Saturday, December 3, 2022

।। जिंदगी की बात संस्कृत के साथ ।।

 ।। जिंदगी की बात संस्कृत के साथ ।।

      



युवा लेखक व स्तंभकार शिवेश प्रताप जी की यह पुस्तक संस्कृत वांग्मय के समृद्धशाली साहित्य से परिचय करवाती है। करीब 37 पाठ में अलग अलग विषयों पर यह संग्रहणीय पुस्तक लिखी गई है। जीवन से जुड़ी कठिनाइयों के लिए संस्कृत साहित्य में उपलब्ध मोतियों को चुन-चुनकर यहां इस पुस्तक में जीवन प्रबंधन के लिए पाठकों के लिए लाया गया है।

इस पुस्तक में अभय, ईश्वर, उद्यम, एकता, कर्म, काल, गुरु महिमा, चरित्र पूजन, ज्ञान, दया, धर्म, प्रेम, परोपकार, संतोष, मन, मित्रता आदि विषयों के गहरे अर्थ संस्कृत साहित्य के माध्यम से समझाये गए हैं। लेखक ने हर पाठ के शुरुआत में सुंदर व सरल व्याख्या की व आगे श्लोकों के माध्यम से उस विषय पर व्यवहारिक प्रकाश डाला है। उदाहरण के लिए एकता का महत्व बताते हुए यहां पारिवारिक एकता का महत्व बताने के लिए एकता पाठ के अंतिम श्लोक को पढ़ा जा सकता है;-
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ।।

इसी तरह से कर्म पर मानस में तुलसीदास जी के माध्यम लेखक ने कर्म का महत्व बताया है, ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।’

इस पुस्तक में लेखक के द्वारा संस्कृत व भारतीय मानस के विशाल साहित्य से उच्च कोटि के मोतियों रूपी श्लोकों को चुन चुनकर इस पुस्तक को जीवन प्रबंध के लिए श्रेष्ठ कार्य किया गया है। कहीं से भी इस पुस्तक को पढ़ा जा सकता है। हर वाक्य व श्लोक मानवीय जीवन व संघर्ष के लिए प्रेरणादायक है। सामान्य पाठक व युवाओं को इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए व वह जब भी जीवन के संघर्षों से घीरे तो यह पुस्तक उसके लिए मददगार हो सकती है। एक संग्रहणीय पुस्तक की रचना लेखक ने की है। संस्कृत साहित्य से इतने श्लोक चुनने व उन्हें अर्थ सहित विभिन्न पाठों में सम्मिलित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे शिवेश जी ने बहुत कम आयु में पूर्ण किया है। जिससे उनकी लेखकीय क्षमता व जीवन प्रबंधन की स्पष्ट झलक दिखती हैं।
       

 

जैसा कि पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर ही पुस्तक के विषय में लिखा है कि ‛जीवन आधारित वैचारिक लेखों व संस्कृत श्लोकों द्वारा सम्यक चिंतन व उत्कृष्ट जीवन जीने की प्रेरणा देती एक बेहतरीन तथा संग्रहणीय पुस्तक’ में को अतिश्योक्ति नहीं है। यह हर युवा के लिए श्रेष्ठ पुस्तक है। आज की युवा पीढ़ी को इस पुस्तक का स्वागत करना चाहिए व पढ़ना चाहिए। आज के विश्वविद्यालयों में इस तरह की पुस्तके अधिक से अधिक मात्रा में होना चाहिए।

इस पुस्तक में लेखक संस्कृत भाषा व साहित्य का भी महत्व बता रहे है और वर्तमान जीवन के लिए उसकी उपयोगिता भी। व्यक्तित्व निर्माण के लिए आजकल कस्बों व शहरों में बड़ी बड़ी कोचिंग चल रही है और उनमें मोटी मोटी फीस ली जाती है। यहां इस पुस्तक में आप पाठ 31 में इस विषय पर गहराई से व सरलता से व्यक्तित्व निर्माण पर पढ़ सकते हैं। लेखक ने बताया है कि हमारे यहां संस्कृत भाषा में इस विषय पर हजारों वर्षों पहले बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बस इस समृद्धशाली संस्कृत साहित्य को वर्तमान युवा पीढ़ी के बीच लाना है। किसी पश्चिमी विचारधारा वाले कोचिंग संस्थान की ओर देखने की जरूरत नहीं है।

ऐसे ही रोचक व प्रेरणादायक विचार, लेख, श्लोक आदि से परिपूर्ण यह पुस्तक हर लेखक व जिज्ञासु पाठक को पढ़ना चाहिए। यह पुस्तक उपहार स्वरूप देने के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। बाकी आप जब इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो ओर भी महत्वपूर्ण व प्रेरणादायक बातें यहां पाऐंगे। व्यक्तित्व निर्माण व जीवन प्रबंधन के लिए यह पुस्तक उच्च कोटि के मानकों पर खरा उतरती है।



पुस्तक : जिंदगी की बात संस्कृत के साथ
लेखक: शिवेश प्रताप
प्रकाशक : ब्लूरोज प्रकाशन
मूल्य : 300


समीक्षक
भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Saturday, November 19, 2022

आम आदमी बनने की वंदनीय यात्रा....!!

 आम आदमी बनने की वंदनीय यात्रा....!!

