरीके सीख गए। अब तो हम इस विधा में इतने कुशल हो गए है कि दो देशों के बीच शांतिवार्ता तो छोड़ो, हम दो धुरविरोधी पड़ोसियों के बीच शांतिवार्ता करा दे ! आजकल तो हमारी इस विधा का जलवा इतना है कि हम दो कट्टर विरोधी महिलाओं के बीच शांतिवार्ता सम्पन्न करा देते है। वो हम ही तो थे ! जिन्होंने शीतयुद्ध में भी शांति की मशालें थामें रखी थी। जिससे नये-नये देशों का निर्माण हुआ ! ‛गुटनिरपेक्षता’ नीति हमारे ही द्वारा तैयार किये गए पाठ्यक्रम का भाग रही है।

“गंगा-जमुना तहजीब” का पाठ हम ही तो अपनी कक्षाओं में सरपट पढ़ाते रहें है। हमने ही सर्वप्रथम हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा अपने पठ्ठो को दिया था और फिर हमारे पठ्ठो ने इस नारे के बदोलत ही चीन की दीवार पर मेरॉथन दौड़ लगाते शांतिदूतों का वैश्विक तमगा प्राप्त किया। हमारे पढ़ाये छात्र संयुक्त राष्ट्र में शांतिदूत बन गये। किसी भी विश्व मंच पर हमारे विश्वविद्यालय से निकले बुद्धिजीवी ही शांतिवार्ताओं की सर्वप्रथम पहल करते हैं। अब इससे ज्यादा अपनी विश्व शांतिप्रियता व वैश्विक छवि की बात कैसे करें !

हमने कितनी ही बार वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ विश्व साहित्य पर चर्चा में भाग लिया है। वैश्विक शिष्ठ मंडलों का प्रतिनिधित्व हमने ऐसे ही नहीं किया है। संसदीय दलों का नेता प्रतिनिधि बनकर हम विश्व के कितने ही देशों की यात्रा कर चुकें है। शांतिवार्ताओं में हुए खर्चों के हम आजतक किसी संस्था के दो रूपये के दगेलदार नहीं है। हम हर शांतिवार्ताओं की यात्राओं पर अपने ही खर्चें पर गए है। किसी सरकारी यात्रा का हम पर अबतक कोई प्रभाव नहीं रहा है ! हम विश्व शांतिदूत का पुण्य कार्य अपनी आत्मशांति के लिए करते है न कि किसी लालच के वशीभूत होकर। नारायण-नारायण करते शांतिदूत के रूप में हम कहीं भी पहुंच जाते है।

हर गाँव के ओटले पर बैठी हम पंच-परमेश्वरों की सभा शांतिदूतों का ही प्रतिनिधित्व करती है। हमारे ही कारण गाँव का हर काम शांति से सम्पन्न होता है। हम अपने गाँव में तो शांति बनाये रखते ही है, आस-पड़ोस के गांवों में भी शांतिदूत बनकर आते-जाते रहते हैं। हम ऐसे ही “लोकल से वोकल” तक अपने शांति के उत्पाद बेचते रहते है। हमारे ही शांतिदूतों के करकमलों से दुनिया में अमन-चैन फलता-फूलता रहता है। शहरों में भी हमने कई शांति के मठ खोल रखे है। इन शांतिमठों हमारे ही मठाधीश शांति से अलग-अलग शांति यज्ञ सम्पन्न करते रहते हैं। इन शांतिमठों में हमारे शांतिदूत नियमित शांति पाठ भी करते हैं। जिससे पूरे शहर का वातावरण शांतिमय बना रहता है।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Tuesday, August 17, 2021

लो जी आ गए हम....!!

दैनिक जनवाणी

 लो जी आ गए हम....!! 


हाँ जी हम आ ही जाते है, जैसे किसी भी विवाह में फुफा-मौसा जी बीन बात पर बिगड़कर आते है ! वैसे ही हम हर बड़े आयोजन-उत्सव-त्यौहार पर आ ही जाते है। कभी किसी की जात पूछने या फिर किसी का धर्म पूछने, हम आ ही जाते है। किसको किस उत्सव या त्यौहार पर फटाके फोड़ना है और किसे नहीं फोड़ना है, किस तरह के कपड़े पहनना है आदि पर रायचंद बनकर हम आ ही जाते है। अच्छी भली दौड़ रही ज़िंदगी में हम खलल डालने आ ही जाते है। हमें आना ही पड़ता है क्योंकि हमें बगैर बुलाये आने की आदत है। 


