Monday, February 7, 2022

यात्राएं नये संसार से मिलाती है....!!

 यात्राएं नये संसार से मिलाती है....!!


              

                          अमर उजाला में....दिल्ली 
यात्रा आपको स्वयं व संसार से मिलाती है। यात्राओं पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन हर यात्रा पहले वाली से पूरी तरह अलग ही होती है। इसलिए यात्राओं का महत्व मनुष्य के विकास में आदिकाल से रहा है। नये लोगों से मिलना, नयी जगह देखना भर यात्रा नहीं, बल्कि यह अपने आप में एक पूरा जीवन दर्शन है।

दो साल से पापी कोरोना के कारण कोई लंबी यात्रा नहीं हुई थी। आखिर में मैं, मेरे मित्र सचिन सिंह परिहार व विजयंत सिंह ठाकुर हम तीनों अपनी अपनी व्यस्तताओं को छोड़कर घुमने के लिए घुमन्तुओं की तरह निकल पड़े। पहले से कोई निश्चित नहीं था कि कहां जाना है, बस निकल गए घर से...! सबसे पहले भोपाल से होते हुए सागर व फिर छतरपुर के पास भीमकुण्ड पहुंचे। भीमकुण्ड में पानी सुंदर व पारदर्शी (जैसे मिट्टी का तेल) बहुत गहराई तक भरा हुआ है। कई कहानियां व किवदंतियां है इस कुंड की। जिसमें प्रमुख महाभारत में अज्ञातवास के समय भीम ने पानी के लिए गंगा जी को यहां प्रकट होने का निवेदन किया था और उसके बाद से आजतक यह भीमकुण्ड अस्तित्व में है। एक स्थानीय व्यक्ति ने इस कुंड के बारे में बताया कि सुनामी 2004 के समय इस कुंड के पानी का रंग बदल गया था व बहुत सी हलचलें हुई थी।
                       
    


भीमकुण्ड के बाद अगला पड़ाव खजुराहों..., बीच में एक जगह एक ताल के किनारे किसी समय बनाई एक सराई दिखी, कुछ देर फोटोबाजी की व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। फिर खजुराहों पहुंचे। गाईड ने सबसे पहले अपने कमाऊ व चलताऊ ज्ञान से खजुराहों के मंदिरों व मूर्तियों का अजब गजब विवरण प्रस्तुत किया। हम तो मूर्तियां ही देखते रहे। पहले से हमें कोई जानकारी इन कलाओं की आत्माओं का नहीं था। फिर भी बहुत कुछ देखने पर पता चला कि ऐसा भी हो सकता है ! इन मूर्तियों व मंदिरों पर ज्यादा कुछ कहना मेरे जैसे व्यक्ति के बस का नहीं हैं...हो सके तो एक बार जरूर जायें व देखें, बस इतना कह सकता हूँ कि हमारा इतिहास गौरवशाली व सांस्कृतिक रूप से समृद्धशाली रहा है। हम न जाने क्यों अक्सर हर मामले में पश्चिम की ओर देखते हैं ? एक पूरा दिन चाहिए खजुराहों की सुंदरता को देखने के लिए ओर शायद इससे भी ज्यादा। और मेरे जैसा व्यक्ति जब एक दिन इस सुंदरता को देख ले तो मुझे इस पर कुछ कहने व लिखने के लिए एक माह चाहिए।

खैर, दही के साथ मस्त पनीर पराठे ग्रहण करके खजुराहों की इस सुंदरता से किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रयागराज की ओर बढ़ गए। गूगल मेप के ज्ञान पर ज्यादा भरोसा करके निर्माणाधीन खराब रास्ते पर फस गए। जैसे तैसे राजनीतिक देवदूतों व गूगल को कोसते हुए रात 12 बजे 31 दिसंबर 2021 को प्रयागराज (इलाहाबाद) पहुंच ही गए। इतना प्राचीन नगर व चारों ओर कचरा व गुटखाबाजों का थूंक फेला था...! मुझे इंदौर जैसे नगर में युवा होते हुए सफाई देखकर आजकल हर नगर में यही आशा रहती है कि वहां भी साफ-सफाई हो। योगीजी को मामाजी से बहुत कुछ सिखना है और अभी यूपी में बहुत कुछ करना है। 2022 के आगमन पर प्रयागराज वाले भी फटाखे फोड़ रहे थे और हम तीन मित्र अपनी मस्ती में मस्त थे। जिस होटल में रूके थे, वहां का एक कर्मचारी कुछ देर के लिए हमारा हमजाम साथी हो गया था और कह रहा था कि योगीजी फिर आ जाऐंगे। ओर कोई उनके मुकाबले में नहीं है। बंदा अपनी जाति से हटकर राय दे रहा था....!!

2022 की पहली सुबह त्रिवेणी(संगम) पर पहुंचे। मकर संक्रांति के मेले की तैयारी शुरू हो गई है। बहुत भव्य दृश्य है गंगा, जमुना व सरस्वती जी(त्रिवेणी) का। केवट निषादराज जी की मदद से संगम तट से आगे बीच संगम नाव से पहुंचकर पांच डुबकी लगाई। फोटोबाजी चल रही है...! निषादराज जी बहुत सी बातें बता रहे थे, हमने खुशी खुशी उन्हें उनका मेहनताना दिया। आखिर में केवट निषादराज फिर कहने लगे, अगली बार ओर आईऐगा भाईलोग, तब तक योगीजी माँ गंगाजी की कृपा से घाट पर ओर अच्छी सुविधाएं कर देगें। हमने अपनी अपनी बाटल में संगम से नीर भर लिया और निषादराज जी से प्रणाम कर विदा ली।

संगम से सीधे माँ भारती के लाड़ले क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान पहुंचे। आजादी के दीवाने-रक्षक-संरक्षक के चरणों में नमन कर फोटोबाजी की। कुछ पल के लिए इस वीर की मूर्ति के सामने खड़े होने पर शरीर कापने लगा व आंखों में गलगलिया भी अई गया। वहीं कुछ युवा अपनी अपनी जाति व कौमों के हिसाब से नारे लगा रहे थे ! और फोटोबाजी कर रहे थे...! मुझसे वहां ज्यादा देर नहीं रूकाया। मन में प्रश्न आ रहे थे क्या हम इस आजादी के काबिल है ?