       



आखिरकार लंबी उठापटक के बाद प्रशासनिक शल्यचिकित्सा हो ही गई। होना ही थी, वे एक क्षेत्र में सेवा कर-करके थक जो चुके थे। वे जब भी कही सेवा में होते हैं, उस क्षेत्र में विकास की गंगा बहा देते हैं। सौ-छल मीडिया से दौरे पर दौर करते हैं। वे यह गंगा अपने कार्यालय में बैठकर ही पूरे क्षेत्र में बहाते हैं। सरकार का इंधन जो इससे बचता है। ऐसे ही इन दिनों वे सौछल मीडिया से सेवा की गंगा बहा रहे हैं।
उनका जब भी एक क्षेत्र से दूसरे में स्थानांतरण होता है, उस क्षेत्र में स्वागत, वंदन, अभिनंदन...की होड़ लग जाती हैं। उनकी सेवा का फल बटता है। उनका नये क्षेत्र में जाने पर भी स्वागत होता है और उस क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने पर भी उनका वंदन-अभिनंदन किया जाता है। उनका एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने-आने दोनों में उनके गाजेबाजे है। वे जनता के सेवक जो ठहरे !

कभी कभी तो लगता है कि वे जीवनभर इतनी सेवा करते हैं लेकिन फिर उनके क्षेत्र में विकास दिखता ही नहीं ! वे जहां भी नई पदस्थापना पर जाते हैं वहां विकास की पूरी उम्मीद होती है लेकिन उनके जाने तक विकास दिखता ही नहीं। लगता यह विकास ही बिगड़ा हुआ है। सुधरना ही नहीं चाहता। इस विकास के लिए कोई कितनी ही मेहनत करें, यह कमबख्त जनता में टिकता ही नहीं। फिर भी जनता उनके आने-जाने दोनों समय पर स्वागत-वंदन करती हैं। क्षेत्र में आने पर पुष्प माला-जाने पर पुष्प माला । उनके आने पर भी क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ती है और उनके जाने पर भी खुशी की लहर..! वे कितने महान जन सेवक हैं। कोई इतना बड़ा सेवक कैसे हो सकता है !

वैसे उन्हें यह सेवा के दौरान बार-बार आना-जाना पसंद नहीं है। यह उनकी सेवा साधना में हर बार बाधा पहुंचाता है। वे हर सरकार की तबादला नीति के आलोचक रहे हैं। इस विषय पर कोई उनसे राय भी नहीं लेता। वे राय देने में एक्पर्ट है। पर सरकार है कि उनकी सुनती ही नहीं। वे जब भी दृणता से मन बनाकर क्षेत्र व जनता की सेवा करने पर उतारू होते हैं सरकार उनका तबादला कर देती हैं। वे फिर नये स्थान पर वंदनीय हो जाते हैं। एक बार फिर स्वागत-वंदन की बेला आ जाती हैं। वे इन सब से अभिभूत हो जाते हैं। इससे उनके शरीर में जनसेवा का करंट दौड़ता है। उनके अगले क्षेत्र में फिर विकास की उम्मीद जागनी शुरू हो जाती हैं ! उन्हें हर पदस्थापना पर विकास नजर आता है लेकिन क्षेत्र की समस्याओं की अधिकता के कारण यह सबको नजर नहीं आता।

फिर भी वे हर बार नई उम्मीद व विश्वास के भरोसे कार्यभार ग्रहण करते ही है। जनसेवा के इस भार ने उनके कंधों को बहुत क्षति पहुंचाई है। वे झुककर घुटनों तक आ गए हैं। लेकिन उन्होंने विकास की प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी है। प्रत्येक नये क्षेत्र में स्वागत-वंदन-अभिनंदन से उनके शरीर व आत्मा में जनकल्याण का लोकतांत्रिक विस्फोट होता है और वे उस क्षेत्र में फिर विकास की गंगा बहाने लगते हैं। राजधानी में फिर उनके नाम के चर्चे होते हैं। उन्हें राजधानी में सम्मान के लिए बुलाया जाता है। वहां भी गाजेबाजे के साथ उनका स्वागत, वंदन, अभिनंदन... होता है। उनका राजधानी में पहुंचना क्षेत्र के लिए शुभ माना जाता है।
एक दिन वे हमेशा के लिए राजधानी में स्थापित कर दिये जाते हैं। उनके लिए राजधानी में एक निश्चित लोकतांत्रिक मठ बना दिया जाता है। वे उस मठ में खुशी से जनसेवा की जुगाली करते हैं। अब राजधानी में ही उनका वंदन-अभिनंदन समय-समय पर होता रहता है। कभी-कभी राजधानी के मठ में बैठे-बैठे वे क्षेत्र के स्वागत-वंदन-अभिनंदन समारोहों की सुखद स्मृतियों की कमी जरूर अनुभव करते हैं।
आगे चलकर धीरे-धीरे राजधानी के ये मठ उन्हें खाने दौड़ते हैं। उनका इन मठों से मौह भंग हो जाता है। वे इनसे परेशान हो जाते हैं। उनका मन राजधानी में नहीं लगता। वे राजधानी से भागना चाहते हैं। उन्हें अपने क्षेत्रीय जनसेवा के अच्छे दिन याद आते हैं। वे फिर नये क्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं। इस बार वे एक निश्चित क्षेत्र के स्थायी निवासी बन जाते हैं। अपने जीवन के कन्याकुमारी पड़ाव पर वे जनसेवा के लिए नहीं, अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए आम आदमी बन जाते हैं....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Sunday, November 6, 2022

“सर्वर डाउन” पर लचकलाल व मेरी बातचीत....!!

