Sunday, February 12, 2023

बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

 बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

       



अक्सर देखा गया है कि बसंत व बजट एक साथ आते हैं। वैसे इन दोनों में ज्यादा कोई समानता नहीं है फिर भी इनकी वाहवाही में बहुत-सी समानताएं देखी जा सकती हैं। इसी कारण बसंत व बजट के राग दरबारी हर चौराहे पर देखें जा सकते हैं। कोई कहता है वाह ! क्या मौसम आया है, तो वहीं यह कहने वाले भी मिल जाऐंगे कि;- “एक तो मौसम बहुत खराब है और ऊपर से ऑफिस जाना है !” वहीं कुछ अर्थशास्त्री बजट को आंकड़ों की बाजीगरी बता कर मुँह फुला रहे हैं। ऐसे में जिसके पास कोई बजट नहीं, वह बसंत से क्या कहें ? उसका कैसा बसंत-बहार...! बिन बजट बसंत सुन बटा सन्नाटा।

फिर भी बहुत से राग दरबारी बजट पर बड़े बड़े स्तंभ लिख रहे हैं। मीडिया को बाईट दे रहे हैं। बजट की दो सप्ताह पहले से समीक्षा करना शुरू कर दी है। कोई कह रहा, यह बजट आम आदमी के लिए रामबाण सिद्ध होगा। भविष्य के लिए यह बजट अमृत के समान सिद्ध होगा। हार्वर्ड में बैठे लाल बादशाह अर्थशास्त्री बजट को आम आदमी के खिलाफ बता रहे हैं। ऐसे में बजट बाबू है कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है। वह अपनी ही धुन में घटते-बढ़ते ही जा रहे है।
जिसे दो समय की रोटी की भी चिंता नहीं है, जो हर बात में कबीरा खड़ा बाजार धुन बजाने लग जाते है। पत्रकार उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि इस बार बजट आपके लिए कैसा रहा ! आप इसे कितने नंबर देने वाले हैं ? जो कभी किसी परीक्षा में कभी अच्छे नंबर नहीं लाया, उससे बजट के लिए नंबर मांगे जा रहे हैं। बजट यह सब देखकर घाटे वाली हँसी में हँस रहा है। उसकी मुस्कान के सूचकांक कुछ ओर ही आंकड़े बता रहे हैं। इस बजट-बसंत के राग पर हर माली एक बार फिर मंद-मंद लोकतांत्रिक लहजे में हँस रहा है।
            


एक स्थिति यह भी है कि बजट की अफरातफरी में बसंत ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा है। बसंत सप्ताह बीतने को है पर बहार के अते-पते नहीं है। राग दरबारी अपने-अपने दिन मना रहे हैं। सबने अपने-अपने बजट का जुगाड़ पहले से ही कर रखा था। बसंत एक बार फिर बजट का कर्जदार हो गया। कहाँ तो बुद्धिजीवीयों को बजट में दो जून की रोटी तक नजर नहीं आ रही है ! वहीं बसंत के माध्यम से राग दरबारियों ने बजट की चर्चा में चार चाँद लगा दिये। हर बार की तरह इस बार भी बसंत सप्ताह में छोटे से बड़े नगर तक बाजार गुलज़ार है। सात दिनों की इस बहार में बाजार उछाले मार रहा है। सौछल मीडिया पर 70 साल से ऊपर वाले राग दरबारी भी वेलेंटाइन डे के संदेश उछाल रहे हैं। बसंत बहार के पवाड़े गा रहे हैं। “संसद भवन बजट-बजट के शोर से गुंजायमान हो रही है और उसके बाहर लोकतंत्र बसंत से कलियां चुरा रहा है। एक तरफ आलोचनाओं का गुलाल है। तो दूसरी ओर गंगा-जमुनी रंग से भरी प्रेम की पिचकारियां छोड़ी जा रही है।”

‛कलियों के खिलने’ व ‛संसद में हलवा’ बनाने वाले इस कोमल काल में ; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे राग दरबारी काल में क्या करूं ? मैं अपने मन को सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों के माध्यम से समझाने का भी प्रयास रहा हूँ ;-
“खिलतीं मधु की नव कलियाँ, खिल रे, खिल रे मेरे मन!
नव सुखमा की पंखड़ियाँ, फैला, फैला परिमल-घन!”

