Monday, September 22, 2025

हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि काल का प्रश्न है, वहीं हिन्दू विवाह एक पवित्र संस्कार की मान्यता रखता है और हम वेद से लेकर रामायण, महाभारत व वर्तमान हिन्दू विवाह के स्वरूप को देखते आ रहे हैं। हिन्दुओं में विवाह अब भी बहुत विचार-विमर्श , गुणों के मिलान व समानताओं को देखकर होता है। मुख्य बात यह है कि वर्तमान हिन्दू विधि व हिंदू संपत्ति विधि अंग्रेजी मानसिकता की बनी हुई है जो कि अधिकांश स्वतंत्रता के पहले व बाद में जो भी हिन्दू विवाह व संपत्ति विभाजन से संबंधित विधि अधिनियमित हुई हिन्दू परिवार, विवाह, संस्कार , मान्यताओं व संबंधों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई। इसमें राजनीतिक लालच व पूर्वाग्रह से ग्रसित भावनाओं से इनमें संशोधन किये जाते रहे हैं। “2004 के बाद के निर्णयों और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन के संदर्भ में, एक महत्वपूर्ण निर्णय 20 दिसंबर, 2004 से पहले किए गए पैतृक संपत्ति के बंटवारे पर था। इस दिनांक से पहले यदि पैतृक संपत्ति का विभाजन कर दिया गया था, तो उसमें बेटियों को अधिकार नहीं मिलेगा, क्योंकि तब लागू पुरानी विधि के अनुसार, बेटों को ही संपत्ति का अधिकार था। 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में समान का अधिकार मिला।" वर्तमान में इस विधि व संपत्ति विभाजन व्यवस्था पर विधायिका, जनप्रतिनिधियों व हिन्दू समाज को गंभीरता से विचार व मंथन करना होगा। हिंदू समाज, परिवार, विवाह, संस्कार व संबंधों की सुरक्षा व इसके महत्व को यथावत रखने के लिए कोई उचित, न्यायसंगत व निर्विवाद विधि व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए। क्योंकि इस विधि के कारण जैसा मेरा पीछले 15 वर्षों से व्यवहारिक अनुभव है व समाज व न्यायालयों में मामले देखते आ रहा हूँ हिंदू समाज के आधार स्तंभ परिवार व विवाह संस्था दिनोंदिन कमजोर हो रहे हैं। आपस में विवाद दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। भाई-बहन, भुआ, मामा आदि के बीच संबंधों में दरारें आने लगी है। संपत्ति के लालच में संबंधों की गरिमा गिर रही है। हिन्दू समाज के लिए भविष्य में यह घातक हो सकता है या फिर कहुँ इसके परिणाम आने शुरू हो गए है। हिंदू समाज को इसके लिए आगे आना होगा। पूरी तरह से नेताओं, विधायिका व न्यायपालिका के भरोसे रहना घातक व अंधेरे में रहना जैसा है। भूमि व्यवस्था व भू राजस्व से संबंधित विभाग व अधिकारियों के भरोसे तो बिल्कुल भी नहीं रहा जा सकता है। इससे संबंधित अधिकारी, विभाग व मंत्रियों को अक्सर देखा गया है कि वे तो इस भयंकर आपदा में निरंतर माल कूटते देखें व लिप्त पाये गए हैं। इसलिए हिन्दू उत्ताराधिकारी व भूमि विभाजन विधि के संबंध में हम हिन्दू समाज को बेटे व बेटियों की पैतृक संपत्ति के अधिकार के विषय में गंभीरता से विचार , मंथन व विमर्श करना ही होगा। इस चुनौती व समस्या पर हिंदू समाज में जल्द से जल्द जागरूकता बढ़ाना बहुत जरुरी है। 

              






आज के नईदुनिया अंक में तो ये सिर्फ़ दो बड़े राजघरानों के संपत्ति विवाद है लेकिन ऐसे कितने ही विवाद हिन्दू समाज में संपत्ति के विभाजन को लेकर निचले न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चल रहे हैं।

Saturday, May 3, 2025

सरकारी सेवा में अपार सफलता के बाद...!

 सरकारी सेवा में अपार सफलता के बाद...!


लचकलाल ने सरकारी सेवा में लंबा समय काटा और अब सरकारी सेवा में अपार सफलता के बाद वे निजी सेवा क्षेत्र में प्रवेश का लगभग मन बना चुके हैं। ‛वैसे सेवा करने का मन लचकलाल का सरकारी सेवा में रहते हुए भी खूब होता रहा पर सरकारी व्यवस्था उन्हें सेवा नहीं करने देती थी। वह अपने संपूर्ण सरकारी सेवा काल में नौकरी बचाने में ही इतने व्यस्त रहे कि सेवा करना ही भूल गए ! हाँ इस स्वर्णिम कार्यकाल में उन्होंने अपने सरकार व लोकतंत्र के तीनों स्तंभों की सेवा बहुत की, भले जनता की सेवा से वंचित रह गए।’ 


ऐसे में अब सेवानिवृत्ति के बाद लचकलाल को जनता की सेवा की चिंता सता रही है। उनकी पेंशन उन्हें बार बार झकझोरती है कि “हे, पार्थ -तुम अब जनता की सेवा करो। तब ही तुम्हें मुक्ति मिलेगी। मोक्ष का मार्ग यही है। यही तुम्हारा परम कर्त्तव्य है। तुम इस सेवा के लिए निजी क्षेत्र में कूदो। इनवेस्ट करो। यह युग इनवेस्टमेंट का है। मैं पेंशन तुम्हें भवसागर पार नहीं करा सकती हूँ। ” ऐसे विचार लचकलाल के मन को बारंबार उद्वेलित कर रहे हैं। इसमें इनवेस्टमेंट कंपनियों व आनलाइन इनवेस्टमेंट विज्ञापनों की अपनी अलग भूमिका है। भू-माफिया अलग दाने फेंक रहे हैं। उधार लेने वालों का जाल तैयार रखा है। ऐसे में लचकलाल को समझ नहीं आ रहा है कि वह अपनी सरकारी सेवा के दौरान कूटे धन को दूसरों के निजी क्षेत्र में कैसे इनवेस्ट(निवेश) करें। उसने तो जीवनभर कभी टेबल के नीचे से तो कभी सरकारी कार्यालय के पीछे से लिया ही है, उसे लगाना आता ही नहीं। बाजार में धन लगाने के लिए वह किस पर विश्वास करें। यह ज्ञान वह कहाँ से प्राप्त करें। आखिर आनलाइन विज्ञापनों पर भरोसा करें तो कैसे करें ? भू माफियाओं को वह सरकारी सेवा के समय से जानता है! लचकलाल ने सरकारी सेवा के समय किसी पर विश्वास ही नहीं किया था। सरकारी नौकरी में हमेशा ज्ञान देने की आदत ही रही। अब भला ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्या करें ? लचकलाल को इतना तो पता है कि ‛किसी भी तरह का ज्ञान व शिक्षा प्राप्त करने के लिए विनम्र होना पड़ता है। लेकिन उसने तो सरकारी सेवा रौब से की है। वह सरकारी सेवा में कभी झुका नहीं। भला अब वह कैसे झुकेगा। लचकलाल की स्थिति भी पुष्पा जैसी हो गई है कि साला लचकलाल झुकेगा नहीं !' 


लेकिन लचकलाल का जीवन अब तक सफलता से भरपूर रहा है। सरकारी सेवा की अपार सफलता के बाद वह अब किसी भी स्थिति में रिटायरमेंट को भी सफलतम बनाना चाहता है। पेंशनर होकर भी सफल उद्यमी होना चाहता है। अपने जीवन को दूसरे के लिए आदर्श बनाना है। जिससे कि लोग उसकी चर्चा करें। उसके मरने पर जनता उसकी स्मृति में व्याख्यानमाला आयोजित करें। बुद्धिजीवी उसके जीवन के अनछुए पहलुओं पर पुस्तक लिखे।चर्चा करें। उसके जीवन से युवा प्रेरणा ले। उसका सम्मान हो। सरकार तक फिर उसका लोहा माने। जैसे सरकारी सेवाकाल में भी लचकलाल की सेवा का लोहा सरकार को मानना पड़ा था। ऐसे में लचकलाल सफल उद्यमी बनना चाहता है। “सहकारिता व समाजवाद के रथ से उतर कर अब लचकलाल पूँजीवाद की बूलेट ट्रेन में सवार होना चाहता है। वह निजी क्षेत्र में सेवा के माध्यम से सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित करना चाहता है।" वह यह सब करने के लिए कुछ भी कर सकता है। यहां तक की वह ‘अपनी पेंशन तक फूंककर सफलता की गंगा में नहाना चाहता है।’ 

आखिर उसे अपने जीवन में अपार सफलता की आदत जो रही है। वरिष्ठ नागरिक व पेंशनर के तौर पर भी वह सफलता का स्वाद फिर चखना चाहता है। इसके लिए उसने आठ-दस सामाजिक व धार्मिक समितियों की सदस्यता ले ली है। सेवानिवृत्ति के बाद से इन समितियों में वह प्रतिदिन सक्रियता से अपना तन-मन-धन का योगदान दे रहा है। इस राह में उसकी बीपी-सूगर जैसी बिमारी भी आड़े नहीं आ सकती है। अब वो दिन दूर नहीं जब लचकलाल एक बार फिर अपने जीवन के इस अंतिम पड़ाव में भी सफलता के नये शिखर छूने वाला होगा। लगता है एक बार फिर लचकलाल की सेवा भावना से उसके जीवन में अपार सफलता आने ही वाली है...



©भूपेन्द्र भारतीय 

205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,

जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)

मोब. 9926476410

Friday, October 18, 2024

माँ....

आज माँ होती तो धीरे से मेरे माथे पर अपना हाथ रखकर कहती, “आज तेरा जनम हुआ था, नवरता की नवमी तिथि की रात को तू पैदा हुआ था।” वैसे हमारे घर में जन्म दिन मनाने की कोई विशेष परंपरा नहीं रही। दादी जब तक जिंदा थी वह भी ऐसे ही धीरे से मुझे पास बुलाकर अपना आशीर्वाद देती थी और बड़े प्यार से कहती थी आज नवमी को तू पैदा हुआ था व अपने पास से कुछ रूपये जन्मदिन पर जरूर देती। मेरा जन्मदिन जब तक माँ जीवित थी तब तक ऐसा ही मना। अब दादी को जाए सात साल हो गए और माँ को इस मृत्युलोक से जाए को 21 महीने व एक दिन हो गया। 

                     


अब माँ के नहीं होने पर घर पर आता हूँ लगता है घर के किसी कमरे से माँ अभी निकल आऐंगी ओर पूछने लगेगी, आ गया तू, चाय बना दू। यह सब लिखते हाथ अब भी काँप रहे है। गाँव वाले घर जाता हूँ तो वहां भी लगता है कि दादी अभी अपने कमरे से निकलकर पूछने लगेगी, “आ गया बेटा, इत्ता दन में आयो, अपनी दादी को भूल ही गया है और फिर दोनों हाथों के चुम्मे लेने लगती।" 


इन दोनों के जाने के बाद अब घर व मेरा मन एक अजीब खामोशी को ओढ़े रखता है। जो कि घर में पांच बच्चे व बाकी सभी सदस्य भी हैं। लेकिन इस खामोशी को माहेश्वर तिवारी के शब्दों में कहूँ तो.... 


एक तुम्हारा होना

क्या से क्या कर देता है,

बेजुबान छत दीवारों को घर कर देता है । 


ख़ाली शब्दों में आता है

ऐसे अर्थ पिरोना

गीत बन गया-सा लगता है

घर का कोना-कोना 


एक तुम्हारा होना सपनों को स्वर देता है । 


आरोहों-अवरोहों से समझाने लगती हैं

तुमसे जुड़ कर चीज़ें भी बतियाने लगती हैं 


एक तुम्हारा होना अपनापन भर देता है ।


माँ जब इस नश्वर संसार से विदा हुई तो मेरी गोद में थी, मेरी गोद में माँ के प्राण निकले। करीब पांच मिनट तक हार्ट अटैक से झूझती रही व बीच बीच में एक ही बात कहती रही की मेरी पांचों बेटियों का ध्यान रखना। वह पल निरंतर आँखों के सामने आता है, शब्दों के माध्यम से कहा नहीं जाता। अटैक ने अस्पताल पहुंचने ही नहीं दिया। आज 21 माह बाद काँपते हाथों से लिखने की हिम्मत कर पाया। माँ पर लिखना मेरे बस का नहीं रहा है। बहुत मुश्किल होता है इस प्रेम को शब्द देना। मैंने लिखना ही प्रेम पत्रों के माध्यम से सीखा है लेकिन माँ-बेटे के प्रेम पर कुछ लिखना मेरी लिए शुरू से ही असंभव रहा है। वैसे भी बेटे के लिए माँ कभी कहाँ कहीं जाती है... माँ जीवनभर बेटे के आसपास ही तो रहती है। माँ का लाड़ ही जीवनभर बेटे के लिए माँ का साथ है। माँ व दादी माँ के लाड पर पूर्ण लिखना किसी कवि के बस का नहीं है...


आज जब यह सब लिख रहा हूँ तो इसके पीछे कल मेरे प्रिय कवियों में से एक चंद्रकांत देवताले जी की कविताओं को पढ़ रहा था तो यकायक “माँ पर नहीं लिख सकता कविता" कविता को पढ़कर ठहर गया... 


माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता

अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है

माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है

मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ

यह किस तरह होता होगा

घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है

और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ

जब कोई भी माँ छिलके उतार कर

चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है

तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं

माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए

देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे

और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है

चन्द्रमा को गिटार में बदला है

समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया

सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा....!


