Sunday, March 19, 2023

केंचुली उतारने की पीड़ा....!!

 केंचुली उतारने की पीड़ा....!!

           



जब भी चुनाव होते हैं उन्हें केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इस पीड़ा को सहना आसान नहीं है। चुनाव लड़ने से पहले इस पीड़ा में पड़ना और चुनाव बाद हर पाँच साल में इस पीड़ा से दो-चार होना भी पड़ता है। चुनाव में हार के बाद भी केंचुली उतारना और जीत के बाद भी केंचुली उतारना..! वे इस पीड़ा पर उवाचते हैं, “साधों क्या यहीं जीवन है ?”

किसी को कोई भी पुरस्कार मिल गया तो उन्हें फिर अपनी साहित्यिक केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजरना पड़ता है। यह पीड़ा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आजकल तो उन्होंने मुझे भी इस पीड़ा में पटक दिया है। अभी कुछ दिनों पहले ही विदेश में जाकर उन्होंने अपनी केंचुली उतारने की पीड़ा का ढिंढोरा पीटा। ओर ना सिर्फ पीटा, पर पीढ़ामय राग में पीटने की ध्वनि विदेशी अखबारों में छपी भी।
वैसे साँपनाथ-नागनाथ जैसी उनकी दोस्ती के किस्से बहुत चर्चित रहते है। लेकिन यह केंचुली उतारने की पीड़ा के समय उनकी यह सदाबहार दोस्ती किसी काम नहीं आती है। वे लोकतंत्र के किसी भी रण में उतरते तो साथ-साथ , लेकिन कुछ ही समय बाद उनका लोकतांत्रिक गठजोड़ कमजोर पड़ने लगता है। दोनों एक दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगा देते हैं। दोनों एक दूसरे को लोकतंत्र का हत्यारा तक का दोषी घोषित कर देते है। आखिर में वही केंचुली उतारने की पीड़ा उन्हें विदेश यात्रा के लिए मजबूर कर देती है और फिर वे विदेशी जमीन से लोकतंत्र के लिए फुफकारते है।

केंचुली उतारने की यह पीड़ा दिनोंदिन हर संस्था व संगठन में बढ़ती जा रही है। किसी संस्था ने किसी को कोई पुरस्कार दे दिया तो उस संस्था के बाकी सदस्य इस पीड़ा से ग्रसित हो जाते हैं। यहां तक कि कुछ लोग तो पड़ोसी के यहां डबल-बेड आ जाये तो इस पीड़ा से पीड़ित हो जाते हैं। यह पीड़ा हमारे देश के शिक्षा संस्थानों में कुछ ज्यादा ही फैली है। जैसे ही किसी विश्वविद्यालय में प्रवेश करो, तो हर विभाग में केंचुली ही केंचुली देखने को मिल जाती है। जितना बड़ा शिक्षा का मंदिर , उतने बड़े साँपनाथ-नागनाथ विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं।

कुछ दिनों पहले मैं गलती से एक कलेक्टोरेट कार्यालय में चला गया। जैसे ही एक बाबूजी की टेबल के सामने पहुंचा, ‛वे केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजर रहे थे।’ उनका कहना था, “अभी थोड़ी देर बाहर जाईये, मैं अभी तो कलेक्टर साहब के बंगले से आ रहा हूँ ! पहले मैडम का काम तो निपटा लू..!” बेचारे बाबूजी, उस दिन इस पीड़ा से बहुत ज्यादा परेशान दिखे। आखिर में लंबी प्रतिक्षा के बाद उन्होंने मेरी बात तो सुनी, लेकिन शाम को जब मैं घर पहुंचा तो मुझे भी अपनी श्रीमति के सामने केंचुली उतारने की पीड़ा से दो-चार होना पड़ा।

जैसे-जैसे हमारा गणतंत्र बड़ा हो रहा है और बड़प्पन की ओर जा रहा है। यह पीड़ा उसके अधिकांश चंदन के खंभों पर बढ़ती जा रही है। कोई इस पीड़ा से अपने ही घर में पीड़ित हैं तो कुछ लोग संसद के हर सत्र में केंचुली उतारते हुए देखें जा सकते हैं। वहीं कुछ स्वघोषित राजनीतिक राजाधिराज जब तक विदेशी धरती पर जाकर अपनी केंचुली नहीं उतारते, उन्हें इस पीड़ा में आनंद ही नहीं आता...!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Saturday, March 18, 2023

जीवन जीने के लिए है, मिटाने के लिए नहीं...!

 जीवन जीने के लिए है, मिटाने के लिए नहीं...!