विगत दो वर्ष से ट्विटर से जुड़े व मिले प्रोफेसर साहब रमाकान्त राय जी से भी इलाहाबाद में मिलना हुआ। प्रोफेसर साहब के साथ भोजन किया। उन्होंने हमें बहुत सी रोचक व अच्छी बातें बताई व चर्चा की। काफी मजेदार भोजन रहा व उसके बाद प्रोफेसर साहब के स्नेह पर इलाहाबाद के प्रसिद्ध रसगुल्लों का सेवन किया। प्रोफेसर साहब बड़े मस्तमौला व हिन्दी साहित्य के विद्वान है। उनके माध्यम से भी प्रयागराज व इलाहाबाद को जाना... प्रोफेसर साहब ने अगली बार इटावा आने का वादा लेकर हमें वाराणसी के लिए विदा किया।

वाराणसी (बनारस) के ईमानदारी पूर्ण निर्माण किये चर्चित मार्ग काशी_कोरिडोर के माध्यम से गोधूलि बेला में कुछ मधुर लोकगीतों व बालीबुडीया गीतों को सुनते हुए, प्रयागराज से जल्दी ही काशी विश्वनाथ पहुंच ही गए। पर इस मनमौजी नगर में जनसंख्या वृद्धि के कारण व ट्राफिक में फसने के कारण गंगा आरती का अद्भुत नजारा नहीं देख पाये। पर जैसे तैसे अस्सी घाट पर पहुंच ही गए। यहां का भी वर्णन करना मेरे बस का नहीं है। हां फोटोबाजी सतत चल रही थी! हर घाट का अपना इतिहास रहा है। कौन नहीं आया है गंगाजी के घाट पर ? राजा हो या फिर रंक..., रात को लाईट शो के कारण दृश्य मनोरम लग रहा था। गुलाबी ठंड अलग ही मजा दे रही थी। देवि अहिल्या बाई घाट पर पहुंचकर मन फिर भावुक हो गया, हाँ अभिमान भी हुआ कि मालवा की रानी ने आज से करीब 250 वर्ष पहले काशी में मालवा से आकर सनातन धर्म व संस्कृति के लिए कितना बड़ा कार्य किया है। देवी अहिल्याबाई ने सनातन धर्म के लिए कितना कुछ किया है।

देर रात तक बनारस की गलियों में डमते(घुमते) रहे। बनारस, बनारस से वाराणसी होता जा रहा है। यहां मोदीजी ने बहुत सारा काम कराया है। निर्माण सतत चल रहा है। बनारस की ठंड भी धीमे धीमे मजा देने वाली थी...! इस प्राचीनतम नगर में घुमते हुए लगा कि यह कब काशी से बनारस व बनारस से वाराणसी हो जाता है, पता ही नहीं चलता है...! पर वाराणसी वासीयों को भी अपने इस पल-पल परिवर्तित होते धाम व तीर्थ की स्वच्छता के लिए भी जागरूक होना पड़ेगा...। तब कहीं जाकर यह नगर अपने गौरव को यथावत रख पाऐगा।

काशी में सुबह बाबा काशी विश्वनाथ भगवान के दर्शन किये। जब दर्शन कर रहा था मैंने देखा, “एक महिला के दर्शन करते हुए आंसू नहीं रूक रहे थे !” उनखे देखी के माहरी आंख में गलगलीया अई गया। बाबा बाबा हे.., बोला था बूला लूगाँ। बाबा ने बूला लिया। ओर बाबा ने बोला भी जा बेटा थारा साथे तो धर्मराज है। सब अच्छा होगा। धर्म ,आस्था व भक्ति का संगम काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में चहु ओर था। प्रांगण में फोटोबाजी प्रतिबंधित है। अवैध निर्माण व कब्जे का जाल बिछा था, वर्तमान में उसे साफ किया जा रहा है।
बनारस की गलियों में सुबह भी फोटोबाजी चल रही थी...! बनारस की चटपटी पपीता खाकर वहां से आगे बढ़े। वाराणसी से रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या जाना था, पर फिर वही जीवन की व्यस्तताओं व भागादौड़ी के कारण बात नहीं बन पाई...! घर की ओर आने का फरमान आ गया। शायद रामलला जी की अभी बुलाने की इच्छा नहीं है। दिशाधारी जयश्रीराम बोलकर आगे बढ़ गए।

एक बात तो रह ही गई, आखिर बनारस आये और यहां का पान न खायें ऐसा कैसे हो सकता है...! बनारस का पान तो खाना ही था, आधा घंटा इंतजार करने के बाद पान बना और फिर सीधे माता मैहर शारदा जी के दर्शन के लिए होंडा अमेज कार को परिपक्व कार चालक मित्र सचिन परिहार ने आगे बढ़ा दिया। गंतव्य के दौरान साधा भोजन करके बनारसी पान का आनंद लेकर व मिर्जापुर में चाय पीकर( चाय वाले से कालीन भय्या की भी बात की, बोला, बालीवुड वाले कुछ भी बना देते हैं ! फोकट में भय्या को बदनाम कर रहे हैं...!) बनारस का पान इतना अच्छा लगा कि ओर पान बना लाने थे। आगे दौड़ा भागी करते हुए शाम को, माँ शारदा मैहर माता जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रात कटनी में एक अच्छी होटल मिल गई तो वहीं रूके और 2022 के पहले सोमवार की सुबह मित्र व माड्साब संजू सर ने दमोह, भोपाल होते हुए कार को सोनकच्छ नगर के लिए दबा दिया....!!

