Friday, December 24, 2021

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!


    


          दैनिक ट्रिब्यूनल पंजाब में....

चौराहों पर आदमकद विज्ञापनों में वे जब हँसते है। तो जनता जनार्दन असमंजस में पड़ जाती हैं ! शुरुआत में कोई नहीं समझ पाता कि उनकी इस मुस्कान का राज़ क्या है ? पर वे आत्मविश्वास से लबरेज़ रहते हैं।
वे ऐसे ही सब पर हँसते है। कभी मंच से, कभी मोटरकारों में से, सफेदझक कुर्ते से निकलती हँसी, तो कभी लोकतंत्र के सभागारों में बैठे बैठे मुस्कुराते है ! दो राष्ट्र अध्यक्षों की वार्ताओं में यह हँसी विश्वबंधुत्व का मार्गप्रशस्त करती हैं ! तो कभी सौ करोड़ की वसूली के बाद भी वे ऐसे ही मंद मंद मुस्काते है। लोकतंत्र पर खतरा आने के समय यह गठबंधन के रूप में मंच से अपनी कोमल मुस्कान बिखेरते है। कोरोना-ओरोना जैसी महामारी भी इस हँसी से घबराती है ! कोरोना के नये वेरिएंट इससे घबराकर क्वारेंटाईन हो जाते हैं। शायद किसी बुद्धिजीवी ने सही ही फरमाया कि इस मदमस्त हँसी के पीछे “मत-वाली हँसी” का भारी-भरकम योगदान है।

जब से ऐसे बुद्धिजीवी महाशय ने इस हँसी के बारे में बताया मुझे इस हँसी को जानने की जिज्ञासा ओर बढ़ गई कि मतवाली हँसी के लक्षण कैसे होते है ? एक दिन मतवाली हँसी हँसने वाले से ही पुछ लिया। मेरे क्षेत्र के ही है या फिर उनके अनुसार मैं उनके चुनाव क्षेत्र का ही मतदाता हूँ ! इसलिए उन्होंने बताया कि ‛चुनाव में मतदाता से मत प्राप्त करके जो उसपर व लोकतंत्र पर पाँच वर्षों तक हँसते रहे, उसे “मत-वाला” कहते है और उसकी हँसी को “मत-वाली” हँसी कहते है !’


     

                      हरिभूमि में.....

इस मतवाली हँस पर छाती चोड़ी करते हुए वे मतवाले से होकर आगे इसका ओर विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे ! कहते हैं हमारी इस हँसी से लोकतंत्र के तीनों स्तंभ स्वस्थ रहते है। कोई महामारी इन्हें टस से मस नहीं कर सकती हैं। आगे बकते गये ;- यह जब भी किसी मंच या चुनावी रैली से जनता में प्रसारित की जाती है तो यह ‛हमारे विकास सूचकांक को बताती हैं।’ वहीं विपक्ष के गिरते ग्राफ को इंगित करती हैं। समाचार पत्रों में लाखों रुपए देकर इस हँसी को छपाना पड़ता है। शिष्टाचार के तौर पर बाजार जिसे विज्ञापन कहता है ! जिससे हमारे देश की विश्व में “हेप्पीनेश रैंक” बढ़ती है। जनता इसे विकास का पैमाना मानती हैं। और इसी आधार पर हमें चुनावों में भारीमात्रा में मत मिलते हैं। जिससे मत-वाली हँसी में दिनोंदिन वृद्धि होती रहती है और परिणाम में नागरिकों की हँसी माननीयों के खाते में आ जाती हैं।

इस छटा का चित्र तो बड़े से बड़े चित्रकार भी अपनी कृति में आजतक नहीं खिच पाये ! आज यदि महान चित्रकार राजा रवि भी जीवित होते तो इस सौम्य हँसी का हुबहू चित्र नहीं बना पाते ! यह जब भी सफेदझक परिधानों से व बड़ी बड़ी लक्झरी गाड़ियों से झांकती है, तो सीधे जनता के ह्रदय पर अंकित होती हैं। जिससे मतदाता मतदान के दिन दिनभर पंक्तियों में लोकतंत्र के तीनों खंबों के सहारे खड़े रहते हैं।

इस हँसी को संरक्षित करने के लिए बड़े बड़े बंगले बनाये जाते हैं। आचार संहिता का बंदोबस्त किया जाता हैं। बड़े बड़े भत्ते, वेतन, मान व मानदेय् दीये जाते है ! तो कभी सांसदों के शिष्ठ मंडल के सदस्य के तौर पर विदेशों में जाकर भी इस हँसी के माध्यम से शिष्ठता को बिखेरा जाता है। कभी कभी तो इस “मत-वाली हँसी” को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षण के लिए चौराहों-चबुतरों पर मूर्तियां स्थापित करके नागरिकों के अधिकारों व लोकतंत्र तक की बलि तक दी जाती हैं।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Thursday, December 16, 2021

कोई लहर नहीं आ रही है....!!