माँ का जाना फिर भी एक खामोशी-एक शून्य कर गया है। मुझे पता है इस शून्यता को भरना असंभव है। उनकी स्नेहिल स्मृति व लाड ही अब मेरी सबसे बड़ी प्रेम पूंजी है। बाकी बचा, दुनियावी झंझावातों से निपटने का हूनर तो माँ ने मुझे बहुत कम उम्र में ही सीखा दिया था....बड़ा बेटा हूँ ना, बचपन से ही सब बड़ा समझते हैं..! बस माँ के लिए सिर्फ बेटा था। उसके बाद तो बड़ा बेटा, भय्या, मित्र, प्रेमी, पति , पिता, लेखक, अधिवक्ता, प्रोफेसर, भिया, सर...आदि अनादि..!


अपनी इसी अंतिम बात को कृष्णबिहारी ‛नूर' के शब्दों में कहूँ तो....


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,

और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

 

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,

मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं....!! 


©भूपेन्द्र 

Thursday, April 11, 2024

लोकसभा चुनाव में महुआ राजनीति....

 लोकसभा चुनाव में महुआ राजनीति....

       



शहडोल चुनावी दौरे पर कहाँ राहुल गांधी ने थोड़ा सा महुआ का फूल चख लिखा, उसका नशा भाजपा नेताओं की जबान पर सर चढ़कर बोलने लगा और फिर दोनों दलों की ओर से इस फूल के माध्यम से आरोप प्रत्यारोप शुरू। लोकसभा के चुनाव में मध्यप्रदेश में महुआ के फूल ने इस बार अलग माहौल बना दिया है। कुछ पहलवानी बुद्धि के नेताओं की जबान फिसल भी गई और उन्होंने भारत के ग्रामीण समाज के प्रतिक महुआ के फूल को नशे व शौक तक ही सीमित कर दिया !

यदि देखा जाए तो जो पेड़ हिमालय की तराई तथा पंजाब के अतिरिक्त सारे उत्तरीय भारत तथा दक्षिण के जंगलों में प्रचुरमात्रा में पाया जाता हैं , ग्रामीण भारत में जिस पेड़ के फल , फुल,बीज, लकड़ी का आजीविका के रुप में उपयोग होता हो, उसके एक फूल का सेवन करने पर पहलवानी बुद्धि वाले नेतागण शौक या फिर नशे का प्रतीक बताये, बहुत ही दयनीय व ग्रामीण भारत का अपमान है। साथ ही उन सभी ग्रामीण, जनजातीय व आदिवासीय समुदाय के मतदाताओं का अपमान जिनके वोट बैंक के लिए इन दिनों तथाकथित नेतागण उनके घर -घर व गाँव गाँव जाकर वोट के लिए नाक रगड़ रहे हो।
                         

 

यदि 5 मिनट भी गुगल पर आप महुआ के फूल व पेड़ के उपयोग पर पढ़ेंगे तो पाऐंगे कि “ यह एक भारतीय उष्णकटिबन्धीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। महुआ के पेड़ और प्राचीन आदिवासी समाज का बहुत गहरा नाता है, जब अनाज नहीं था तब आदिम आदिवासी समाज के लोग महुआ के फल को खाकर अपना जीवन गुजारते थे, आदिवासी समाज के पारंपरिक सांस्कृतिक लोकगीतों में महुआ के गीत गाए जाते हैं। विशेष प्राकृतिक अवसरों पर आज भी महुआ के पेड़ की पूजा की जाती है। इसकी पत्तियाँ फूलने के पहले फागुन-चैत में झड़ जाती हैं। पत्तियों के झड़ने पर इसकी डालियों के सिरों पर कलियों के गुच्छे निकलने लगते हैं जो कूर्ची के आकार के होते है। इसे महुए का कुचियाना कहते हैं। कलियाँ बढ़ती जाती है और उनके खिलने पर कोश के आकार का सफेद फूल निकलता है जो गुदारा और दोनों ओर खुला हुआ होता है और जिसके भीतर जीरे होते हैं। यही फूल खाने के काम में आता है और 'महुआ' कहलाता है।
यहां तक कि महुआ का उल्लेख संस्कृत व अन्य भाषाओं व बोलियों में होता आया है, भारतीय ग्रामीण समाज के लोकमानस में इससे संबंध गीत व लोकगीत प्रचुर मात्रा में रचे बसे हैं। 'महुआ' जिसे संस्कृत ग्रन्थों में महाद्रुम, मधुष्ठील, मधुपुष्प, मध्वग, तीक्ष्णसार आदि नाम दिया गया है। प्राचीन किवदंतियों के अनुसार इसकी उत्पत्ति का संबंध देवासुर युद्ध से जोड़ा गया है। जिसके अनुसार समुद्रमंथन के उपरांत इस बहुमूल्य वृक्ष संसार में आया। जिसे कल्पवृक्ष के नाम से भी जाना जाता है।

अंग्रेजों ने इसपर कानून बनाकर प्रतिबंध लगाया। ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था में भी महुआ के पेड़ों की अहम भूमिका थी। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के कुल राजस्व का एक चौथाई दवाओं और नशीले पदार्थों से आता था, जिसमें महुआ के फूल भी शामिल थे। चूंकि महुआ के फूलों से बनने वाली अवैध शराब के कारण राजस्व को नुकसान होने लगा, इसलिए अंग्रेजी हुकूमत ने इसके संग्रह पर प्रतिबंध लगाने के भरपूर प्रयास किए। सरकार शराब के अवैध उत्पादन पर अंकुश लगाने के लिए तत्पर थी, इसलिए महुआ के पेड़ उखाड़ने का प्रस्ताव रखा गया। महुआ ग्रामीणों की आय का बड़ा साधन था व अंग्रेज विदेशी शराब भारत में लाना चाहते थे इसलिए अंग्रेजों ने सन 1882 में बंबई विधान परिषद में म्होवरा बिल लाया गया जिसका भारतीय राष्ट्रवादियों ने पुरजोर विरोध किया, क्योंकि महुआ के फूल लोगों के लिए भोजन का एक स्रोत भी थे। हालांकि, अंततः वर्ष 1892 में बिल को पारित करा लिया गया था। स्वतंत्रता के बाद हमारे नेताओं ने इस ओर कोई अच्छा व उल्लेखनीय कार्य तो किया नहीं, लेकिन वर्तमान में दुर्भाग्य ही कहे महुआ पर ओछी व तुच्छ राजनीति की जा रही है।

महुए का फूल बीस-बाइस दिन तक लगातार टपकता है। महुए के फूल में मीठास का प्रायः आधा अंश होता है, इसी से पशु, पक्षी और मनुष्य सब इसे चाव से खाते हैं। इसके रस में विशेषता यह होती है कि उसमें रोटियाँ पूरी की भाँति पकाई जा सकती हैं। इसका प्रयोग हरे और सूखे दोनों रूपों में होता है। हरे महुए के फूल को कुचलकर रस निकालकर पूरियाँ पकाई जाती हैं और पीसकर उसे आटे में मिलाकर रोटियाँ बनाते हैं। जिन्हें 'महुअरी' कहते हैं। सूखे महुए को भूनकर उसमें पियार, पोस्ते के दाने आदि मिलाकर कूटते हैं। इस रूप में इसे 'लाटा' कहते हैं। इसे भिगोकर और पीसकर आटे में मिलाकर 'महुअरी' बनाई जाती है। हरे और सूखे महुए लोग भूनकर भी खाते हैं। गरीबों के लिये यह बड़ा ही उपयोगी होता है। यह गायों, भैसों को भी खिलाया जाता है जिससे वे मोटी होती हैं और उनका दूध बढ़ता है। इससे शराब भी खींची जाती है। महुए की शराब को संस्कृत में 'माध्वी' और आजकल के तथाकथित आधुनिक शहरी लोग 'ठर्रा' कहते हैं। महुए का सूखा फूल बहुत दिनों तक रहता है और बिगड़ता नहीं।" ऐसे कितने ही महत्व व उपयोग है इस पेड़ व इसके फूल, फल , बीज व लकड़ी के। वहीं उससे ज्यादा महुआ भारतीय ग्रामीण समाज की संस्कृति व अस्मिता से जुड़ा है।
ऐसे में नेताओं के द्वारा महुआ का प्रतिक रूप में उपयोग कर अपनी राजनीतिक रोटियों सेकना ग्रामीण भारत के लिए अपमान स्वरूप है। जो वनस्पति सदियों से हमारे समाज को जोड़े हुए है। समाज का पोषण कर रही है। संस्कृति से जुड़ी हुई है। उसे राजनीतिक हथियार बनाना, घिनौनी राजनीति का ही उदाहरण है। जिसपर नेताओं की हल्की व छिछलेदार टिप्पणी निदंनीय तो है ही, साथ ही यह ग्रामीण भारत का अपमान है। जिसके लिए इन्हें क्षमा मांगना चाहिए।


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Saturday, December 16, 2023

"मित्रों अब विदा...जस की तस रख दीनी चदरिया !"

 "मित्रों अब विदा...जस की तस रख दीनी चदरिया !"

       

            गूगल से साभार...

कबीरदास की पंक्ति “जस की तस रख दीनी चदरिया” का अर्थ सामान्यतः हम सब जानते हैं। जैसा मिला था, उसे वैसा ही लौटाना। यह पंक्ति मीडिया से हाथ जोड़ते हुए पीछले 18 वर्षों से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराजसिंह चौहान ने भावुक होते हुए विगत दिनों कही। अब इस पंक्ति के कई मायने निकाले जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के आम आदमी के मामा शिवराजसिंह चौहान ने नवंबर 2005 में पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उसके बाद से आज तक नर्मदा नदी में कितना ही पानी बह चुका है और मध्यप्रदेश जो 2005 में था, वह वर्तमान में बिल्कुल अलग व विकास की ओर बढ़ता राज्य बन गया है। 


एक बेहद बीमारु राज्य को विकास के पथ पर लाने में शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व का बहुत बड़ा योगदान है। उनके मुख्यमंत्री काल में मध्यप्रदेश ने कई ऐतिहासिक निर्णय देखे। राज्य समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर हुआ। मध्यप्रदेश की जनता के बीच “मामा” नाम से चर्चित शिवराजसिंह चौहान ही थे जो सबसे पहले केन्द्र में मनमोहन सिंह सरकार से मध्यप्रदेश के लिए बड़े विकास कार्यों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने केंद्र के द्वारा मध्यप्रदेश के साथ हुए भेदभाव के लिए पुरजोर आवाज उठाई और मध्यप्रदेश में विकास के लिए कई मार्ग खोले। अपने सहज व सरल स्वभाव के कारण शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश की जनता के बीच बहुत जल्द ही लोकप्रिय हो गए थे और अपने 18 वर्षों के कार्यकाल में आखिर तक लोकप्रियता के चरम पर रहे । 


आज जब मध्यप्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा व लोकप्रिय चहरा यदि कोई है तो निसंदेह मामाजी ही है। ऐसे में यह कह देना कि "मित्रों अब विदा...जस की तस रख दीनी चदरिया !" इस बात के कई अर्थ हो सकते हैं ! क्या वे अब राजनीति से सन्यास लेगे ? या फिर भाजपा में नई जिम्मेदारी के लिए उनका मन नहीं है या फिर वे कहना चाहते है कि मुझे जो संगठन व संघ ने जिम्मेदारी दी थी, मैंने उसका निर्वाह कर दिया ? या फिर अपने संगठन व दल से किसी तरह की असंतुष्टि जाहिर करना चाहते हो। इन सब बातों के अलावा इन पंक्तियों के ओर भी मायने हो सकते हैं। लेकिन विगत 18 वर्षों से मध्यप्रदेश की राजनीति में मामाजी का कार्याकाल विकास, संवाद, विवाद, घोटाले के आरोप, भ्रष्टाचार से संबंधित बातें, महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं व अपनी अलग राजनीतिक शैली की लंबी लकीर खींच गया है। 

वो भले मध्यप्रदेश की सड़कों का निर्माण हो या फिर महिलाओं व बच्चों के लिए कितने ही लाभकारी योजनाएं हो। उसी के साथ जुड़ा है डंपर कांड, जो राष्ट्रीय राजनीति में काफी चर्चा में रहा। व्यापमं घोटाले को भला कौन भूल सकता है ? मध्यप्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा नदी में रेत उत्खनन से संबंधित अनियमितता हो या फिर आम आदमी का भ्रष्टाचार के कारण परेशान होना। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो शिवराजसिंह चौहान के पूरे कार्यकाल में निरंतर चर्चा के विषय रहे। वहीं कांग्रेस की 15 महीनों की सरकार के समय विपक्ष में रहते हुए शिवराजसिंह चौहान का मध्यप्रदेश के अंचलों में सरकार के खिलाफ माहौल बनाना। ऐसे विषय है जो उनकी राजनीतिक सक्रियता व जुझारूपन को दिखाते हैं।


शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में 2023 के चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद वे भले कहे कि मित्रों अब विदा ! लेकिन इसके गहरे अर्थ व भाजपा संगठन को बड़ा संदेश तो माना जा सकता है। आज मध्यप्रदेश में मामा मोदीजी से भी लोकप्रिय बनकर उभरे हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब इसे कैसे देखता है यह अगले कुछ माह चर्चा का विषय रहना है। सोशल मीडिया पर शिवराजसिंह चौहान ने अपने आप को जनता का “भाई व मामा" लिख दिया है। आम जनता से जुड़कर रहने की उनकी यह कला उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान दिलाती है। मध्यप्रदेश का पाँचवीं बार मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाने के बाद मामाजी राजनीतिक छवि ओर बढ़ गई है। लाड़ली लक्ष्मी व लाड़ली बहना योजनाओं से उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में  अपना एक अलग ही स्थान बना लिया है। इस कारण ही इस बार के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की महिलाओं ने भाजपा को भारी मतों से जिताया। इस मास्टर स्ट्रोक की सफलता के लिए मध्यप्रदेश की जनता मामाजी को श्रेय देती हैं और इस जीत के लिए उन्हें असली नायक मानती हैं। लेकिन उसके बाद भी शिवराजसिंह चौहान का इतनी सहजता से कह देने कि मित्रों अब विदा...! उनके बड़े राजनीतिक कद को दर्शाता है। वे अटल-आडवाणी युग की राजनीति से संबंध रखते है इसलिए आगे राष्ट्रीय व मध्यप्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका क्या रहेगी, यह महत्वपूर्ण प्रश्न आम जनता में चर्चा का विषय बन गया है। 