लेकिन वहीं सब कह रहे हैं कि ये दोनों अपनी चरम सीमा पर है। लेकिन ना मैं बजट को पढ़-समझ पा रहा हूँ और ना ही बसंत की बहारों का आनंद ले पा रहा हूँ। बजट के आंकड़े मेरे लिए हमेशा से एक कठिन रसायन शास्त्र की तरह रहे हैं और वहीं बसंत का रसायन जब तक मेरे समझ में आता है, कमबख़्त यह बसंत-बहार मेरे हाथ से निकल जाता है ! लगता है इसबार भी आभासी बजट व बसंत के राग दरबारी रंगों से ही काम चलाना होगा....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Wednesday, January 18, 2023

भोलाराम के आंगन में जिंगल बेल्स....!!

 भोलाराम के आंगन में जिंगल बेल्स....!!

             



भोलाराम भोला नहीं था। लेकिन उसके देशीपन व गरीबी के कारण आयातित विचारधारा ने उसे अपना शिकार बनाया। भोलाराम को पहले धीरे से पुचकारा गया। बड़े सपने दिखाये गये। अच्छे कपड़े पहनने को दिये गए। नये पकवान खिलाये गए। जमीन से जुड़े भोलाराम को टेबल-कुर्सी पर बैठाकर विदेशी चम्मचों के द्वारा खाना खिलाना सिखाया गया। उसे अजीबोगरीब प्रार्थनाएं रटाई गई। भोलाराम के आंगन में लोकनृत्य के बजाय विदेशी गाने बजने लगे।

यह सब देखकर पहले पहल भोलाराम खुश था। उसे लगा, यह सब तो उसके भले के लिए हो रहा है ! उसे लगा कोई अवतार आया है, कोई नया देवता है। जो उसकी सूध ले रहा है। कोई उसका भला करना चाहता है। उसे अच्छे दिन के सपने दिखाये गए। उसे लगा उसके अच्छे दिन आ गए। खूब रेवड़ियां बाटी जा रही थी। उसके बाल-बच्चे खुशी से चहकने लगें। कुछ दिनों बाद ही पिता से बच्चे प्रार्थना सभा में चलने की जिद करने लगे। पिता प्रार्थना सभा की कहानी नहीं समझ पा रहे थे ! भोजन, कपड़े, खिलौने, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा आदि के बदले प्रार्थना सभा में चलना ! आखिर इस प्रार्थना सभा में क्या होता है ? इसपर इतना बल क्यों ? हम तो माँ शक्ति की पूजा अर्चना करते हैं। प्रतिदिन मंदिर में माथा टेकने जाते हैं। महादेव के भक्त हैं। हमारे यहां तो खेड़े-खेड़े रक्षक, फिर यह अलग से कैसी प्रार्थना करना होगी ?

भोलाराम यह सब, कुछ दिनों से देख ही रहा था। उसे यह सब समझ नहीं आ रहा था। प्रार्थना में जाने पर उसे बहुत सी बातें छोड़ने व बहुत सी नई बातें अपनाने के लिए प्रार्थना में उपदेश दिया जाने लगा। उसकी पत्नी को नया मकान देने का लालच दिया जाने लगा। बच्चों को अच्छे स्कूल व कपड़ों का वादा किया गया। उन्हें नौकरी तक का लालच दिया गया। हर छः माह में भोलाराम के बच्चों के लिए अच्छे अच्छे कपड़े व खाने की चीजें उपहार स्वरूप दी जाती थी। उसकी पत्नी को सिलाई मशीन दी गई व मशीन चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। भोलाराम से प्रार्थना दल के सदस्यों के द्वारा कहाँ जाने लगा कि प्रतिदिन जंगल में गाय-बकरियों को क्यों ले जाते हो ! अपना जीवन जंगल में क्यों बर्बाद कर रहे हो। इस झोपड़ी वाले छोटे से घर में क्या रखा है। हम तुम्हें बड़ा मकान देगें। तुम्हारे इस थोड़े से जंगल-जमीन में क्या रखा है ? हमारे साथ चलों, शहर में हम तुम्हें अच्छी नौकरी देगें। साथ ही रहने का घर व तुम्हारे बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा भी देगें। उससे उन्हें नौकरी मिलेगी !

भोलाराम के परिवार के सदस्यों को यह सब अच्छा लगने लगा। बच्चें व उसकी पत्नी इन सब उपहारों के मोह में आकर अब भोलाराम से यह सब मानने की जिद करने लगें। भोलाराम यह सब स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह अपने जंगल-जमीन व गांव से जुड़ा रहना चाहता था। उसे इन सब बातों पर विश्वास नहीं था। भोलाराम को इस लोकलुभावन उपहार में किसी षड्यंत्र की शंका लग रही थी। पर उसे बच्चों व पत्नी की जीद्द के आगे झुकना पड़ा। वह ना चाहकर भी प्रार्थना की माया से मोहित हो ही गया। भोलाराम अपना गांव, जंगल, जमीन, पशुधन व ग्राम्य जीवन को प्रार्थना सभा के हाथों में छोड़कर शहर की ओर बढ़ गया...!