     



आत्महत्या एक कायराना व बुजदिल कृत्य है जो कि हमारे समाज में दिनोंदिन न जाने क्यों बढ़ती जा रही हैं ! क्या हम गलत विकास की परंपरा व नीतियों की तरफ जा रहे हैं जिससें हमारा युवा आत्महत्या की ओर जा रहा है ? किसी परीक्षा में कम नंबर आना, अच्छा मोबाइल-कार नहीं होना, पारिवारिक तनाव, सरकारी नौकरी नहीं होना आदि जैसी छोटी-छोटी बातों के कारण आजकल युवा व बड़े भी आत्महत्या जैसा कायराना कृत्य करते है। आत्महत्या जैसे कृत्य को किसी भी तरह से इस पीढ़ी को मिटाना होगा। समाज के जिम्मेदार लोग व अभिभावक इस ओर विशेष ध्यान दे।

आखिर क्या कारण है कि भगवान व प्रकृति की सबसे सुंदर रचना जीवन ओर वह भी मानव जीवन को हम इतने सस्ते में आत्महत्या के भेंट चढ़ा रहे ! ऐसा करते समय उन माँ बाप के बारे में कोई कुछ क्यों नहीं सोचता है जो हमें कई परेशानियों व मुश्किलों से पालते पोसते हैं तथा जीने लायक बनातें हैं। हर एक इंसान के जीवन में प्रकृति ने कुछ न कुछ संघर्ष दिया है। हम संघर्ष से भाग नहीं सकते हैं। जिंदगी जीने के लिए संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। संघर्ष में ही जीवन की असल खुशी व आनंद छूपे रहते हैं।

कैसा भी जीवन हो लेकिन आत्महत्या कभी भी सही कदम नहीं हो सकता, ना ही यह कोई विकल्प हैं जीवन के संघर्ष के लिए। दुनिया में हर इंसान को हजारों परेशानिया रहतीं हैं लेकिन फिर भी जीने का एक ही तरीका है कि जीने के लिए संघर्ष करो, जो हैं वहीं स्वीकारों व परिस्थितियों से मुकाबला करो। जीवन एक सुंदर व सुहाना सफर हैं इसकी यात्रा करो, इससे भागों मत। इस यात्रा में माना कि बहुत सी कठिनाई आ सकती है लेकिन उनके बाद ही जीवन का असल मूल्य भी हमें पता चलता है। जीवन से भागना कायरता ओर वही आत्महत्या नपुंसकता हैं।

हो सकता है जिन परिस्थितियों में आप है तथा वे आपके अनुकूल नहीं है तो थोड़ा अपनी कार्य शैली व विचारों में बदलाव लाए, कही घुमने चले जाए, कुछ नया पढ़े, कुछ नए मित्र बनाए, गरीब लोगों के बीच जाए, अपने से छोटे लोगों को देखे कि वे कितना संघर्ष कर रहे हैं ओर फिर देखेगे कि आप तो सुखी हैं। हमेशा किसी एक लक्ष्य पर नहीं रूके, क्योंकि जिंदगी का सफर व मंजिल बहुत बार रास्ते बदलने से सुहानी व सुखद हो जाती हैं। आत्महत्या कभी भी जीवन को सार्थक व परिपूर्ण आनंद नही दे सकती हैं। आत्महत्या का प्रयास या फिर इस जैसे कृत्य करकें आप अपराध करतें हैं। ऐसा अपराध न करें। यह प्रकृति व ईश्वर की मानहानि है। कैसी भी सुंदरता व सुख जीवन को जीने में है ना की जीवन को कायरतापूर्ण मिटाने में ।

हमेशा ध्यान रखें, आप अकेले नहीं है जिसके जीवन में परेशानीयाँ हैं। सबके साथ ऐसा होता है। एक या दो अदद मित्र या साथी जरुर बनाए , जिससें आप अपनी सब तरह की बातें व परेशानियां उनसे साझा कर पाए। वो मित्र व साथी कोई भी हो सकता है आपकी माँ, पिता, भाई, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दोस्त आदि कोई भी। जब भी कोई कठीन परिस्थिति आए या आपको ऐसा लगता है कि आप जीवन के संघर्ष व जटिलताओं से हार रहे हैं तो माता-पिता से जरुर साझा करे या माँ के चरणों में बैठ जाए, सबकुछ सही हो जाएगा। लेकिन छोटी छोटी बातों से तनाव में आ जाना व आत्महत्या कर लेना पुरी तरह से गलत है। हमें अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य का भी सतर्कता के साथ ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि कहा भी गया है कि “मन चंगा तो सब चंगा”...!

वर्तमान समय में बाजारवाद व पूँजीवाद को समझे ,इनके कारण से बहुत सी आपकी मानसिक परिस्थितियां इनके अधीन है इनसे मुक्त रहे। आज की गलाकाट प्रतियोगिता के चक्कर में न पड़े तथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रण में रखें। पड़ोसी कौन सी कार लाया हैं या दोस्त कितना पैसा कमा रहा है उससे आपका कुछ भी भला नहीं होगा। किसी के देखादेखी जीवन नहीं जीना चाहिए ना ही किसी भी तरह की अनुचित होड़ा-होड़ी करना चाहिए। आपनी स्वतंत्र सोच व विचार रखें, किसी के देखा देखी जीवन न जीए। स्वंय की क्षमताओं व योग्यताओं से अपने जीवन के लक्ष्य बनाएं तथा हमेशा एक ही लक्ष्य पर भी न अड़े रहे। क्योंकि जीवन आनंद लेने के लिए हैं न कि अपने आप को तनाव की भट्टी में जलाकर आत्महत्या कर लेना है।

