Tuesday, January 11, 2022

स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।

 स्वामी विवेकानंद युवाओं के सच्चे आदर्श महानायक।


    



“जो आपके पास मौलिक गुण है उससे ही जीवन में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त की जा सकती है।” स्वामी विवेकानंद विश्व के सबसे बड़े धर्म सम्मेलन ११ सितम्बर १८९३ अमेरिका में अपने आध्यात्मिक ज्ञान के बलबूते पर ही गए थे। भारत के इस क्षत्रिय सन्देश वाहक की चिंतनधारा की अमेरिका पर गहरी छाप पड़ी। इस गुण के अलावा उनके पास उस समय कुछ नहीं था। लेकिन यह शक्ति कोई साधारण नहीं थी। उनके इस गुण में भारतवर्ष की हजारों वर्षों की आध्यात्मिक ऊर्जा सिंचित थी। वे भारतीय आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत थे। वे भारत के प्राचीन साहित्य व अपने समय के यथार्थ को भलीभांति जानते थे। स्वामी विवेकानंद जी भारतवर्ष के अपने समय के ज्ञान रूपी सूर्य से कम नहीं थे। वे वेदों व प्राचीन भारतीय शास्त्रों के ज्ञाता थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उनके बतायें मार्ग व दर्शन से भारत में नवजागरण हुआ और आजतक वे युवाओं के लिए महानायक है।


स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय बताता है कि उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। आज जब हम स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस १२ जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाते हैं तो यह हमारे लिए गर्व का विषय है। एक ऐसा युवा जिसने अपने छोटे से जीवन में न सिर्फ़ भारतवर्ष को छान दिया, बल्कि विश्व में भारतवर्ष के अद्भुत धर्म शास्त्रों का परचम लहराया। सनातन हिंदू धर्म की ध्वजा को उन्होंने बड़ी ही कुशलता व श्रेष्ठता के साथ विश्व के सामने लहराया। यह सब करना इतना भी आसान नहीं था, जबकि भारत में ही उनके अनेकों दुश्मन हो गए थे। पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर अंततः विश्व की बड़ी संख्या का दिल जीत लिया।


यह सब इसलिए हुआ कि वे भारतवर्ष में बहुत घूमे साथ ही दुनिया के कितने ही देशों में लोगों के बीच जाकर अपने सच्चे सनातन धर्म की बात कहीं। वे सिर्फ़ हिमालय की कंदराओं में बैठकर ध्यान करने वाले योगी नहीं थे, वे जनमानस के बीच रहकर आध्यात्म की लौ जगाने वाले योगी थे। उन्हें पता था कि खाली पेट भजन नहीं हो सकता है।

उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस जी से सच्ची शिक्षा प्राप्त कर सबसे पहले भारत को जाना। शुरुआत में अपने गुरू की कितनी ही बातों का वे विरोध करते थे। वे इतनी आसानी से अपने गुरू की बातें भी स्वीकार नहीं करते थे। वे हर बात व तथ्य को कसौटी पर कसते हुए उसकी गहराई तक जाते थे। इसलिए ही बाद में उन्होंने कहा कि “स्वयं पर विश्वास करो।” वे हमेशा कहते थे किसी भी बात पर आंख मूंदकर भरोसा मत करो, उसे स्वयं से जानों। वे भारतीय प्राचीन ज्ञान की शक्ति की क्षमता को जान गए थे। जिसके लिए वे भारत को जानने के लिए वे भारत के कौने-कौने मे गए। आम लोगों के बीच रहे। उनके दुख दर्द को जाना। भारत की वास्तविक शक्ति व गुण को पहचाना। सैकड़ों वर्षों की दासता के बाद उन्होंने भारतीयों को जागृत किया कि अपनी मूल शक्ति आध्यात्म की ओर लौटो। वेद व प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति को पहचानों। आत्मनिर्भर बनो। उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए।



स्वामी विवेकानंद के बारे में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।" रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"


देश की उन्नति–फिर चाहे वह आर्थिक हो या आध्यात्मिक–में स्वामी विवेकानंद शिक्षा की भूमिका केन्द्रिय मानते थे। भारत तथा पश्चिम के बीच के अन्तर को वे इसी दृष्टि से वर्णित करते हुए कहते हैं, "केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहाँ के ग़रीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे ग़रीबों की बात याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ ? जवाब पाया – शिक्षा!" स्वामी विवेकानंद का विचार था कि उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व विकसित होना चाहिए और चरित्र की उन्नति होनी चाहिए। सन् १९०० में लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी यही बात सामने रखते हैं, "हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।"