 कोई लहर नहीं आ रही है....!!

    

                     सुबह सवेरे समाचार पत्र में....

जी हाँ, आप निश्चिंत होकर शादी-बिहा-चुनाव रैलियां अटेन्ड कीजिये। कोई तीसरी-उसरी लहर नहीं आने वाली है। मेरे अनुभवी व जमे-ठमे मित्र लचकरामजी ने ऐसा कहा है। वो तो यहां तक कह रहे है कि जितने बड़े व भव्य आयोजन होगें, उनसे ही कोरोना-ओरोना जैसा विषाणु का अगला वेरिएंट मारा जाऐगा। ये तो जनता पिछली दो लहरों में मानसिक तनाव व अपच (बदहज़मी) के कारण अस्पताल तक पहुंची थी। और फिर बाकी सारा मामला अस्पताल वालों ने समझदारी से निपटाया। लचकरामजी तो यहां तक कह रहे हैं कि हमारी संसद के शीतकालीन सत्र को लंबा कर देना चाहिए, कोरोना जैसा वायरस अपने आप सदन में किसी बिल की तरह धड़ाम से गिर जाऐगा। और फिर कोरोना का बाकी का क्रियाक्रम सांसद महोदयगण खुद कर देगें। लचकरामजी ने किसान आंदोलन के सामने कोरोना को झुकते देखा है !

बात तीसरी लहर की चली तो लचकरामजी आगे कहने लगे, जितने ज्यादा लंबे चौड़े भव्य आयोजन वाले विवाह होगें, तीसरी लहर की संभावना उतनी ही कम होती जाऐगी। थाली कुटने वाले व खचाखच थाली भरने वाले आखिर कबतक खाली पेट बैठे ? ये लहरें कुँवारे युवक-युवतियों की तड़प व कुँवारेपन के कारण ही आ रही है। भला वैवाहिक जीवन के सामने कौन-सी लहर टिक सकी है ? और फिर जब विवाह में सात जन्मों का दाम्पत्य स्थापित हो जाता है तो कौन कोरोना इसे अलग कर सकता है ? ऐसे सात जन्मों वालें अनुबंध से कौन टक्कर ले सकता है। यमराज तक को इन संबंधों के विषय में निर्णय लेने में पचास-साठ साल लग जाते हैं।

लचकराम जी तनावमुक्त मुद्रा में आकर आगे सुझाते है कि चुनाव आयोग को भी अब तो पांच राज्यों के चुनाव की बजाए देशव्यापी चुनाव करवा देना चाहिए। फिर देखों, कोरोना वोरोना के बचें खुचे मामले भी समाप्त हो जाऐंगे। चुनावी रैलियों में नेताओं के कुकुरहाव से यह देश फिर कोरोना मुक्त हो सकता है ! राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के आपसी सौहार्द व प्रेम से भी भय खाकर कोरोना चीन की ओर पलायन कर जाऐगा। और जब हम राजनीति के माध्यम से चीन का अदृश्य माल उन्हें वापस प्रेमपूर्वक तरीकें से लौटा देगें, तो फिर से हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा सकेंगे। साथ ही एक बार फिर पंचशील का झंडा लिये नाथूला दर्रा में एक-दो एक-दो की लय में कदमताल कर सकते है !