अपने 18 वर्षों के कार्यकाल में शिवराजसिंह चौहान पर विपक्ष के द्वारा कई आरोप भी लगाए गए। लेकिन विपक्ष उन आरोपों को सिद्ध नहीं कर पाया। मामाजी निरंतर मध्यप्रदेश के विकास के लिए संघर्ष करते रहे व मध्यप्रदेश को आखिरकार विकास के पथ पर ले ही आये। 2005 में जो मध्यप्रदेश शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई, बिजली, पर्यटन , परिवहन आदि के मामलों में पिछड़ा व बीमारु राज्य था। वह 2023 में आज एक तेज गति से आगे बढ़ता राज्य बन गया है। मामाजी को जो चदरिया मिली थी उन्होंने उसे आज साफ व चमकदार करके डॉ मोहन यादव के हाथों में सोंपी है। यह सही है कि शिवराजसिंह चौहान के ऊपर कई घोटालों व भ्रष्टाचार के आरोप लगे, लेकिन उन मामलों का न्यायालय तक जाना व वहां से कोई ठोस निर्णय नहीं आना, आरोपों को खोखला साबित करता है व मामाजी की छवि को ज्यादा धूमिल नहीं कर पाये। राजनीति काजल की कोठरी के समान है लेकिन मामाजी इस कोठरी से बेदाग निकलने में बहुत कुछ सफल हुए हैं। यह आज मध्यप्रदेश की जनता के मन में उनके लिए प्रेम, लोकप्रियता व स्नेह सिद्ध कर रहा है। 


भूपेन्द्र भारतीय 


Shivraj Singh Chouhan BJP Madhya Pradesh #BJP

Saturday, September 23, 2023

पुस्तक समीक्षा - कम्प्यूटर चीन (अवैध अस्तित्व )- वर्तमान वामपंथी चीन पर रोचक पुस्तक

 कम्प्यूटर चीन (अवैध अस्तित्व )- वर्तमान वामपंथी चीन पर रोचक पुस्तक

       


आज भले चीन दुनिया में अपने अजीबोगरीब उत्पादों व वस्तुओं के कारण चर्चित रहता है। लेकिन वास्तव में इतिहास की गहराई में जाकर देखा जाए तो वर्तमान चीन एक अवैध अस्तित्व वाला देश है। इसी बात को प्रमाणित तथ्यों के साथ प्रो. कुसुमलता केडिया ने अपनी पुस्तक “कम्युनिस्ट चीन अवैध अस्तित्व" में विस्तार से बताया है। पुस्तक के परिचय के रूप में आमुख शीर्षक में ही इस पुस्तक का पूर्ण परिचय व इसकी विषय वस्तु स्पष्ट है। 22 अध्यायों के माध्यम से लेखिका ने इस पुस्तक में चीन की विस्तारवादी कूटनीति व उसकी राजनीति व शासन में चीनी वामपंथियों की घुसपैठ पर सविस्तार लिखा।

जिसे हम चीन कहते हैं उसे चीन स्वयं झुआंगहुआ कहता है। ‛वर्तमान के विशाल भौगोलिक क्षेत्रवाले चीन का निर्माण मुख्यतः सोवियत संघ तथा अन्य पश्चिमी देशों के अनुग्रह, हस्तक्षेप और प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग के कारण ही हुआ है। रोचक यह है कि यह चीन न होकर कम्युनिस्ट चीन है। पारंपरिक चीन को बाहरी शक्तियों से कभी भी ऐसी व्यापक और प्रभावकारी सहायता नहीं मिलती।' इस मुख्य बात को यहां इस पुस्तक में प्रमुखता से विभिन्न संदर्भों व लेखकों की पुस्तक के माध्यम से अलग अलग अध्यायों में स्पष्ट बताया गया।

पुस्तक एक बात ओर प्रमुखता से कहती है कि ‛ सन् 1954 तक चीन में उसके प्राचीन इतिहास का कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। जब माओ जे दुंग ने सोवियत संघ के अनुसरण में सैन्य प्रोद्योगिकी का विस्तार करते हुए भवन निर्माण के लिए जगह-जगह खुदाइयाँ शुरू की, तब उसे पहली बार हूनान प्रांत में एक बड़ा पुरातात्विक क्षेत्र मिला, जिसके आधार पर चीनी सभ्यता की प्राचीनता की बात प्रचारित की गई।' वास्तव में इस पुस्तक के माध्यम से लेखिका ने बताया है कि वर्तमान चीन एक कब्जा किया हुआ क्षेत्र है। वर्तमान में दुनिया के अधिकांश देशों व बुद्धिजीवीयों को पता है कि चीन का करीब 23 देशों से सीमा विवाद है। वर्तमान चीन का अधिकांश भाग उसने अपने पड़ोसी देशों से जबरन कब्जा किया हुआ है। और इस सबके पीछे पश्चिमी ताकतें व वामपंथी विचारधारा सबसे प्रमुख कारण है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्तमान कम्युनिस्ट चीन अपने वर्तमान अवैध अस्तित्व का आकार लेना शुरू हो गया था। वामपंथियों , पश्चिमी ताकतों, पादरियों , रूसी सत्ता व भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सहारे कम्युनिस्ट चीन अपनी विस्तारवाद की कूटनीति पर अपने पड़ोसी देशों की सीमाओं पर अवैध कब्जा करता गया। लेखिका पुस्तक के पहले ही अध्याय के पृष्ठ 16 में लिखती है कि “नेहरू द्वारा माओ जे दुंग या माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी का कब्जा तिब्बत पर करा देने के बाद से पहली बार कम्युनिस्ट चीन भारत का पड़ोसी बना है।” इससे पहले कभी चीन भारत का पड़ोसी नहीं रहा। बल्कि चीन महाभारत काल में भारत के एक जनपद का ही सिर्फ़ भाग था। वह भी सुदूर प्रशांत महासागर क्षेत्र से लगा हुआ था व क्षेत्रफल में बहुत कम था।
इसी बात को पुस्तक में ओर विस्तार से बताते हुए लेखिका ने लिखा है कि ‛वर्तमान कम्युनिस्ट चीन के 28 प्रांतों में से, जैसा कि जॉन की बताते हैं पाँच प्रांत ही मूल चीनी भूमि हैं- हेनान, हेबेई, शांक्सी, शेक्सी और शानदांग। 23 प्रांत 20वीं सदी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका के संरक्षण में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा कब्जा किए गए क्षेत्र हैं।’

पुस्तक के अध्याय 2 में पादरी सैमुअल बील और जोसफ नीडम की चीन में भूमिका पर विस्तार से लिखा गया है और साथ ही बताया गया है कि कैसे पश्चिमी पादरियों ने मूल चीन के भोले भाले लोगों का मतांतरण किया। वहां पर इंग्लैंड की कंपनियों ने वहां के लोगों को अफीम के अवैध धंधे में उतार दिया व उन्हें अफीमची बना दिया। वर्तमान में जो भारत के मणिपुर व अन्य हिस्सों में इन्हें वामपंथियों द्वारा अफीम के माध्यम से विवाद खड़ा कर रखा है। भेद फैलाने और जासूसी करने तथा झूठ फैलाने में इंग्लैंड के अनेक पादरी अग्रणी रहे हैं। इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जाता है। इन्हीं लोगों व इनकी विचारधारा वाले लोगों ने 1950 के बाद कम्युनिस्ट चीन का दुनिया के सामने बढ़ा चढ़ाकर प्रचार प्रसार किया व उसे आर्थिक रूप से विकसित देश बताने के लिए किसी भी तरह के आंकड़ों का सहारा लिया। वहीं वर्तमान चीन की हर विस्तारवादी नीति को विश्व पटल पर सही ठहराने के लिए विमर्श गढ़े गए।

पुस्तक में चीन के इतिहास पर फाहयान व शुंग युन के समय पर भी प्रकाश डाला गया है। उस समय के चीन व वर्तमान चीन में कितना अंतर है यह पुस्तक में स्पष्ट लिखा गया है। भारत का चीन से संबंध व इतिहास में चीन की क्या स्थिति थी। वह भारत के सामने कहीं नहीं ठहरता था। चीन वर्तमान में जितना बड़ा क्षेत्रफल वाला देश है वह पहले कभी नहीं रहा था, निरंतर बदलती रही हैं चीन की सीमाएँ। तुर्को, मंगोलों, मांचुओं, तिब्बतियों और जापानियों ने चीन को एक-एक कर अपने अधीन रखा। और अंत में रूस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार चीन को एक महान कम्युनिस्ट ‛ नेशन स्टेट’ की तरह प्रचारित किया। इसका कारण यह था कि सोवियत संघ का आसपास कोई साथी नहीं था और उसे कम्युनिस्ट चीन के रूप में एक शक्तिशाली साथी दिखा। माओ त्से तुंग ने चीन की परंपरागत संस्कृति को नष्ट करने का एक महाअभियान चलाया और कई लाख चीनियों को मौत के घाट उतार दिया। अंत में चीन के भीतर ही एक कई तरह के विद्रोह हो गए और सैन्य बल से कम्युनिस्ट पार्टी उन्हें कुचलती रही । इस प्रकार वर्तमान चीन पर कम्युनिस्टों का कब्जा है, जो किसी भी अर्थ में चीन की परंपरागत संस्कृति से संबंध नहीं रखता।

आखिर क्या कारण थे कि बाहरी शक्तियों ने वर्तमान चीन का आकार गढ़ने में सहयोग किया ? मैं यहां समीक्षा में इसका खुलासा कर दूंगा तो पाठक की पुस्तक के प्रति जिज्ञासा कम हो सकती है। यहां इस पुस्तक में विस्तार से बताया गया है जिससे पाठक वर्तमान चीन की बनावट को आसानी से समझ जाऐंगे व यह भी समझेंगे की पश्चिमी देशों व रूस को इससे कितना लाभ हुआ व भारत को पीछले सात दशकों में कितना बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। जिसके पीछे जवाहरलाल नेहरू की अतिविश्वास भरी व अव्यवहारिक विदेश नीति जिम्मेदार रही है। ऐसा लेखिका ने अपनी इस पुस्तक में कितनी ही जगह प्रमाण सहित स्पष्ट किया है।

कुल मिलाकर इस पुस्तक के बारे में एक आम पाठक की तरह ही मेरी यह राय है कि यह पुस्तक व इसकी लेखिका अपने विषय के साथ पूर्ण न्याय करती है। कहीं कहीं कुछ तथ्यों व घटनाओं का दोहराव हुआ है लेकिन वह भी अध्याय को स्पष्ट करने के लिए। साथ ही यदि पुस्तक के अंत में संदर्भ सूची होती तो पुस्तक ओर ज्यादा प्रमाणिक होती तथा आगे पाठक इस विषय पर विस्तार से पढ़ना व जानना चाहता तो उसे सुविधा रहती। फिर भी पुस्तक कम्युनिस्ट( वामपंथी) विचारधारा, इंग्लैंड व अमेरिका के पादरियों की करतूतों, पश्चिमी देशों की दुनिया में दादागिरी, अपने व्यापार व हितों के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस जैसे देशों की नीतियों व मानवता पर क्रुरताओ का यह एक अच्छा दस्तावेज है।
ईसाइयत के प्रचार प्रसार के लिए पादरी किस हद तक जा सकते हैं, पाठक जब यह किताब पढ़ेगा तो उसे इस विषय पर विस्तार से जानने-समझने को मिलेगा। किसने चीन को भारत का पड़ोसी बनाया, तिब्बत पर चीन का कब्जा, नेहरू की गलत विदेश नीति, भारतीय सीमा पर चीन का कूटनीतिक कुचक्र , कैसे वर्तमान चीन में मुसलमानों को दबाकर रखा गया है और बाकी दुनिया के मुसलमान इसपर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं, कम्युनिस्ट छाया में भारत-चीन संबंध आदि विषयों पर यहां इस पुस्तक में विस्तार से पढ़ने के लिए है।

लेखिका अंत में कहती है कि भारत की लड़ाई मूल(वास्तविक) चीन से नहीं है, हमारी लड़ाई तो कम्युनिस्ट चीन से है। जो कि एक अवैध अस्तित्व व कम्युनिस्टों के हित साधने का राजनीतिक अखाड़ा है। जिस तरह से 1991 में सोवियत क्षेत्र से कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद समाप्त हो गया, उसी तरह से कम्युनिस्ट चीन से भी तिब्बतियों, मंगोलों, मांचुओं, तुर्को और हानो की मुक्ति आवश्यक है। वहीं इसमें भारत की क्या भूमिका है इस पर भी प्रकाश डाला गया है। वर्तमान में जो कम्युनिस्ट चीन है वह अपना वास्तविक इतिहास तक भी नहीं जानता है वह अब भी दंत कथाओं के आधार पर ही इतिहास लिखता , बताता व गढ़ता रहा है। उसका एक दिन सोवियत रूस की तरह विघटन होना ही है। क्योंकि जिस देश की पृष्ठभूमि ही अवैध अस्तित्व पर टिकी वह लंबे समय तक एक संपूर्ण राष्ट्र नहीं रह सकता है।

अंत में लेखिका की ही बात से मैं अपनी इस पुस्तक समीक्षा को विराम देना चाहुंगा, “वस्तुतः चीन कोई ‛नेशन स्टेट’ नहीं है, अपितु आपस में युद्धरत अनेक राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है और वहाँ भीतरी झगड़े भयंकर रूप से चल रहे हैं और पूरा क्षेत्र कम्युनिस्ट पार्टी का उपनिवेश बना हुआ है। माओ त्से तुंग ने 9 करोड़ से अधिक चीनियों की हत्या कर एक आतंककारी शासन स्थापित किया, परंतु चीन भीतर से धधक रहा है और द्रवणशील स्थिति में है, क्योंकि इतिहास में कभी भी वह नेशन स्टेट रहा ही नहीं है।”



पुस्तक : कम्युनिस्ट चीन अवैध अस्तित्व
लेखक: कुसुमलता केडिया
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
मूल्य : 300


समीक्षक
भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Friday, July 14, 2023

बेसन घोल दिया है, जल्दी आ जाओ....!!