स्वामी विवेकानन्द की वाणी में गजब का आकर्षण रहता था। वे जो भी बात कहते उसमें व्यवहारिक ज्ञान होता था। उनका कहना था:- “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।” यह बात भले साधारण लग रही हो। लेकिन इस एक बात से उन्होंने भारत में वर्षों से पनप रहे पाखंड व अनेक कुरीतियों पर आक्रमण किया था। शायद इसके ही कारण कितनी ही तथाकथित धार्मिक संस्थाएं व धर्म गुरू उनका विरोध करते रहे थे।


जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" इस बात में बहुत गहराई थी, वे जैसा कि कहते थे एक विवेकानंद से कुछ नहीं होगा। वे अपने जैसे विचारों वाले युवाओं का एक बड़ा दल संगठित करना चाहते थे। जो भारत की गरीबी को मिटाने में पूर्ण रूप से समर्पित हो। भारत की अपनी यात्राओं में उन्होंने गरीबी को देखा था। जिससे वे बहुत दुखी भी रहे। पश्चिम का वैभवशाली भौतिक वातावरण उन्हें कभी आकर्षित नहीं कर पाया, क्योंकि वे भारत भूमि के सच्चे राष्ट्र भक्त थे। इसलिए ही वर्षों से निद्रा में पड़े भारतीयों को वे जगाना चाहते थे। वे अच्छे से जानते थे कि यदि यह भारतीय जाग गया तो विश्व का कल्याण ही होगा। वे हमेशा युवाओं के लिए आदर्श रहे।


आज जब विश्व के युवाओं के सामने महामारीयों व नस्लीय हिंसाओं का मकडज़ाल फैला हुआ है तब इस स्थिति में स्वामी विवेकानंद के ही विचार युवाओं के लिए आदर्श होगें। क्योंकि जैसा स्वामी जी मानते थे, युवाओं के द्वारा ही वर्तमान व भविष्य का कल्याण होता है। युवा ही हमारे समाज की रीढ़ है। इसलिए युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात करके वर्तमान व भविष्य का निर्माण करना चाहिए। जिस तरह स्वामी विवेकानंद ने भारत की जनता में खोये हुए आत्मविश्वास को जगाया। उसी तरह आज के युवाओं को भारत के खोये गौरव को वापस प्राप्त करने के लिए भारत में ही रहकर काम करना होगा। सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए हमारे युवा भाईयों बहनों को स्वामी विवेकानंद जी के विचारों व मार्ग पर चलकर इस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। तब कहीं स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को युवा दिवस मनाना सार्थक माना जाऐगा।



भूपेन्द्र भारतीय
पूरा नाम:- भूपेन्द्रसिंह परिहार
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Monday, January 10, 2022

“कड़ी निन्दा रस का सुख....!!"

 “कड़ी निन्दा रस का सुख....!!"

 

              सुबह सवेरे में .....

गांव के पेले पार रहने वाले मेरे मित्र लचकरामजी को जब भी किसी से असहमति रहती है, तो वे उस व्यक्ति की ‛कड़ी निन्दा’ करना ही सर्वोत्तम प्रतिक्रिया मानते है। लचकरामजी का कहना है कि जो सुख निंदा रस में है भला बाकी नौ रसों में से किसी एक में भी हो सकता है ? और उस पर भी कड़ी निंदा तो उनका प्रिय तीर है। बुद्धिजीवी व विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के लंबे चौड़े बौद्धिक लेखों व भाषणों के सामने लचकरामजी के ये दो शब्द अक्सर भारी पड़ते हैं। ऐसा लचकरामजी का मानना है। और उनका कड़ी निन्दा में न सिर्फ़ दृढ़ विश्वास है, पर यह उनका प्रमुख हथियार है।

इधर जब से अधिकांश लेखक आलोचना के लिए व्यंग्य की नदी में दिनरात गोते लगा रहे हैं ! और सोशल मीडिया पर अपने अपने खेमे में साहित्य साधना कर रहे हैं...! लचकरामजी का कहना है कि कोई भी बात हो उसके उत्तर में अपन तो बुराई, आलोचना, विरोध, करारा जवाब, व्यंग्य, प्रतिक्रिया, अभिव्यंजना जैसा कुछ करना नहीं जानते है। “बस उनका काम कड़ी निन्दा करना ही है।” लचकरामजी का मानना है कि आधुनिक समय में लोकतांत्रिक ढंग से वक्रोक्ति का सबसे बड़ा हथियार “कड़ी निन्दा” ही है।