जब भी ऐसा लगें कि जीवन में मजा नहीं आ रहा है या असफलता ही असफलता हाथ लग रही हैं तो कहीं घुमने चले जाए, कोई नई किताब पढ़े, गांव देहात में चले जाए या कोई नया शहर घुम आए, अपने बच्चों या पत्नी के साथ समय बिताए या प्रेमिका के साथ बैठकर बातें करे। आपको ऐसा लगे हम तो बहुत गरीबी या संघर्ष में जी रहे हैं तो गांव-देहात में जाकर जीवन देखे, वही गांव वाले शहर वालों का जीवन देख ले। बड़ा पद या अच्छा पैसा कभी जीवन का अंतिम औचित्य व सफलता नहीं है। इसके आलावा भी जीवन बहुत सुंदर व आनंदमय हैं। लेकिन एक या दो असफलता या थोड़े बहुत आभावों के कारण आत्महत्या कर लेना कायरता तो हैं ही साथ ही अपने माता पिता व प्रकृति को धोखा देना है।

हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्ति की मौलिकता से छेड़छाड़ न करें। खासकर बच्चों पर कुछ भी न थोपे, उन्हें सहज आगे बढ़ने दे। अभिभावक अपने सपनों का भार अपने बच्चों के कंधों पर ना डालें। महान जीवन या व्यक्ति कुछ नहीं होता है यह तो हर इंसान का अपना मौलिक व्यक्तित्व होता है। जीवन जिंदगी को मस्ती से जीने के लिए मिला है, ना की आत्महत्या करने के लिए। जीवन ईश्वर की अनुकंपा हैं, माँ पिता का दुलार हैं, इसे आत्महत्या कर प्रकृति व मानवजीवन का अपमान व इनके साथ धोखा न करें।



भूपेन्द्र भारतीय ( अधिवक्ता व लेखक )
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Tuesday, March 7, 2023

वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!

 वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!




उनके पास अपना कोई कैलेंडर नहीं है। वे हर त्यौहार पर दूसरों से ही त्यौहार की सही तिथि पूछते रहते हैं। इस बार फिर होली आने वाली है। वे पीछले वर्ष वाला ही प्रश्न पत्र लेकर बैठ गए है। सारे प्रश्न पहले वाले हैं। उन्हें नवीनता से एलर्जी है। वे होली सिर्फ़ छोटे से तिलक वाली खेलते हैं। ज्यादा रंग उनके काले-सफेद जीवन में ख़लल डालते हैं। उन्हें हुड़दंग पसंद नहीं है। कभी कभी तो उनकी गली में होली खेलते बच्चों से भी उन्हें खीझ हो जाती है। उन्हें गंवारों वाली होली पसंद नहीं है। वे होली को भी शालिनता से मानने में विश्वास करते हैं। वे संभ्रांत मानुष जो ठहरे ! वे संभ्रांत होली के शौकीन हैं..!

हर बार की तरह उन्होंने अपना पुराना सफेद कुर्ता-पजामा निकाल लिया। उन्होंने इस कुर्ता-पजामा से कितनी ही होली निपटा दी है। पीछले वर्ष बच गई गुलाल की पूढ़ी उन्हें फिर मिल गई है। उनकी मंडली के सदस्यों से उनकी बात हो गई है। होली कब है सभी से उन्होंने कंफर्म कर लिया है। किसके घर रंग गुलाल करने जाना है और किसके घर नहीं, यह निर्णय भी बहुमत से फोन पर ही पारित कर दिया। उन्होंने इस बार की होली पर फिर पानी के प्रबंधन पर लंबा-सा आलेख लिखकर पिच्चतीस अखबारों में भेज दिया है। होली के बाद उनका एक लंगोटिया ठंडाई का भी प्रबंध करेगा। उसके लिए आनलाईन चंदा मांगा गया है। ठंडाई के बाद उनका मन है कि एक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाए। जिससे वे अपने मन की बात कह सके। उन्होंने अपने प्रिय विषय;-“होली पर जानवरों की सुरक्षा व पर्यावरण संरक्षण” पर जोरदार तैयारी कर ली है।

हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने होली पर नेताओं के लिए चुटकी लेकर चुटकी भर लिख डाला है। अब वे इसके छपने की प्रतिक्षा कर रहे है। उनका लिखा होली के रंगों जैसा ही होता है। कौनसा रंग किसके साथ मिला हुआ है यह वे भी नहीं जानते। एक बार जो लिख दिया, वह साहित्य की रंगीन गंगा के हवाले।
होली के एक दिन पहले तक ‛हर वर्ष की तरह इस बार भी वे होली कब है ?’ की रट लगाये हुए है। उन्हें कहीं से सही उत्तर नहीं मिल रहा है। होली की सही तारीख व तिथि पर उनके मन में असमंजस चल रहा है। सरकारी छुट्टी ने अलग से दुविधा में डाल दिया है।