 बेसन घोल दिया है, जल्दी आ जाओ....!!





फोन पर श्रीमती जी का संदेश आया कि “बेसन घोल दिया है, जल्दी घर आ जाओ....!!" मैं थोड़ा चौंका, सोचा कि अभी तो मौसम भी ऐसा नहीं है। कहीं दूर दूर तक बादल भी नहीं है। मैंने इधर से प्रश्न किया, कोई विशेष कारण ? बोली;- शाम को मौसम विभाग ने मुसलाधार बारिश बताई है। मैं हँस दिया। तुम भी कहाँ उनके चक्कर में आ गई। उनकी भविष्यवाणी आजतक सही निकली ? “हमारे यहाँ मौसम विभाग व रोजगार कार्यालय की बातें सही कब हुई हैं ?”
जबरन बेसन व उसके साथ मिलाये गए सब्जी-मसालों की बर्बादी हो जाऐगी। कहाँ तो हम मध्यवर्गीय और ऊपर से इन मौसम विभाग वालों पर विश्वास करना। गरीबी में आटा गिला होने जैसा ही है।
बेसन घोलने की सूचना पर मैं चिंतित इसलिए भी हो गया कि इस मँहगाई के जमाने में बेसन घोलना इतना भी आसान नहीं है ! बेसन के साथ महँगी मिर्ची, जीरा, आजवाइन, बड़े मियां प्याजजी आदि की जरूरत होती है। इन्हें एक साथ खरीदना आसान है ? इनके चक्कर में अच्छे अच्छों की जेब ढीली हो जाती है और बहुमत वाली सरकारें तक चली गई है। और ऊपर से मुझे यह डर सताने लगा कि कहीं बचे कुछे दो टमाटर में से किसी एक टमाटर को तो नहीं घोल दिया...!
मन में विचार आया कि ‛भला इन दिनों मौसम देखकर कौन इतना खर्चा करता है।’ मध्यवर्गीय लोगों को ऐसा आर्थिक अपराध नहीं करना चाहिए। लेकिन उन्हें यह बात समझाने का अपराध मैं कैसे करूँ।
लगा यह समय तो बेमौसम बरसात व बाजार का ही है। मौसम विभाग वाले आखिर कब सही हुए हैं ? जो उनकी बात में आकर इतना बड़ा रिस्क ले ! और फिर मध्यवर्गीय रिस्क ले सकता है !
हम इन दिनों देख रहे हैं कि सरकार तो सरकार, विपक्ष तक की हिम्मत नहीं हो रही है कि कुछ भी घोला जाए या फिर घपला किया जाए। ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा वाले समय में आखिर कौन राजनीतिक बेसन घोलने की हिम्मत करें। ऐसे में श्रीमती जी है कि छुटपुट बादलों व मौसम विभाग वालों के चक्कर में आकर बेसन ही घोल दिया। बताओ भला आसपास वाले बेसन की खुशबू सूंघ लेगें, तो बांका-तिरछा मुँह नहीं बनाऐंगे ? ऊपर से यह माह इनकमटैक्स रिटर्न फाइल करने का है जो अलग।
बेसन घोलना भी है तो पहाड़ों पर जाओ, वहाँ बादल टूटकर बरस रहें हैं , वहां आधुनिक पर्यटकों ने गजब का बेसन घोल रखा है। इन्हें कौन बताएं कि बेसन घोलने का आयोजन भला मैदानी क्षेत्रों में हो, ऊपर यह कैसा आयोजन। सावन के ये भजिए कितने महँगे पड़ सकते हैं ! आखिर भाग्यवान को कौन समझाये !
खैर बेसन घोल दिया है तो निकलना पड़ा। खाने-पीने के शौकीन कभी खिलाने वाले की बात को टाल सकते हैं। श्रीमती जी का आदेश जो था। ऊपर से बादल भी घने होने लगे। थोड़ा मुझे भी लगा कि बारिश हो सकती है। जल्दी ही पहुंचा जाए। कहीं ट्राफिक के चक्कर में मौसम का मजा ना बिगड़ जाए। थोड़ी बहुत बारिश में ही हमारे शहरों की सड़कें नाराज हो जाती है। सड़क के गड्ढे व नगरपालिका का निर्माण कहीं बारिश से नाराज नहीं हो जाए, तब तक घर पहुंचना ही ठीक है। कहीं घर पहुंचने में देरी हो गई और मौसम विभाग वालों की भविष्यवाणी आज सही हो गई, तो फिर भजिए तो गए भाड़ में, “घर में घुसते ही आकाश व रसोईघर से गरज के साथ बादल ओर ज्यादा बरसने लगेंगे....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Sunday, April 9, 2023

उन्हें अक्सर शब्द कम पड़ जाते हैं...!!

 उन्हें अक्सर शब्द कम पड़ जाते हैं...!!




लचकलाल जी जब भी बोलना शुरू करते है उन्हें अक्सर शब्द कम पड़ जाते हैं। नगर में ऐसा कोई आयोजन नहीं रहता है जिसमें लचकलालजी नहीं पहुंच पाते हो। नगर व नगर के 56 किलोमीटर के आसपास तक कहीं भी कोई भी आयोजन हो रहा हो, लचकलाल जी को उसकी खुशबू आ ही जाती है। उनके पंखें(फेन), उन्हें कहीं ना कहीं से फोन कर ही देते हैं। “दादा फलां की काकी मर गई है, वहीं अपने छोटू के जियाजी के पिताजी का रविवार को नुक्ता(पगड़ी) है ! अपने को चलना है, वो अपना खास है और ‛दादा पगड़ी के कार्यक्रम का संचालन आप ही को करना है।’ अब बात कार्यक्रम के संचालन की आ गई है तो जाना ही पड़ता है। लेकिन लचकलाल जब-जब बोलना शुरू करते है उन्हें शब्दों की सीमा घेर लेती है। वे वक्ता के तौर पर जब तक रंग में आते हैं तब तक शब्द की सीमा उनके पीछे पड़ जाती है।यही शब्दों की सीमा अधिकांश समय संचालन के रंग में भंग डालती है !

आयोजन-कार्यक्रम कोई भी हो, लचकलालजी हर विषय पर बोल सकते है। उनके पास जीवन की हर घटना के लिए एक रेडीमेड कहानी रहती है। भले वह कार्यक्रम उठावने का हो, श्रद्धांजलि सभा हो, होली मिलन समारोह हो या फिर नेताजी के भूमि पूजन का। नगर के अधिकांश आयोजनों की चर्चाओं में यह बात सामान्य रहती है कि “इस बार फिर लचकलालजी को पर्ची पहुंचाई गई और कहा गया कि अपनी बात को संक्षिप्त करिए। ऐसे में वे अक्सर शब्दों की मर्यादा के हवाले से अपनी बात वहीं समाप्त कर देते हैं।”

किसी कार्यक्रम में शब्द कम पड़ जाना, लचकलालजी के लिए वैसा ही है जैसे “क्रिकेट में खिलाड़ी का 99 पर आउट हो जाना और प्रेमी-प्रेमिका के आंख मिलाते ही प्रेमिका के पिताजी का घर के दरवाजे पर आ जाना !”
किसी आयोजन में यदि माईक नहीं है तो उनके पास शब्द अपने आप कम पड़ जाते हैं और लचकलालजी स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यक्रम की गरिमा को समझ जाते है। बहुत से आयोजनों में देखा गया है कि जनता कम होने पर भी उन्हें शब्दों की सीमा फिर याद आ जाती हैं। और वहीं किसी आयोजन में भारी-भरकम भीड़ को देखते ही उनका शब्द भण्डार बढ़ने लगता है।

लचकलालजी जब भी किसी आयोजन में मुख्य अतिथि की भूमिका में रहते है तो वहां शब्दों का भंडार लेकर पहुंचते है लेकिन वहां आयोजकों व कार्यकर्ताओं की खींचातानी के कारण फिर उनकी वाणी शब्दों की कमी अनुभव करती है। बहुत बार जनता की भावनाएं आड़े आ जाती है। भीड़ में से कुछ व्यस्त लोग अपने मोबाइल को कान पर लगाते हुए उठने लगते हैं। जनता आपस में संसद जैसी कार्यवाही का संचालन करने लगती हैं। वह कार्यकर्ता जिस पर आखिर में टेंट व कुर्सी समेटने की जिम्मेदारी होती है वह जनता की भावनाओं का ध्यान रखते हुए, “वह कार्यकर्ता आयोजन स्थल के पास ही श्रोता बनकर बैठे किसी कुत्ते को पत्थर मार देता है जिससे जनता का ध्यानाकर्षण हो जाता है !” इन स्थितियों में लचकलालजी को एक बार फिर शब्दों की अपनी सीमा व समय की मर्यादा का पालन करते हुए, अपना स्थान ग्रहण करना पड़ता है। लचकलालजी को इस बात की पीड़ा निरंतर सताती रहती है कि वह ‛अपनी अभिव्यक्ति का पूर्ण आनंद नहीं ले पाते है।’

शब्दों की इन्हीं कमीयों को देखते हुए। लचकलाल जी ने इन दिनों अपना एक स्थायी मंच यूट्यूब चैनल बना लिया है। आजकल वे अपने यूट्यूब चैनल पर महीने में एक दो बार शब्दों की कमी को पूरा करते है। अब अपने चैनल पर उन्हें किसी तरह के शब्दों की सीमा व समय की मर्यादा के वीटो पावर से सामना नहीं करना पड़ता । वे अपने मन की सारी बात कह लेते है और फिर उस ऐतिहासिक वार्ता को 25-30 वाट्सएप समूहों में लिंक के माध्यम से अपने शब्दों की तूफानी रवानगी डाल देते है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदे

Tuesday, March 28, 2023

समलैंगिकता ः पश्चिमी संस्कृति की विकृत मानसिकता

 समलैंगिकता ः पश्चिमी संस्कृति की विकृत मानसिकता

      



समलैंगिक विवाह जैसी संस्था पूर्णतः पश्चिमी संस्कृति की उपज है। यह अमानवीय व अप्राकृतिक यौन संबंध पश्चिम की विकृत मानसिकता का लक्षण है। भारतीय समाज की संस्कृति गौरवशाली रही है। इसमें किसी भी तरह के अनुचित व अप्राकृतिक भोग को कभी भी प्रमुखता से स्थान नहीं दिया है। विधायिका को इस तरह के कृत्यों पर नियंत्रण के लिए कठोर विधि का निर्माण करना चाहिए। 
भारत में वामपंथियों के द्वारा इस तरह के कार्य एक सुनियोजित ढंग से किये जाते रहे हैं और इसके पीछे उनकी मंशा रहती हैं कि किसी भी तरह से भारतीय संस्कृति को बदनाम करना व भारतीय संयुक्त परिवार संस्था को तोड़ना। 
भारतीय न्यायशास्त्र में विवाह को एक पवित्र संस्कार व बंधन बताया गया है ना की किसी तरह की संविदा या फिर शारीरिक भोग की एक साधारण संस्था ! यहां तक कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र - राजनीति पर एक ग्रंथ - में भी समलैंगिकता का उल्लेख है। लेकिन पुस्तक में ये साफ लिखा है कि समलैंगिकता में लिप्त लोगों को दंडित करना राजा का कर्तव्य है, क्योंकि समलैंगिक लोग समाज की बुराई हैं। आखिर क्या कारण है कि वर्तमान में कुछ तथाकथित आधुनिक वर्ग पश्चिम को देखकर इस बुराई को अपना रहे हैं ?

यहां तक कि कई धार्मिक व वैज्ञानिक जानकारों ने भी कहा है कि " समलैंगिकता शास्त्रों के अनुसार एक अपराध है और अप्राकृतिक है। लोग खुद को एक समाज से अलग नहीं मान सकते ... एक समाज में , एक परिवार एक पुरुष और एक महिला से बनता है, न कि एक महिला और एक महिला से, या एक पुरुष और एक पुरुष से। यदि ये समलैंगिक जोड़े बच्चों को गोद लेते हैं, तो बच्चा एक विकृत परिवार के साथ बड़ा होगा। समाज बिखर जाएगा। अगर हम पश्चिम के उन देशों को देखें जिन्होंने समान-लिंग विवाह की अनुमति दी है, तो आप पाएंगे कि वे किस मानसिक तनाव से पीड़ित हैं। और किस तरह से वहाँ का समाज दिनोंदिन मानसिक विकृतियों से जूझ रहा है।”
विगत दिनों में उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष एक मामले में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का विरोध करते हुए कहा, "इस तरह के विवाह भारतीय संस्कृति और भारतीय धर्म के खिलाफ हैं और भारतीय कानूनों के अनुसार अमान्य होंगे, जिन्हें एक पुरुष और एक महिला की अवधारणा को ध्यान में रखकर बनाया गया है।"

कई मनोचिकित्सकों ने स्पष्ट कहा है कि “समलैंगिकता स्पष्ट मनोवैज्ञानिक विकार है जिसका इलाज डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए।” वहीं महान दार्शनिक ओशो ने कहा था, “ समलैंगिकता एक यौन विकृति है, जो पश्चिमी समाज की देन है !”
कुछ वर्ष पहले जब भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को कानूनी दृष्टि से उचित ठहराया तो समाज में भारी विरोध हुआ और कितने ही लोगों ने इस तरह के निर्णय को भारतीय संस्कृति व नैतिक मूल्यों के खिलाफ बताया था। भारत सरकार भी सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिकता के विषय पर अपने जवाब में कह चुकी है कि “समलैंगिकों का जोड़े के रूप में साथ रहना और शारीरिक संबंध बनाने की, भारत की पारिवारिक इकाई की अवधारणा से तुलना नहीं हो सकती।”
एक बार फिर इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय व न्यायिक संस्थाओं में बहस शुरू हो गई है, जो कि भारतीय समाज व विवाह जैसी पवित्र संस्था के लिए जरुरी है कि इस बहस के माध्यम से यह पश्चिमी मानसिक विकृति समाप्त हो तथा इस तरह के कृत्य के लिए कठोर दंड का प्रावधान बने। आखिर हमारा समाज प्रकृति के विरुद्ध कैसे जा सकता है। न्यायशास्त्र में प्राकृतिक न्याय व नैतिक मूल्यों का सबसे ज्यादा महत्व है।


भूपेन्द्र भारतीय ( अधिवक्ता व लेखक )
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Sunday, March 19, 2023

केंचुली उतारने की पीड़ा....!!