सरकारें बात-बात में हर मामले में जाँच, आयोग व समिति बनाना शुरू कर देती है, जब कि कड़ी निन्दा से भी समस्या का समाधान हो सकता है। कड़ी निन्दा में वो बल है जो किसी भी विपक्षी की जमीन हिला सकती है। और कड़ी निन्दा से न सिर्फ़ विपक्षी दलों की खटिया खड़ी हो सकती है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी कड़ी निन्दा से चारों खाने चित किया जा सकता है। आगे लचकरामजी अपने इस तीर की विशेषता पर कहने लगे, एक बार रात के समय चोर उनकी भैंस चुरा ले गये। उन्होंने चहु दिशाओं को चुनौती देते हुए इस चोरी पर चोरों की “कड़ी निन्दा” की, अगले दिन उनकी भैंस उनके ग्वाड़े में आकर अपने आप खूंटे के पास आकर खड़ी हो गई और जैसे ही लचकरामजी दूध दोहने भैंस के पास बैठे, भैंस ने फट से दो समय का दूध एक बार में ही दे दिया। उनका कहना है, इसलिए वे “कड़ी निन्दा को ही सर्वोत्तम” हथियार मानते है। “भैंस तक इस तरह की प्रतिक्रिया को समझती है।”

बातचीत ओर आगे बढ़ी तो लचकरामजी चाय पर चर्चा करते हुए कड़ी निन्दा के विषय में फूर्ति से कह रहे थे, कि बताओं निन्दा कौन नहीं करता ? सास बहू की कर रही है, पत्नी पड़ोसी की पत्नी से अपने पति की कड़ी निंदा करती है, विधायक मंत्रियों की, छोटे कार्यकर्ता बड़े नेताओं की, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की, बच्चे बड़ों की, राजनीतिक मंचों से तो अक्सर कड़ी निन्दा सुनाई ही देती हैं। न्याय की मूर्तियां तक बहुत से गंभीर मामलों में कड़ी निन्दा करके पूर्ण न्याय कर कानूनी कलम तोड़ती रहती हैं...! भ्रष्टाचारी बाबू पर लगे आरोपों पर कार्यवाही के नाम पर उसके बड़े बाबू छोटे बाबू की कड़ी निंदा करते हुए कहते है, “बड़ा खऊ है यार, सारा माल अकेले ही गप कर जाता है !” बड़े साहब से इसकी कड़ी निन्दा करनी पड़ेगी। चाय पी लेने पर लचकरामजी अपने हाथों को अजीब मुद्रा में लाते हुए कहते है, आजकल तो इससे भी ज्यादा गजब हो रहा है ! जब से कोरोना आया है शिक्षक अपने छात्रों को कड़ी निन्दा करते हुए ही परीक्षा में उत्तीर्ण कर रहे हैं । बच्चे भी शिक्षा व्यवस्था की इस वैकल्पिक व्यवस्था “कड़ी निन्दा” से गदगद है।

अंत में लचकरामजी निन्दा रस से ओतप्रोत होते हुए कह रहे थे, अब बताओं जब सभी अपना-अपना काम कड़ी निन्दा करके ही चला रहे है तो हम क्यों नहीं “कड़ी निन्दा” करे ? एक दिन हमने अपने एक पुराने खटारा मित्र की आनलाईन कड़ी निन्दा कर दी तो वह बुरा मान गया। कहता फिर रहा है कि उसकी मानहानि हुई है ! अब बताओं हर घटना की इतिश्री “कड़ी निन्दा” से हो रही हैं, तो हमने क्या उसे कोई देवताओं की तरह कोई श्राप दे दिया है ?


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
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Wednesday, January 5, 2022

जिह्वा में फिर गुप्त रोग....!!

 जिह्वा में फिर गुप्त रोग....!!

      

                   इंदौर समाचार में.....

जैसे ही हमारे देश में चुनाव आते हैं नये-नये जुमलों, गालियों, फब्तियां, मुहावरों की बाढ़-सी आ जाती है । आम आदमी महामारी, आपदा या बाढ़ से इतना परेशान नहीं होता है, जितना इन जबानी संज्ञा-सर्वनाम-विशेषणों रूपी गाली से आहत होता है। अब नेता करे भी तो क्या करे ? “दिनोंदिन जागरूक होते मतदाता को कहीं न कहीं तो उलझाना पड़ता है।” यदि नेताजी सीधी बात व सभ्य भाषा में वोट मांगने जाए तो कोई क्यों नेताजी को विजय का आशीर्वाद दे ? हो सकता है वहीं मतदाता नेताजी को गाली देकर या दो चार जूते देकर भगा न दे ? इसलिए ही नेताओं की अपनी मर्ज़ी से या किसी गंभीर रोग के कारण ज़बान फिसल जाती हैं। अब उसमें किसी महिला को नेताजी ने आयटम, टंच माल, हरामखोर या बार बाला कह दिया तो क्या हुआ ? बेचारे नेताजी के यहां क्या पता माँ-बहन-बेटी-बहु है भी या नहीं ? हो सकता है नेताजी राजनीति में दुल्हा बनने के लिए सामाजिक जीवन में अबतक कुँवारे हो ! नेताजी तो भोले है ! उन्हें क्या पता नारी का सम्मान क्या होता है ! उन्हें तो “सत्ता सुंदरी ही चहुंओर दिखती हैं।”