लचकरामजी पीछले सप्ताह एक दाल-बाटी पार्टी में भी बता रहे थे कि उन्हें बारातें व चुनावी रैलियां बहुत पसंद है। वे कैसी भी जुगाडू बारात में “माले मुफ्त दिले बेरहम" वाली कहावत को पूरी तन्मयता से चरितार्थ करने के शौकीन रहे हैं। ऐसे में बारात में बज रहे डीजे से कौन सा कोरोना वेरिएंट नहीं मर सकता है ? एक बार कोरोना वेरिएंट की गली से बारात निकालों तो सही ! देखें फिर नागिन डांस करने वाले बारातियों के सामने कौनसी तीसरी लहर आती हैं । “ये बाराती अपने आप में किसी लहर से कम रहते हैं ?” वहीं चुनावी रैलीयों का अलग जीव-विज्ञान रहता है। चुनावी रैलियों के जितने वेरिएंट रहते हैं उतने कोरोना के शायद ही हो सकते है। जितने नेताओं व उनके कर्मठ कार्यकर्ताओं के वेरिएंट उससे चौसठ गुना ज्यादा रैलियों के रंग। अब भला इतने रंगारंग आयोजनों में कोरोना का नया वेरिएंट टिक पाऐगा ?


भूपेन्द्र भारतीय 
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Monday, December 13, 2021

हम नहीं मानने वाले....!!

 हम नहीं मानने वाले....!!

   

                    प्रजातंत्र समाचार पत्र में....

जैसा कि हमारे संविधान में लिखा गया है, “हम भारत के लोग....!” ये शुरूआती शब्द जनता को आत्मविश्वास से पूर्णतः भर देते हैं। हमारे संविधान ने अपने नागरिकों की कई तरह के अधिकारों से झोली भरी हुई है। वो बात अलग है कि इसी संविधान में नागरिकों के लिए कर्तव्यों की भी बात की गई है। लेकिन कर्त्तव्य-कर्म की बातें तो भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। कर्त्तव्य-कर्म के चक्कर में आदमी पड़े तो जीवन के मजे कब ले ? आम आदमी हर एक दिशानिर्देश मानने लगे तो फिर जीवन के आनंद का क्या ? वह क्यों मानें शासन के नियम ? क्या सरकार हम भारत के लोगों की सुनती है ? क्या हम कभी वीआईपी भारतीयों जैसे नहीं रह सकते ? अब हम किसी तरह के बंधन को नहीं मानने वाले हैं। हर बात में हमें कीर्तिमान बनाना अच्छा लगता है। वो फिर जनसंख्या का हो या फिर कोरोना के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण !

हम सड़क पर यातायात नियमों को नहीं मानने के लिए ही चलते हैं। आखिर हम यात्रा के लिए सड़क टैक्स देते हैं या फिर नियम मानने के लिए ! “कैसी भी लहर आये हम नहीं मानने वाले हैं।” हमने लहरों से टकरा कर कितने ही समंदर पार कर दिये हैं। ऐसा हमको बॉलीवुड वाले गाना गाकर बताते रहते हैं। हम भर कोरोना लहर में भी भारी-भरकम विवाह करने से नहीं मानने वाले हैं। हम उसी गली में बारात निकालना पसंद करते हैं जिसमें विवाद की संभावना अधिक रहती है। फूंका-मौसा की इच्छा पर ऐसा करना पड़ता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो दुनिया आगे कैसे बढ़ेगी ? सामाजिक समरसता का क्या होगा ! जनसंख्या वृद्धि का फिर क्या होगा ! हम अपना समृद्धि सूचकांक कैसे दिखायेंगे। फिर ऐसी निरंतर आने-जाने वाली लहरों का कारवां कैसे चलेगा।

सरकारी कार्यालयों में हम कठिन प्रतियोगिता परीक्षाएं पास कर घुसते है, फिर हम घूस लेने-देने में विश्वास क्यों न करें। हम नियमों में रहना नहीं जानते। ना ही हम उधार लेने से मानते है और न ही उधार चुकाने में विश्वास करते हैं। हमारे ऐसा करने से बैंको का बैलेंस बना रहता है ! फिर भले ही हमें ऋण चुकाने के चक्कर में अपना देश छोड़कर विदेश में बसने का भारी कष्ट सहना पड़े। हम राष्ट्र के ऋणी होने से मानने वाले नहीं है।

हम तो किसी को कुछ नहीं मानते है। वो फिर अपना घर हो या फिर पड़ोसी का। हम जहां भी जाते है, उस जगह पर अपना अधिकार जमा लेते है। हमें कुर्सियों से बहुत प्रेम है। हम सिर्फ़ बैठकों में शामिल होने को मानने वाले हैं। हम अतिक्रमण व विस्तारवाद का सिद्धांत मानने वाले लोग हैं। हम अपनी गली से संसद तक में हँगामा करने से नहीं मानने वाले माननीय है ! हम विदेश में भी जाकर अपने देश की निंदा करके निंदारस लेने से नहीं मानते। हम सरकार में हो या फिर विपक्ष में, हम जोड़-तोड़ किये बगैर नहीं मानने वाले ! आखिर हम माने तो क्यों माने ? क्या हमने ही सबकुछ मानने का ठेका लिया है।