 “सर्वर डाउन” पर लचकलाल व मेरी बातचीत....!!


  



ऊँचा-नीचा होना प्रकृति के प्रमुख लक्षणों में है। यह अब तक जीवों में ही था। लेकिन अब यह सेवा क्षेत्र में ज्यादा पाया जाता है। कोई चीज ऊँची जाऐगी तो उसका नीचे भी आना जरूरी है। ओर वह आऐगी ही। जो ऊपर लटका है वह नीचे भी गिरेगा ही। यह हमें न्यूटन बाबा से पहले वाले बाबा बता गए हैं। ‛अप-डाउन जीवन का नियम है। लेकिन वर्तमान में “सर्वर डाउन होना” नया नियम हो गया है।

आप सोच रहेंगे होगे, ‛यह ऊपर-नीचे की ओर जाना कौनसा नया दर्शन है ?’ यह तो सबको पता है। यह सब तो प्रतिदिन हर व्यक्ति के जीवन में चलता रहता है और चलता रहेगा। आप सही सोच रहे हैं। मैं भी मानता हूं, सही भी है। मैं आपकी भावना समझ रहा हूँ। बस इसमें मैं इतना ही जोड़ना चाहता हूँ कि ऊँचा-नीचा होना, उठना-गिरना, चढ़ना-उतरना आदि मानवीय व मशीनी क्रियाओं में अब “सर्वर डाउन होना” भी जोड़ा जाना चाहिए। पिछले एक दशक से यह मेरे दैनिक जीवन में अक्सर होता आ रहा है। मैं जानता हूँ कि आपके जीवन में भी यह हो रहा है। आप भी कभी इसका आनंद उठाते हैं और कभी इसके दुखानंद में उठट-बैठक करते रहते हैं।

वैसे यह “सर्वर डाउन होना” क्या होता है, इसे समझना इतना भी आसान नहीं है। इसको समझने के लिए सरकारी कार्यालयों, बैंकों, सायबर कैफे, आनलाईन साईट, बाबूजी की टेबल आदि के चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे में बहुत बार किसी साईट के सर्वर डाउन के चक्कर में आपका मानसिक-शारीरिक सर्वर भी डाउन हो सकता है...!
विगत दिनों मेरे परम् मित्र लचकलाल जी का सर्वर डाउन हो गया था। उनकी जैब का डाटा उड़ चुका था। वे एक सेवा कार्यालय से स्वयं भी डाउन होते हुए आ रहे थे, तभी मुझे मिल गए। मैंने पूछा, ‛क्यों लचकलाल आज तो बड़े बैठे-बैठे से लग रहे हो ?’ कहने लगा, मत पूछ मित्र;- “मैं तो इस सर्वर डाउन चल रहा है !” जवाब को सुन सुन कर परेशान हो गया हूँ। आजकल जिस भी कार्य को करो, सर्वर डाउन की समस्या सबसे पहले आ जाती है। जिस भी कार्यालय में जाओं सर्वर डाउन का हल्ला मचा हुआ है। बाबूजी की टेबल के सामने सही से खड़े ना हो, उसके पहले वे कह देते है, “अभी सर्वर डाउन चल रहा है कल आना।"
एक तरफ तो केन्द्र से लेकर पंचायत तक सरकारें 5जी गति से योजनाओं की घोषणा कर रही है, वहीं योजनाओं की फाईलें सर्वर डाउन की शिकार हो रही हैं। इससे तो पहले का सिस्टम अच्छा था। सबकुछ कागजों पर होता था। जैसा माल-वैसा काम। जो चाहो वह कागज पर चितर दो ! फाइलें जैब के डाटा से 5जी गति से आगे बढ़ती थी। कई मामलों में फाइलें कूदा दी जाती थी।
उस दिन लचकलाल बहुत चिंतित लग रहा था ! एक्टिविस्टों की भाषा शैली में बोल रहा था, “अब तो इस इंटरनेट सेवा ने मेवा भी कम कर दिया और माथापच्ची ज्यादा। लगता है, “भ्रष्टाचार, कामचोरी व लेटलतीफी का नया औजार सर्वर-डाउन हो गया है।”
लचकलाल फिर 4जी स्पीड से कह रहा था कि सोशल मीडिया साईट्स का सर्वर डाउन हो जाये तो जनता आंदोलन पर उतारू हो जाए ! वहीं हमारे जैसे लाभार्थियों की फाईलों की बात हो तो सर्वर डाउन से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता ! आजकल के स्मार्ट बाबूजी भी “सर्वर डाउन” को पेरासिटामोल की गोली की तरह उपयोग करते हैं। कोई भी सरकारी मरीज हो “सर्वर डाउन” की गोली दे दो।

लचकलाल के इस आनलाईन दुख में मैं भी कुछ देर तक शामिल रहा। हमने इस प्रोद्योगिकी औजार पर बुद्धिजीवियों जैसी लंबी बातचीत की। जिससे मेरा भी सर्वर डाउन होने लगा। मैंने अपने आप को संभाला। बातचीत को दो चाय से शांत करने की कोशिश। पर जैसे कि अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों, यूएनओ की महासभा, विधानसभा-संसद की चर्चाओं व राज्यों के सम्मेलनों के आयोजनों का निचोड़ ज्यादा कुछ नहीं निकलता। उसी तरह हमारी भी बातचीत दो चाय से आगे नहीं बढ़ पाई....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Saturday, October 22, 2022

भौंकने की कला व भूख सूचकांक....!!