यह यात्रा वृतांत, सिर्फ़ यात्रा वृत्तांत से थोड़ा आगे बढ़कर तीन घुमन्तुओं का आंखों देखा है। क्या कभी यात्राएं समाप्त होती हैं...?


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Thursday, January 27, 2022

शब्दों की दुनिया से आगे....

 शब्दों की दुनिया से आगे....


                
                        अमर उजाला में....


अक्सर हमारे साथ ऐसी स्थितियां आती हैं जब हम प्राकृतिक दृश्य या फिर मानव भावनाओं को शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकते। ऐसे पल मुझे बहुत बार प्रिय व मन को सुखद लगते हैं। क्योंकि कभी-कभी किसी बात को हम शब्दों के माध्यम से व्यक्त करके उस बात या भावना को सीमित कर देते हैं। शब्द बहुत सी अभिव्यक्तियों में छोटे लगते हैं। शब्दों से उस पल या दृश्य को पूर्णता नहीं मिल पाती है। उसे हमे सिर्फ़ महसूस करना चाहिए। उस पल को देखकर सिर्फ़ आनंद ही लेना चाहिए। हम बहुत बार बुद्धि का ज्यादा उपयोग करते है, जबकि अधिकांश मामलों में हृदय से ही काम चल जाता है। जहां मौन से काम चल रहा है वहां शब्द शक्ति क्यों खर्च करें ।

उदाहरण के लिए बात करें तो, बहुत बार हम एकदम से प्रकृति का कोई सुंदर दृश्य देखते हैं और भावविभोर हो जाते हैं। लेकिन उस दृश्य को शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर पाते। कभी कभी ऐसा नहीं भी करना चाहिए। क्योंकि उस दृश्य के सौंदर्य का वास्तविक आनंद उसे धैर्यपूर्वक देखने में ही निहित है। वहीं उस समय जब हमें दिल से काम लेना होता है वहां हम दिमाग(बुद्धि) को दौड़ाने की कोशिश करते है और उस सुंदर व सुखद पल के असली आनंद लेने से हम वंचित हो जाते है। हमारा मन-मस्तिष्क हमसे तर्क करने लगता है, जो कि हर परिस्थिति में सही नहीं होता है।

एक बच्चे की मधुर मुस्कान को परिभाषित करने के लिए शब्दों में ढ़ुंढ़ना मुश्किल है, उसी तरह कोई सुंदर फूल बगिया में खिला है तो उसे देखकर ही ज्यादा आनंद लिया जा सकता है, न की बुद्धि बल का उपयोग कर उसे शब्दों की सीमाओं में बांधने से। कोई अच्छी कविता, कहानी, पुस्तक, अच्छे व्यंजन का स्वाद, अपने गाँव बहुत दिन बाद जाना, दादा-दादी की बातें सुनना, अपने खेत की मेढ़ पर धीमे-धीमे टहलना, अपनी प्रिय स्मृतियों में खो जाना आदि स्तिथियों को बताने के लिए जरुरी नहीं है कि शब्द मिले ही, इन्हें अनुभव करके ही इनका महत्व समझा जाता है। वहीं जहां सहजता में शब्दों के माध्यम से बात कहीं जा सके, वहां कहना भी चाहिए। लेकिन जहां शब्द की सीमा व क्षमता समाप्त हो जाए, वहां से मौन व मधुर मुस्कान के माध्यम से ही अपनी बात अच्छे से अभिव्यक्त की जा सकती है।

यह निर्विवाद है कि शब्द की शक्ति बहुत बड़ी व अद्भुत है। पर फिर भी जब यह शक्ति हमारे पास पर्याप्त मात्रा में नहीं है या फिर इस शक्ति की आवश्यकता हर स्थिति में नहीं है तो फिर हम हर पल व बात को शब्दों के माध्यम से ही परिभाषित व कहने की क्यों कोशिश करें ? हम उसे सिर्फ़ दिल से समझ भी सकते है। आंखों व चहरे के आव-भाव से भी व्यक्त कर सकते है। शांत व धैर्यपूर्वक भी बात को समझा व समझ सकते है। क्योंकि प्रकृति व जीवन के हर दृश्य व भाव को शब्दों के माध्यम से समझना व समझाना मानव शक्ति के बहुत बार बाहर होता है। और जब हम यह कोशिश हर एक भावना व पल को व्यक्त करने में लगाते हैं तो उस भाव के वास्तविक सौंदर्य से छेड़छाड़ ही करते हैं। उसमें सफल होना मुश्किल ही होता है। ध्यान व योग के माध्यम से इस विषय में हमारे शास्त्रों में बहुत विस्तार से बताया गया है।

हम सहजता में जीवन को देखने की दृष्टि उत्पन्न करें। यह जरूरी नहीं है कि हर स्थिति के लिए शब्द जाल में उलझते रहे। अपनी बात को मौन भावों व कला के माध्यम से भी प्रेषित किया जा सकता है। वर्तमान में जिस तरह से सोशल मीडिया पर होड़ मची है कि हर बात को दुनिया को सोशल मीडिया पर उढेल कर दिखाना व फोटो-विडियों के द्वारा परोसा जा रहा है, उससे उस पल व स्थिति के सौंदर्य में कमी ही आती है। इससे उस बात में वजन भी कम ही होता है। अच्छा है कि जो भी हम सुखद व सुंदर अनुभव कर रहे है, उसे आभासी दुनिया के कचरें में हल्के व निर्थक शब्दों के माध्यम से डालने से बचें। क्योंकि कुछ ऐसा भी बचा रहना चाहिए जिसे हम उसे अपने हृदय की अंतरंग गहराई से ही महसूस कर सकें। जिससे उस पल शब्द मौन धारण करें व हृदय सबकुछ धीमे धीमे समझता रहे।



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Friday, January 21, 2022

बड़े लोगों का लोगत्व....!!