उनकी तैयारियां पूरी हो चुकी है लेकिन होली का रंग कहीं चढ़ता दिख नहीं रहा है। टीवी चैनलों पर भी उन्हें अब तक कोई निमंत्रण नहीं मिला है। उनके पास अब तक वरिष्ठ साहित्यकार का भी फोन नहीं आया है। हालांकि अपने नगर के वे स्वयं सबसे वरिष्ठ साहित्यकार है। ऐसा उनका दृढ़ विश्वास है। भले ही हिन्दी साहित्य के आलोचक उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार ना मानते हो। इसलिए वे ऐसे साहित्यिक साथियों से होली पर दूरी बनाकर रखते हैं।

आखिर में जैसे ही होली का दिन आता है तो सबसे पहले वे अपनी स्वयं की पत्नी को सुबह-सुबह ही एक छोटा सा टीका लगाकर होली का श्रीगणेश करते है। पाँच-पंद्रह वाट्सएप समूहों में भी वे होली की पंक्तियां फेंकते है। फेसबुक पर एक कालजयी रंगारंग पंक्ति लिखकर होली का डिजिटल श्रीगणेश भी कर देते है। अपने ही बच्चों को केमिकल रंगों से कैसे बचें व इको फ्रेंडली होली कैसे खेलना है इस विषय पर भी सुबह सुबह ही संक्षिप्त भाषण सुनाते हैं। अपने प्रिय कुत्ते को भी एक छोटा सा टीका लगा देते है और उसे कड़ा संदेश देते है कि उसे आज घर से बिल्कुल बाहर नहीं निकलना है ना ही पड़ोसी के बच्चों के साथ भौं-भौं खेल खेलना है।
वहीं इस दिन वे आस पड़ोस वालों से बात तक नहीं करते। उन्हें होली के दिन भी आसपड़ोस वालों को ना ही मुँह लगाना पसंद है और ना ही रंग ! उन्हें लगता है कि इससे उनकी वरिष्ठता में कमी आ सकती है । इसलिए वे सुबह सुबह अपने घर में ही होली का श्रीगणेश करके वीआईपी कॉलोनी में रहने वाले अपने स्तर के साथियों के बीच पहुंच जाते है। आखिर में अपने स्तर के वरिष्ठ लोगों के बीच पहुंचकर होली का रंग लेना शुरू करते है। आखिर वे वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Tuesday, February 21, 2023

सरकार हमारे “कम्पोजिट कल्चर” वाले....!!

 सरकार हमारे “कम्पोजिट कल्चर” वाले....!!

         



सरकार हमारे कम्पोजिट कल्चर में विश्वास करते हैं।उनकी नीति में मार भी है तो साथ ही पुचकारना। वे मारते भी है और रोने भी नहीं देते। उनके एक हाथ में लड्डू है तो दूसरे हाथ में मँहगाई ! एक पांव के नीचे गाँवों की अटल सड़कें है तो दूसरे पांव के नीचें चार्टर्ड प्लेन है। बहनों के लिए साईकिल है तो भाईयों के लिए सिर्फ लड्डू ! सरकार हमारे देशी रुप भी धरते है तो विदेशी मुद्रा में भी आ सकते हैं। सरकार हमारे गरीब-अमीर में कोई भेदभाव नहीं करते। वे चुनावों के समय गरीब की शरण में रहते है तो वहीं चुनाव होने के बाद अमीरों के..!

सरकार हमारे अपनी सरकार भी कम्पोजिट शैली में चलाते हैं। उनकी सरकार में देशी-विदेशी दोनों तरफ के मंत्री-विधायक मिल जाते है। कुछ का भाव कम होता है तो कुछ का डॉलर में ! उनकी सरकार में ऊँचे से ऊँचे दाम वाले प्रोडक्ट है तो वहीं जमीनी समीकरण साधने वाले ब्रांड भी मिल जाऐंगे। वे बैठकर भी खा सकते हैं और खड़े-खड़े किसी भी बफर पार्टी का आनंद ले सकते हैं।

यह कम्पोजिट संस्कृति ही है जिससे हमारा लोकतंत्र फलफूल रहा है। तुम भी खाओं और हमें भी खाने दो। हम ऊपर से खाकर निचे भेजते हैं, तुम नीचे वालों की थाली में से छेद कर हम ऊपर वालों को पहुंचाओ। हमारे लोकतंत्र का यह कम्पोजिट कल्चर कितना कल्याणकारी राज्य बना रहा है। हर राज्य जनकल्याण के मार्ग पर दिनोंदिन आगे बढ़ता जा रहा है। जनता के लिए चौराहे-चौराहे कम्पोजिट कल्चर की दुकानें खोल दी है। आओ जैसा माल चाहिए ले जाओ। एक जगह से ही देशी-विदेशी ब्रांड उपलब्ध होगा। इस कंपोजिट कल्चर की बदोलत कितने ही राज्य राजस्व की लंबी उड़ान भरते हैं। कंपोजिट कल्चर वाले मंत्रालय में हर कोई खूब फलता फूलता रहता है। इस कल्चर से राज्य में विकास की गंगा बहती रहती है। झूठे है वे अर्थशास्त्री जो राज्यों को कर्ज तले दबा हुआ बताते रहते हैं। भला जिस कंपोजिट कल्चर की बदौलत नियमित सेवा मिलती हो उससे किसी को कोई नुकसान हो सकता है। फिर वह राज्य तो कल्याणकारी राज्य कह लाऐगा ही !