पाँच साल में एक बार तो क्षेत्र में वोट मांगने जाते हैं। ओर ऊपर से यदि “उपचुनाव” आ जाए तो गलती से जबान फिसल ही जाती है। पूर्व में इस पर एक नेताजी कह भी चुके हैं कि “जवान लड़कों से गलतियां हो जाती हैं!” वैसे ही नेताजी की सदाबहार जवान जिह्वा में चुनाव के समय हार-जीत के तनाव में गुप्त रोग हो जाता हैं। वैसे भी सत्ता पाने के बाद हमारे देश में नेता बिरादरी को कहाँ आम आदमी की तरह रहना है। वे तो जीतते ही माननीय, आदरणीय, हरदिल अजीज, मंत्रीजी, बड़े भाई साहब आदि हो जाते है। यदि कुछ थोड़ी बहुत जिबान भी फिसलती है, तो लोकतंत्र में नई गालीयों, मुहावरों, जुमलों, फब्तियों का ही अविष्कार होगा ! जो कि हमारे समाज को आदर्श समाज बनाने में नेताजी का भारी योगदान ही माना जाता रहा है।

इनकी इसी आदर्श वाणी से चुनाव आचार संहिता व उसको बनाने वाले आयोग का भी पता चलता है कि वह अभी अस्तित्व में है ! वे नेताजी ही है जो आम जनता को चुनावी समय में याद दिलाते हैं कि हमारे देश में अभी संवैधानिक मर्यादाएं बची है। नेताजी इसी समय में अपनी जबान निकाल निकाल कर बताते हैं कि “हम है संविधान के रक्षक !” भले चुनाव बाद वे ही संविधान के सबसे बड़े भक्षक निकलते हो ! लोकतंत्र के मंदिर में खड़े होकर शाप तक देते हो...!

जैसे इन दिनों हर क्षेत्र में गला काट प्रतियोगिता है, वैसे ही राजनीति में भी छोटे-बड़े-छुट भैय्या टाईप के नेताओं की बाढ़ आ गई है ओर इसी राजनीतिक तनाव में कभी-कभार जमे-ठमे नेता अपना आपा खो देते हैं। नवोदित नेताओं के दवाब में ओर कुर्सी के मोह में पुराने मठाधीशों की पहले जबान फिसलती है। वे लोकतंत्र के मंदिर संसद को अपना आश्रम समझने लगते हैं और ऋषि-मुनियों जैसे एक दूसरे को शाप दे रहे हो। वैसे भी उन्होंने जनता का धन क्षेत्र के विकास के लिए तो कभी खर्च किया ही नहीं। इसलिए इस तरह के नेता ऐसे में सिर्फ़ जबानी खर्च के ही भरोसे चुनावी मैदान में उतरते है ! ओर फिर यदि किसी नेता ने किसी नेता को कोई गाली-गलौज कर भी दी है तो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि उन्हें तो गाली खाने की आदत पड़ गई है। वे तो अपने आप को भी “कुत्ता या गधा” कहते पाए गए हैं। “नेता शब्द ही गाली हो गया है।” ऐसा हमारे देश की एक बड़ी महिला नैत्री कह चुकी है। क्योंकि शायद उन्हें यह सब अनुभव लोकतांत्रिक मंदिर के स्पीकर रहते हुए बहुत बार हुआ होगा !

खैर, जबान की आदत ही फिसलने की रही है ! ओर यदि चुनाव हो तो कितने ही नेताओं की जबान में कई तरह के अलग-अलग गुप्त रोग होते रहते हैं। ओर फिर वो नेता ही क्या जिसकी जबान न चले या दौड़े, ऐसे जबानी दौड़-भाग में ही कभी कोई फिसल जाए तो किस बात की माफी ? ओर फिर हर किसी मंच पर ऐसे माफी मांगते रहें तो पांच साल तो माफी मांगने में ही निकल जाए। फिर सत्ता सुंदरी के सहारे सैर-सपाटे कौन करे ? जनता का क्या, जनता को तो ऐसे नेताओं की आदत पड़ गई है ! चुनाव में ही सही पांच साल में कम से कम नेताजी कुछ दिन तो क्षेत्र की जनता का मनोरंजन तो करते हैं। बाकि समय तो वहीं सत्ता सुंदरी के साथ....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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Friday, December 24, 2021

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!

महामारी के सामने मत-वाली हँसी....!!