 केंचुली उतारने की पीड़ा....!!

           



जब भी चुनाव होते हैं उन्हें केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इस पीड़ा को सहना आसान नहीं है। चुनाव लड़ने से पहले इस पीड़ा में पड़ना और चुनाव बाद हर पाँच साल में इस पीड़ा से दो-चार होना भी पड़ता है। चुनाव में हार के बाद भी केंचुली उतारना और जीत के बाद भी केंचुली उतारना..! वे इस पीड़ा पर उवाचते हैं, “साधों क्या यहीं जीवन है ?”

किसी को कोई भी पुरस्कार मिल गया तो उन्हें फिर अपनी साहित्यिक केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजरना पड़ता है। यह पीड़ा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आजकल तो उन्होंने मुझे भी इस पीड़ा में पटक दिया है। अभी कुछ दिनों पहले ही विदेश में जाकर उन्होंने अपनी केंचुली उतारने की पीड़ा का ढिंढोरा पीटा। ओर ना सिर्फ पीटा, पर पीढ़ामय राग में पीटने की ध्वनि विदेशी अखबारों में छपी भी।
वैसे साँपनाथ-नागनाथ जैसी उनकी दोस्ती के किस्से बहुत चर्चित रहते है। लेकिन यह केंचुली उतारने की पीड़ा के समय उनकी यह सदाबहार दोस्ती किसी काम नहीं आती है। वे लोकतंत्र के किसी भी रण में उतरते तो साथ-साथ , लेकिन कुछ ही समय बाद उनका लोकतांत्रिक गठजोड़ कमजोर पड़ने लगता है। दोनों एक दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगा देते हैं। दोनों एक दूसरे को लोकतंत्र का हत्यारा तक का दोषी घोषित कर देते है। आखिर में वही केंचुली उतारने की पीड़ा उन्हें विदेश यात्रा के लिए मजबूर कर देती है और फिर वे विदेशी जमीन से लोकतंत्र के लिए फुफकारते है।

केंचुली उतारने की यह पीड़ा दिनोंदिन हर संस्था व संगठन में बढ़ती जा रही है। किसी संस्था ने किसी को कोई पुरस्कार दे दिया तो उस संस्था के बाकी सदस्य इस पीड़ा से ग्रसित हो जाते हैं। यहां तक कि कुछ लोग तो पड़ोसी के यहां डबल-बेड आ जाये तो इस पीड़ा से पीड़ित हो जाते हैं। यह पीड़ा हमारे देश के शिक्षा संस्थानों में कुछ ज्यादा ही फैली है। जैसे ही किसी विश्वविद्यालय में प्रवेश करो, तो हर विभाग में केंचुली ही केंचुली देखने को मिल जाती है। जितना बड़ा शिक्षा का मंदिर , उतने बड़े साँपनाथ-नागनाथ विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं।

कुछ दिनों पहले मैं गलती से एक कलेक्टोरेट कार्यालय में चला गया। जैसे ही एक बाबूजी की टेबल के सामने पहुंचा, ‛वे केंचुली उतारने की पीड़ा से गुजर रहे थे।’ उनका कहना था, “अभी थोड़ी देर बाहर जाईये, मैं अभी तो कलेक्टर साहब के बंगले से आ रहा हूँ ! पहले मैडम का काम तो निपटा लू..!” बेचारे बाबूजी, उस दिन इस पीड़ा से बहुत ज्यादा परेशान दिखे। आखिर में लंबी प्रतिक्षा के बाद उन्होंने मेरी बात तो सुनी, लेकिन शाम को जब मैं घर पहुंचा तो मुझे भी अपनी श्रीमति के सामने केंचुली उतारने की पीड़ा से दो-चार होना पड़ा।

जैसे-जैसे हमारा गणतंत्र बड़ा हो रहा है और बड़प्पन की ओर जा रहा है। यह पीड़ा उसके अधिकांश चंदन के खंभों पर बढ़ती जा रही है। कोई इस पीड़ा से अपने ही घर में पीड़ित हैं तो कुछ लोग संसद के हर सत्र में केंचुली उतारते हुए देखें जा सकते हैं। वहीं कुछ स्वघोषित राजनीतिक राजाधिराज जब तक विदेशी धरती पर जाकर अपनी केंचुली नहीं उतारते, उन्हें इस पीड़ा में आनंद ही नहीं आता...!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, March 18, 2023

जीवन जीने के लिए है, मिटाने के लिए नहीं...!

 जीवन जीने के लिए है, मिटाने के लिए नहीं...!

     



आत्महत्या एक कायराना व बुजदिल कृत्य है जो कि हमारे समाज में दिनोंदिन न जाने क्यों बढ़ती जा रही हैं ! क्या हम गलत विकास की परंपरा व नीतियों की तरफ जा रहे हैं जिससें हमारा युवा आत्महत्या की ओर जा रहा है ? किसी परीक्षा में कम नंबर आना, अच्छा मोबाइल-कार नहीं होना, पारिवारिक तनाव, सरकारी नौकरी नहीं होना आदि जैसी छोटी-छोटी बातों के कारण आजकल युवा व बड़े भी आत्महत्या जैसा कायराना कृत्य करते है। आत्महत्या जैसे कृत्य को किसी भी तरह से इस पीढ़ी को मिटाना होगा। समाज के जिम्मेदार लोग व अभिभावक इस ओर विशेष ध्यान दे।

आखिर क्या कारण है कि भगवान व प्रकृति की सबसे सुंदर रचना जीवन ओर वह भी मानव जीवन को हम इतने सस्ते में आत्महत्या के भेंट चढ़ा रहे ! ऐसा करते समय उन माँ बाप के बारे में कोई कुछ क्यों नहीं सोचता है जो हमें कई परेशानियों व मुश्किलों से पालते पोसते हैं तथा जीने लायक बनातें हैं। हर एक इंसान के जीवन में प्रकृति ने कुछ न कुछ संघर्ष दिया है। हम संघर्ष से भाग नहीं सकते हैं। जिंदगी जीने के लिए संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। संघर्ष में ही जीवन की असल खुशी व आनंद छूपे रहते हैं।

कैसा भी जीवन हो लेकिन आत्महत्या कभी भी सही कदम नहीं हो सकता, ना ही यह कोई विकल्प हैं जीवन के संघर्ष के लिए। दुनिया में हर इंसान को हजारों परेशानिया रहतीं हैं लेकिन फिर भी जीने का एक ही तरीका है कि जीने के लिए संघर्ष करो, जो हैं वहीं स्वीकारों व परिस्थितियों से मुकाबला करो। जीवन एक सुंदर व सुहाना सफर हैं इसकी यात्रा करो, इससे भागों मत। इस यात्रा में माना कि बहुत सी कठिनाई आ सकती है लेकिन उनके बाद ही जीवन का असल मूल्य भी हमें पता चलता है। जीवन से भागना कायरता ओर वही आत्महत्या नपुंसकता हैं।

हो सकता है जिन परिस्थितियों में आप है तथा वे आपके अनुकूल नहीं है तो थोड़ा अपनी कार्य शैली व विचारों में बदलाव लाए, कही घुमने चले जाए, कुछ नया पढ़े, कुछ नए मित्र बनाए, गरीब लोगों के बीच जाए, अपने से छोटे लोगों को देखे कि वे कितना संघर्ष कर रहे हैं ओर फिर देखेगे कि आप तो सुखी हैं। हमेशा किसी एक लक्ष्य पर नहीं रूके, क्योंकि जिंदगी का सफर व मंजिल बहुत बार रास्ते बदलने से सुहानी व सुखद हो जाती हैं। आत्महत्या कभी भी जीवन को सार्थक व परिपूर्ण आनंद नही दे सकती हैं। आत्महत्या का प्रयास या फिर इस जैसे कृत्य करकें आप अपराध करतें हैं। ऐसा अपराध न करें। यह प्रकृति व ईश्वर की मानहानि है। कैसी भी सुंदरता व सुख जीवन को जीने में है ना की जीवन को कायरतापूर्ण मिटाने में ।

हमेशा ध्यान रखें, आप अकेले नहीं है जिसके जीवन में परेशानीयाँ हैं। सबके साथ ऐसा होता है। एक या दो अदद मित्र या साथी जरुर बनाए , जिससें आप अपनी सब तरह की बातें व परेशानियां उनसे साझा कर पाए। वो मित्र व साथी कोई भी हो सकता है आपकी माँ, पिता, भाई, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दोस्त आदि कोई भी। जब भी कोई कठीन परिस्थिति आए या आपको ऐसा लगता है कि आप जीवन के संघर्ष व जटिलताओं से हार रहे हैं तो माता-पिता से जरुर साझा करे या माँ के चरणों में बैठ जाए, सबकुछ सही हो जाएगा। लेकिन छोटी छोटी बातों से तनाव में आ जाना व आत्महत्या कर लेना पुरी तरह से गलत है। हमें अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य का भी सतर्कता के साथ ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि कहा भी गया है कि “मन चंगा तो सब चंगा”...!

वर्तमान समय में बाजारवाद व पूँजीवाद को समझे ,इनके कारण से बहुत सी आपकी मानसिक परिस्थितियां इनके अधीन है इनसे मुक्त रहे। आज की गलाकाट प्रतियोगिता के चक्कर में न पड़े तथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रण में रखें। पड़ोसी कौन सी कार लाया हैं या दोस्त कितना पैसा कमा रहा है उससे आपका कुछ भी भला नहीं होगा। किसी के देखादेखी जीवन नहीं जीना चाहिए ना ही किसी भी तरह की अनुचित होड़ा-होड़ी करना चाहिए। आपनी स्वतंत्र सोच व विचार रखें, किसी के देखा देखी जीवन न जीए। स्वंय की क्षमताओं व योग्यताओं से अपने जीवन के लक्ष्य बनाएं तथा हमेशा एक ही लक्ष्य पर भी न अड़े रहे। क्योंकि जीवन आनंद लेने के लिए हैं न कि अपने आप को तनाव की भट्टी में जलाकर आत्महत्या कर लेना है।

जब भी ऐसा लगें कि जीवन में मजा नहीं आ रहा है या असफलता ही असफलता हाथ लग रही हैं तो कहीं घुमने चले जाए, कोई नई किताब पढ़े, गांव देहात में चले जाए या कोई नया शहर घुम आए, अपने बच्चों या पत्नी के साथ समय बिताए या प्रेमिका के साथ बैठकर बातें करे। आपको ऐसा लगे हम तो बहुत गरीबी या संघर्ष में जी रहे हैं तो गांव-देहात में जाकर जीवन देखे, वही गांव वाले शहर वालों का जीवन देख ले। बड़ा पद या अच्छा पैसा कभी जीवन का अंतिम औचित्य व सफलता नहीं है। इसके आलावा भी जीवन बहुत सुंदर व आनंदमय हैं। लेकिन एक या दो असफलता या थोड़े बहुत आभावों के कारण आत्महत्या कर लेना कायरता तो हैं ही साथ ही अपने माता पिता व प्रकृति को धोखा देना है।

हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्ति की मौलिकता से छेड़छाड़ न करें। खासकर बच्चों पर कुछ भी न थोपे, उन्हें सहज आगे बढ़ने दे। अभिभावक अपने सपनों का भार अपने बच्चों के कंधों पर ना डालें। महान जीवन या व्यक्ति कुछ नहीं होता है यह तो हर इंसान का अपना मौलिक व्यक्तित्व होता है। जीवन जिंदगी को मस्ती से जीने के लिए मिला है, ना की आत्महत्या करने के लिए। जीवन ईश्वर की अनुकंपा हैं, माँ पिता का दुलार हैं, इसे आत्महत्या कर प्रकृति व मानवजीवन का अपमान व इनके साथ धोखा न करें।



भूपेन्द्र भारतीय ( अधिवक्ता व लेखक )
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Tuesday, March 7, 2023

वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!

 वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!




उनके पास अपना कोई कैलेंडर नहीं है। वे हर त्यौहार पर दूसरों से ही त्यौहार की सही तिथि पूछते रहते हैं। इस बार फिर होली आने वाली है। वे पीछले वर्ष वाला ही प्रश्न पत्र लेकर बैठ गए है। सारे प्रश्न पहले वाले हैं। उन्हें नवीनता से एलर्जी है। वे होली सिर्फ़ छोटे से तिलक वाली खेलते हैं। ज्यादा रंग उनके काले-सफेद जीवन में ख़लल डालते हैं। उन्हें हुड़दंग पसंद नहीं है। कभी कभी तो उनकी गली में होली खेलते बच्चों से भी उन्हें खीझ हो जाती है। उन्हें गंवारों वाली होली पसंद नहीं है। वे होली को भी शालिनता से मानने में विश्वास करते हैं। वे संभ्रांत मानुष जो ठहरे ! वे संभ्रांत होली के शौकीन हैं..!