हम किसी को कुछ मानते है तो सिर्फ़ अपने आप को सम्माननीय मानते है। “हमारे बयानों का कोई कैसा भी अर्थ निकाले, हम प्रतिदिन टीवी व सोशल मीडिया पर बयान देने से नहीं मानने वाले हैं।” हम न मिलावट करने से मानने वाले हैं और न ही मामला रफा-दफा करने से ! हम टेबल के नीचें से व परदे के पीछे से ही लेने-देने के लिए मानते हैं। “हम नाक की सीध में चलने वाले लोग हैं”, बाकी कैसे भी दायें-बायें वाले मामलों में हम मानने वाले नहीं है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Thursday, December 2, 2021

मलखंभ व हमारी शिक्षा व्यवस्था....!!

 मलखंभ व हमारी शिक्षा व्यवस्था....!!





“मलखंभ खेल को हमारे देश में कुछ राज्यों ने अपना राजकीय खेल बना रखा है। इस अद्भुत तथ्य का जब जब भी ध्यान आता है, मेरा शैक्षणिक अनुभव मुझसे मलखंभ करने लगता हैं ! मेरा तो बचपन से यही अनुभव रहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंभ का खेल पहले से ही शामिल है ! शिक्षक प्रतिदिन शासन की शिक्षा नीतियों से मलखंभ करता रहता है। ऐसे में छात्रों को पढ़ाने के लिए कम ही अवसर मिलते हैं और मलखंभ के करतब जैसे कार्य हमारे राष्ट्र निर्माता शिक्षकों को प्रति कार्यदिवस करना होते हैं ! माड्साब कभी नेतागिरी-बाबुगिरी करके मलखंभ करते है, तो कभी जनगणना करके, कभी मलेरिया की दवा पिलाकर, कभी चुनाव, टीकाकरण, कभी फलाना ढिकाना सर्वे करके शिक्षण कार्य की खानापूर्ति करते हैं। प्रतिदिन कौन-सा पाठ पढ़ाना है उसके बजाय, इस बात के लिए मलखंभ ज्यादा होता है कि विद्यालय निरक्षण पर आए मंत्रीजी की खातिरदारी कैसे-कैसे करतबों से करना हैं !

मलखंभ भले हमारे देश के कुछ राज्यों का राजकीय खेल घोषित हो। पर राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा तंत्र में मलखंभ आजादी के बाद से आजतक अघोषित रूप से जारी है। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए हर कैलेंडर वर्ष में बड़े बड़े बजट बनते है लेकिन भ्रष्टाचार के मलखंभ के आगे “शिक्षा नाम का खंभा” धड़ाम से धराशायी हो जाता हैं ! शिक्षा के नाम पर स्कूल भवन हमने बड़े बड़े बनाएं, पर इन भवनों में राजनीति के खिलाड़ी मलखंभ करते रहते हैं ! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए बने हैं या राजनीतिक मलखंभ करने के लिए ? शिक्षकों के स्थानंतरण का खेल इतने हुनर से होता है कि अच्छे से अच्छा मलखंभ का खिलाड़ी मलखंब पर इस सरकारी करतब के बारे में सोचकर ऊलटा लटक जाए।

शिक्षा क्षेत्र में जितने प्रयोग हमारे देश की सरकारों ने किए, यदि उतने में से आधे भी मलखंभ का खिलाड़ी कर ले तो पहले प्रयास में ही ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत ले। कभी कभी तो शिक्षा व्यवस्था से इतना डर लगता है कि उसके आगे मलखंभ का खेल बहुत आसान लगता है ! विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र सबसे ज्यादा टीका-टिप्पणी यदि किसी पर करते हैं तो वह स्वयं के शिक्षा विभाग ही पर। “जिस देश में शिक्षा मंत्री बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है लेकिन उसी शिक्षा विभाग के कार्यालय का चपड़ासी दसवीं पास होना चाहिए !” ऐसी स्थिति में शिक्षा संस्थानों से छात्रों को ज्ञान मिलना मुश्किल है, हाँ वे मलखंभ खेल के दर्शक आसानी से बन सकते हैं !