    


          दैनिक ट्रिब्यूनल पंजाब में....

चौराहों पर आदमकद विज्ञापनों में वे जब हँसते है। तो जनता जनार्दन असमंजस में पड़ जाती हैं ! शुरुआत में कोई नहीं समझ पाता कि उनकी इस मुस्कान का राज़ क्या है ? पर वे आत्मविश्वास से लबरेज़ रहते हैं।
वे ऐसे ही सब पर हँसते है। कभी मंच से, कभी मोटरकारों में से, सफेदझक कुर्ते से निकलती हँसी, तो कभी लोकतंत्र के सभागारों में बैठे बैठे मुस्कुराते है ! दो राष्ट्र अध्यक्षों की वार्ताओं में यह हँसी विश्वबंधुत्व का मार्गप्रशस्त करती हैं ! तो कभी सौ करोड़ की वसूली के बाद भी वे ऐसे ही मंद मंद मुस्काते है। लोकतंत्र पर खतरा आने के समय यह गठबंधन के रूप में मंच से अपनी कोमल मुस्कान बिखेरते है। कोरोना-ओरोना जैसी महामारी भी इस हँसी से घबराती है ! कोरोना के नये वेरिएंट इससे घबराकर क्वारेंटाईन हो जाते हैं। शायद किसी बुद्धिजीवी ने सही ही फरमाया कि इस मदमस्त हँसी के पीछे “मत-वाली हँसी” का भारी-भरकम योगदान है।

जब से ऐसे बुद्धिजीवी महाशय ने इस हँसी के बारे में बताया मुझे इस हँसी को जानने की जिज्ञासा ओर बढ़ गई कि मतवाली हँसी के लक्षण कैसे होते है ? एक दिन मतवाली हँसी हँसने वाले से ही पुछ लिया। मेरे क्षेत्र के ही है या फिर उनके अनुसार मैं उनके चुनाव क्षेत्र का ही मतदाता हूँ ! इसलिए उन्होंने बताया कि ‛चुनाव में मतदाता से मत प्राप्त करके जो उसपर व लोकतंत्र पर पाँच वर्षों तक हँसते रहे, उसे “मत-वाला” कहते है और उसकी हँसी को “मत-वाली” हँसी कहते है !’


     

                      हरिभूमि में.....

इस मतवाली हँस पर छाती चोड़ी करते हुए वे मतवाले से होकर आगे इसका ओर विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे ! कहते हैं हमारी इस हँसी से लोकतंत्र के तीनों स्तंभ स्वस्थ रहते है। कोई महामारी इन्हें टस से मस नहीं कर सकती हैं। आगे बकते गये ;- यह जब भी किसी मंच या चुनावी रैली से जनता में प्रसारित की जाती है तो यह ‛हमारे विकास सूचकांक को बताती हैं।’ वहीं विपक्ष के गिरते ग्राफ को इंगित करती हैं। समाचार पत्रों में लाखों रुपए देकर इस हँसी को छपाना पड़ता है। शिष्टाचार के तौर पर बाजार जिसे विज्ञापन कहता है ! जिससे हमारे देश की विश्व में “हेप्पीनेश रैंक” बढ़ती है। जनता इसे विकास का पैमाना मानती हैं। और इसी आधार पर हमें चुनावों में भारीमात्रा में मत मिलते हैं। जिससे मत-वाली हँसी में दिनोंदिन वृद्धि होती रहती है और परिणाम में नागरिकों की हँसी माननीयों के खाते में आ जाती हैं।

इस छटा का चित्र तो बड़े से बड़े चित्रकार भी अपनी कृति में आजतक नहीं खिच पाये ! आज यदि महान चित्रकार राजा रवि भी जीवित होते तो इस सौम्य हँसी का हुबहू चित्र नहीं बना पाते ! यह जब भी सफेदझक परिधानों से व बड़ी बड़ी लक्झरी गाड़ियों से झांकती है, तो सीधे जनता के ह्रदय पर अंकित होती हैं। जिससे मतदाता मतदान के दिन दिनभर पंक्तियों में लोकतंत्र के तीनों खंबों के सहारे खड़े रहते हैं।

इस हँसी को संरक्षित करने के लिए बड़े बड़े बंगले बनाये जाते हैं। आचार संहिता का बंदोबस्त किया जाता हैं। बड़े बड़े भत्ते, वेतन, मान व मानदेय् दीये जाते है ! तो कभी सांसदों के शिष्ठ मंडल के सदस्य के तौर पर विदेशों में जाकर भी इस हँसी के माध्यम से शिष्ठता को बिखेरा जाता है। कभी कभी तो इस “मत-वाली हँसी” को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षण के लिए चौराहों-चबुतरों पर मूर्तियां स्थापित करके नागरिकों के अधिकारों व लोकतंत्र तक की बलि तक दी जाती हैं।


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Thursday, December 16, 2021

कोई लहर नहीं आ रही है....!!