भोलाराम को शहर में मिले नये मकान, अच्छे कपड़ें व बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के बदले अपना सबकुछ छोड़ना पड़ा। गांव में वह सब कुछ छोड़ना पड़ा जो उसके पीढ़ियों के परिश्रम से खड़ा किया गया था। बच्चे अंग्रेजी स्कूल में प्रार्थना करने जाते। भोलाराम को हर दिन प्रार्थना के चमत्कार बताते। पत्नी पर भी प्रार्थना का चमत्कार होने लगा था। यह सब देख-सुन कर भी भोलाराम का मन शहर में नहीं लग रहा था। वह एक बार अपने गांव वाले घर पर जाना चाहता था। एक दिन समय मिलते ही वह अपने गांव की ओर दौड़ा। वह गांव वाले घर पहुंचता है। वह जैसे ही उस घर के आंगन में जाता है। वह देखता है उसके आंगन में प्रार्थना सभा वालों की जिंगल बेल्स लटकी थी। उनसे अजीबोगरीब आवाज़ें आ रही थी। भोलाराम उन घंटियों की आवाज़ नहीं सुन सका। उस आवाज़ में उसे एक अजीब सी चित्कार सुनाई दी ! वह उलटे पांव वहां से शहर की ओर लौट आया। मन में एक भारीपन के साथ आज वह अपने शहर वाले मकान में बैठा था। शाम होते ही भोलाराम के बच्चें उसके पास आये और उसके हाथ में प्रार्थना की पुस्तक रख दी। और उसके बच्चें कहने लगे कि पापा आज हम साथ में इस पुस्तक से प्रभु की प्रार्थना करते हैं ! शाम को प्रार्थना सभा में चलना....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Saturday, January 7, 2023

भय्या रिचार्ज होकर फिर आये.....!!

 भय्या रिचार्ज होकर फिर आये.....!!

             



आखिर भय्या एक लंबी यात्रा से रिचार्ज होकर फिर नई यात्रा के लिए आ गए। इस लंबी यात्रा में भय्या को कई नये अनुभव हुए। भय्या ने पहली बार अपने क्षेत्र से निकलकर दूसरे क्षेत्र का विकास देखा। इस यात्रा में भय्या ने पहली बार जाना कि उन्हें तो बहुत कुछ पता नहीं था। उन्हें तो अब भी बहुत कुछ जानना है। उनके सत्ता में ना होने पर भी विकास हो रहा है। विकास अपनी यात्रा में दौड़ लगा रहा है।
एक लंबी युवा उम्र के बाद भी भय्या को अभी ओर युवा रहना है। दक्षिण भारत की अपनी इस यात्रा में भय्या एक जोड़ी कपड़ें में यात्रा पूर्ण करते है। उनका अपना एक ड्रेस कोड है। वे अपनी इस यात्रा को यात्रा नहीं, मिशन बताते है। वे यात्रा में हर एक सहयात्री से गले मिल रहे हैं और वहीं इस मेलजोल भरी मोहब्बत को मिडिया गले पड़ना बता रहा है !

अपनी यात्रा में भय्या हर पल जोर-जोर से हाथ हिलाते चलते हैं। बीच-बीच में वे दौड़ने का भी अभ्यास करते हुए दिख जाते है। उनकी यात्रा में हर पड़ाव पर राजनीतिक प्रवासी पक्षी भी देखे जा सकते हैं। भय्या उनसे गले पड़ते हुए गंभीर हो कर बुद्धिजीवीयों जैसी बातें करते-करते चलते है। भय्या की यात्रा में बड़े-बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियां भी देखे जा सकते है। भय्या ने यात्रा के लिए अपना विशेष रुप बनाया है। वामपंथियों जैसी खिचड़ी दाढ़ी का विशेष सृजन किया है। वे यात्रा में बुद्धिजीवीयों जैसा अवतार लिये चलते है। चाचा नेहरू की तरह वे बच्चों से बात करते है। उन्हें यात्रा में शामिल करते है। उनके साथ सड़क पर फुटबॉल खेलते है। उन्हें गोद में लेते है। जैसे बच्चों में एक बच्चा खूब रंग जमाता है। यात्रा में कभी भावुकता , तो कभी करूणा का बघार लगता है। यह सब समाचार चैनल वाले रूक-रूक कर बताते हैं। भय्या की यात्रा में बहुत कुछ जोड़-घटाव चल रहा है...!