खैर, इस मलखंभी शिक्षा व्यवस्था में भी कुछ शिक्षा का काम भी हुआ है लेकिन ऐसी शिक्षा मिली कि कितनों की ही बुद्धि मलखंभ खिलाड़ियों के शरीर जैसी मोटी व चिकनी हो गई। वे सरकारी सेवा में भी इस मोटी बुद्धि के दम पर ही जाते हैं और जिंदगी भर इस मोटी बुद्धि के सहारे सरकारी कुर्सियों पर बैठे बैठे मलखंभ करते रहते हैं और मोटी-मोटी रकम बनाते हैं। जिसके कारण आज तक देश की कितनी ही पीढ़ियों की मिट्टी पलित हो गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षण के अलावा सारे काम होते रहें और दिनोंदिन अन्य कार्यों की सूंची मलखंभ की ऊचाई इतनी बढ़ती जा रही हैं ! लेकिन आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंब का खेल प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय की शिक्षण संस्थानों तक खेला जा रहा है। अब एक बार फिर नई शिक्षा नीति आ गई है। देखते है, इस बार नई शिक्षा नीति में नये-नये करतब देखने को मिलते है या फिर शिक्षा के मंदिरों में वहीं पहले वाला मलखंभ का खेल पुनः नये नियमों से खेला जाता रहेगा....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, November 27, 2021

गधे हँस रहे हैं....!!

 गधे हँस रहे हैं....!!

        



एक ने पूछा गधे भी हँसते है ? मैंने कहा, भाई मैंने आजतक तो किसी गधे को प्रत्यक्ष रूप से हँसते हुए देखा नहीं। लेकिन भले लोगों के मुँह से सुना है कि गधे भी हँसते है। आगे कहा, मैंने तो कृशन चन्दर के उपन्यास “एक गधे की आत्मकथा” में गधे को मानवों जैसा व्यवहार करते जरूर पढ़ा है। सामने वाला तो मेरी इस बात पर आश्चर्य से गधे का बाप बनकर कहने लगा, भला कोई गधे पर भी उपन्यास लिखता है ? आजकल ऐसे लेखक पाये जाते है ? मैंने कहा, “पाठक होना चाहिए। कुछ लेखक तो श्वान पुराण तक भी लिख सकते हैं।”

खैर बात गधे के हँसने की चल रही थी। कुछ दिन पहले मैंने सोशल मीडिया पर एक गधे को यह कहते हुए सुना कि वह “उस देश से आता है”, जिसमें उसे असहिष्णुता ही असहिष्णुता दिखती हैं ! वह अपने आप को अपने देश के सबसे बड़े गधे के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। वह गधा अपने देश का नाम भारत बता रहा था ! विदेश में कविता के नाम पर गधापन झाड़ रहा था। इन दिनों भारत में ऐसे गधों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। लगता है जैसे पाकिस्तान ने अपने सारे गधे भारत की ओर घेर दिये हो। जो भारत की रोटीयों पर पलते हैं और विदेशों में गधों जैसा हँसते है ! कविता के नाम पर वह गधा सोशल मीडिया पर दो-तीन दिनों तक सिर्फ़ ढेंचू-ढेंचू करता ही खड़ा रहा।

इधर कुछ गधे विदेशों में जाकर बड़े बड़े घांस के मैदानों में चरकर मोटे-ताजे चर्बी युक्त हो गए है। इधर के गधे उनपर हँसते है और उधर के गधे इधर के गधों पर हँसते हैं। हर कोई पूछ रहा है ये ‛गधे हँस क्यों रहे हैं ?’ अब भला गधों से ऐसा पूछने की समझदारी कौन करें। क्या पता कैसा जवाब आ जाये। गधों से बात करते हुए कोई बुद्धिजीवी व्यक्ति देख ले तो उस बात करने वाले प्रगतिशील व्यक्ति को कहीं गधा समुदाय का न समझ बैठे। इतना बड़ा गधा जोखिम कौन उठाये।

फिर भी आजकल गधे हँसते हुए ज्यादा पाये जा रहे हैं। ऐसा सोशल मीडिया वाले कहते हैं। मुझे तो अब भी भरोसा ही नहीं होता कि गधे हँस भी सकते हैं ! आखिर गधे इस मानवीय क्रिया को क्यों करने लगे ? क्या मानवों के बाद गधे भी नकल करने लग गए हैं ? जो वे मनुष्यों की तरह हँसने लगे हैं ! उन्हें कौनसी प्रतियोगिता परीक्षा पास कर सरकारी नौकरी प्राप्त करना है।