 बड़े लोगों का लोगत्व....!!

    

                                हरिभूमि में....

बड़े लोग ‛बड़े महान होते है।’ यहां मुझसे जो सिर्फ़ आयु में बड़े लोग हैं उनकी तो मैं बात नहीं कर रहा हूँ ना ही कद में जो बड़े हैं। यहां मैं उन ‛बड़े लोगों’ की चर्चा कर रहा हूँ जिनकी नजर में मैं हमेशा छोटा ही रहता हूँ। आपके साथ भी ऐसा हो सकता है या फिर हो रहा होगा। आप कितनी ही प्रगति व सफलता प्राप्त कर लें, कुछ बड़े लोगों की दृष्टि में आप छोटे ही रहेंगे। ओर न सिर्फ़ ये बड़े लोग आपको छोटा समझते हैं बल्कि वे आपको हर समय नजरअंदाज भी करेंगे।

गलती से आपने अपनी किसी उपलब्धि या खुशी को सोशल मीडिया पर साझा किया, तो बड़े लोग उस पोस्ट को नजरअंदाज करने के साथ ही, गलती से भी उसपर लाईक या कमेंट का बटन नहीं दबाएंगे। वहीं बाबू-शोना वाली पोस्ट पर दिनभर लाईक-कमेंट चलती रहती हैं। कभी गलती से बड़े लोगों के सामने चले जाओं तो वे आपको पहचानने से साफ मना कर देते हैं। भले आप उन्हें वर्षों से जानते हो और वे भी आपको जानते हो। पर जानबूझकर ऐसा व्यवहार करेंगे कि अरे, “तुम छोटे लोग, जाओ हम तुम्हें नहीं पहचानते।

‛बड़े लोग’ विभिन्न प्रकार के होते हैं। वह आपका चड्ढी मित्र भी हो सकता है ! जो अब सरकारी आदमी हो गया है। और बड़े शहर में रहने लग गया है। वहीं आपके पहले के कोई पड़ोसी भी बड़े लोग हो सकते हैं। वे अब अपने लड़के के बड़े अधिकारी बन जाने के कारण, बड़े लोगों की श्रेणी में आ गए हैं। और उन्होंने अपने लड़के की उच्च व गुप्त आय से बड़े से शहर में बड़ा सा मकान बना लिया है। इसलिए वे अपने आप को बड़ा मानते हैं। इसके अलावा भी बड़े लोग होने व “बड़ा लोगत्व” प्राप्त करने के विभिन्न प्रकार व ठीये है। बड़े लोग अक्सर आपको सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, राजनीतिक कार्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, विवाह कार्यक्रमों आदि सार्वजनिक स्थलों पर आसानी से मिल सकते हैं। यहां तक कि धार्मिक स्थल पर भी “विशेष पूजा के समय” बड़े लोगों के दर्शन आसानी से किये जा सकते हैं।

जैसे ही आपने इन बड़े लोगों के ‛लोगत्व’ से कोई छेड़छाड़ की, ये आपको अपने बड़े लोगत्व का प्रभाव दिखाने लग जाते हैं। इनके समूह द्वारा आप अच्छे भले सामान्य व्यक्ति से “छोटे लोग” घोषित कर दिये जाओगें। पीठ पीछे कहेंगे, “छोटे लोग हैं इन्हें मुँह नहीं लगाना चाहिए।” कोई बड़ी बात नहीं कि बड़े लोगों का लोगत्व आपके सहज छोटत्व को बड़ा छत-विछत कर दे।

कोई व्यक्ति आपको यदि पांच मिनट के कार्य के लिए एक घंटा प्रतिक्षा करवाये तो समझ लिजिये, वह पक्का ‛बड़ा लोगत्व’ श्रेणी वाला व्यक्ति है। जो कभी किसी लाईन में नहीं लगें, वे भी स्वाभाविक बड़े लोग ही होते हैं। आखिर ‛वे बड़े लोग कैसे जो सामान्य इंसानों जैसे रहे !’ बड़े लोग विशिष्ट होते हैं। उनके लिए सरकार से लेकर सड़क तक सब जगह विशेष मार्ग बने-बनाये होते हैं। और नहीं होगें तो वे ‛ध्वनिमत’ से बना लेते हैं। यहां तक कि बड़े लोगों के लिए हर जगह पीछे का रास्ता ही होता है। वे सामान्य लोगों की तरह कभी सामने से किसी जगह पर नहीं जाते। “बड़े लोग बैकडोर का उपयोग कर किसी भी बड़े सदन में आसानी से पहुंच जाते हैं।”
आम आदमी अक्सर विंडो पर खड़ा रहकर अपनी टिकट का इंतज़ार करता रहता है, वहीं बड़े लोगों के लोगत्व प्रभाव में बेचारी विंडो ही उनके पास चलकर आ जाती है। इन दिनों ऐसा लोगत्व सर्वत्र देखा जा सकता है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Tuesday, January 11, 2022

स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।

 स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।


    