 भौंकने की कला व भूख सूचकांक....!!


              



वे भौंकने में निपुण है। उनकी बिरादरी का काम ही यही है। भौंकने में वे बड़े कलाकार हैं। उन्हें इसके लिए कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उन्हें जब भी भौंकने का मौका मिलता है वह किसी भी विषय में भौंक लेते हैं। वैसे तो भौंकने व भूख में कोई ज्यादा समानता नहीं है लेकिन उनके भौंकने के पीछे किसी ना किसी तरह की भूख ही काम करती हैं। कभी पुरस्कारों की भूख, तो कभी किसी पद की भूख, वहीं अंध विरोध भौंकने का प्रमुख कारण बनता है ! उनके समय-समय पर भौंकने का चिंतन कुछ तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र व सोशल मीडिया मंच भी करते हैं। भले उनकी भौंकने की कला से उनके सगे मालिक तक प्रभावित ना हो। लेकिन वे अपनी विचारधारा की भूख के लिए भौंकना पसंद करते हैं। उन्हें सिर्फ़ भौंकने वाला श्वान कहना, श्वान संगठन व समाज का अपमान माना जाऐगा। वे इससे भी बड़े सम्मान के अधिकारी है।

वे जब भी भौंकने लगते हैं जनता को चोर-चोर सुनाई देता है। लेकिन उनके भौंकने के पीछे उनके ही बनाये मापदंड वालें वैश्विक भूख सूचकांक काम करते हैं। इधर उनके भौंकने पर जनता चोर व चोरी की चर्चा में लग जाती हैं और वे अपनी इस कला से जेब भर लेते हैं। जनता को कितने ही मंचों से उनके भौंकने की आवाज तो सुनाई देती है लेकिन वे कब भौंकने की आड़ में आंकड़ों की हेराफेरी कर देते है, बड़े-बड़े बुद्धि-प्रसादों को इसकी भनक तक नहीं लगती !

हर समय भौंकने की प्रतिभा के दम पर उनके कितने ही संगठन विश्व के कितने ही मंचों पर दमखम दिखाते रहते हैं। उनका पेट भरा हो या फिर खाली, वे हर हाल में हर विषय पर भौंकते हैं। विगत दिनों वे फिर दुनियाभर में अपने ही बनाये “ वैश्विक भूख सूचकांक” के आधार पर भौंके। उनके भौंकने से एक बार फिर सिद्ध हुआ कि उन्होंने आगे लंबे समय के लिए अपने पेट भरने के लिए तगड़ा माल लपक लिया है। भौंकने से जारी हुए आंकड़े बता रहे हैं कि एक बार फिर किसी ओर के इशारे पर भौंका जा रहा है।

वैसे उनके भौंकने की यह कला नई नहीं है। वे सदियों से भ्रामक प्रचार-प्रसार भरे तथ्यों के आधार पर संगठित रूप से भौंकते आये हैं। वे अपने पेट खाली होने पर नहीं भौंकते, “दूसरों के भरे हुए पेट पर भौंकने लगते हैं ! और उस भौंकने को नाम देते हैं- गरीबी, भूखमरी, शोषण, असहिष्णुता, अत्याचार आदि।" यह कला ही उनकी काबिलियत है। इसके ही आधार पर उनका हर एक सूचकांक आता है। वे दिनभर भौंकते हैं गरीबों के लिए और रातें गुजारते है अमीरों के साथ ! गरीबों की गरीबी के साथ फोटोशूट करवाते हैं और भौंकते हैं अपनी अमीरी बढ़ाने के लिए।

वे भौंकने के आदि हो चुके हैं। वे किसी दिन ना भौंके तो उनकी पाचन क्रिया खराब हो जाये। उनके भारी-भरकम आंकड़े उनसे ही पचाना मुश्किल हो जाए। उनका भूख सूचकांक उन्हें ही “गरीबी की रेखा” से नीचें गिरा दें। आखिर वे क्या करें ? वैश्विक स्तर पर भौंकने से ही उनकी दुकानें जो चलती हैं। अब क्या अच्छे-प्यारे पप्पी-टामी जैसा बनकर एक कोनें में पड़े रहे ? लोकतंत्र में उन्हें भौंकने का भी अधिकार नहीं है ? अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत क्या वे अब भौंक भी नहीं सकते। भौंकना उनकी कला है। अब वे भ्रामक भूख सूचकांक के दम पर भौंके भी नहीं ? उनका इस कहावत से भी कोई लेना-देना नहीं है कि ‛हाथी चले बाजार, श्वान भौंके...!’ आखिर हमें अब यह मान लेना चाहिए कि “वे भौंकते थे, भौंकते हैं और भौंकते ही रहेंगे....!!”


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Saturday, October 1, 2022

बापू की बकरी फिर खो गई....!!

 बापू की बकरी फिर खो गई....!!