यात्रा के माध्यम से कुछ जोड़ने की बात की जाती है ! लेकिन पीछे-पीछे भय्या का दल टुटता जा रहा है। कई का दिल भी। हो सकता है इससे उनके मन में खरोंच भी आई हो। भय्या को इसका कोई मलाल नहीं है। वे अपने मिशन पर सतत आगे बढ़ते जा रहे है। वे एक जोड़ी कपड़े में मोहब्बत की बात करते है। उनका कहना है कि नफरत के माहौल में वे मोहब्बत की यात्रा पर है। “भय्या इस यात्रा के माध्यम से राजनीति में रिचार्ज होना चाहते है। लेकिन वे अपने ही बयानों से बार-बार डिस्चार्ज हो जाते है।” उनकी राजनीतिक यात्रा को रिचार्ज करने में अब तक कितनी ही बेटरीयां डिस्चार्ज हो गई हैं।

भय्या अपनी लंबी यात्रा के बाद कुछ दिन अवकाश भी लेते है। अवकाश लेने की भय्या की यह बहुत पुरानी आदत है। पहले बच्चे गर्मियों की छुट्टी में दादी-नानी के यहां जाते थे । लेकिन भय्या अवकाश लेकर सिर्फ़ अपनी नानी के पास अवकाश का आनंद लेने जाते है। उनके इस राजनीतिक अवकाश पर कई यात्रीयों की राजनीति अवकाश पर चली जाती हैं। उनकी कक्षा का परिणाम बिगड़ जाता है, पर उन्हें अपनी यात्रा की ही चिंता होती है।
कितने ही राजनीतिक प्रवासी नेताओं की राजनीति बिगड़ जाती हैं। लेकिन जैसे ही भय्या अवकाश से रिचार्ज होकर आते है। यात्रा में जोश आ जाता है। फिर तो वे सर्दी-गर्मी-बरसात सबसे भीड़ जाते है। उनके सामने कोई नहीं ठहरता है। वे मोहब्बत का भाषण देते है। फिर गले मिलने व प्यार लुटाने की यात्रा आगे बढ़ती है। फिर नये-नये राजनीतिक प्रवासी पक्षी यात्रा में शामिल होने लगते हैं। अपने मूल प्रवास से उनके द्वारा लाये गए वैचारिक खाद-पानी का असर यात्रा में दिखता है। इस सर्दी में भय्या अपनी यात्रा में राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राजनीतिक गर्मी का आह्वान करते है। लेकिन भय्या की यात्रा के भूतकाल के बर्फीले तूफान यात्रा में गर्मी का माहौल बनना मुश्किल लगता है। लगता है भय्या के लिए उत्तर से दक्षिण की ओर यात्रा करना ही लिखा है। देखते हैं यह यात्रा कब तक चलती है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, December 24, 2022

कबीरा खड़ा बाजार में और हाथ में मोबाइल....!!

 कबीरा खड़ा बाजार में और हाथ में मोबाइल....!!

     



वर्तमान का सबसे बड़ा शस्त्र मोबाइल बन गया है। यह मैं ही नहीं, पूरी दुनिया जानती हैं। यहां तक कि बच्चें-बच्चें को पता है। वैसे यह शस्त्र, शास्त्र के रूप में भी उपयोग हो सकता है और होता भी है। लेकिन इसके लिए कबीरा का मुड होना चाहिए। कबीरा का मुड नहीं हुआ तो वह उसके लिए एक खिलौने के अलावा कुछ नहीं। वह बस दिनभर इससे खेलता ही रहता है।

आज बाजार कहाँ नहीं है ? हर तरफ बाजार जमा है। और जहाँ बाजार है कबीरा वहीं खड़ा है। वास्तव में कबीरा के मोबाइल में ही बाजार घुस गया है। अब मोबाइल मतलब बाजार ही होता है। सुबह की महत्वपूर्ण जरूरत टूथपेस्ट से लेकर रात तक की सभी जरूरतों के लिए कबीरा के हाथ में बाजार है। इस बाजार के बीचोंबीच कबीरा खड़ा है। वह बाजार में क्यों खड़ा है यह सिर्फ़ कबीरा को ही पता है। यहां तक कि बाजार कबीरा के मोबाइल में घुस गया है या फिर कबीरा बाजार में घुसा है यह शोध ही नहीं, रहस्य का विषय बनता जा रहा है ! वहीं कबीरा मानता है कि बाजार को वह अपनी जेब में लेकर चलता है। जब चाहे तब कबीरा बाजार को अपनी ऊंगलियों पर नचा सकता है। बाजार के तमाम मंचों के लिए कबीरा बीच बाजार हाथ में मोबाइल लिये खड़ा है।