 कोई लहर नहीं आ रही है....!!

    

                     सुबह सवेरे समाचार पत्र में....

जी हाँ, आप निश्चिंत होकर शादी-बिहा-चुनाव रैलियां अटेन्ड कीजिये। कोई तीसरी-उसरी लहर नहीं आने वाली है। मेरे अनुभवी व जमे-ठमे मित्र लचकरामजी ने ऐसा कहा है। वो तो यहां तक कह रहे है कि जितने बड़े व भव्य आयोजन होगें, उनसे ही कोरोना-ओरोना जैसा विषाणु का अगला वेरिएंट मारा जाऐगा। ये तो जनता पिछली दो लहरों में मानसिक तनाव व अपच (बदहज़मी) के कारण अस्पताल तक पहुंची थी। और फिर बाकी सारा मामला अस्पताल वालों ने समझदारी से निपटाया। लचकरामजी तो यहां तक कह रहे हैं कि हमारी संसद के शीतकालीन सत्र को लंबा कर देना चाहिए, कोरोना जैसा वायरस अपने आप सदन में किसी बिल की तरह धड़ाम से गिर जाऐगा। और फिर कोरोना का बाकी का क्रियाक्रम सांसद महोदयगण खुद कर देगें। लचकरामजी ने किसान आंदोलन के सामने कोरोना को झुकते देखा है !

बात तीसरी लहर की चली तो लचकरामजी आगे कहने लगे, जितने ज्यादा लंबे चौड़े भव्य आयोजन वाले विवाह होगें, तीसरी लहर की संभावना उतनी ही कम होती जाऐगी। थाली कुटने वाले व खचाखच थाली भरने वाले आखिर कबतक खाली पेट बैठे ? ये लहरें कुँवारे युवक-युवतियों की तड़प व कुँवारेपन के कारण ही आ रही है। भला वैवाहिक जीवन के सामने कौन-सी लहर टिक सकी है ? और फिर जब विवाह में सात जन्मों का दाम्पत्य स्थापित हो जाता है तो कौन कोरोना इसे अलग कर सकता है ? ऐसे सात जन्मों वालें अनुबंध से कौन टक्कर ले सकता है। यमराज तक को इन संबंधों के विषय में निर्णय लेने में पचास-साठ साल लग जाते हैं।

लचकराम जी तनावमुक्त मुद्रा में आकर आगे सुझाते है कि चुनाव आयोग को भी अब तो पांच राज्यों के चुनाव की बजाए देशव्यापी चुनाव करवा देना चाहिए। फिर देखों, कोरोना वोरोना के बचें खुचे मामले भी समाप्त हो जाऐंगे। चुनावी रैलियों में नेताओं के कुकुरहाव से यह देश फिर कोरोना मुक्त हो सकता है ! राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के आपसी सौहार्द व प्रेम से भी भय खाकर कोरोना चीन की ओर पलायन कर जाऐगा। और जब हम राजनीति के माध्यम से चीन का अदृश्य माल उन्हें वापस प्रेमपूर्वक तरीकें से लौटा देगें, तो फिर से हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा सकेंगे। साथ ही एक बार फिर पंचशील का झंडा लिये नाथूला दर्रा में एक-दो एक-दो की लय में कदमताल कर सकते है !

लचकरामजी पीछले सप्ताह एक दाल-बाटी पार्टी में भी बता रहे थे कि उन्हें बारातें व चुनावी रैलियां बहुत पसंद है। वे कैसी भी जुगाडू बारात में “माले मुफ्त दिले बेरहम" वाली कहावत को पूरी तन्मयता से चरितार्थ करने के शौकीन रहे हैं। ऐसे में बारात में बज रहे डीजे से कौन सा कोरोना वेरिएंट नहीं मर सकता है ? एक बार कोरोना वेरिएंट की गली से बारात निकालों तो सही ! देखें फिर नागिन डांस करने वाले बारातियों के सामने कौनसी तीसरी लहर आती हैं । “ये बाराती अपने आप में किसी लहर से कम रहते हैं ?” वहीं चुनावी रैलीयों का अलग जीव-विज्ञान रहता है। चुनावी रैलियों के जितने वेरिएंट रहते हैं उतने कोरोना के शायद ही हो सकते है। जितने नेताओं व उनके कर्मठ कार्यकर्ताओं के वेरिएंट उससे चौसठ गुना ज्यादा रैलियों के रंग। अब भला इतने रंगारंग आयोजनों में कोरोना का नया वेरिएंट टिक पाऐगा ?