आजकल के कुछ भारतीय गधे तो कृशन चंदर के गधे से भी आगे निकल गए हैं। कृशन चंदर का गधा तो सिर्फ़ चीन व रूस का साम्यवादी विकास मॉडल भारत में लाना चाहता था ! लेकिन वर्तमान के कुछ गधे तो भारत में पश्चिमी देशों का संपूर्ण विकास मॉडल ही उठाकर लाना चाहते है और उसपर भी आये दिन समाचार पत्रों में बड़े बड़े विज्ञापनों के माध्यम से हँसते रहते हैं। जैसे वे किसी गधास्तान में विकास पुरूष बनकर खड़े हो !

मुझे आश्चर्य तो उस दिन हुआ था जब मेरे एक मित्र ने कहा कि आजकल बहुत से गधे संसद में भी घुस गए हैं। जब मैंने पूछा वे संसद में भला क्या करने घुस गए और किसने उन्हें उस “लोकतंत्र के मंदिर” प्रांगण में घुसाया ? मित्र कहने लगा, उधर हरि-हरि घांस के बड़े-बड़े मुगलीया व ब्रितानिया बगीचें देखकर, उन्हें किसी भले मतदाता ने उधर घुसा दिया। मित्र को मैंने कहा, फिर तो सही किया उस भले मतदाता ने ! “अब जिधर ऐसी आयातित मुलायम हरि-हरि घांस होगी, गधे उधर ही तो घुसेगें।” इसमें भला कौन-सी आश्चर्य की बात है । हो सकता है, “गधे इस कारण ही उस भले मतदाता के इस लोकतांत्रिक कर्तव्य के लिए उसपर भोली-भाली हँसी हँसते रहते हो....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Friday, November 19, 2021

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम बच जाय....!!

 साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम बच जाय....!!

       

      

आजकल हर पल लगता है कि बस अब तो मेरी जैब पर डाका डलने ही वाला है। कभी मोबाइल पर बैंक से लिये लोन की किस्त का संदेश आ रहा है, तो कोई कार खरीदने का मेल कर रहा है ! जीवन बीमा वालों के द्वारा मरने के बाद दिखाये हसीन सपनों की आशा में ‛अच्छे दिन भी’ किस्तों में हाथ से जा रहे हैं। विज्ञापन वाले हल्का होने वाले स्थान पर भी अपना मार्केटिंग प्रबंध कौशल दिखाने से बाज नहीं आते। उन्हें लगता है कि कुछ ही दिनों में दुनिया किसी गुमनाम लहर से खत्म होने वाली है सारा माल जल्दी से जल्दी बेच दो ! “मांग बढ़ावो मांग बढ़ावो” उनका प्रिय नारा रहता है। आनलाईन शापिंग ने इस आग में घी का काम कर दिया है। साईं ने जितना दिया उससे ज्यादा का आर्डर हो रहा है !

    


घर वालों के अलग डिमांड ड्राफ्ट हमेशा तैयार ही रहते है। सरकारी कार्यालय में घुसे नहीं की बाबूजी अपना वाला कबीर भजन शुरू कर देते हैं;-
“साईं इतना दीजिये, जा मे मेरा कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साहब की भी भूख मिट जाय ॥”
मुझे उस पल समझ नहीं आता कि साधु कौन है और भूखा कौन ? कहाँ है साधु-संत ? वे भी आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं ! जिन्हें मेरे जैसा निम्न मध्यवर्गीय कुछ दे सकता है ! अभी तो मेरी ही भूख शांत नहीं हुई है। ऐसे में मेरे घर के द्वार पर कौन भला साधु आऐगा ?

घर से बाहर पहला कदम रखते ही अंदर से घर वालों की मांग भरी ऊंची आवाज़ें आतीं है। सुनों जी, शाम को बाजार से कुछ जरूरी चीजें लेते आना। मैं आपको चीजों की सूची दिन में वाट्सएप कर दूगीं। शाम आते आते कुछ चीजें की सूंची एक बड़ा मांग पत्र हो जाता है ! जैसे मेरे घर में ही कोई बड़ा संगठन अपनी मांगों की सूचीं दिनरात बनाता रहता है। अपने ही घर के अंदर ही अंदर कोई बड़ा आंदोलन होने वाला हो। अब भला कबीर साहब का साईं दे भी तो कितना दे ? ऐसे मांग पत्रों के सामने साईं कितना व क्या दे सकते हैं ? हो सकता है साईं इस थोड़े-बहुत में से भी कुछ मांग ले !