अधबीच-नईदुनिया


एक बार फिर बापू की बकरी कहीं खो गई है। सारे समाज व देश में चर्चा चल पड़ी की अब क्या होगा ? बापू सुबह की प्रार्थना के समय से परेशान हैं। मीडिया में बड़ी खबर की भूमिका बन गई है। सूचना मंत्रालय में खलबली मच गई है। बापूवादी चिंतक चिंतित हो रहे हैं कि आखिर यह किसने किया होगा। कहीं किसी ने बापू के साथ मजाक तो नहीं किया ! वह बकरी बापूजी की सबसे प्रिय बकरियों मे से एक बकरी है। कल रात ही उस बकरी के दूध से बापू ने भोजन किया था। कल सांध्य प्रार्थना में वह बकरी बापू जी के साथ प्रार्थना सभा में बैठी थी।
इधर विपक्ष के नेताओं ने आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि यह सरकार का ही कोई षड्यंत्र लगता है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति फिर शुरू हो गई है।

बापू की बकरी को ढ़ूँढने के लिए एक खोजी दल का गठन किया गया। बापू के न्यास से इस दल के लिए धन आबंटित किया गया। दल के सदस्यों को चारों दिशाओं में भेजा गया। ये सदस्य हर किसी से पूछने लगे, “आपने बापू की बकरी को देखा है।” कोई कहता मैंने तो ना पहले देखा था- ना ही अब उनकी बकरी को देखा। एक गाँव वाले ने कहा कि कल सहकारिता भवन में घुसते देखा था। उसके बाद से पता नहीं किधर गई। कोई कहता, “दो पुलिस वालें एक बकरी को थाने ले गए थे। हो सकता है वह बापू की ही बकरी हो। मैं ठीक से नहीं बता सकता कि वह बापू की ही बकरी थी ! मामला पुलिस का है। ओर आप जानते है कि पुलिस के मामले में कौन हाथ डाले।"

इधर उत्तर भारत से खबर आ रही है कि कहीं बाढ़ में तो बापू की बकरी नहीं खो गई ? “बाढ़ व भ्रष्टाचार के कारण इधर प्रति वर्ष हजारों जानवरों व मनुष्य खो जाते हैं।” भला एक बकरी ऐसे में कैसे बच सकती है ! दल के एक सदस्य के पास चाँदनी चौंक से फोन आया कि कल रात को उसने अपनी गली में एक काली बकरी को घुमते देखा था। कुछ बच्चें उसे पत्थर मारकर बार बार परेशान कर रहे थे। देखने से लग रहा था, बड़ी गऊ बकरी थी। वहीं ‛बकरी खोजों दल’ के एक वरिष्ठ बापू चिंतक को वाट्सएप आया। उस वाट्सएप संदेश में भूरे रंग की एक बकरी का फोटो भी था और साथ में लिखा था, ‛क्या यही बापू की बकरी है ?’ उस बापू चिंतक ने वाट्सएप रिपलाय किया कि बापू की बकरी आगे से थोड़ी सफेद व पीछे से लाल रंग की है। वह तो बड़ी ही शांति प्रिय व समाजवादी स्वभाव की है। आपके इस फोटो वाली खुंखार जैसी बकरी नहीं है।

बापू की बकरी को खोजने के लिए ‘बकरी खोजों दल’ के कुछ सदस्यों को सुदूर दक्षिण भारत की ओर भी भेजा गया। उन्हें बापू ने पहले दक्षिण की एक-दो भाषाओं का प्रारंभिक ज्ञान भी दिया। “बापू के इस देश में अब भी, दक्षिण वालों को उत्तर वालों की-उत्तर वालों को दक्षिण की भाषा नहीं आती व पूरब वालों को पश्चिम वालों की भाषा नहीं आती। अधिकांश पढ़ें-लिखें भारतीय अब भी अंग्रेजी से ही चिपके हैं।” वहीं बकरी खोजों दल में बापू ने भाषाई प्रतिनिधित्व का पूरा ध्यान रखा है। पूरे देश के लिए बापू की बकरी चिंता का विषय बन गया है लेकिन अब भी भाषा के विषय पर हमारा एकमत होना बाकी है !

दक्षिण से खबर आई कि बापू की बकरी को कुछ मछवारों द्वारा श्रीलंका की ओर जाते देखा गया है। प्रार्थना सभा में बैठे एक भूदानी ने कहा कि बापू की बकरी को तो तैरना आता ही नहीं है। यह खबर गलत लग रही है। यह खबर जरूर किसी सूत्र के हवाले से आईं होगी। भला बापू की बकरी कभी विदेश भी जा सकती है ? जितना प्रेम बापू को अपने इस देश से है उनकी बकरी को भी अपनी मिट्टी से उतना ही प्रेम है।

कई दिनों तक बापू की बकरी को खोजा गया। चारों दिशाओं में खोजी दल बकरी की पूछताछ करता रहा। सरकार के द्वारा सीबीआई, एनआईए, ईडी, सीआईडी आदि बड़ी-बड़ी जाँच ऐजेंसियों को बकरी खोजने में लगा दिया गया। लेकिन बापू की गऊ बकरी कहीं नहीं मिली। इस चिंता में बापू का स्वास्थ्य खराब होने लगा। बापू इस स्थिति में भी नहीं रहे कि वह सरकार के खिलाफ उपवास या अनशन करे ! “विपक्ष का कहना है कि देश में बढ़ती हिंसा व फांसीवादी सरकार के कारण ही बापू की बकरी नहीं मिल रही है। इस कारण ही विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा है !” इधर नियमित प्रार्थना में भी बापू ने आना बंद कर दिया। बापूवादीयों की दिनोंदिन परेशानी बढ़ती जा रही हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर बापू की बकरी कहाँ खो गई....?