“जो आपके पास मौलिक गुण है उससे ही जीवन में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त की जा सकती है।” स्वामी विवेकानंद विश्व के सबसे बड़े धर्म सम्मेलन ११ सितम्बर १८९३ अमेरिका में अपने आध्यात्मिक ज्ञान के बलबूते पर ही गए थे। भारत के इस क्षत्रिय सन्देश वाहक की चिंतनधारा की अमेरिका पर गहरी छाप पड़ी। इस गुण के अलावा उनके पास उस समय कुछ नहीं था। लेकिन यह शक्ति कोई साधारण नहीं थी। उनके इस गुण में भारतवर्ष की हजारों वर्षों की आध्यात्मिक ऊर्जा सिंचित थी। वे भारतीय आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत थे। वे भारत के प्राचीन साहित्य व अपने समय के यथार्थ को भलीभांति जानते थे। स्वामी विवेकानंद जी भारतवर्ष के अपने समय के ज्ञान रूपी सूर्य से कम नहीं थे। वे वेदों व प्राचीन भारतीय शास्त्रों के ज्ञाता थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उनके बतायें मार्ग व दर्शन से भारत में नवजागरण हुआ और आजतक वे युवाओं के लिए महानायक है।


स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय बताता है कि उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। आज जब हम स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस १२ जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाते हैं तो यह हमारे लिए गर्व का विषय है। एक ऐसा युवा जिसने अपने छोटे से जीवन में न सिर्फ़ भारतवर्ष को छान दिया, बल्कि विश्व में भारतवर्ष के अद्भुत धर्म शास्त्रों का परचम लहराया। सनातन हिंदू धर्म की ध्वजा को उन्होंने बड़ी ही कुशलता व श्रेष्ठता के साथ विश्व के सामने लहराया। यह सब करना इतना भी आसान नहीं था, जबकि भारत में ही उनके अनेकों दुश्मन हो गए थे। पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर अंततः विश्व की बड़ी संख्या का दिल जीत लिया।


यह सब इसलिए हुआ कि वे भारतवर्ष में बहुत घूमे साथ ही दुनिया के कितने ही देशों में लोगों के बीच जाकर अपने सच्चे सनातन धर्म की बात कहीं। वे सिर्फ़ हिमालय की कंदराओं में बैठकर ध्यान करने वाले योगी नहीं थे, वे जनमानस के बीच रहकर आध्यात्म की लौ जगाने वाले योगी थे। उन्हें पता था कि खाली पेट भजन नहीं हो सकता है।

उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस जी से सच्ची शिक्षा प्राप्त कर सबसे पहले भारत को जाना। शुरुआत में अपने गुरू की कितनी ही बातों का वे विरोध करते थे। वे इतनी आसानी से अपने गुरू की बातें भी स्वीकार नहीं करते थे। वे हर बात व तथ्य को कसौटी पर कसते हुए उसकी गहराई तक जाते थे। इसलिए ही बाद में उन्होंने कहा कि “स्वयं पर विश्वास करो।” वे हमेशा कहते थे किसी भी बात पर आंख मूंदकर भरोसा मत करो, उसे स्वयं से जानों। वे भारतीय प्राचीन ज्ञान की शक्ति की क्षमता को जान गए थे। जिसके लिए वे भारत को जानने के लिए वे भारत के कौने-कौने मे गए। आम लोगों के बीच रहे। उनके दुख दर्द को जाना। भारत की वास्तविक शक्ति व गुण को पहचाना। सैकड़ों वर्षों की दासता के बाद उन्होंने भारतीयों को जागृत किया कि अपनी मूल शक्ति आध्यात्म की ओर लौटो। वेद व प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति को पहचानों। आत्मनिर्भर बनो। उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए।



स्वामी विवेकानंद के बारे में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।" रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"


देश की उन्नति–फिर चाहे वह आर्थिक हो या आध्यात्मिक–में स्वामी विवेकानंद शिक्षा की भूमिका केन्द्रिय मानते थे। भारत तथा पश्चिम के बीच के अन्तर को वे इसी दृष्टि से वर्णित करते हुए कहते हैं, "केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ ? जवाब पाया – शिक्षा!" स्वामी विवेकानंद का विचार था कि उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकसित होना चाहिए और चरित्र की उन्नति होनी चाहिए। सन् १९०० में लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी यही बात सामने रखते हैं, "हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।"



स्वामी विवेकानन्द की वाणी में गजब का आकर्षण रहता था। वे जो भी बात कहते उसमें व्यवहारिक ज्ञान होता था। उनका कहना था:- “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।” यह बात भले साधारण लग रही हो। लेकिन इस एक बात से उन्होंने भारत में वर्षों से पनप रहे पाखंड व अनेक कुरीतियों पर आक्रमण किया था। शायद इसके ही कारण कितनी ही तथाकथित धार्मिक संस्थाएं व धर्म गुरू उनका विरोध करते रहे थे।


जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" इस बात में बहुत गहराई थी, वे जैसा कि कहते थे एक विवेकानंद से कुछ नहीं होगा। वे अपने जैसे विचारों वाले युवाओं का एक बड़ा दल संगठित करना चाहते थे। जो भारत की गरीबी को मिटाने में पूर्ण रूप से समर्पित हो। भारत की अपनी यात्राओं में उन्होंने गरीबी को देखा था। जिससे वे बहुत दुखी भी रहे। पश्चिम का वैभवशाली भौतिक वातावरण उन्हें कभी आकर्षित नहीं कर पाया, क्योंकि वे भारत भूमि के सच्चे राष्ट्र भक्त थे। इसलिए ही वर्षों से निद्रा में पड़े भारतीयों को वे जगाना चाहते थे। वे अच्छे से जानते थे कि यदि यह भारतीय जाग गया तो विश्व का कल्याण ही होगा। वे हमेशा युवाओं के लिए आदर्श रहे।