कबीरा बाजार में खड़ा है यह आश्चर्य का विषय नहीं है। वह तो लंबे समय से खड़ा है लेकिन वह अब हाथ में मोबाइल लिये खड़ा है। यह विचार करने का विषय है। उसके हाथ में मोबाइल है। लेकिन लगता है वह दुनिया मुठ्ठी में करके के खड़ा है। बाजार के हर भाव का निर्णय कबीरा के हाथ में है। कानून के हाथ से लंबा हाथ कबीरा का हो गया है। कबीरा बाजार को कहीं से भी छू सकता है और गुलज़ार कर सकता है। सेंसेक्स का उतार चढ़ाव हो या फिर किसी विरोध के लिए ट्विटर ट्रेंड हो ! कबीरा खड़े-खड़े बाजार को धड़ाम कर सकता है।
         
      


कबीरा के हाथ अब सृजन व विध्वंस दोनों के लिए उतारूं रहते हैं। कबीरा का यह शस्त्र परमाणु हथियारों से भी खतरनाक होता जा रहा है। लोकतंत्र तक कबीरा के शस्त्र से डरता है। कबीरा बाजार में खड़े-खड़े किसी भी सरकार को बना-बिगाड़ सकता है। सबको लगता है कि कबीरा सिर्फ़ खड़ा है। लेकिन वह मोबाइल में बहुत कुछ चला व बना रहा है। वह खड़े -खड़े चलता है। वह अपने इस शस्त्र से दुनिया को कभी बनाता है तो कभी मिटाने पर भी तुल जाता है। वह मोबाइल चलाते-चलाते दुनिया चलाने सीख रहा है। अब समझ आया कि “कर लो दुनिया मुठ्ठी में, विज्ञापन उसके लिए ही बना था।"

पहले कबीरा जीवन मूल्य बुनने का कार्य करता था। वहीं आज का कबीरा रील-वीडियो बुनता है। आज कबीर वाणी, कबीरा स्वयं सुनता है। अपने कानों में अपने मोबाइल का ही राग-मोबाईली संगीत सुनना पसंद करता है। उसे किसी से कोई लेना देना नहीं है। उसके एक तरफ घर है और दूसरी ओर घाट। वह घर व घाट दोनों पर खड़ा है। वह बाजार में खड़े-खड़े मस्त ऊंगलियां चलाता है। भले कबीरा कहीं भी खड़ा हो और कोई भी उसके आसपास से आया-गया हो, वह अपने मोबाइल के साथ ध्यान अवस्था में बीच बाजार में खड़े साधना कर रहा है।


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, December 10, 2022

ईवीएम की प्रचंड जीत....!!

 ईवीएम की प्रचंड जीत....!!

      



आखिर ईवीएम की प्रचंड जीत का सपना सच हो ही गया। उसने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास जीत ही लिया। इस बेचारी ईवीएम को क्या नहीं कहा गया ? उसे क्या-क्या नहीं सहना पड़ा ! विगत दो दशकों से उसे मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम किया जा रहा था। जिस तरह नयी नयी बहु के हर काम में मीनमेख निकाला जाता है विगत एक दशक से ईवीएम प्रताड़ित हो रही थी। आखिर उसके सास-ससुर लोकतंत्र की मेहरबानी उसपर भी हो ही गई और उसे जनतंत्र में जीत का स्वाद चखने का अवसर मिल गया। लंबी बदनामी के बाद ईवीएम को किसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप का सामना नहीं करना पड़ा।

इस बार के तीन राज्यों के चुनावी परिणामों से लोकतंत्र के तीनों स्तंभ भी चैन की साँस ले रहे है। लोकतंत्र भी इस बार बदनाम होने से बच गया। असहिष्णुता व ध्रुवीकरण जैसे राग दरबारी राग किसी टीवी बहस में सुनने को नहीं मिले। हर दल अपनी अपनी जीत में मगन है। मतदाता भी तन कर कह रहा है कि देखा कैसे सबको खुश कर दिया ! ‛भले बाद में ये तीनों मिलकर उसपर हँस रहे होगें।’ लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुत कम बार ऐसा हुआ कि मतदाताओं ने भी चमत्कार किया हो ओर वह भी लोकतांत्रिक पद्धति द्वारा।
 
   