भूपेन्द्र भारतीय 
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क्रांतिदूतों के क्रांतिदूत वीर सावरकर की क्रांतिमय गाथा:- #मित्रमेला

 क्रांतिदूतों के क्रांतिदूत वीर सावरकर की क्रांतिमय गाथा:- मित्रमेला

     



स्वर्गीय श्री अटल जी ने अपनी एक कविता में वीर सावरकर के व्यक्तित्व पर कहा था कि “सावरकर माने तेज, त्याग, तप, तत्व, तर्क, तारुण्य, तीर, तलवार..।" आप जब इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो वीर सावरकर के इन सभी विशेष गुणों को आसानी से समझ जाऐंगे।
क्रांतिदूत का यह भाग-०३ मित्रमेला मुख्यतः वीर सावरकर जी पर ही केन्द्रित है। इसमें वीर सावरकर के शुरुआती जीवन से लेकर उनके विदेश में जाकर शिक्षा प्राप्त करना व उनके द्वारा लिखी गई कालजयी पुस्तक “१८५७ का स्वातंत्र्य समर" की प्रेरणा सावरकर जी को कैसे मिली, इस भाग में संक्षिप्त रूप से कथात्मक उपन्यास शैली में लिखा गया है।

पुस्तक पहले पृष्ठ से लेकर आखिरी तक पाठक को बांधकर रखने में सफल है। क्रांतिदूतों व उनके गुरूओं के आपस में संवादमय तरीकें से यहां वीर सावरकर जी के क्रांतिकारी जीवन पर प्रकाश डाला गया है। वे कौन कौन से प्रेरणास्रोत व कारण थे, जिसके कारण विनायक दामोदर सावरकर से “वीर सावरकर” बने। इन सब ऐतिहासिक संघर्षों भरें पलों को लेखक ने बेहद खूबसूरत तरीक़े से मित्रमेला भाग में लिखा है। यहां हर क्रांतिकारी घटना का स्पष्ट संदर्भ भी दिया गया है और उसे छोटे छोटे अध्यायों के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है। ये अध्याय स्वतंत्रत रूप में भी पूर्ण है। पुस्तक को किसी भी अध्याय से पढ़ा जा सकता है। मुश्किल से 120 पृष्ठ की क्रांतिदूत शृंखला का यह भाग धैर्य से सिर्फ़ तीन घंटे में पढ़ा जा सकता है।

२१ छोटे छोटे अध्यायों में इस भाग को लिखा गया है। हर अध्याय के बाद पाठक की रूची क्रांतिकारियों की जीवन गाथा को पढ़ने के लिए ओर बढ़ती जाती है। यह भाग सामान्य पाठक का इतिहास विषय में रूची पैदा करता है। वीर सावरकर को इस भाग में पढ़कर उनके जीवन के बारे में ओर जानने व पढ़ने का मन होता है। साथ ही स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक संघर्षों से पाठक यहां रूबरू होता है। कैसे महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव से लंदन तक वीर सावरकर क्रांतिदूतों की एक महान सेना खड़ी कर देते हैं। और इस सबके के पीछे उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को सुंदरता व रोचकता के साथ इस भाग में लेखक ने रचा है।

इस भाग को पढ़ते हुए पाठक वीर सावरकर के विशाल व्यक्तित्व के निर्माण के बारे में समझ पाऐगा। वीर सावरकर की जीवन गाथा वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए जानना व समझना बहुत जरुरी है, यह कार्य इस भाग को पढ़ने से आसानी से हो सकता है। वीर सावरकर के साथ ही इस भाग में श्याम जी वर्मा, चापेकर बंधु, लोकमान्य तिलक, मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल, वासुदेव, रानाडे, साठे, महादेव, बालकृष्ण आदि महान क्रांतिदूतों के जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है। कैसे वीर सावरकर की सहायता कई क्रांतिदूतों ने की व उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य पर आगे बढ़ने के लिए कौन कौन से संघर्ष व त्याग करने पड़े, यह सब आप इस भाग में संक्षिप्त रूप में पढ़ सकते हैं।

#मित्रमेला वीर सावरकर के द्वारा बनाया गया संगठन था। जो कि विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक व देशभक्ति से संबंधित आयोजन करता था। इसी के द्वारा सर्वप्रथम वीर सावरकर ने राष्ट्रवाद की अलख जगाई थी। आगे चलकर इस संगठन से कई महान क्रांतिदूत जुड़ते गए। इस भाग में यह सब रोचकता से कहा गया है। इस भाग में “अभिनय भारत संगठन" पर भी चर्चा की गई है।इसकी प्रेरणा व इसके ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। इस भाग में मुख्यतः १९०० से १९२० के स्वतंत्रता संग्राम पर चर्चा की गई है व साथ ही उस समय में अंग्रेजों की नीति व शासन पर तीखी आलोचना के माध्यम से पाठकों के सामने बहुत सी बातें यहां रखी गई है। गांधी व नेहरू की कथनी व करनी पर भी क्रांतिदूतों को उनके शिक्षक इस भाग में बहुत सी बातें स्पष्टता से बताते हैं। पर इस भाग में मुख्य नायक वीर सावरकर ही है व उनके चमत्कारी व्यक्तित्व पर बहुत ही पठनीय भाषा व भाव के साथ लिखा गया है। यहां एक अध्याय विशेष तौर पर श्याम जी वर्मा के जीवन पर व उनके क्रांतिकारी कार्यों पर प्रकाश डालता है। यहां लेखक ने श्याम जी के जीवन पर विशेष प्रकाश इसलिए भी डाला है कि वीर सावरकर के कृतित्व व व्यक्तित्व निर्माण में उनका बड़ा योगदान रहा था। लंदन में स्थिति उस समय के दो महत्वपूर्ण स्थान इंडिया हाऊस व इंडिया आफिस पर भी लेखक ने यहां रोचक बातें रखी है। और कैसे ये स्थान क्रांतिदूतों के लिए महत्वपूर्ण बने। यह सब पढ़ना सामान्य पाठक के लिए रूचिकर, स्वतंत्रता संग्राम के लिए जिज्ञासा उत्पन्न करने वाला व प्रेरणादायक है।