आज जब विश्व के युवाओं के सामने महामारीयों व नस्लीय हिंसाओं का मकडज़ाल फैला हुआ है तब इस स्थिति में स्वामी विवेकानंद के ही विचार युवाओं के लिए आदर्श होगें। क्योंकि जैसा स्वामी जी मानते थे, युवाओं के द्वारा ही वर्तमान व भविष्य का कल्याण होता है। युवा ही हमारे समाज की रीढ़ है। इसलिए युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात करके वर्तमान व भविष्य का निर्माण करना चाहिए। जिस तरह स्वामी विवेकानंद ने भारत की जनता में खोये हुए आत्मविश्वास को जगाया। उसी तरह आज के युवाओं को भारत के खोये गौरव को वापस प्राप्त करने के लिए भारत में ही रहकर काम करना होगा। सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए हमारे युवा भाईयों बहनों को स्वामी विवेकानंद जी के विचारों व मार्ग पर चलकर इस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। तब कहीं स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को युवा दिवस मनाना सार्थक माना जाऐगा।



भूपेन्द्र भारतीय
पूरा नाम:- भूपेन्द्रसिंह परिहार
मो. ९९२६४७६४१०
ट्विटर हैंडल-- @AdvBhupendraSP
ईमेल -- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Monday, January 10, 2022

“कड़ी निन्दा रस का सुख....!!"

 “कड़ी निन्दा रस का सुख....!!"

 

              सुबह सवेरे में .....

गांव के पेले पार रहने वाले मेरे मित्र लचकरामजी को जब भी किसी से असहमति रहती है, तो वे उस व्यक्ति की ‛कड़ी निन्दा’ करना ही सर्वोत्तम प्रतिक्रिया मानते है। लचकरामजी का कहना है कि जो सुख निंदा रस में है भला बाकी नौ रसों में से किसी एक में भी हो सकता है ? और उस पर भी कड़ी निंदा तो उनका प्रिय तीर है। बुद्धिजीवी व विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के लंबे चौड़े बौद्धिक लेखों व भाषणों के सामने लचकरामजी के ये दो शब्द अक्सर भारी पड़ते हैं। ऐसा लचकरामजी का मानना है। और उनका कड़ी निन्दा में न सिर्फ़ दृढ़ विश्वास है, पर यह उनका प्रमुख हथियार है।

इधर जब से अधिकांश लेखक आलोचना के लिए व्यंग्य की नदी में दिनरात गोते लगा रहे हैं ! और सोशल मीडिया पर अपने अपने खेमे में साहित्य साधना कर रहे हैं...! लचकरामजी का कहना है कि कोई भी बात हो उसके उत्तर में अपन तो बुराई, आलोचना, विरोध, करारा जवाब, व्यंग्य, प्रतिक्रिया, अभिव्यंजना जैसा कुछ करना नहीं जानते है। “बस उनका काम कड़ी निन्दा करना ही है।” लचकरामजी का मानना है कि आधुनिक समय में लोकतांत्रिक ढंग से वक्रोक्ति का सबसे बड़ा हथियार “कड़ी निन्दा” ही है।

सरकारें बात-बात में हर मामले में जाँच, आयोग व समिति बनाना शुरू कर देती है, जब कि कड़ी निन्दा से भी समस्या का समाधान हो सकता है। कड़ी निन्दा में वो बल है जो किसी भी विपक्षी की जमीन हिला सकती है। और कड़ी निन्दा से न सिर्फ़ विपक्षी दलों की खटिया खड़ी हो सकती है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी कड़ी निन्दा से चारों खाने चित किया जा सकता है। आगे लचकरामजी अपने इस तीर की विशेषता पर कहने लगे, एक बार रात के समय चोर उनकी भैंस चुरा ले गये। उन्होंने चहु दिशाओं को चुनौती देते हुए इस चोरी पर चोरों की “कड़ी निन्दा” की, अगले दिन उनकी भैंस उनके ग्वाड़े में आकर अपने आप खूंटे के पास आकर खड़ी हो गई और जैसे ही लचकरामजी दूध दोहने भैंस के पास बैठे, भैंस ने फट से दो समय का दूध एक बार में ही दे दिया। उनका कहना है, इसलिए वे “कड़ी निन्दा को ही सर्वोत्तम” हथियार मानते है। “भैंस तक इस तरह की प्रतिक्रिया को समझती है।”

बातचीत ओर आगे बढ़ी तो लचकरामजी चाय पर चर्चा करते हुए कड़ी निन्दा के विषय में फूर्ति से कह रहे थे, कि बताओं निन्दा कौन नहीं करता ? सास बहू की कर रही है, पत्नी पड़ोसी की पत्नी से अपने पति की कड़ी निंदा करती है, विधायक मंत्रियों की, छोटे कार्यकर्ता बड़े नेताओं की, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की, बच्चे बड़ों की, राजनीतिक मंचों से तो अक्सर कड़ी निन्दा सुनाई ही देती हैं। न्याय की मूर्तियां तक बहुत से गंभीर मामलों में कड़ी निन्दा करके पूर्ण न्याय कर कानूनी कलम तोड़ती रहती हैं...! भ्रष्टाचारी बाबू पर लगे आरोपों पर कार्यवाही के नाम पर उसके बड़े बाबू छोटे बाबू की कड़ी निंदा करते हुए कहते है, “बड़ा खऊ है यार, सारा माल अकेले ही गप कर जाता है !” बड़े साहब से इसकी कड़ी निन्दा करनी पड़ेगी। चाय पी लेने पर लचकरामजी अपने हाथों को अजीब मुद्रा में लाते हुए कहते है, आजकल तो इससे भी ज्यादा गजब हो रहा है ! जब से कोरोना आया है शिक्षक अपने छात्रों को कड़ी निन्दा करते हुए ही परीक्षा में उत्तीर्ण कर रहे हैं । बच्चे भी शिक्षा व्यवस्था की इस वैकल्पिक व्यवस्था “कड़ी निन्दा” से गदगद है।

अंत में लचकरामजी निन्दा रस से ओतप्रोत होते हुए कह रहे थे, अब बताओं जब सभी अपना-अपना काम कड़ी निन्दा करके ही चला रहे है तो हम क्यों नहीं “कड़ी निन्दा” करे ? एक दिन हमने अपने एक पुराने खटारा मित्र की आनलाईन कड़ी निन्दा कर दी तो वह बुरा मान गया। कहता फिर रहा है कि उसकी मानहानि हुई है ! अब बताओं हर घटना की इतिश्री “कड़ी निन्दा” से हो रही हैं, तो हमने क्या उसे कोई देवताओं की तरह कोई श्राप दे दिया है ?