हमें सड़क पर बेवजह आना अच्छा लगता है क्योंकि यह हमारा संवैधानिक अधिकार है ! हम ही तो वो जागरूक नागरिक हैं जो अपने संवैधानिक मौलिक अधिकारों को पूरी निष्ठा से उपयोग करते है। हमें ही सड़क जाम करके लोकतंत्र की रक्षा करते हैं। संसद में सभापति की ओर कागजों की गेंद बनाकर फेंकने वाले, वो भी हम ही होते है। क्योंकि हमें जनता संसद व विधानसभा में फेंका-फांकी करने ही तो चुनाव में चुनकर पहुंचाती है ! जनता हमें अपनी इसी सर्वकालिक प्रतिभा के कारण तो संसद में चुनकर भेजती है। हम ही है वो जो अपने क्षेत्र में जाने पर भी कहतें है कि “लो जी आ गए हम....!!” ‛हमारा स्वागत नहीं करोगें ?’ हमें सबसे ज्यादा राजनीतिक क्षेत्र में बगैर बुलाएं घुसना अच्छा लगता है।


हम ही है वे आदर्श मेहमान होते है जो किसी की भी रसोई में घुसकर अपनी चतुर बुद्धि से हर भोजन में मीनमेख निकाल सकते है। हमें यह बताना भी अच्छा लगता है कि किसे क्या खाना चाहिए और किसे क्या नहीं ! हमारे ही कारण कहीं पर भी पहुंच जाने से वहां के माहौल में खलबली मच जाती है। हमनें ही अपने राष्ट्र में संसद से सड़क तक वादों की झड़ी लगा रखी है। हम जहां भी पहुंच जाते है “लाईन वहीं से शुरू हो जाती हैं।” हम ही हर सभा में सबपर भारी पड़ते है ! सरकारी संस्थाओं व कार्यालयों में हम ही सबसे पहले पहुंचते हैं। सरकारी योजनाओं पर सर्वप्रथम हमारा ही अधिकार होता है ! 

       


अपना पड़ोसी हो या फिर हमारे देश का पड़ोसी, हमारे आने-जाने से ही तो आपसी संबंधों में ‛गर्माहट’ बनी रहती है। लेकिन जब हम अपने ही घर पहुंकर कहते है कि ‛लो जी आ गए हम !’ तो घर वाले कहते है ‛कोई अहसान नहीं किया है !’ “पहले अपने जूते बाहर उतारों व हाथ-पांव साफकर अंदर आना !” कहाँ तो हमारे आने-जाने से दुनियाभर में मान-सम्मान है लेकिन अपने ही घर में हमें “घुसपैठिये” कहा जाता है। इसी पीड़ा के कारण हम बहुत बार रूठकर विदेश चले जाते है। आखिर हमें वहां भी तो अपनी “लो जी आ गए हम” वाली प्रतिभा दिखाना होती है। 


आजकल हम सोशल मीडिया पर भी छाती चौड़ी करके कहते है, “लो जी आ गए हम !" हमने वाट्सएप विश्वविद्यालय के माध्यम से इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया है कि हम हर विषय पर धाराप्रवाह बोल सकते है। हमने कॉपी-पेस्ट करना इतना अच्छे से सीख लिया है कि हम घर बैठे-बैठे ही चार-पांच पीएचडी वालों जितना ज्ञान बांट सकते है। वे हम ही है जो हर सोशल मीडिया मंच की बहस में लाईक-कमेंट से ही अपनी विद्वता सिद्ध करते है। हमारे ही मार्गदर्शन में हर क्षेत्र में पुरस्कार बांटे जाते है। और फिर हम ही होते है जो पुरस्कार वापसी अभियान चलाते हैं। हम जब लंबा कुर्ता पहनकर कला के मंच पर चढ़ते है तो अच्छे-अच्छे कलाकार रास्ता नाप लेते है। कला व साहित्य के मंचों पर भी हमारी ही जागीरी चलती है। कुल मिलाकर हम कहीं भी जाए हमें कभी नहीं कहना पड़ता है कि “लो जी आ गए हम....!!" हमें सब जानते-पहचानते हैं।


भूपेन्द्र भारतीय 

९९२६४७६४१०

Sunday, August 1, 2021

समाचार में सक्रिय माननीय....!!

 समाचार में सक्रिय माननीय....!!

दैनिक जनवाणी में प्रकाशित....



आम आदमी की शिकायत रहती है कि नेता कुछ नहीं करते है। लेकिन उनकी दिनचर्या देख व पढ़कर लगता है कि दुनिया में सबसे व्यस्ततम् यदि कोई है तो यही माननीय ‛जन-गण-मन’ है। कैसे-कैसे चमत्कारिक रूप है इनके ! क्या तो अफलातूनी दिनचर्या रहती है ! और इनके साथी ! इनके पीछे अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे। अखबारों व मीडिया में भी इनकी खबरें बड़े चाव से छपती व पढ़ी जाती हैं। इनके समाचारों के शीर्षक एक बार पढ़ना शुरू करो तो रूक ही नहीं सकते....!!