लेकिन कुछ भी कहो इन चुनावों में ईवीएम की प्रचंड जीत तो हुई है। कुछ दलों द्वारा उसकी विश्वनीयता लंबे समय से संदिग्ध माना जा रही थी। जब से ईवीएम से चुनाव हो रहे है, हारने वाला अपनी हार का ठिकरा ईवीएम पर ही फोड़ता आ रहा है। पहली बार किसी भी पार्टी प्रवक्ता के मुँह से एक गलत शब्द ईवीएम के चरित्र पर नहीं निकला। ईवीएम लंबी उम्र के बाद अब चैन की साँस लेकर अपने आप पर गर्व कर सकती है। लगता है वह जवानी की दहलीज पर पहुंच गई है।
ऐसा ही चलता रहा तो हो सकता है कि आगे चलकर साहित्यिक व सहकारिता संगठनों के चुनाव भी ईवीएम से हो। पुरस्कारों का चयन भी ईवीएम के माध्यम से होना शुरू हो जाये और पुरस्कारों की रेवड़ी बटना बंद हो।

अब ईवीएम हमारे लोकतंत्र में सुरक्षित है। आगे किसी भी तरह के चुनाव करवाने के लिए वह प्रथम पसंद मानी जाऐगी। शहरों के महिला क्लबों के चुनाव के लिए भी अब ईवीएम पर भरोसा किया जा सकता है। कोई बड़ी बात नहीं कि आगे चलकर वर-वधु के जोड़े बनाने का भार भी ईवीएम के कंधों पर आ जाए।

ईवीएम अब सेटिंग का विषय नहीं रहेगी। उसे कोई शक की नजर से भी नहीं देखेगा। हर मतदाता पूरे आत्मविश्वास व बगैर किसी लघु-दीर्घ शंका के ईवीएम का बटन दबाने घर-घर से निकलेगा। लोकतंत्र की समृद्धि के लिए घर-घर से ज्यादा से ज्यादा मतदाता निकलेगें। ईवीएम के लिए कितना बड़ा गौरवमयी समय रहेगा।
अब तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वच्छता सूची में ईवीएम का नंबर भी स्वर्ण अक्षरों से लिखा जा सकता है। एग्जिट पोल वाले भी ईवीएम के परिणामों से खुश हैं। वैसे उन्होंने अपने सर्वे को ही श्रेष्ठ बताया और ब्रेकिंग न्यूज़ में यही धमाका करते रहे कि “हमारे चुनावी रूझानों ने ईवीएम की विश्वनीयता पर भी मोहर लगा दी है...!” किसी धाकड़ एंकर ने ईवीएम के परिणामों पर कोई पलटवार नहीं किया। सभी राजनीतिक दल भी खुशी-खुशी अपनी ही पार्टी द्वारा आर्डर किये लड्डू से अपना ही मुँह मीठा कर रहे हैं। ईवीएम की इस प्रचंड जीत पर लोकतंत्र में खुशी की लहर चल रही है। हो सकता है अगले गणतंत्र दिवस की परेड में लोकपथ पर ईवीएम की झांकी से सर्वदलीय खुशी देखी जा सकती हो। हो सकता है भारत के सबसे वयोवृद्ध राजनीतिक दल अपने अगले अध्यक्ष के चुनाव के लिए ईवीएम से ही मतदान करवाये। देखना यह है कि ईवीएम को मिली यह प्रचंड बहुमत वाली जीत कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगी और कबतक राजनीतिक लांछन से बच पाती है....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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Sunday, December 4, 2022

अध्यक्षीय भाषण....!!

 अध्यक्षीय भाषण....!!

   
      



वे बोलने में शुरू से तेज है। बचपन से बोलते-बोलते वे कब भाषण देने की अवस्था में आ गए, उन्हें ही नहीं पता चला ! इन दिनों वे भाषण तो देते है लेकिन वे हर विषय पर भाषण दे सकते है। धारा प्रवाह दे सकते है। उनके बोल दिनोंदिन ओजस्वी भाषण होते जा रहे है। पहले उन्हें सिर्फ़ उनकी कॉलोनी व नजदीकी विद्यालयों में ही भाषण देने बुलाया जाता था । लेकिन आजकल उन्हें सरकारी आयोजनों में भी भाषण देने के लिए बुलाया जाता है। निमंत्रण पत्र में उनके नाम के आगे “अध्यक्षता” शब्द ना हो, तो वे उस कार्यक्रम में नहीं जाते। इस कारण उन्होंने इन दिनों अपना मीटर अब अध्यक्षीय भाषण के अनुसार ही तय कर लिया है।