एक बार फिर इस शृंखला के इस भाग को पढ़कर भी इन महान क्रांतिदूतों की जीवन गाथा जानने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है। उस समय विदेश में पढ़ रहे भारतीय युवा कैसे वीर सावरकर के कहने पर अपना बना बनाया करियर छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। यह सब वर्तमान भारतीय युवा पीढ़ी को जानना जरूरी है।

“अर्धसत्य” अध्याय में गांधी व नेहरू की कथनी व करनी पर तिखी आलोचना की गई है व पाठकों के सामने तथ्यों सहित इनके कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है। उस समय श्याम जी वर्मा व वीर सावरकर का कद स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में गांधी व नेहरू से बड़ा था। बाद के इतिहासकारों ने कैसे आम जनमानस से इन महान क्रांतिदूतों को अलग कर दिया, यह समझना इस भाग को पढ़कर आसानी से समझा जा सकता है।

आखिरी के अध्यायों में वीर सावरकर को “१८५७ का स्वातंत्र्य समर" पुस्तक लिखने व समझने की प्रेरणा कैसे मिली यह पढ़ना रूचिकर व प्रेरणादायक है। साथ ही इस पुस्तक को लिखने के लिए उन्होंने तथ्यों की सत्यता के तह में जाकर कैसे एक कालजयी पुस्तक लिखी व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण व बड़े अध्याय को नष्ट होने से बचा लिया। और कितने ही क्रांतिदूतों को स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा हथियार इस पुस्तक के माध्यम से दिया। इस पुस्तक को लिखने में लंदन के इंडिया आफिस में पदस्थ मुखर्जी साहब ने सावकार जी का विशेष सहयोग किया था। इंडिया आफिस में संग्रहित दस्तावेजों के आधार पर वीर सावरकर ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक चमत्कार सा कर दिया था। “इतिहास से नया इतिहास रचने की चमत्कारी कला में वीर सावरकर सबके गुरू बनकर विश्व पटल पर छा गए थे।” अंग्रेज उनके इस चमत्कारी व्यक्तित्व से अब चीढ़ने व सर पिटने लगे थे।

अंत में इतना ही कह सकता हूँ कि क्रांतिदूत की शृंखला इस भाग को पढ़ने पर वर्तमान युवा पीढ़ी जरूर भारतीय स्वतंत्रता समर के इतिहास को विस्तार से पढ़ने के लिए प्रेरित होगी व साथ ही राष्ट्रवाद की ओर प्रेरित होगी। भाग-०३ मित्रमेला में वीर सावरकर के जीवन पर ओर ज्यादा लिखा जाता तो ठीक रहता। आशा है अगले भाग में उनपर विस्तार से लिखा जाऐगा। यह भाग इतिहास को जानने के लिए एक नवीन दस्तावेज बन सकता है। इतिहास के नये लेखक व छात्रों के लिए यह शृंखला नया दृष्टिकोण व नवीन आयाम लेकर आई है। इन सभी कारणों के आधार पर भी शृंखला के इस भाग-०३ मित्रमेला को पढ़ना उचित रहेगा।

#समीक्षा 

पुस्तक : क्रांतिदूत (भाग-३) मित्रमेला
लेखक: डॉ. मनीष श्रीवास्तव
प्रकाशक : सर्व भाषा ट्रस्ट
मूल्य : 249


समीक्षक
भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
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Saturday, July 16, 2022

माननीयों की टिप्पणी व मेरी भैंस....!!

 माननीयों की टिप्पणी व मेरी भैंस....!!



                    

                        इंदौर समाचार में.....

मुझे हमेशा यह भय रहता है कि माननीयों की किसी गैर-न्यायिक टिप्पणी से मेरी भैंस भड़क ना जाए। मेरी भैंस को भले कोई भी कैसा भी डंडा मार दे, मैं कभी यह नहीं कहता कि “मेरी भैंस को डंडा किसने मारा !" और ना ही मेरी भैंस को डंडा खाने से कुछ होता है। उसकी चमड़ी मोटी जो है। हाँ वह डंडा खाने से दूध पतला या फिर ना भी दे। आखिर इससे मुझे जरूर भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। जो कि माननीयों की आवारा टिप्पणियों के कारण होता है। ऐसी ही टिप्पणियों के कारण इन दिनों कई भैंस के खूँटों का माहौल गर्म हैं। वहीं मेरी आर्थिक वृद्धि रूकी हुई है।