भूपेन्द्र भारतीय 
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Monday, December 13, 2021

हम नहीं मानने वाले....!!

 हम नहीं मानने वाले....!!

   

                    प्रजातंत्र समाचार पत्र में....

जैसा कि हमारे संविधान में लिखा गया है, “हम भारत के लोग....!” ये शुरूआती शब्द जनता को आत्मविश्वास से पूर्णतः भर देते हैं। हमारे संविधान ने अपने नागरिकों की कई तरह के अधिकारों से झोली भरी हुई है। वो बात अलग है कि इसी संविधान में नागरिकों के लिए कर्तव्यों की भी बात की गई है। लेकिन कर्त्तव्य-कर्म की बातें तो भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। कर्त्तव्य-कर्म के चक्कर में आदमी पड़े तो जीवन के मजे कब ले ? आम आदमी हर एक दिशानिर्देश मानने लगे तो फिर जीवन के आनंद का क्या ? वह क्यों मानें शासन के नियम ? क्या सरकार हम भारत के लोगों की सुनती है ? क्या हम कभी वीआईपी भारतीयों जैसे नहीं रह सकते ? अब हम किसी तरह के बंधन को नहीं मानने वाले हैं। हर बात में हमें कीर्तिमान बनाना अच्छा लगता है। वो फिर जनसंख्या का हो या फिर कोरोना के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण !

हम सड़क पर यातायात नियमों को नहीं मानने के लिए ही चलते हैं। आखिर हम यात्रा के लिए सड़क टैक्स देते हैं या फिर नियम मानने के लिए ! “कैसी भी लहर आये हम नहीं मानने वाले हैं।” हमने लहरों से टकरा कर कितने ही समंदर पार कर दिये हैं। ऐसा हमको बॉलीवुड वाले गाना गाकर बताते रहते हैं। हम भर कोरोना लहर में भी भारी-भरकम विवाह करने से नहीं मानने वाले हैं। हम उसी गली में बारात निकालना पसंद करते हैं जिसमें विवाद की संभावना अधिक रहती है। फूंका-मौसा की इच्छा पर ऐसा करना पड़ता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो दुनिया आगे कैसे बढ़ेगी ? सामाजिक समरसता का क्या होगा ! जनसंख्या वृद्धि का फिर क्या होगा ! हम अपना समृद्धि सूचकांक कैसे दिखायेंगे। फिर ऐसी निरंतर आने-जाने वाली लहरों का कारवां कैसे चलेगा।

सरकारी कार्यालयों में हम कठिन प्रतियोगिता परीक्षाएं पास कर घुसते है, फिर हम घूस लेने-देने में विश्वास क्यों न करें। हम नियमों में रहना नहीं जानते। ना ही हम उधार लेने से मानते है और न ही उधार चुकाने में विश्वास करते हैं। हमारे ऐसा करने से बैंको का बैलेंस बना रहता है ! फिर भले ही हमें ऋण चुकाने के चक्कर में अपना देश छोड़कर विदेश में बसने का भारी कष्ट सहना पड़े। हम राष्ट्र के ऋणी होने से मानने वाले नहीं है।

हम तो किसी को कुछ नहीं मानते है। वो फिर अपना घर हो या फिर पड़ोसी का। हम जहां भी जाते है, उस जगह पर अपना अधिकार जमा लेते है। हमें कुर्सियों से बहुत प्रेम है। हम सिर्फ़ बैठकों में शामिल होने को मानने वाले हैं। हम अतिक्रमण व विस्तारवाद का सिद्धांत मानने वाले लोग हैं। हम अपनी गली से संसद तक में हँगामा करने से नहीं मानने वाले माननीय है ! हम विदेश में भी जाकर अपने देश की निंदा करके निंदारस लेने से नहीं मानते। हम सरकार में हो या फिर विपक्ष में, हम जोड़-तोड़ किये बगैर नहीं मानने वाले ! आखिर हम माने तो क्यों माने ? क्या हमने ही सबकुछ मानने का ठेका लिया है।

हम किसी को कुछ मानते है तो सिर्फ़ अपने आप को सम्माननीय मानते है। “हमारे बयानों का कोई कैसा भी अर्थ निकाले, हम प्रतिदिन टीवी व सोशल मीडिया पर बयान देने से नहीं मानने वाले हैं।” हम न मिलावट करने से मानने वाले हैं और न ही मामला रफा-दफा करने से ! हम टेबल के नीचें से व परदे के पीछे से ही लेने-देने के लिए मानते हैं। “हम नाक की सीध में चलने वाले लोग हैं”, बाकी कैसे भी दायें-बायें वाले मामलों में हम मानने वाले नहीं है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Thursday, December 2, 2021

मलखंभ व हमारी शिक्षा व्यवस्था....!!