वहीं इन दिनों घर से कार्यालय पहुंचने के बीच एक बड़ा जंक्शन खड़ा हो गया है। जिसे ‛पेट्रोल-डीजल पंप टोल टैक्स स्थान’ कहना ही उचित होगा। इसके मीटर को देखकर हर बार लगता है कि कहीं सांसें ही नहीं रूक जाए ! लगता है जैसे देश की अर्थव्यवस्था इसी स्टेशन से ही चल रही हो। शायद कबीर साहब के जमाने में भी कुछ ऐसे ही ‛रोका’ विशेष स्थल रहे होगें। तभी उन्होंने ऐसी दोहामय अमृतवाणी लिखी। अब एक भला मध्यवर्गीय आदमी इस रोका-डाका डालों से बचें तो अपनी पहली मांग सूचीं की भरपाई करें ? ऊपर से दिन में बच्चों के विचित्र महंगी मांग भरे फोन अलग दनदनाते रहते हैं।

ऐसे में अब कोई कैसे ‛आत्मनिर्भर’ बने ! जब हर कोई आपसे कुछ न कुछ मांग ही रहा है। देने वाला कहीं दिख नहीं रहा है। “क्योंकि आप एक वर्ग विशेष श्रेणी में नहीं आते। आपके पास कोई संगठन नहीं है और न ही किसी तरह का संगठित वोटबैंक !” वहीं आनलाईन मांगने वाले की तो लाईन लंबी ही होती जा रही है। हर दूसरे वर्ष वोट मांगने वाले अलग नहीं मानतें। पड़ोसी अब चाय पत्ती, चीनी और दुध से आगे बढ़ते हुए पेट्रोल-डीजल-गैस सिलेंडर की मांग पर आ गया है। गनीमत है कि चंदा मांगने वालों को अब तक कोरोना ने क्वॉरेंटाइन कर रखा है। खेतों में कीटनाशक दवाओं की मांग बढ़ती जा रही है ! वहीं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता दिनोंदिन घटती-जा रही हैं। इस स्थिति में बेचारे साईं से कितना और क्या मांगे ? जिससे की इस छोटीसी जैब की आर्थिक स्थिति का सूचकांक भी बढ़ जाए।
मेरी इस मांगीलाल वाली स्थिति में आज कबीर साहब होते तो इस मांग-भरी महंगी दुनिया पर शायद मूल दोहे की जगह यह ही लिख पाते ;-

“साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम बच जाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, बाकी की मांग पूरी हो जाय ॥”



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Thursday, November 11, 2021

ब्रांड मूल्य का बाजार

 ब्रांड मूल्य का बाजार

             




जीवन के हर क्षेत्र में ब्रांड वैल्यू(मूल्य) का आजकल बहुत बोलबाला बढ़ गया है। जैसे मार्केटिंग का हिन्दी अर्थ ‛विपणन’ जटिल शब्द है, उसी तरह से मार्केटिंग प्रबंधकों का तंत्र व उनके मंत्र भी बड़े ही विचित्र है। किस मीडिया मंच से कौनसा मंच आपके घर व मस्तिष्क में कब घर कर जाए ! इस विषय में सही सही कोई कुछ नहीं कह सकता है। “गंजे को कंघी बेचने” वाले मार्केटिंग मंत्र से बात बहुत आगे निकल गई है।
वहीं किसी को सोशल मीडिया पर कम लाईक्स व शेयर मिलने लगे तो समझो, उस मीडिया महावीर का मूल्य गिर रहा है। जैसे उसका सबकुछ लूट गया हो ! जीवन में किन्हीं अज्ञात अशांति ही अशांतियों ने घेर लिया हो। अबतक अक्सर सुनने में आता था कि बॉलीवुड व क्रिकेटरों का ब्रांड घटता-बढ़ता है। लेकिन जनता इन दो ब्रांडों से इनता प्रभावित हो गई है कि उसने अपना मूल्यांकन स्वयं करना शुरू कर दिया है। आभासी दुनिया ही उसके लिए परम् सुख होने लग गई! एक तरफ महानायक जैसों का पान-सुपारी-गुटखा बेचने के विज्ञापन से ब्रांड मूल्य क्या गिरने लगा ! जनता का मूल्य सूचकांक ऊपर-नीचें होने लगा। जनता ने अलग अलग ब्रांड में नये-नये मानक खोजना शुरू कर दिये।