जब भी खूँटों की बात आती है, माननीयों की टिप्पणियां आना शुरू हो जाती हैं। कौन किस खूँटे से बँधा है इन दिनों बुद्धिजीवी वर्ग में इस बात ने गंभीर चर्चा का रूप धारण कर लिया है। वहीं मुझे मेरी भैंस की चिंता है। वह स्वतः संज्ञान लेकर कहीं नाराज हो गई तो मेरे घर के वरिष्ठ नेता नाराज हो जाऐंगे। वैसे तो मेरी भैंस बड़ी शांत प्रवृत्ति की है। लेकिन जब भी कोई माननीय अपने वातानुकूलित कमरे में बैठकर बेवजह कोई टिका-टिप्पणी करते है तो वह आहत ही नहीं नाराज होकर अपने खूँटे को उखाड़ते हुए कूदाफांदी करने लगती हैं। आखिर मेरी भैंस की भी भावना है। उसे भी आहत होने का संवैधानिक अधिकार है। वह भी ट्वीट कर सकती है।आखिर वह भी इस सहिष्णु समाज को दूध व गोबर देती है। उसे भी अभिव्यक्ति का अधिकार है। उसे भी रेंकने का मौलिक अधिकार है। फिर “इस समाज को क्या अधिकार है कि वह मेरी भैंस की भावनाएं व उसके खूँटे से खिलवाड़ करें !”

माननीयों को समझना चाहिए कि इंटरनेट के इस युग में सबको सबकुछ पता चल जाता है। अब किसी भी तरह की टिप्पणी करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए।तथ्यों को पहले से देख लेना चाहिए। ऐसी वैसी टिप्पणी से कौनसी भैंस कब किस खूँटे से उछल-कूद कर दे, इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्या माननीय चाय नहीं पीते ! जो उन्हें भैंसों की भावनाओं का ध्यान नहीं रहा। और माननीय भले चाय नहीं पीते हो, लेकिन मैं तो चाय पीता हूँ। उन्हें मेरे चाय-पानी को प्रभावित करने का किसने अधिकार दिया ?
मेरी भैंस किसी भी टिप्पणी से बहुत जल्दी भड़क जाती है। और वह जैसे ही भड़कती है। अपने खूँटे समेत कूद जाती है। अब एक बार मेरी भैंस कूद गई तो फिर उसे खूँटे पर लाना मुश्किल होता है। वह फिर समय पर ना तो दूध देती हैं और ना ही खूँटे पर गोबर। अब मेरी इस गंभीर समस्या को माननीय कैसे समझेंगे ? माननीयों को इस राष्ट्रीय चुनौती व क्षति से कौन अवगत कराये। इसके लिए उनके सामने कौन जनहित याचिका लगाऐगा ? मेरी भैंस की भावनाओं को क्षति पहुंचाने व मेरी भैंस के दूध का नुकसान पहुंचाने के लिए माननीय क्षतिपूर्ति का प्रबंध कैसे व कहाँ से करेंगे ?

आगे से यही उचित रहेंगा कि माननीयों को सोच समझकर व परिस्थितियों को देख-परखकर ही किसी भी तरह की वैधानिक टिप्पणी करना चाहिए। वैसे टिप्पणी करने का काम तो स्वतंत्र लेखकों का रहता है। ना जाने कब से माननीयों को यह लत लग गई है ! उन्हें भैंसों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें एक बार जरूर भैंस संहिता का अध्ययन करना चाहिए। भैंसे वैसे भी स्वभाव से गर्म होती हैं। उनके दूध में व्यापारी इसलिए ही पानी मिलाते हैं कि उन्हें पानी में रहना पसंद है। ऐसे गर्म माहौल में माननीयों की टिप्पणी उनकी भावनाओं को ओर भड़का सकती हैं। लोकतांत्रिक बाड़े में हर भैंस-भैंसे का अपना संवैधानिक अधिकार है। बाड़े में वातानुकूलित माहौल नहीं रहता है लेकिन माननीयों के कक्ष वातानुकूलित होते हैं। उन्हें ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। उनकी टिप्पणी से किसी भी बाड़े में कभी भी बात का बतंगड़ बन सकता है। कोई भी भैंस कब भी भड़क सकती हैं। वे आपस में भीड़ सकती हैं। कभी भी खूँटा उखाड़कर बाहर का माहौल खराब कर सकती हैं। भीड़ में गलती से भी कोई भैंसा यदि निकल गया तो फिर बड़ी क्षति हो सकती हैं। इसलिए माननीयों को अपनी टिप्पणियों पर नियत्रंण रखना चाहिए। क्योंकि भीड़ का विवेक नहीं होता। पर साहित्यिक बुद्धिजीवीयों का ऐसा मानना है कि माननीय विवेकशील होते हैं ! उन्हें अपने विवेक का उपयोग करते हुए किसी भी तरह की टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

आखिर में मेरा माननीयों से विशेष निवेदन है कि वे मेरी भैंस की भावनाओं का विशेष ध्यान रखें। क्योंकि वह एक बार भड़क गई तो फिर मेरा चाय-पानी बंद हो जाता हैं। किसी भी अनुचित टिप्पणी सुनने पर उसे भी स्वतः संज्ञान लेकर कूदने-फांदने की आदत है। वहीं माननीयों की टिप्पणी सुनते ही वह लात भी मार सकती हैं। उसकी लातें बड़ी जोर की लगती हैं। मेरी भैंस फिर ना भड़के इसलिए माननीयों को ऐसी भड़काऊ टिप्पणियों से बचना चाहिए....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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