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Wednesday, January 5, 2022

जिह्वा में फिर गुप्त रोग....!!

 जिह्वा में फिर गुप्त रोग....!!

      

                   इंदौर समाचार में.....

जैसे ही हमारे देश में चुनाव आते हैं नये-नये जुमलों, गालियों, फब्तियां, मुहावरों की बाढ़-सी आ जाती है । आम आदमी महामारी, आपदा या बाढ़ से इतना परेशान नहीं होता है, जितना इन जबानी संज्ञा-सर्वनाम-विशेषणों रूपी गाली से आहत होता है। अब नेता करे भी तो क्या करे ? “दिनोंदिन जागरूक होते मतदाता को कहीं न कहीं तो उलझाना पड़ता है।” यदि नेताजी सीधी बात व सभ्य भाषा में वोट मांगने जाए तो कोई क्यों नेताजी को विजय का आशीर्वाद दे ? हो सकता है वहीं मतदाता नेताजी को गाली देकर या दो चार जूते देकर भगा न दे ? इसलिए ही नेताओं की अपनी मर्ज़ी से या किसी गंभीर रोग के कारण ज़बान फिसल जाती हैं। अब उसमें किसी महिला को नेताजी ने आयटम, टंच माल, हरामखोर या बार बाला कह दिया तो क्या हुआ ? बेचारे नेताजी के यहां क्या पता माँ-बहन-बेटी-बहु है भी या नहीं ? हो सकता है नेताजी राजनीति में दुल्हा बनने के लिए सामाजिक जीवन में अबतक कुँवारे हो ! नेताजी तो भोले है ! उन्हें क्या पता नारी का सम्मान क्या होता है ! उन्हें तो “सत्ता सुंदरी ही चहुंओर दिखती हैं।”


पाँच साल में एक बार तो क्षेत्र में वोट मांगने जाते हैं। ओर ऊपर से यदि “उपचुनाव” आ जाए तो गलती से जबान फिसल ही जाती है। पूर्व में इस पर एक नेताजी कह भी चुके हैं कि “जवान लड़कों से गलतियां हो जाती हैं!” वैसे ही नेताजी की सदाबहार जवान जिह्वा में चुनाव के समय हार-जीत के तनाव में गुप्त रोग हो जाता हैं। वैसे भी सत्ता पाने के बाद हमारे देश में नेता बिरादरी को कहाँ आम आदमी की तरह रहना है। वे तो जीतते ही माननीय, आदरणीय, हरदिल अजीज, मंत्रीजी, बड़े भाई साहब आदि हो जाते है। यदि कुछ थोड़ी बहुत जिबान भी फिसलती है, तो लोकतंत्र में नई गालीयों, मुहावरों, जुमलों, फब्तियों का ही अविष्कार होगा ! जो कि हमारे समाज को आदर्श समाज बनाने में नेताजी का भारी योगदान ही माना जाता रहा है।

इनकी इसी आदर्श वाणी से चुनाव आचार संहिता व उसको बनाने वाले आयोग का भी पता चलता है कि वह अभी अस्तित्व में है ! वे नेताजी ही है जो आम जनता को चुनावी समय में याद दिलाते हैं कि हमारे देश में अभी संवैधानिक मर्यादाएं बची है। नेताजी इसी समय में अपनी जबान निकाल निकाल कर बताते हैं कि “हम है संविधान के रक्षक !” भले चुनाव बाद वे ही संविधान के सबसे बड़े भक्षक निकलते हो ! लोकतंत्र के मंदिर में खड़े होकर शाप तक देते हो...!

जैसे इन दिनों हर क्षेत्र में गला काट प्रतियोगिता है, वैसे ही राजनीति में भी छोटे-बड़े-छुट भैय्या टाईप के नेताओं की बाढ़ आ गई है ओर इसी राजनीतिक तनाव में कभी-कभार जमे-ठमे नेता अपना आपा खो देते हैं। नवोदित नेताओं के दवाब में ओर कुर्सी के मोह में पुराने मठाधीशों की पहले जबान फिसलती है। वे लोकतंत्र के मंदिर संसद को अपना आश्रम समझने लगते हैं और ऋषि-मुनियों जैसे एक दूसरे को शाप दे रहे हो। वैसे भी उन्होंने जनता का धन क्षेत्र के विकास के लिए तो कभी खर्च किया ही नहीं। इसलिए इस तरह के नेता ऐसे में सिर्फ़ जबानी खर्च के ही भरोसे चुनावी मैदान में उतरते है ! ओर फिर यदि किसी नेता ने किसी नेता को कोई गाली-गलौज कर भी दी है तो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि उन्हें तो गाली खाने की आदत पड़ गई है। वे तो अपने आप को भी “कुत्ता या गधा” कहते पाए गए हैं। “नेता शब्द ही गाली हो गया है।” ऐसा हमारे देश की एक बड़ी महिला नैत्री कह चुकी है। क्योंकि शायद उन्हें यह सब अनुभव लोकतांत्रिक मंदिर के स्पीकर रहते हुए बहुत बार हुआ होगा !