 मलखंभ व हमारी शिक्षा व्यवस्था....!!





“मलखंभ खेल को हमारे देश में कुछ राज्यों ने अपना राजकीय खेल बना रखा है। इस अद्भुत तथ्य का जब जब भी ध्यान आता है, मेरा शैक्षणिक अनुभव मुझसे मलखंभ करने लगता हैं ! मेरा तो बचपन से यही अनुभव रहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंभ का खेल पहले से ही शामिल है ! शिक्षक प्रतिदिन शासन की शिक्षा नीतियों से मलखंभ करता रहता है। ऐसे में छात्रों को पढ़ाने के लिए कम ही अवसर मिलते हैं और मलखंभ के करतब जैसे कार्य हमारे राष्ट्र निर्माता शिक्षकों को प्रति कार्यदिवस करना होते हैं ! माड्साब कभी नेतागिरी-बाबुगिरी करके मलखंभ करते है, तो कभी जनगणना करके, कभी मलेरिया की दवा पिलाकर, कभी चुनाव, टीकाकरण, कभी फलाना ढिकाना सर्वे करके शिक्षण कार्य की खानापूर्ति करते हैं। प्रतिदिन कौन-सा पाठ पढ़ाना है उसके बजाय, इस बात के लिए मलखंभ ज्यादा होता है कि विद्यालय निरक्षण पर आए मंत्रीजी की खातिरदारी कैसे-कैसे करतबों से करना हैं !

मलखंभ भले हमारे देश के कुछ राज्यों का राजकीय खेल घोषित हो। पर राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा तंत्र में मलखंभ आजादी के बाद से आजतक अघोषित रूप से जारी है। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए हर कैलेंडर वर्ष में बड़े बड़े बजट बनते है लेकिन भ्रष्टाचार के मलखंभ के आगे “शिक्षा नाम का खंभा” धड़ाम से धराशायी हो जाता हैं ! शिक्षा के नाम पर स्कूल भवन हमने बड़े बड़े बनाएं, पर इन भवनों में राजनीति के खिलाड़ी मलखंभ करते रहते हैं ! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए बने हैं या राजनीतिक मलखंभ करने के लिए ? शिक्षकों के स्थानंतरण का खेल इतने हुनर से होता है कि अच्छे से अच्छा मलखंभ का खिलाड़ी मलखंब पर इस सरकारी करतब के बारे में सोचकर ऊलटा लटक जाए।

शिक्षा क्षेत्र में जितने प्रयोग हमारे देश की सरकारों ने किए, यदि उतने में से आधे भी मलखंभ का खिलाड़ी कर ले तो पहले प्रयास में ही ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत ले। कभी कभी तो शिक्षा व्यवस्था से इतना डर लगता है कि उसके आगे मलखंभ का खेल बहुत आसान लगता है ! विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र सबसे ज्यादा टीका-टिप्पणी यदि किसी पर करते हैं तो वह स्वयं के शिक्षा विभाग ही पर। “जिस देश में शिक्षा मंत्री बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है लेकिन उसी शिक्षा विभाग के कार्यालय का चपड़ासी दसवीं पास होना चाहिए !” ऐसी स्थिति में शिक्षा संस्थानों से छात्रों को ज्ञान मिलना मुश्किल है, हाँ वे मलखंभ खेल के दर्शक आसानी से बन सकते हैं !

खैर, इस मलखंभी शिक्षा व्यवस्था में भी कुछ शिक्षा का काम भी हुआ है लेकिन ऐसी शिक्षा मिली कि कितनों की ही बुद्धि मलखंभ खिलाड़ियों के शरीर जैसी मोटी व चिकनी हो गई। वे सरकारी सेवा में भी इस मोटी बुद्धि के दम पर ही जाते हैं और जिंदगी भर इस मोटी बुद्धि के सहारे सरकारी कुर्सियों पर बैठे बैठे मलखंभ करते रहते हैं और मोटी-मोटी रकम बनाते हैं। जिसके कारण आज तक देश की कितनी ही पीढ़ियों की मिट्टी पलित हो गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षण के अलावा सारे काम होते रहें और दिनोंदिन अन्य कार्यों की सूंची मलखंभ की ऊचाई इतनी बढ़ती जा रही हैं ! लेकिन आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में मलखंब का खेल प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय की शिक्षण संस्थानों तक खेला जा रहा है। अब एक बार फिर नई शिक्षा नीति आ गई है। देखते है, इस बार नई शिक्षा नीति में नये-नये करतब देखने को मिलते है या फिर शिक्षा के मंदिरों में वहीं पहले वाला मलखंभ का खेल पुनः नये नियमों से खेला जाता रहेगा....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...