ऐसा महान व सर्वहितकारी कल्चर शुरू करने पर हमारे सरकार को नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए। हर कंपोजिट कल्चर की दुकान पर हमारे सरकार का आदमकद पोस्टर लगना चाहिए। हर मंत्रालय को इस कल्चर का अनुकरण करना चाहिए। शिक्षा व स्वास्थ्य मंत्रालय में भी कंपोजिट कल्चर की जल्द से जल्द शुरुआत कर देना चाहिए। देशी शिक्षक के साथ साथ विदेशी शिक्षक की भी भर्ती करना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में भी कंपोजिट कल्चर आना चाहिए। देशी दवाओं के साथ साथ विदेशी दवा भी उपलब्ध हो। न्यायपालिका को भी अपना बौझ कम करने के लिए कंपोजिट कानूनी कल्चर पर विचार करना चाहिए। जैसे हमारे लोकतंत्र में कंपोजिट कल्चर है, भारतीय लोकतंत्र व इंडियन डेमोक्रेसी ! एक देशी-दूसरा विदेशी माल।
         
मेरी तो फ्री में राय है कि यह कंपोजिट संस्कृति विश्व स्तर पर लागू होना चाहिए। जल्द ही संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधि मंडल को भारत में आमंत्रित करके इस कल्चर की खूबसूरती पर व्याख्यान दिया जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों में इस कल्चर पर सेमिनार आयोजित करवाने चाहिए। शिक्षा मंत्री व वर्तमान सरकार से मेरा निवेदन है कि नई शिक्षा नीति में कंपोजिट कल्चर को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ‛जैसे आनलाइन माध्यम से घर बैठे देशी व विदेशी डिग्री दी जाना चाहिए।’ बताओं इस कल्चर से सरकार का कितना धन बचेगा। जीडीपी बढ़ जाऐगी। हम विश्व अर्थव्यवस्था में मजबूत हो जाऐंगे।



भूपेन्द्र भारतीय 
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हिन्दी साहित्य का “निराला सूर्य” ।

 हिन्दी साहित्य का “निराला सूर्य” ।

                 

  

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को भारतवर्ष में हिंदी साहित्य जगत में कौन नहीं जानता। वे अपनी हिन्दी साहित्य, कविता व व्यक्तित्व में निराले तो थे ही, साथ ही आज तक हिन्दी साहित्य में सूर्य की तरह चमक रहे है। बिना उनकी चर्चा किए आज क्या हिंदी साहित्य की चर्चा की जा सकती है ? उन्होंने हिन्दी साहित्य में लगभग सभी विधाओं में प्रचूर मात्रा में लिखा। उनका साहित्य आज भी हिन्दी भाषा व साहित्य के लिए अमूल्य निधि है।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‛निराला' का जन्म रविवार को हुआ था। इसी से उनका नाम सूर्यकांत पड़ा। लेकिन सूर्य के पास अपनी धधकन के अलावा और क्या है ? हम सूर्य की पूजा करते हैं, क्योंकि वह जीवनदाता है। लेकिन सूर्य किसकी पूजा करे ? कवियों के कवि निराला सूर्य की तरह ही जीवन भर धधकते रहे। बचपन में मां चली गईं, जवानी आते-आते पिता न रहे। धर्मपत्नी को प्लेग खा गया। बेटी का विवाह नहीं हो सका और अकालमृत्यु हुई। जीवन भर कभी इतने साधन नहीं हुए कि कल की चिंता न करनी पड़े। किसी प्रतिभाशाली और संवेदनशील लेखक के साथ इससे ज्यादा ट्रेजेडी और क्या हो सकती है ? फिर भी, निराला प्रकृति और संस्कृति दोनों के अभिशापों को झेलते हुए अपनी सृजन यात्रा पर चलते रहे। यह आत्मिक शक्ति ही निराला जैसे लेखकों की विलक्षणता है। निराला ने ठीक ही कहा है, मैं बाहर से खाली कर दिया गया हूं, पर भीतर से भर दिया गया हूं। यह कोरा अनुप्रास नहीं था - निराला का यथार्थ था।