जो जितना बड़ा अभिनेता वह उतना ऊँचे दाम का ब्रांड मूल्य रखता है ! और बिकता भी हैं। क्या तो इन्हें जनता की भावनाओं का ध्यान और क्या तो जनता इनकी बात मानने को तत्पर खड़ी ! आजकल कैसे कैसे विज्ञापन गुरू बैठे है, दोनों को गच्चा खिला रहे हैं। और बाजार को गुलजार कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे ब्रांड मूल्य का मामला नहीं है, ब्राह्मण गद्दी का हो। बाजार गुरूओं ने जनता को बाजारू बना रखा है।
वहीं जैसे जैसे जनता की भावनाएं ब्रांड मूल्य धारियों से आहत हो रही है जनता अपना ब्रांड खुद बना रही है। इन दिनों जैसे जैसे बाजार का बोलबाला दिनोंदिन बढ़ रहा है, जनता अपने ब्रांड की बखत स्वयं बढ़ाने में लग गई है। इस वैश्विक अभियान में जनता का साथ आभासी दुनिया सर्वाधिक दे रही है। हर हाथ को मोबाईल ने काम दे दिया है। वहीं बाजार ने ब्रांड मूल्य का पैमाना इतना बढ़ा दिया है कि इस पैमाने तक पहुंचने में हर कोई औंधे मुंह गिर रहा है।

एक समय जब युवाओं का विद्यालय में अच्छे नंबर लाना अपने घर व आस-पड़ोस में ब्रांड था, आज वहीं बड़ी कंपनीयों का मोबाईल खरीदना बच्चों का ब्रांड मूल्य बन गया है। बाजार अच्छे दिनों की आस में सब कुछ परोस रहा है। जनता चहुँ ओर से हर वस्तु के मूल्य मानकों के दबाव के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। वह भी चाहती हैं कि ‛लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके भी मत की ब्रांड वैल्यू हो।’ भले वह पांच साल में एक बार ही हो ! जब हर चवन्नी छाप चीज का मूल्य स्तर बढ़ रहा है तो फिर “जनता के बेलट ब्रांड का मूल्य स्तर भी बढ़ना चाहिए।”

आज बाजार ने हर घर के प्रत्येक सदस्य के लिए आनलाईन दुकानें खोल रखी है। सबकी पसंद-नापसंद का पल-पल पर विज्ञापन गुरू-घंटाल पैनी निगाह से ध्यान रख रहे हैं। यदि आपने ठंड में आग में तापने का मन बनाया और उधर जैसे ही सोशल मीडिया खोला, हर प्लेटफार्म पर चार-चार तरह की माचिस व लाईटर के विज्ञापन दनादन आने लग जाते है ! जैसे आभासी दुनिया का इशारा हो “गुरू लगाओं आग, जिधर लगाना हो ! ये रही आग लगाने के साधनों के विकल्पों की लड़ी।” ब्रांड मूल्य बाजार ने दुनिया को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है और वही एड गुरु जनता से कह रहे हैं कि एक आइडिया जो दुनिया बदल दे ! अब बेचारी जनता दुनिया को मुठ्ठी में करें या फिर दुनिया को बदलें ?

इसी ऊहापोह में जनता की दुखती नश को ब्रांड मूल्यधारी समय-समय पर टटोलते रहते हैं। और अपने मालिकों के इशारे पर नश को दबाते हुए बाजार के सूचकांकों को बढ़ाते रहते हैं। अब जनता को समझना है कि उसका ब्रांड वह स्वयं चुने और बाजार को अपनी मुठ्ठी में रखें या फिर कटपुतली बनकर आभासी दुनिया से संचालित होती रहे ! क्योंकि ब्रांड मूल्य-धारीयों के अश्वमेध घोड़े सरपट दौड़े जा रहे हैं, इन्हें नियंत्रित करने के लिए जनता को अपना ब्रांड मूल्य बढ़ाना होगा। ब्रांड मूल्य के इस चक्रव्यूह से बचने के लिए जनता को इसे बेधना व इसमें से फिर बाहर निकलने वाली दोनों विद्याओं को सीखना होगा।


भूपेन्द्र भारतीय 
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