आज माननीय ने दिनभर फोटू खिचाओं प्रतियोगिता में भाग लिया ! प्रभारी मंत्री जी का हार-फूल से स्वागत हुआ। चार पांच शोकाकुल परिवारों के घर जाकर संवेदना व्यक्त कर ढांढस बंधाया। चुनावी क्षेत्र में तीन स्कूलों में पौधारोपण किया। कई दिनों से इंतजार कर रहे ग्रामीणों से मिले प्रभारी मंत्री, जमकर लगे नारे ! बापड़े दिनभर क्षेत्र में धूल खाते रहे। शाम तक मंत्रीजी की कार पर एक कुंटल फुल मालाएं सवार हो गई !

एक नया-नया शीर्षक था, “हमारे दल में आए हो तो पार्टी का चाल-चलन व रिवाज अपनाना पड़ेगा”- एक बड़ी राजनैत्री ने दलबदलू नेता से कहा। अगले पृष्ठ पर कुछ ओर पंक्तियां थी... ‛विधानसभावार समस्या समाधान शिविर आयोजित करते रहें !’ एक क्षेत्रीय कद्दावर कार्यकर्ता के यहां एक बेशरम का व एक बांस का पौधा लगाया।
आज के दिन हाईवे से सटी गरीब बस्ती में नंगे-पुंग्गे बच्चों को चड्ढी-बनियान का वितरण किया।
चुनावी क्षेत्र में ग्रामीणों की समस्याएं अनसुनी कर, बहुत से कपड़े बांटे ! क्षेत्र के दौरे पर निकले जनप्रतिनिधि बाढ़ में फंसे, “आम जनता ने चार-पाई के सहारे राजधानी पहुंचाया !”

प्रभारी मंत्री ने दिनभर सैकड़ों समस्याओं से संबंधित ज्ञापन लियें और निजी सचिव को दे दिये। शाम तक सचिव ने आवेदनों को कुड़ादान को समर्पित कर दियें।
“पद और दायित्व बदलते रहते हैं, लेकिन कार्यकर्ता नींव का पत्थर होते है” :- एक तेजस्वी माननीय ने मंच पर भाषण के दौरान यह चमत्कारी वक्तव्य उछाला !

किसी समाचार पत्र में छपता है, ‛रिमझिम फुहारों के बीच क्षेत्र में दिनभर खुली जिप्सी में डमते रहे मुख्यमंत्री !’ “विपक्ष आरक्षण की राजनीति कर रहा है” :- सामाजिक विकास मंत्री ने कहा।
एक दिन में सुबह-दोपहर-शाम को मिलाकर तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को महामहिम राज्यपाल ने दिलाई शपथ।
मानसून सत्र के सातवें दिन भी विपक्षी दलों का दोनों सदनों में जोरदार हंगामा। सरकार ने कहा, विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं। सत्ता पक्ष कह रहा है, “चर्चा से क्यों भाग रहा विपक्ष ?"
वहीं एक राष्ट्रीय अखबार का शीर्षक, “ठहरी हुई संसद और जनता की साँसें फुल रही !”
संपादकीय पृष्ठ पर संपादक के मन की बात:- ‛दो घंटे की “मन की बात” में पीएम ने पांच हजार शब्दों में जन की बात की ! श्रोता सुनकर अभिभूत हुए।’

सदन में गूंजा ‛खेला होबे’, विपक्षी सदस्यों ने खेल-खेल में आसंदी पर फेंके कागज। सदन की कार्यवाही जरूरी कागजों के फाड़ने से रूकी। सदन की मर्यादा भूले सांसद, स्पीकर की ओर फेंके पर्चे...! ‛संसद में तनातनी आर-पार की ओर बढ़ी !’
अगले पृष्ठ पर बड़ा सा शीर्षक:- एक बड़े नेता ने कहा, “जासूसी, महंगाई और किसानों पर समझौता नहीं ! वहीं पृष्ठ के बुंदे में छपता है, “दल के ई-चिंतन में दल के बड़े नेता का कार्यकर्ताओं ने उद्बोधन सुना।" आखिर में आता है, ‛सभी क्षेत्रीय दलों पर भरोसा करें राष्ट्रीय दल, रचेंगे इतिहास:- एक राज्य स्तरीय राजनैत्री का बयान !’

अब जब इस तरह के आश्चर्यजनक समाचार शीर्षक पढ़ने-देखते में आते है तो लगता ही नहीं, कि हमारे माननीय कुछ काम नहीं करते है ! वे तो हर शीर्षक में भी कितनी सक्रियता से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 

हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...