प्रसिद्ध आलोचक व निराला जी पर प्रमाणिक लेखन करने वाले रामविलास शर्मा अपने संस्मरणों में कहते है कि सन् 34 से 38 तक का समय निराला जी के कवि जीवन का सबसे अच्छा समय था । उनका कविता- संग्रह ‛परिमल’ छप चुका था, लेकिन ‛गीतिका’ के अधिकांश गीत, अपनी सर्वश्रेष्ठ कविताएँ ‛राम की शक्ति पूजा', ‛तुलसीदास’, ‛सरोज स्मृति' आदि उन्होंने इसी समय लिखी। गद्य में ‛अप्सरा-अलका' उपन्यास छप चुके थे, लेकिन ‛प्रभावती’ , ‛निरुपमा’ उपन्यास और अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कहानियाँ उन्होंने इसी समय लिखीं। यही बात उनके निबंधों के बारे में भी सही है। उस समय उनकी प्रतिभा अपने पूरे उभार पर थी। उसके पहले जो कुछ था, वह तैयारी थी, बाद को जो कुछ आया, वह सूर्यास्त के बाद का प्रकाश भर था।

निराला जैसी महाप्राण प्रतिभा विरोध से, टकराहट से ही तीक्ष्ण और पुष्ट होती है। अस्मिता का बोध उसमें इसी तरह जागता है । निराला में यह बोध एक समग्र भारतीय अस्मिता के बाद में उत्कर्ष पाता देखा जा सकता है।

सांस्कृतिक लयभंग की - वेदना निराला के कृतित्व का एक प्रमुख प्रेरक सूत्र बनी --उसके वादी- संवादी स्वरों को निर्धारित करती हुई।
हो गए आज जो खिन्न-खिन्न
छुट-छुट कर दल से भिन्न-भिन्न
वह अकल कला गह सकल छिन्न जोड़ेगी। (तुलसीदास)

कविताएँ पढ़ने और सुनाने में उन्हें बड़ा आनंद आता था। सैकड़ों कविताएँ उन्हें कंठाग्र थीं, अपनी नहीं दूसरों की भी। वहीं निराला जी का घर साहित्य प्रेमियों का तीर्थ-स्थल था। प्रसिद्ध साहित्यकारों से लेकर विद्यार्थियों तक के लिए उनका द्वार खुला रहता था। निराला जी का निराला साहित्यिक व्यक्तित्व था। वे साहित्यकारों का सम्मान करते थे और उनसे खुलकर मिलते थे, लेकिन धन और वैभव का सम्मान करना उन्होंने न सीखा था। उनके जीवन से जुड़ी ऐसी ही एक बात थी कि एक राजा साहब लखनऊ आए थे। उनके सम्मान में गोष्ठी हुई। सभी साहित्यकार एकत्रित हुए । राजा साहब के आते ही अब लोग उठ खड़े हुए , केवल निराला जी बैठे रहे। राजा साहब के लिए एक भूतपूर्व दीवान लोगों का परिचय कराने लगे --‘गरीब परवर ! ये अमुक साहित्यकार हैं’ जब वह निराला जी तक पहुँचे तब तक महाकवि उठ खड़े हो गये और भूतपूर्व दीवान को ‛गरीब परवर’ से आगे बढ़ने का मौका न देकर बोल उठे--‘ हम वो है जिन के दादा के दादा की पालकी आपके दादा ने उठाई थी।’ यानी भूषण की पालकी छत्रसाल ने उठाई थी । भूषण के वंशज हुए निराला जी और छत्रसाल के वंशज हुए राजा साहब।

ऐसे कितने ही निराले व जीवंत किस्से उनके जीवन से जुड़े रहे हैं। उन्हें समझना सामान्य व्यक्ति व लेखक के बस की बात नहीं है। उनके साहित्य व जीवन से जुड़े संस्मरण पाठक आज भी पढ़कर अचंभित हो सकता है। ऐसा विशाल व निराला साहित्यिक जीवन रहा था।
उनके ऐसे ही निराले व्यक्तित्व व साहित्यिक रूप के लिए नजीर बनारसी ने निराला जी के स्वर्ग चले जाने पर कहा था...
अलग उसका रस्ता, अलग उसकी मंजिल
निराली डगर और राही निराला ।
अजब सूर्य डूबा है हिन्दी जगत का
कि डूबा तो कुछ और फैला उजाला।

यह हिन्दी साहित्य का निराला सूर्य भले देह से अस्त हो गया हो, लेकिन हिन्दी साहित्य व हिन्दी भाषा में आज भी ओर आगे भी अपने साहित्यिक प्रकाश से चमकता रहेगा। उनके निराले विशाल व्यक्तित्व ने हिन्दी साहित्य को आज भी प्रकाशित रखा है। इसलिए ही इस हिन्दी साहित्य के निराला “सूर्य” ने अपनी कविता के माध्यम से कहा था ;-
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत ,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनंत
अभी न होगा मेरा अंत।

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अंत। 

संदर्भ

1. https://www.rachanakar.org/2007/10/blog-post_7060.html?m=1

2. https://www.amarujala.com/columns/opinion/hero-of-spring-suryakant-tripathi-nirala

3. https://m.bharatdiscovery.org/india/

4. निराला संचयिता, वाणी प्रकाशन , संस्करण 2010

5. नया ज्ञानोदय पत्रिका अंक मार्च 2018, महाकवि निराला पर एकाग्र


भूपेन्द्र भारतीय 
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Sunday, February 19, 2023