खैर, जबान की आदत ही फिसलने की रही है ! ओर यदि चुनाव हो तो कितने ही नेताओं की जबान में कई तरह के अलग-अलग गुप्त रोग होते रहते हैं। ओर फिर वो नेता ही क्या जिसकी जबान न चले या दौड़े, ऐसे जबानी दौड़-भाग में ही कभी कोई फिसल जाए तो किस बात की माफी ? ओर फिर हर किसी मंच पर ऐसे माफी मांगते रहें तो पांच साल तो माफी मांगने में ही निकल जाए। फिर सत्ता सुंदरी के सहारे सैर-सपाटे कौन करे ? जनता का क्या, जनता को तो ऐसे नेताओं की आदत पड़ गई है ! चुनाव में ही सही पांच साल में कम से कम नेताजी कुछ दिन तो क्षेत्र की जनता का मनोरंजन तो करते हैं। बाकि समय तो वहीं सत्ता सुंदरी के साथ....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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Friday, December 24, 2021

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!


    


          दैनिक ट्रिब्यूनल पंजाब में....

चौराहों पर आदमकद विज्ञापनों में वे जब हँसते है। तो जनता जनार्दन असमंजस में पड़ जाती हैं ! शुरुआत में कोई नहीं समझ पाता कि उनकी इस मुस्कान का राज़ क्या है ? पर वे आत्मविश्वास से लबरेज़ रहते हैं।
वे ऐसे ही सब पर हँसते है। कभी मंच से, कभी मोटरकारों में से, सफेदझक कुर्ते से निकलती हँसी, तो कभी लोकतंत्र के सभागारों में बैठे बैठे मुस्कुराते है ! दो राष्ट्र अध्यक्षों की वार्ताओं में यह हँसी विश्वबंधुत्व का मार्गप्रशस्त करती हैं ! तो कभी सौ करोड़ की वसूली के बाद भी वे ऐसे ही मंद मंद मुस्काते है। लोकतंत्र पर खतरा आने के समय यह गठबंधन के रूप में मंच से अपनी कोमल मुस्कान बिखेरते है। कोरोना-ओरोना जैसी महामारी भी इस हँसी से घबराती है ! कोरोना के नये वेरिएंट इससे घबराकर क्वारेंटाईन हो जाते हैं। शायद किसी बुद्धिजीवी ने सही ही फरमाया कि इस मदमस्त हँसी के पीछे “मत-वाली हँसी” का भारी-भरकम योगदान है।

जब से ऐसे बुद्धिजीवी महाशय ने इस हँसी के बारे में बताया मुझे इस हँसी को जानने की जिज्ञासा ओर बढ़ गई कि मतवाली हँसी के लक्षण कैसे होते है ? एक दिन मतवाली हँसी हँसने वाले से ही पुछ लिया। मेरे क्षेत्र के ही है या फिर उनके अनुसार मैं उनके चुनाव क्षेत्र का ही मतदाता हूँ ! इसलिए उन्होंने बताया कि ‛चुनाव में मतदाता से मत प्राप्त करके जो उसपर व लोकतंत्र पर पाँच वर्षों तक हँसते रहे, उसे “मत-वाला” कहते है और उसकी हँसी को “मत-वाली” हँसी कहते है !’


     

                      हरिभूमि में.....

इस मतवाली हँस पर छाती चोड़ी करते हुए वे मतवाले से होकर आगे इसका ओर विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे ! कहते हैं हमारी इस हँसी से लोकतंत्र के तीनों स्तंभ स्वस्थ रहते है। कोई महामारी इन्हें टस से मस नहीं कर सकती हैं। आगे बकते गये ;- यह जब भी किसी मंच या चुनावी रैली से जनता में प्रसारित की जाती है तो यह ‛हमारे विकास सूचकांक को बताती हैं।’ वहीं विपक्ष के गिरते ग्राफ को इंगित करती हैं। समाचार पत्रों में लाखों रुपए देकर इस हँसी को छपाना पड़ता है। शिष्टाचार के तौर पर बाजार जिसे विज्ञापन कहता है ! जिससे हमारे देश की विश्व में “हेप्पीनेश रैंक” बढ़ती है। जनता इसे विकास का पैमाना मानती हैं। और इसी आधार पर हमें चुनावों में भारीमात्रा में मत मिलते हैं। जिससे मत-वाली हँसी में दिनोंदिन वृद्धि होती रहती है और परिणाम में नागरिकों की हँसी माननीयों के खाते में आ जाती हैं।

इस छटा का चित्र तो बड़े से बड़े चित्रकार भी अपनी कृति में आजतक नहीं खिच पाये ! आज यदि महान चित्रकार राजा रवि भी जीवित होते तो इस सौम्य हँसी का हुबहू चित्र नहीं बना पाते ! यह जब भी सफेदझक परिधानों से व बड़ी बड़ी लक्झरी गाड़ियों से झांकती है, तो सीधे जनता के ह्रदय पर अंकित होती हैं। जिससे मतदाता मतदान के दिन दिनभर पंक्तियों में लोकतंत्र के तीनों खंबों के सहारे खड़े रहते हैं।

इस हँसी को संरक्षित करने के लिए बड़े बड़े बंगले बनाये जाते हैं। आचार संहिता का बंदोबस्त किया जाता हैं। बड़े बड़े भत्ते, वेतन, मान व मानदेय् दीये जाते है ! तो कभी सांसदों के शिष्ठ मंडल के सदस्य के तौर पर विदेशों में जाकर भी इस हँसी के माध्यम से शिष्ठता को बिखेरा जाता है। कभी कभी तो इस “मत-वाली हँसी” को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षण के लिए चौराहों-चबुतरों पर मूर्तियां स्थापित करके नागरिकों के अधिकारों व लोकतंत्र तक की बलि तक दी जाती हैं।


भूपेन्द्र भारतीय 
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हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...