उनका अध्यक्षीय भाषण हर विषय पर धाराप्रवाह रहता है। हर भाषण में कहीं ऐसा नहीं लगता है कि कुछ नया कहा जा रहा है। सुनने वाले हर सभा में सहज ही रहते हैं। उन्हें अपनी बुद्धि पर जोर भी नहीं लगाना पड़ता है। श्रोतागण उनकी सभा में रात्रि के तिसरे-पहर की निंद का आनंद लेते हैं। आयोजन कर्ता से श्रोतागण निवेदन करते हैं कि उन्हें अगले आयोजन में भी अध्यक्षीय भाषण के लिए आमंत्रित करें ! नगर में बच्चों को भी उनका भाषण रटा गया है। कुछ बच्चें तो उनके भाषण शुरू होने से पहले ही उनकी कालजयी पंक्तियों का वाचन शुरू कर देते हैं। वे अपने नगर के रेडीमेड अध्यक्ष मान लिये गए है। कितनी ही आयोजन समितियाँ व संगठन इसके कारण आसानी से समाज कार्य के माध्यम से उनके नगर का कल्याण कर रही हैं। वे इसके कारण ही अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है। उन्हें लगता है, नगर के विकास का भार उनके ही कंधों पर है !

उनके इस अध्यक्षीय भाषण से समाचार पत्रों व टीवी चैनलों को भी सुविधा रहती हैं कि उन्हें अपने विशेषांक विचार पृष्ठ पर ज्यादा मेहनत नहीं करना पड़ती हैं। उनके भाषणों को सुनने वाले लाखों-करोड़ों में है। वे सभी जानते हैं कि इनके भाषणों का सार क्या है। वे अपने अध्यक्षीय भाषणों में कुरुक्षेत्र में खड़े श्रीकृष्ण की तरह विश्वरूप वाली आभा में रहते है। कितने ही श्रोतागण उनकी कांति व तेज से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उनके भाषण पर वाह-वाह से सभा मंडल का वातावरण किसी चक्रवर्ती सम्राट की राजसभा जैसा हो जाता है। सभा का हर श्रोता अपने आप को भाग्यशाली समझता है। उसे लगता है जैसे वह देववाणी सुन रहा है। वह अनुभव करता है कि उसने अपने जीवन का संपूर्ण पूण्य रस प्राप्त कर लिया है !

वे अपनी इस कला के माध्यम से साहित्य जगत में भी सम्माननीय है। बड़े-बड़े साहित्यकार उन्हें अध्यक्षीय भाषण के लिए बुलाते हैं और अपनी रचनाओं का पाठ भी उनसे ही करवाते हैं। लेखक अपनी ही रचनाओं का रस लेते हैं और अध्यक्ष यश प्राप्त करते है। अपने अध्यक्षीय भाषणों से उन्होंने साहित्य की कितनी ही मरणासन्न अवस्था में पहुंच गई पत्रिकाओं को जीवनदान प्रदान किया है। अपने भाषणों में वे अक्सर साहित्य सेवा की बातें करते हैं। साहित्यकारों ने भी उन्हें सच्चा साहित्य सेवक मान लिया है। इस सेवा से प्रभावित होकर कई साहित्यिक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है। अब तो उन्हें लिटरेचर-फेस्टिवलों में भी अध्यक्षीय भाषण देने बुलाया जाता है। इन फेस्टिवलों में अधिक अध्यक्षता करने से उनका वजन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और उनके भाषण का वजन कम होता जा रहा है। यह चिंता उन्हें कभी-कभी चिंतित करती है !
            
              


जीवन की प्रौढ़ बेला में ही उन्होंने सफेदी की झंकार प्राप्त कर ली है। वे यह चाहते भी थे। जनता उन्हें अध्यक्ष की उम्र के लायक जो समझे। आखिर अध्यक्ष के तौर पर दिनोंदिन उनकी पहचान बढ़ती जा रही है। अब तो उन्हें अपने राज्य की राजधानी में भी अध्यक्षीय भाषण के लिए बुलाया जाने लगा है। उन्होंने उसके लिए अलग से महँगे कपड़े बनवा लिये है। लिट-फेस्टिवल का बजट देखते हुए लगता है अग्रिम मानदेय मिला गया हो ! वे यही रूकने वाले नहीं है। उनका सपना है कि वे एक दिन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भी “#अध्यक्षीय_भाषण” के लिए आयोजकों की सबसे पहली पसंद बने....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, December 3, 2022

।। जिंदगी की बात संस्कृत के साथ ।।

 ।। जिंदगी की बात संस्कृत के साथ ।।

      



युवा लेखक व स्तंभकार शिवेश प्रताप जी की यह पुस्तक संस्कृत वांग्मय के समृद्धशाली साहित्य से परिचय करवाती है। करीब 37 पाठ में अलग अलग विषयों पर यह संग्रहणीय पुस्तक लिखी गई है। जीवन से जुड़ी कठिनाइयों के लिए संस्कृत साहित्य में उपलब्ध मोतियों को चुन-चुनकर यहां इस पुस्तक में जीवन प्रबंधन के लिए पाठकों के लिए लाया गया है।