हर बार की तरह उन्होंने अपना पुराना सफेद कुर्ता-पजामा निकाल लिया। उन्होंने इस कुर्ता-पजामा से कितनी ही होली निपटा दी है। पीछले वर्ष बच गई गुलाल की पूढ़ी उन्हें फिर मिल गई है। उनकी मंडली के सदस्यों से उनकी बात हो गई है। होली कब है सभी से उन्होंने कंफर्म कर लिया है। किसके घर रंग गुलाल करने जाना है और किसके घर नहीं, यह निर्णय भी बहुमत से फोन पर ही पारित कर दिया। उन्होंने इस बार की होली पर फिर पानी के प्रबंधन पर लंबा-सा आलेख लिखकर पिच्चतीस अखबारों में भेज दिया है। होली के बाद उनका एक लंगोटिया ठंडाई का भी प्रबंध करेगा। उसके लिए आनलाईन चंदा मांगा गया है। ठंडाई के बाद उनका मन है कि एक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाए। जिससे वे अपने मन की बात कह सके। उन्होंने अपने प्रिय विषय;-“होली पर जानवरों की सुरक्षा व पर्यावरण संरक्षण” पर जोरदार तैयारी कर ली है।

हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने होली पर नेताओं के लिए चुटकी लेकर चुटकी भर लिख डाला है। अब वे इसके छपने की प्रतिक्षा कर रहे है। उनका लिखा होली के रंगों जैसा ही होता है। कौनसा रंग किसके साथ मिला हुआ है यह वे भी नहीं जानते। एक बार जो लिख दिया, वह साहित्य की रंगीन गंगा के हवाले।
होली के एक दिन पहले तक ‛हर वर्ष की तरह इस बार भी वे होली कब है ?’ की रट लगाये हुए है। उन्हें कहीं से सही उत्तर नहीं मिल रहा है। होली की सही तारीख व तिथि पर उनके मन में असमंजस चल रहा है। सरकारी छुट्टी ने अलग से दुविधा में डाल दिया है।

उनकी तैयारियां पूरी हो चुकी है लेकिन होली का रंग कहीं चढ़ता दिख नहीं रहा है। टीवी चैनलों पर भी उन्हें अब तक कोई निमंत्रण नहीं मिला है। उनके पास अब तक वरिष्ठ साहित्यकार का भी फोन नहीं आया है। हालांकि अपने नगर के वे स्वयं सबसे वरिष्ठ साहित्यकार है। ऐसा उनका दृढ़ विश्वास है। भले ही हिन्दी साहित्य के आलोचक उन्हें वरिष्ठ साहित्यकार ना मानते हो। इसलिए वे ऐसे साहित्यिक साथियों से होली पर दूरी बनाकर रखते हैं।

आखिर में जैसे ही होली का दिन आता है तो सबसे पहले वे अपनी स्वयं की पत्नी को सुबह-सुबह ही एक छोटा सा टीका लगाकर होली का श्रीगणेश करते है। पाँच-पंद्रह वाट्सएप समूहों में भी वे होली की पंक्तियां फेंकते है। फेसबुक पर एक कालजयी रंगारंग पंक्ति लिखकर होली का डिजिटल श्रीगणेश भी कर देते है। अपने ही बच्चों को केमिकल रंगों से कैसे बचें व इको फ्रेंडली होली कैसे खेलना है इस विषय पर भी सुबह सुबह ही संक्षिप्त भाषण सुनाते हैं। अपने प्रिय कुत्ते को भी एक छोटा सा टीका लगा देते है और उसे कड़ा संदेश देते है कि उसे आज घर से बिल्कुल बाहर नहीं निकलना है ना ही पड़ोसी के बच्चों के साथ भौं-भौं खेल खेलना है।
वहीं इस दिन वे आस पड़ोस वालों से बात तक नहीं करते। उन्हें होली के दिन भी आसपड़ोस वालों को ना ही मुँह लगाना पसंद है और ना ही रंग ! उन्हें लगता है कि इससे उनकी वरिष्ठता में कमी आ सकती है । इसलिए वे सुबह सुबह अपने घर में ही होली का श्रीगणेश करके वीआईपी कॉलोनी में रहने वाले अपने स्तर के साथियों के बीच पहुंच जाते है। आखिर में अपने स्तर के वरिष्ठ लोगों के बीच पहुंचकर होली का रंग लेना शुरू करते है। आखिर वे वीआईपी होली के शौकीन जो ठहरे....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Tuesday, February 21, 2023

सरकार हमारे “कम्पोजिट कल्चर” वाले....!!

 सरकार हमारे “कम्पोजिट कल्चर” वाले....!!

         



सरकार हमारे कम्पोजिट कल्चर में विश्वास करते हैं।उनकी नीति में मार भी है तो साथ ही पुचकारना। वे मारते भी है और रोने भी नहीं देते। उनके एक हाथ में लड्डू है तो दूसरे हाथ में मँहगाई ! एक पांव के नीचे गाँवों की अटल सड़कें है तो दूसरे पांव के नीचें चार्टर्ड प्लेन है। बहनों के लिए साईकिल है तो भाईयों के लिए सिर्फ लड्डू ! सरकार हमारे देशी रुप भी धरते है तो विदेशी मुद्रा में भी आ सकते हैं। सरकार हमारे गरीब-अमीर में कोई भेदभाव नहीं करते। वे चुनावों के समय गरीब की शरण में रहते है तो वहीं चुनाव होने के बाद अमीरों के..!

सरकार हमारे अपनी सरकार भी कम्पोजिट शैली में चलाते हैं। उनकी सरकार में देशी-विदेशी दोनों तरफ के मंत्री-विधायक मिल जाते है। कुछ का भाव कम होता है तो कुछ का डॉलर में ! उनकी सरकार में ऊँचे से ऊँचे दाम वाले प्रोडक्ट है तो वहीं जमीनी समीकरण साधने वाले ब्रांड भी मिल जाऐंगे। वे बैठकर भी खा सकते हैं और खड़े-खड़े किसी भी बफर पार्टी का आनंद ले सकते हैं।

यह कम्पोजिट संस्कृति ही है जिससे हमारा लोकतंत्र फलफूल रहा है। तुम भी खाओं और हमें भी खाने दो। हम ऊपर से खाकर निचे भेजते हैं, तुम नीचे वालों की थाली में से छेद कर हम ऊपर वालों को पहुंचाओ। हमारे लोकतंत्र का यह कम्पोजिट कल्चर कितना कल्याणकारी राज्य बना रहा है। हर राज्य जनकल्याण के मार्ग पर दिनोंदिन आगे बढ़ता जा रहा है। जनता के लिए चौराहे-चौराहे कम्पोजिट कल्चर की दुकानें खोल दी है। आओ जैसा माल चाहिए ले जाओ। एक जगह से ही देशी-विदेशी ब्रांड उपलब्ध होगा। इस कंपोजिट कल्चर की बदोलत कितने ही राज्य राजस्व की लंबी उड़ान भरते हैं। कंपोजिट कल्चर वाले मंत्रालय में हर कोई खूब फलता फूलता रहता है। इस कल्चर से राज्य में विकास की गंगा बहती रहती है। झूठे है वे अर्थशास्त्री जो राज्यों को कर्ज तले दबा हुआ बताते रहते हैं। भला जिस कंपोजिट कल्चर की बदौलत नियमित सेवा मिलती हो उससे किसी को कोई नुकसान हो सकता है। फिर वह राज्य तो कल्याणकारी राज्य कह लाऐगा ही !

ऐसा महान व सर्वहितकारी कल्चर शुरू करने पर हमारे सरकार को नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए। हर कंपोजिट कल्चर की दुकान पर हमारे सरकार का आदमकद पोस्टर लगना चाहिए। हर मंत्रालय को इस कल्चर का अनुकरण करना चाहिए। शिक्षा व स्वास्थ्य मंत्रालय में भी कंपोजिट कल्चर की जल्द से जल्द शुरुआत कर देना चाहिए। देशी शिक्षक के साथ साथ विदेशी शिक्षक की भी भर्ती करना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में भी कंपोजिट कल्चर आना चाहिए। देशी दवाओं के साथ साथ विदेशी दवा भी उपलब्ध हो। न्यायपालिका को भी अपना बौझ कम करने के लिए कंपोजिट कानूनी कल्चर पर विचार करना चाहिए। जैसे हमारे लोकतंत्र में कंपोजिट कल्चर है, भारतीय लोकतंत्र व इंडियन डेमोक्रेसी ! एक देशी-दूसरा विदेशी माल।
         
मेरी तो फ्री में राय है कि यह कंपोजिट संस्कृति विश्व स्तर पर लागू होना चाहिए। जल्द ही संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधि मंडल को भारत में आमंत्रित करके इस कल्चर की खूबसूरती पर व्याख्यान दिया जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों में इस कल्चर पर सेमिनार आयोजित करवाने चाहिए। शिक्षा मंत्री व वर्तमान सरकार से मेरा निवेदन है कि नई शिक्षा नीति में कंपोजिट कल्चर को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ‛जैसे आनलाइन माध्यम से घर बैठे देशी व विदेशी डिग्री दी जाना चाहिए।’ बताओं इस कल्चर से सरकार का कितना धन बचेगा। जीडीपी बढ़ जाऐगी। हम विश्व अर्थव्यवस्था में मजबूत हो जाऐंगे।



भूपेन्द्र भारतीय 
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हिन्दी साहित्य का “निराला सूर्य” ।

 हिन्दी साहित्य का “निराला सूर्य” ।

                 

  

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को भारतवर्ष में हिंदी साहित्य जगत में कौन नहीं जानता। वे अपनी हिन्दी साहित्य, कविता व व्यक्तित्व में निराले तो थे ही, साथ ही आज तक हिन्दी साहित्य में सूर्य की तरह चमक रहे है। बिना उनकी चर्चा किए आज क्या हिंदी साहित्य की चर्चा की जा सकती है ? उन्होंने हिन्दी साहित्य में लगभग सभी विधाओं में प्रचूर मात्रा में लिखा। उनका साहित्य आज भी हिन्दी भाषा व साहित्य के लिए अमूल्य निधि है।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‛निराला' का जन्म रविवार को हुआ था। इसी से उनका नाम सूर्यकांत पड़ा। लेकिन सूर्य के पास अपनी धधकन के अलावा और क्या है ? हम सूर्य की पूजा करते हैं, क्योंकि वह जीवनदाता है। लेकिन सूर्य किसकी पूजा करे ? कवियों के कवि निराला सूर्य की तरह ही जीवन भर धधकते रहे। बचपन में मां चली गईं, जवानी आते-आते पिता न रहे। धर्मपत्नी को प्लेग खा गया। बेटी का विवाह नहीं हो सका और अकालमृत्यु हुई। जीवन भर कभी इतने साधन नहीं हुए कि कल की चिंता न करनी पड़े। किसी प्रतिभाशाली और संवेदनशील लेखक के साथ इससे ज्यादा ट्रेजेडी और क्या हो सकती है ? फिर भी, निराला प्रकृति और संस्कृति दोनों के अभिशापों को झेलते हुए अपनी सृजन यात्रा पर चलते रहे। यह आत्मिक शक्ति ही निराला जैसे लेखकों की विलक्षणता है। निराला ने ठीक ही कहा है, मैं बाहर से खाली कर दिया गया हूं, पर भीतर से भर दिया गया हूं। यह कोरा अनुप्रास नहीं था - निराला का यथार्थ था।

प्रसिद्ध आलोचक व निराला जी पर प्रमाणिक लेखन करने वाले रामविलास शर्मा अपने संस्मरणों में कहते है कि सन् 34 से 38 तक का समय निराला जी के कवि जीवन का सबसे अच्छा समय था । उनका कविता- संग्रह ‛परिमल’ छप चुका था, लेकिन ‛गीतिका’ के अधिकांश गीत, अपनी सर्वश्रेष्ठ कविताएँ ‛राम की शक्ति पूजा', ‛तुलसीदास’, ‛सरोज स्मृति' आदि उन्होंने इसी समय लिखी। गद्य में ‛अप्सरा-अलका' उपन्यास छप चुके थे, लेकिन ‛प्रभावती’ , ‛निरुपमा’ उपन्यास और अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कहानियाँ उन्होंने इसी समय लिखीं। यही बात उनके निबंधों के बारे में भी सही है। उस समय उनकी प्रतिभा अपने पूरे उभार पर थी। उसके पहले जो कुछ था, वह तैयारी थी, बाद को जो कुछ आया, वह सूर्यास्त के बाद का प्रकाश भर था।

निराला जैसी महाप्राण प्रतिभा विरोध से, टकराहट से ही तीक्ष्ण और पुष्ट होती है। अस्मिता का बोध उसमें इसी तरह जागता है । निराला में यह बोध एक समग्र भारतीय अस्मिता के बाद में उत्कर्ष पाता देखा जा सकता है।

सांस्कृतिक लयभंग की - वेदना निराला के कृतित्व का एक प्रमुख प्रेरक सूत्र बनी --उसके वादी- संवादी स्वरों को निर्धारित करती हुई।
हो गए आज जो खिन्न-खिन्न
छुट-छुट कर दल से भिन्न-भिन्न
वह अकल कला गह सकल छिन्न जोड़ेगी। (तुलसीदास)

कविताएँ पढ़ने और सुनाने में उन्हें बड़ा आनंद आता था। सैकड़ों कविताएँ उन्हें कंठाग्र थीं, अपनी नहीं दूसरों की भी। वहीं निराला जी का घर साहित्य प्रेमियों का तीर्थ-स्थल था। प्रसिद्ध साहित्यकारों से लेकर विद्यार्थियों तक के लिए उनका द्वार खुला रहता था। निराला जी का निराला साहित्यिक व्यक्तित्व था। वे साहित्यकारों का सम्मान करते थे और उनसे खुलकर मिलते थे, लेकिन धन और वैभव का सम्मान करना उन्होंने न सीखा था। उनके जीवन से जुड़ी ऐसी ही एक बात थी कि एक राजा साहब लखनऊ आए थे। उनके सम्मान में गोष्ठी हुई। सभी साहित्यकार एकत्रित हुए । राजा साहब के आते ही अब लोग उठ खड़े हुए , केवल निराला जी बैठे रहे। राजा साहब के लिए एक भूतपूर्व दीवान लोगों का परिचय कराने लगे --‘गरीब परवर ! ये अमुक साहित्यकार हैं’ जब वह निराला जी तक पहुँचे तब तक महाकवि उठ खड़े हो गये और भूतपूर्व दीवान को ‛गरीब परवर’ से आगे बढ़ने का मौका न देकर बोल उठे--‘ हम वो है जिन के दादा के दादा की पालकी आपके दादा ने उठाई थी।’ यानी भूषण की पालकी छत्रसाल ने उठाई थी । भूषण के वंशज हुए निराला जी और छत्रसाल के वंशज हुए राजा साहब।