।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

 ।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

     



अंग्रेजों के शासन में भी ओर उनके जाने के बाद भी उनके मानस पुत्रों के द्वारा यह विमर्श चलाया गया कि भारत अंग्रेजों के आने के पहले एक राष्ट्र नहीं था ! कितना बड़ा झूठ व षड्यंत्र भारत के खिलाफ फैलाया गया। इस झूठे विमर्श से ही पर्दा यहां इस पुस्तक में उठाया गया है। श्री रंगा हरि द्वारा लिखी गई यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रत्व के रोचक व गौरवशाली अनन्त प्रवाह पर प्रकाश डालती है। पुस्तक भारत के गौरवशाली राष्ट्र भाव का तथ्यात्मक वर्णन करती है। 19 विभिन्न तरंगों में विभाजित इस पुस्तक की प्रत्येक तरंग पाठक के रोंगटे खड़े कर देती है। और साथ ही पाठक के मन भारतीय संस्कृति व धर्म के गौरव का भाव ओर बढ़ाती है। आखिर में डॉ. मनमोहन वैद्य, मिलिंद ओक, डॉ. भगवती प्रकाश व श्री रंगा हरि के आलेख राष्ट्र प्रेमी पाठकों के लिए प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक है।

भारत का ‛राष्ट्र’ अंग्रेजी ‛Nation’ से अलग है। यह किस तरह से अलग है यही इस पुस्तक का प्रमुख विषय है। भारतीय जीवनदृष्टि के मूलग्राही चिंतक श्री रंगा हरि ने भारत की राष्ट्र विषयक जो विस्तृत चर्चा की है, वह इस पुस्तक की विशेषता है। पुस्तक में बताया गया है कि भारत का वेदजन्य राष्ट्र नर-केन्द्रित न होकर सृष्टि-केन्द्रित है। (माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः)
इसी पुस्तक में भारतवर्ष व भारत का विस्तृत वर्णन किया गया है। देश, जन और धर्म तीनों मिलकर राष्ट्र बनता है।
अनेकता व विविधता से भरा यह राष्ट्र विश्व में कैसे अपनी अलग पहचान रखता है। यह इस पुस्तक में विस्तार से कहा गया है। पश्चिम के राज्य से भारत का राजत्व व राष्ट्र अलग है। यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि राष्ट्र धर्म और नैतिकता से चलता है। ना की विधायिका के कोरे कानूनों से।

इस पुस्तक में बताया गया है कि राजा, पंतप्रधान या फिर वर्तमान में चुने हुए जनप्रतिनिधि का काम नदियों की तरह होता है। वह किसी से कोई भेदभाव नहीं कर सकता है। वहीं राष्ट्र घराना है तो राज्य उसका मकान है। घराना बंधुता पर आधारित है और मकान व्यवस्था पर। भारतीय राष्ट्रत्व की यह संस्कृति व परंपरा वर्षों से ही नहीं है बल्कि आदि अनंत काल से चलती आ रही है। यह बात इस पुस्तक में प्रमाणिक तथ्यों सहित कही गई है। वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण व प्रमाणिक शास्त्रों के माध्यम से यहां भारत के राष्ट्रत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इसी पुस्तक में ना सिर्फ भारतवर्ष की भौगोलिक सीमाओं का वर्णन है साथ ही भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक व अन्य शास्त्रों की विशेषताओं को भी प्रमाण सहित बताया गया है। संक्षिप्त व कम समय में जो भारत के विशाल जीवन व राष्ट्रत्व को समझना चाहता है। उसे इस पुस्तक को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। विश्व के युवाओं के लिए यह नया मार्गदर्शन व नवीन दर्शन का खजाना है। इसी पुस्तक के माध्यम से कहा गया कि कैसे अन्य पंथ व विचारधाराओं को प्रभावित किया और ये भारत में कैसे घुसे। संक्षिप्त में कहे तो पश्चिम व भारत में क्या अंतर है। यह इसी पुस्तक में कहा गया है कि “भारतीय राष्ट्रत्व और यूरोपीय नेशनलिज्म के बीच मोर -मुर्गे का अंतर, यद्यपि दोनों को कलंगी है।”

भारत अंग्रेजों से कैसे भागे व उन्हें कैसे भगाया गया है उस पर भी एक विस्तृत तरंग है। ‘सेफ्टीवाल्व इंडियन नैशनल कांग्रेस’ से एक तरंग है जिसमें कांग्रेस दल की कथनी और करनी पर विस्तार से कहा गया है। अंत में अंग्रेजों के भारत से भागने व उसके बाद की स्थिति पर कई गंभीर बातें कही गई जो आगे चलकर भारत में घटित होकर अधिकांश सही ही रही। इस पुस्तक को वर्तमान युवा पीढ़ी को जरूर पढ़ना चाहिए और साथ ही दुनिया के उन तमाम लोगों को भी जो भारत को सिर्फ़ एक भौगोलिक दृष्टि से देखतें है। यह पुस्तक आसानी से आनलाईन उपलब्ध है और सिर्फ़ ₹१००/- में विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Sunday, February 12, 2023

बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

 बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

       



अक्सर देखा गया है कि बसंत व बजट एक साथ आते हैं। वैसे इन दोनों में ज्यादा कोई समानता नहीं है फिर भी इनकी वाहवाही में बहुत-सी समानताएं देखी जा सकती हैं। इसी कारण बसंत व बजट के राग दरबारी हर चौराहे पर देखें जा सकते हैं। कोई कहता है वाह ! क्या मौसम आया है, तो वहीं यह कहने वाले भी मिल जाऐंगे कि;- “एक तो मौसम बहुत खराब है और ऊपर से ऑफिस जाना है !” वहीं कुछ अर्थशास्त्री बजट को आंकड़ों की बाजीगरी बता कर मुँह फुला रहे हैं। ऐसे में जिसके पास कोई बजट नहीं, वह बसंत से क्या कहें ? उसका कैसा बसंत-बहार...! बिन बजट बसंत सुन बटा सन्नाटा।

फिर भी बहुत से राग दरबारी बजट पर बड़े बड़े स्तंभ लिख रहे हैं। मीडिया को बाईट दे रहे हैं। बजट की दो सप्ताह पहले से समीक्षा करना शुरू कर दी है। कोई कह रहा, यह बजट आम आदमी के लिए रामबाण सिद्ध होगा। भविष्य के लिए यह बजट अमृत के समान सिद्ध होगा। हार्वर्ड में बैठे लाल बादशाह अर्थशास्त्री बजट को आम आदमी के खिलाफ बता रहे हैं। ऐसे में बजट बाबू है कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है। वह अपनी ही धुन में घटते-बढ़ते ही जा रहे है।
जिसे दो समय की रोटी की भी चिंता नहीं है, जो हर बात में कबीरा खड़ा बाजार धुन बजाने लग जाते है। पत्रकार उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि इस बार बजट आपके लिए कैसा रहा ! आप इसे कितने नंबर देने वाले हैं ? जो कभी किसी परीक्षा में कभी अच्छे नंबर नहीं लाया, उससे बजट के लिए नंबर मांगे जा रहे हैं। बजट यह सब देखकर घाटे वाली हँसी में हँस रहा है। उसकी मुस्कान के सूचकांक कुछ ओर ही आंकड़े बता रहे हैं। इस बजट-बसंत के राग पर हर माली एक बार फिर मंद-मंद लोकतांत्रिक लहजे में हँस रहा है।
            


एक स्थिति यह भी है कि बजट की अफरातफरी में बसंत ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा है। बसंत सप्ताह बीतने को है पर बहार के अते-पते नहीं है। राग दरबारी अपने-अपने दिन मना रहे हैं। सबने अपने-अपने बजट का जुगाड़ पहले से ही कर रखा था। बसंत एक बार फिर बजट का कर्जदार हो गया। कहाँ तो बुद्धिजीवीयों को बजट में दो जून की रोटी तक नजर नहीं आ रही है ! वहीं बसंत के माध्यम से राग दरबारियों ने बजट की चर्चा में चार चाँद लगा दिये। हर बार की तरह इस बार भी बसंत सप्ताह में छोटे से बड़े नगर तक बाजार गुलज़ार है। सात दिनों की इस बहार में बाजार उछाले मार रहा है। सौछल मीडिया पर 70 साल से ऊपर वाले राग दरबारी भी वेलेंटाइन डे के संदेश उछाल रहे हैं। बसंत बहार के पवाड़े गा रहे हैं। “संसद भवन बजट-बजट के शोर से गुंजायमान हो रही है और उसके बाहर लोकतंत्र बसंत से कलियां चुरा रहा है। एक तरफ आलोचनाओं का गुलाल है। तो दूसरी ओर गंगा-जमुनी रंग से भरी प्रेम की पिचकारियां छोड़ी जा रही है।”

‛कलियों के खिलने’ व ‛संसद में हलवा’ बनाने वाले इस कोमल काल में ; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे राग दरबारी काल में क्या करूं ? मैं अपने मन को सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों के माध्यम से समझाने का भी प्रयास रहा हूँ ;-
“खिलतीं मधु की नव कलियाँ, खिल रे, खिल रे मेरे मन!
नव सुखमा की पंखड़ियाँ, फैला, फैला परिमल-घन!”

लेकिन वहीं सब कह रहे हैं कि ये दोनों अपनी चरम सीमा पर है। लेकिन ना मैं बजट को पढ़-समझ पा रहा हूँ और ना ही बसंत की बहारों का आनंद ले पा रहा हूँ। बजट के आंकड़े मेरे लिए हमेशा से एक कठिन रसायन शास्त्र की तरह रहे हैं और वहीं बसंत का रसायन जब तक मेरे समझ में आता है, कमबख़्त यह बसंत-बहार मेरे हाथ से निकल जाता है ! लगता है इसबार भी आभासी बजट व बसंत के राग दरबारी रंगों से ही काम चलाना होगा....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

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