इस पुस्तक में अभय, ईश्वर, उद्यम, एकता, कर्म, काल, गुरु महिमा, चरित्र पूजन, ज्ञान, दया, धर्म, प्रेम, परोपकार, संतोष, मन, मित्रता आदि विषयों के गहरे अर्थ संस्कृत साहित्य के माध्यम से समझाये गए हैं। लेखक ने हर पाठ के शुरुआत में सुंदर व सरल व्याख्या की व आगे श्लोकों के माध्यम से उस विषय पर व्यवहारिक प्रकाश डाला है। उदाहरण के लिए एकता का महत्व बताते हुए यहां पारिवारिक एकता का महत्व बताने के लिए एकता पाठ के अंतिम श्लोक को पढ़ा जा सकता है;-
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ।।

इसी तरह से कर्म पर मानस में तुलसीदास जी के माध्यम लेखक ने कर्म का महत्व बताया है, ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।’

इस पुस्तक में लेखक के द्वारा संस्कृत व भारतीय मानस के विशाल साहित्य से उच्च कोटि के मोतियों रूपी श्लोकों को चुन चुनकर इस पुस्तक को जीवन प्रबंध के लिए श्रेष्ठ कार्य किया गया है। कहीं से भी इस पुस्तक को पढ़ा जा सकता है। हर वाक्य व श्लोक मानवीय जीवन व संघर्ष के लिए प्रेरणादायक है। सामान्य पाठक व युवाओं को इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए व वह जब भी जीवन के संघर्षों से घीरे तो यह पुस्तक उसके लिए मददगार हो सकती है। एक संग्रहणीय पुस्तक की रचना लेखक ने की है। संस्कृत साहित्य से इतने श्लोक चुनने व उन्हें अर्थ सहित विभिन्न पाठों में सम्मिलित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे शिवेश जी ने बहुत कम आयु में पूर्ण किया है। जिससे उनकी लेखकीय क्षमता व जीवन प्रबंधन की स्पष्ट झलक दिखती हैं।
       

 

जैसा कि पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर ही पुस्तक के विषय में लिखा है कि ‛जीवन आधारित वैचारिक लेखों व संस्कृत श्लोकों द्वारा सम्यक चिंतन व उत्कृष्ट जीवन जीने की प्रेरणा देती एक बेहतरीन तथा संग्रहणीय पुस्तक’ में को अतिश्योक्ति नहीं है। यह हर युवा के लिए श्रेष्ठ पुस्तक है। आज की युवा पीढ़ी को इस पुस्तक का स्वागत करना चाहिए व पढ़ना चाहिए। आज के विश्वविद्यालयों में इस तरह की पुस्तके अधिक से अधिक मात्रा में होना चाहिए।

इस पुस्तक में लेखक संस्कृत भाषा व साहित्य का भी महत्व बता रहे है और वर्तमान जीवन के लिए उसकी उपयोगिता भी। व्यक्तित्व निर्माण के लिए आजकल कस्बों व शहरों में बड़ी बड़ी कोचिंग चल रही है और उनमें मोटी मोटी फीस ली जाती है। यहां इस पुस्तक में आप पाठ 31 में इस विषय पर गहराई से व सरलता से व्यक्तित्व निर्माण पर पढ़ सकते हैं। लेखक ने बताया है कि हमारे यहां संस्कृत भाषा में इस विषय पर हजारों वर्षों पहले बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बस इस समृद्धशाली संस्कृत साहित्य को वर्तमान युवा पीढ़ी के बीच लाना है। किसी पश्चिमी विचारधारा वाले कोचिंग संस्थान की ओर देखने की जरूरत नहीं है।

ऐसे ही रोचक व प्रेरणादायक विचार, लेख, श्लोक आदि से परिपूर्ण यह पुस्तक हर लेखक व जिज्ञासु पाठक को पढ़ना चाहिए। यह पुस्तक उपहार स्वरूप देने के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। बाकी आप जब इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो ओर भी महत्वपूर्ण व प्रेरणादायक बातें यहां पाऐंगे। व्यक्तित्व निर्माण व जीवन प्रबंधन के लिए यह पुस्तक उच्च कोटि के मानकों पर खरा उतरती है।



पुस्तक : जिंदगी की बात संस्कृत के साथ
लेखक: शिवेश प्रताप
प्रकाशक : ब्लूरोज प्रकाशन
मूल्य : 300


समीक्षक
भूपेन्द्र भारतीय 
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