ऐसे कितने ही निराले व जीवंत किस्से उनके जीवन से जुड़े रहे हैं। उन्हें समझना सामान्य व्यक्ति व लेखक के बस की बात नहीं है। उनके साहित्य व जीवन से जुड़े संस्मरण पाठक आज भी पढ़कर अचंभित हो सकता है। ऐसा विशाल व निराला साहित्यिक जीवन रहा था।
उनके ऐसे ही निराले व्यक्तित्व व साहित्यिक रूप के लिए नजीर बनारसी ने निराला जी के स्वर्ग चले जाने पर कहा था...
अलग उसका रस्ता, अलग उसकी मंजिल
निराली डगर और राही निराला ।
अजब सूर्य डूबा है हिन्दी जगत का
कि डूबा तो कुछ और फैला उजाला।

यह हिन्दी साहित्य का निराला सूर्य भले देह से अस्त हो गया हो, लेकिन हिन्दी साहित्य व हिन्दी भाषा में आज भी ओर आगे भी अपने साहित्यिक प्रकाश से चमकता रहेगा। उनके निराले विशाल व्यक्तित्व ने हिन्दी साहित्य को आज भी प्रकाशित रखा है। इसलिए ही इस हिन्दी साहित्य के निराला “सूर्य” ने अपनी कविता के माध्यम से कहा था ;-
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत ,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनंत
अभी न होगा मेरा अंत।

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अंत। 

संदर्भ

1. https://www.rachanakar.org/2007/10/blog-post_7060.html?m=1

2. https://www.amarujala.com/columns/opinion/hero-of-spring-suryakant-tripathi-nirala

3. https://m.bharatdiscovery.org/india/

4. निराला संचयिता, वाणी प्रकाशन , संस्करण 2010

5. नया ज्ञानोदय पत्रिका अंक मार्च 2018, महाकवि निराला पर एकाग्र


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
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Sunday, February 19, 2023

।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

 ।। भारत के राष्ट्रत्व का अनन्त प्रवाह ।।

     



अंग्रेजों के शासन में भी ओर उनके जाने के बाद भी उनके मानस पुत्रों के द्वारा यह विमर्श चलाया गया कि भारत अंग्रेजों के आने के पहले एक राष्ट्र नहीं था ! कितना बड़ा झूठ व षड्यंत्र भारत के खिलाफ फैलाया गया। इस झूठे विमर्श से ही पर्दा यहां इस पुस्तक में उठाया गया है। श्री रंगा हरि द्वारा लिखी गई यह पुस्तक भारतीय राष्ट्रत्व के रोचक व गौरवशाली अनन्त प्रवाह पर प्रकाश डालती है। पुस्तक भारत के गौरवशाली राष्ट्र भाव का तथ्यात्मक वर्णन करती है। 19 विभिन्न तरंगों में विभाजित इस पुस्तक की प्रत्येक तरंग पाठक के रोंगटे खड़े कर देती है। और साथ ही पाठक के मन भारतीय संस्कृति व धर्म के गौरव का भाव ओर बढ़ाती है। आखिर में डॉ. मनमोहन वैद्य, मिलिंद ओक, डॉ. भगवती प्रकाश व श्री रंगा हरि के आलेख राष्ट्र प्रेमी पाठकों के लिए प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक है।

भारत का ‛राष्ट्र’ अंग्रेजी ‛Nation’ से अलग है। यह किस तरह से अलग है यही इस पुस्तक का प्रमुख विषय है। भारतीय जीवनदृष्टि के मूलग्राही चिंतक श्री रंगा हरि ने भारत की राष्ट्र विषयक जो विस्तृत चर्चा की है, वह इस पुस्तक की विशेषता है। पुस्तक में बताया गया है कि भारत का वेदजन्य राष्ट्र नर-केन्द्रित न होकर सृष्टि-केन्द्रित है। (माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः)
इसी पुस्तक में भारतवर्ष व भारत का विस्तृत वर्णन किया गया है। देश, जन और धर्म तीनों मिलकर राष्ट्र बनता है।
अनेकता व विविधता से भरा यह राष्ट्र विश्व में कैसे अपनी अलग पहचान रखता है। यह इस पुस्तक में विस्तार से कहा गया है। पश्चिम के राज्य से भारत का राजत्व व राष्ट्र अलग है। यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि राष्ट्र धर्म और नैतिकता से चलता है। ना की विधायिका के कोरे कानूनों से।

इस पुस्तक में बताया गया है कि राजा, पंतप्रधान या फिर वर्तमान में चुने हुए जनप्रतिनिधि का काम नदियों की तरह होता है। वह किसी से कोई भेदभाव नहीं कर सकता है। वहीं राष्ट्र घराना है तो राज्य उसका मकान है। घराना बंधुता पर आधारित है और मकान व्यवस्था पर। भारतीय राष्ट्रत्व की यह संस्कृति व परंपरा वर्षों से ही नहीं है बल्कि आदि अनंत काल से चलती आ रही है। यह बात इस पुस्तक में प्रमाणिक तथ्यों सहित कही गई है। वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण व प्रमाणिक शास्त्रों के माध्यम से यहां भारत के राष्ट्रत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इसी पुस्तक में ना सिर्फ भारतवर्ष की भौगोलिक सीमाओं का वर्णन है साथ ही भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक व अन्य शास्त्रों की विशेषताओं को भी प्रमाण सहित बताया गया है। संक्षिप्त व कम समय में जो भारत के विशाल जीवन व राष्ट्रत्व को समझना चाहता है। उसे इस पुस्तक को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए। विश्व के युवाओं के लिए यह नया मार्गदर्शन व नवीन दर्शन का खजाना है। इसी पुस्तक के माध्यम से कहा गया कि कैसे अन्य पंथ व विचारधाराओं को प्रभावित किया और ये भारत में कैसे घुसे। संक्षिप्त में कहे तो पश्चिम व भारत में क्या अंतर है। यह इसी पुस्तक में कहा गया है कि “भारतीय राष्ट्रत्व और यूरोपीय नेशनलिज्म के बीच मोर -मुर्गे का अंतर, यद्यपि दोनों को कलंगी है।”

भारत अंग्रेजों से कैसे भागे व उन्हें कैसे भगाया गया है उस पर भी एक विस्तृत तरंग है। ‘सेफ्टीवाल्व इंडियन नैशनल कांग्रेस’ से एक तरंग है जिसमें कांग्रेस दल की कथनी और करनी पर विस्तार से कहा गया है। अंत में अंग्रेजों के भारत से भागने व उसके बाद की स्थिति पर कई गंभीर बातें कही गई जो आगे चलकर भारत में घटित होकर अधिकांश सही ही रही। इस पुस्तक को वर्तमान युवा पीढ़ी को जरूर पढ़ना चाहिए और साथ ही दुनिया के उन तमाम लोगों को भी जो भारत को सिर्फ़ एक भौगोलिक दृष्टि से देखतें है। यह पुस्तक आसानी से आनलाईन उपलब्ध है और सिर्फ़ ₹१००/- में विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है।


भूपेन्द्र भारतीय 
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Sunday, February 12, 2023

बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

 बसंत और बजट का राग दरबारी ....!!

       



अक्सर देखा गया है कि बसंत व बजट एक साथ आते हैं। वैसे इन दोनों में ज्यादा कोई समानता नहीं है फिर भी इनकी वाहवाही में बहुत-सी समानताएं देखी जा सकती हैं। इसी कारण बसंत व बजट के राग दरबारी हर चौराहे पर देखें जा सकते हैं। कोई कहता है वाह ! क्या मौसम आया है, तो वहीं यह कहने वाले भी मिल जाऐंगे कि;- “एक तो मौसम बहुत खराब है और ऊपर से ऑफिस जाना है !” वहीं कुछ अर्थशास्त्री बजट को आंकड़ों की बाजीगरी बता कर मुँह फुला रहे हैं। ऐसे में जिसके पास कोई बजट नहीं, वह बसंत से क्या कहें ? उसका कैसा बसंत-बहार...! बिन बजट बसंत सुन बटा सन्नाटा।

फिर भी बहुत से राग दरबारी बजट पर बड़े बड़े स्तंभ लिख रहे हैं। मीडिया को बाईट दे रहे हैं। बजट की दो सप्ताह पहले से समीक्षा करना शुरू कर दी है। कोई कह रहा, यह बजट आम आदमी के लिए रामबाण सिद्ध होगा। भविष्य के लिए यह बजट अमृत के समान सिद्ध होगा। हार्वर्ड में बैठे लाल बादशाह अर्थशास्त्री बजट को आम आदमी के खिलाफ बता रहे हैं। ऐसे में बजट बाबू है कि कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं है। वह अपनी ही धुन में घटते-बढ़ते ही जा रहे है।
जिसे दो समय की रोटी की भी चिंता नहीं है, जो हर बात में कबीरा खड़ा बाजार धुन बजाने लग जाते है। पत्रकार उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि इस बार बजट आपके लिए कैसा रहा ! आप इसे कितने नंबर देने वाले हैं ? जो कभी किसी परीक्षा में कभी अच्छे नंबर नहीं लाया, उससे बजट के लिए नंबर मांगे जा रहे हैं। बजट यह सब देखकर घाटे वाली हँसी में हँस रहा है। उसकी मुस्कान के सूचकांक कुछ ओर ही आंकड़े बता रहे हैं। इस बजट-बसंत के राग पर हर माली एक बार फिर मंद-मंद लोकतांत्रिक लहजे में हँस रहा है।
            


एक स्थिति यह भी है कि बजट की अफरातफरी में बसंत ज्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा है। बसंत सप्ताह बीतने को है पर बहार के अते-पते नहीं है। राग दरबारी अपने-अपने दिन मना रहे हैं। सबने अपने-अपने बजट का जुगाड़ पहले से ही कर रखा था। बसंत एक बार फिर बजट का कर्जदार हो गया। कहाँ तो बुद्धिजीवीयों को बजट में दो जून की रोटी तक नजर नहीं आ रही है ! वहीं बसंत के माध्यम से राग दरबारियों ने बजट की चर्चा में चार चाँद लगा दिये। हर बार की तरह इस बार भी बसंत सप्ताह में छोटे से बड़े नगर तक बाजार गुलज़ार है। सात दिनों की इस बहार में बाजार उछाले मार रहा है। सौछल मीडिया पर 70 साल से ऊपर वाले राग दरबारी भी वेलेंटाइन डे के संदेश उछाल रहे हैं। बसंत बहार के पवाड़े गा रहे हैं। “संसद भवन बजट-बजट के शोर से गुंजायमान हो रही है और उसके बाहर लोकतंत्र बसंत से कलियां चुरा रहा है। एक तरफ आलोचनाओं का गुलाल है। तो दूसरी ओर गंगा-जमुनी रंग से भरी प्रेम की पिचकारियां छोड़ी जा रही है।”

‛कलियों के खिलने’ व ‛संसद में हलवा’ बनाने वाले इस कोमल काल में ; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे राग दरबारी काल में क्या करूं ? मैं अपने मन को सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों के माध्यम से समझाने का भी प्रयास रहा हूँ ;-
“खिलतीं मधु की नव कलियाँ, खिल रे, खिल रे मेरे मन!
नव सुखमा की पंखड़ियाँ, फैला, फैला परिमल-घन!”

लेकिन वहीं सब कह रहे हैं कि ये दोनों अपनी चरम सीमा पर है। लेकिन ना मैं बजट को पढ़-समझ पा रहा हूँ और ना ही बसंत की बहारों का आनंद ले पा रहा हूँ। बजट के आंकड़े मेरे लिए हमेशा से एक कठिन रसायन शास्त्र की तरह रहे हैं और वहीं बसंत का रसायन जब तक मेरे समझ में आता है, कमबख़्त यह बसंत-बहार मेरे हाथ से निकल जाता है ! लगता है इसबार भी आभासी बजट व बसंत के राग दरबारी रंगों से ही काम चलाना होगा....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Wednesday, January 18, 2023

भोलाराम के आंगन में जिंगल बेल्स....!!

 भोलाराम के आंगन में जिंगल बेल्स....!!

             



भोलाराम भोला नहीं था। लेकिन उसके देशीपन व गरीबी के कारण आयातित विचारधारा ने उसे अपना शिकार बनाया। भोलाराम को पहले धीरे से पुचकारा गया। बड़े सपने दिखाये गये। अच्छे कपड़े पहनने को दिये गए। नये पकवान खिलाये गए। जमीन से जुड़े भोलाराम को टेबल-कुर्सी पर बैठाकर विदेशी चम्मचों के द्वारा खाना खिलाना सिखाया गया। उसे अजीबोगरीब प्रार्थनाएं रटाई गई। भोलाराम के आंगन में लोकनृत्य के बजाय विदेशी गाने बजने लगे।

यह सब देखकर पहले पहल भोलाराम खुश था। उसे लगा, यह सब तो उसके भले के लिए हो रहा है ! उसे लगा कोई अवतार आया है, कोई नया देवता है। जो उसकी सूध ले रहा है। कोई उसका भला करना चाहता है। उसे अच्छे दिन के सपने दिखाये गए। उसे लगा उसके अच्छे दिन आ गए। खूब रेवड़ियां बाटी जा रही थी। उसके बाल-बच्चे खुशी से चहकने लगें। कुछ दिनों बाद ही पिता से बच्चे प्रार्थना सभा में चलने की जिद करने लगे। पिता प्रार्थना सभा की कहानी नहीं समझ पा रहे थे ! भोजन, कपड़े, खिलौने, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा आदि के बदले प्रार्थना सभा में चलना ! आखिर इस प्रार्थना सभा में क्या होता है ? इसपर इतना बल क्यों ? हम तो माँ शक्ति की पूजा अर्चना करते हैं। प्रतिदिन मंदिर में माथा टेकने जाते हैं। महादेव के भक्त हैं। हमारे यहां तो खेड़े-खेड़े रक्षक, फिर यह अलग से कैसी प्रार्थना करना होगी ?

भोलाराम यह सब, कुछ दिनों से देख ही रहा था। उसे यह सब समझ नहीं आ रहा था। प्रार्थना में जाने पर उसे बहुत सी बातें छोड़ने व बहुत सी नई बातें अपनाने के लिए प्रार्थना में उपदेश दिया जाने लगा। उसकी पत्नी को नया मकान देने का लालच दिया जाने लगा। बच्चों को अच्छे स्कूल व कपड़ों का वादा किया गया। उन्हें नौकरी तक का लालच दिया गया। हर छः माह में भोलाराम के बच्चों के लिए अच्छे अच्छे कपड़े व खाने की चीजें उपहार स्वरूप दी जाती थी। उसकी पत्नी को सिलाई मशीन दी गई व मशीन चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। भोलाराम से प्रार्थना दल के सदस्यों के द्वारा कहाँ जाने लगा कि प्रतिदिन जंगल में गाय-बकरियों को क्यों ले जाते हो ! अपना जीवन जंगल में क्यों बर्बाद कर रहे हो। इस झोपड़ी वाले छोटे से घर में क्या रखा है। हम तुम्हें बड़ा मकान देगें। तुम्हारे इस थोड़े से जंगल-जमीन में क्या रखा है ? हमारे साथ चलों, शहर में हम तुम्हें अच्छी नौकरी देगें। साथ ही रहने का घर व तुम्हारे बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा भी देगें। उससे उन्हें नौकरी मिलेगी !

भोलाराम के परिवार के सदस्यों को यह सब अच्छा लगने लगा। बच्चें व उसकी पत्नी इन सब उपहारों के मोह में आकर अब भोलाराम से यह सब मानने की जिद करने लगें। भोलाराम यह सब स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह अपने जंगल-जमीन व गांव से जुड़ा रहना चाहता था। उसे इन सब बातों पर विश्वास नहीं था। भोलाराम को इस लोकलुभावन उपहार में किसी षड्यंत्र की शंका लग रही थी। पर उसे बच्चों व पत्नी की जीद्द के आगे झुकना पड़ा। वह ना चाहकर भी प्रार्थना की माया से मोहित हो ही गया। भोलाराम अपना गांव, जंगल, जमीन, पशुधन व ग्राम्य जीवन को प्रार्थना सभा के हाथों में छोड़कर शहर की ओर बढ़ गया...!

भोलाराम को शहर में मिले नये मकान, अच्छे कपड़ें व बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के बदले अपना सबकुछ छोड़ना पड़ा। गांव में वह सब कुछ छोड़ना पड़ा जो उसके पीढ़ियों के परिश्रम से खड़ा किया गया था। बच्चे अंग्रेजी स्कूल में प्रार्थना करने जाते। भोलाराम को हर दिन प्रार्थना के चमत्कार बताते। पत्नी पर भी प्रार्थना का चमत्कार होने लगा था। यह सब देख-सुन कर भी भोलाराम का मन शहर में नहीं लग रहा था। वह एक बार अपने गांव वाले घर पर जाना चाहता था। एक दिन समय मिलते ही वह अपने गांव की ओर दौड़ा। वह गांव वाले घर पहुंचता है। वह जैसे ही उस घर के आंगन में जाता है। वह देखता है उसके आंगन में प्रार्थना सभा वालों की जिंगल बेल्स लटकी थी। उनसे अजीबोगरीब आवाज़ें आ रही थी। भोलाराम उन घंटियों की आवाज़ नहीं सुन सका। उस आवाज़ में उसे एक अजीब सी चित्कार सुनाई दी ! वह उलटे पांव वहां से शहर की ओर लौट आया। मन में एक भारीपन के साथ आज वह अपने शहर वाले मकान में बैठा था। शाम होते ही भोलाराम के बच्चें उसके पास आये और उसके हाथ में प्रार्थना की पुस्तक रख दी। और उसके बच्चें कहने लगे कि पापा आज हम साथ में इस पुस्तक से प्रभु की प्रार्थना करते हैं ! शाम को प्रार्थना सभा में चलना....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410
मेल- bhupendrabhartiya1988@gmail.com 

Saturday, January 7, 2023

भय्या रिचार्ज होकर फिर आये.....!!

 भय्या रिचार्ज होकर फिर आये.....!!

             



आखिर भय्या एक लंबी यात्रा से रिचार्ज होकर फिर नई यात्रा के लिए आ गए। इस लंबी यात्रा में भय्या को कई नये अनुभव हुए। भय्या ने पहली बार अपने क्षेत्र से निकलकर दूसरे क्षेत्र का विकास देखा। इस यात्रा में भय्या ने पहली बार जाना कि उन्हें तो बहुत कुछ पता नहीं था। उन्हें तो अब भी बहुत कुछ जानना है। उनके सत्ता में ना होने पर भी विकास हो रहा है। विकास अपनी यात्रा में दौड़ लगा रहा है।
एक लंबी युवा उम्र के बाद भी भय्या को अभी ओर युवा रहना है। दक्षिण भारत की अपनी इस यात्रा में भय्या एक जोड़ी कपड़ें में यात्रा पूर्ण करते है। उनका अपना एक ड्रेस कोड है। वे अपनी इस यात्रा को यात्रा नहीं, मिशन बताते है। वे यात्रा में हर एक सहयात्री से गले मिल रहे हैं और वहीं इस मेलजोल भरी मोहब्बत को मिडिया गले पड़ना बता रहा है !

अपनी यात्रा में भय्या हर पल जोर-जोर से हाथ हिलाते चलते हैं। बीच-बीच में वे दौड़ने का भी अभ्यास करते हुए दिख जाते है। उनकी यात्रा में हर पड़ाव पर राजनीतिक प्रवासी पक्षी भी देखे जा सकते हैं। भय्या उनसे गले पड़ते हुए गंभीर हो कर बुद्धिजीवीयों जैसी बातें करते-करते चलते है। भय्या की यात्रा में बड़े-बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियां भी देखे जा सकते है। भय्या ने यात्रा के लिए अपना विशेष रुप बनाया है। वामपंथियों जैसी खिचड़ी दाढ़ी का विशेष सृजन किया है। वे यात्रा में बुद्धिजीवीयों जैसा अवतार लिये चलते है। चाचा नेहरू की तरह वे बच्चों से बात करते है। उन्हें यात्रा में शामिल करते है। उनके साथ सड़क पर फुटबॉल खेलते है। उन्हें गोद में लेते है। जैसे बच्चों में एक बच्चा खूब रंग जमाता है। यात्रा में कभी भावुकता , तो कभी करूणा का बघार लगता है। यह सब समाचार चैनल वाले रूक-रूक कर बताते हैं। भय्या की यात्रा में बहुत कुछ जोड़-घटाव चल रहा है...!

यात्रा के माध्यम से कुछ जोड़ने की बात की जाती है ! लेकिन पीछे-पीछे भय्या का दल टुटता जा रहा है। कई का दिल भी। हो सकता है इससे उनके मन में खरोंच भी आई हो। भय्या को इसका कोई मलाल नहीं है। वे अपने मिशन पर सतत आगे बढ़ते जा रहे है। वे एक जोड़ी कपड़े में मोहब्बत की बात करते है। उनका कहना है कि नफरत के माहौल में वे मोहब्बत की यात्रा पर है। “भय्या इस यात्रा के माध्यम से राजनीति में रिचार्ज होना चाहते है। लेकिन वे अपने ही बयानों से बार-बार डिस्चार्ज हो जाते है।” उनकी राजनीतिक यात्रा को रिचार्ज करने में अब तक कितनी ही बेटरीयां डिस्चार्ज हो गई हैं।

भय्या अपनी लंबी यात्रा के बाद कुछ दिन अवकाश भी लेते है। अवकाश लेने की भय्या की यह बहुत पुरानी आदत है। पहले बच्चे गर्मियों की छुट्टी में दादी-नानी के यहां जाते थे । लेकिन भय्या अवकाश लेकर सिर्फ़ अपनी नानी के पास अवकाश का आनंद लेने जाते है। उनके इस राजनीतिक अवकाश पर कई यात्रीयों की राजनीति अवकाश पर चली जाती हैं। उनकी कक्षा का परिणाम बिगड़ जाता है, पर उन्हें अपनी यात्रा की ही चिंता होती है।
कितने ही राजनीतिक प्रवासी नेताओं की राजनीति बिगड़ जाती हैं। लेकिन जैसे ही भय्या अवकाश से रिचार्ज होकर आते है। यात्रा में जोश आ जाता है। फिर तो वे सर्दी-गर्मी-बरसात सबसे भीड़ जाते है। उनके सामने कोई नहीं ठहरता है। वे मोहब्बत का भाषण देते है। फिर गले मिलने व प्यार लुटाने की यात्रा आगे बढ़ती है। फिर नये-नये राजनीतिक प्रवासी पक्षी यात्रा में शामिल होने लगते हैं। अपने मूल प्रवास से उनके द्वारा लाये गए वैचारिक खाद-पानी का असर यात्रा में दिखता है। इस सर्दी में भय्या अपनी यात्रा में राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राजनीतिक गर्मी का आह्वान करते है। लेकिन भय्या की यात्रा के भूतकाल के बर्फीले तूफान यात्रा में गर्मी का माहौल बनना मुश्किल लगता है। लगता है भय्या के लिए उत्तर से दक्षिण की ओर यात्रा करना ही लिखा है। देखते हैं यह यात्रा कब तक चलती है....!!


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, December 24, 2022

कबीरा खड़ा बाजार में और हाथ में मोबाइल....!!

 कबीरा खड़ा बाजार में और हाथ में मोबाइल....!!

     



वर्तमान का सबसे बड़ा शस्त्र मोबाइल बन गया है। यह मैं ही नहीं, पूरी दुनिया जानती हैं। यहां तक कि बच्चें-बच्चें को पता है। वैसे यह शस्त्र, शास्त्र के रूप में भी उपयोग हो सकता है और होता भी है। लेकिन इसके लिए कबीरा का मुड होना चाहिए। कबीरा का मुड नहीं हुआ तो वह उसके लिए एक खिलौने के अलावा कुछ नहीं। वह बस दिनभर इससे खेलता ही रहता है।

आज बाजार कहाँ नहीं है ? हर तरफ बाजार जमा है। और जहाँ बाजार है कबीरा वहीं खड़ा है। वास्तव में कबीरा के मोबाइल में ही बाजार घुस गया है। अब मोबाइल मतलब बाजार ही होता है। सुबह की महत्वपूर्ण जरूरत टूथपेस्ट से लेकर रात तक की सभी जरूरतों के लिए कबीरा के हाथ में बाजार है। इस बाजार के बीचोंबीच कबीरा खड़ा है। वह बाजार में क्यों खड़ा है यह सिर्फ़ कबीरा को ही पता है। यहां तक कि बाजार कबीरा के मोबाइल में घुस गया है या फिर कबीरा बाजार में घुसा है यह शोध ही नहीं, रहस्य का विषय बनता जा रहा है ! वहीं कबीरा मानता है कि बाजार को वह अपनी जेब में लेकर चलता है। जब चाहे तब कबीरा बाजार को अपनी ऊंगलियों पर नचा सकता है। बाजार के तमाम मंचों के लिए कबीरा बीच बाजार हाथ में मोबाइल लिये खड़ा है।

कबीरा बाजार में खड़ा है यह आश्चर्य का विषय नहीं है। वह तो लंबे समय से खड़ा है लेकिन वह अब हाथ में मोबाइल लिये खड़ा है। यह विचार करने का विषय है। उसके हाथ में मोबाइल है। लेकिन लगता है वह दुनिया मुठ्ठी में करके के खड़ा है। बाजार के हर भाव का निर्णय कबीरा के हाथ में है। कानून के हाथ से लंबा हाथ कबीरा का हो गया है। कबीरा बाजार को कहीं से भी छू सकता है और गुलज़ार कर सकता है। सेंसेक्स का उतार चढ़ाव हो या फिर किसी विरोध के लिए ट्विटर ट्रेंड हो ! कबीरा खड़े-खड़े बाजार को धड़ाम कर सकता है।
         
      


कबीरा के हाथ अब सृजन व विध्वंस दोनों के लिए उतारूं रहते हैं। कबीरा का यह शस्त्र परमाणु हथियारों से भी खतरनाक होता जा रहा है। लोकतंत्र तक कबीरा के शस्त्र से डरता है। कबीरा बाजार में खड़े-खड़े किसी भी सरकार को बना-बिगाड़ सकता है। सबको लगता है कि कबीरा सिर्फ़ खड़ा है। लेकिन वह मोबाइल में बहुत कुछ चला व बना रहा है। वह खड़े -खड़े चलता है। वह अपने इस शस्त्र से दुनिया को कभी बनाता है तो कभी मिटाने पर भी तुल जाता है। वह मोबाइल चलाते-चलाते दुनिया चलाने सीख रहा है। अब समझ आया कि “कर लो दुनिया मुठ्ठी में, विज्ञापन उसके लिए ही बना था।"

पहले कबीरा जीवन मूल्य बुनने का कार्य करता था। वहीं आज का कबीरा रील-वीडियो बुनता है। आज कबीर वाणी, कबीरा स्वयं सुनता है। अपने कानों में अपने मोबाइल का ही राग-मोबाईली संगीत सुनना पसंद करता है। उसे किसी से कोई लेना देना नहीं है। उसके एक तरफ घर है और दूसरी ओर घाट। वह घर व घाट दोनों पर खड़ा है। वह बाजार में खड़े-खड़े मस्त ऊंगलियां चलाता है। भले कबीरा कहीं भी खड़ा हो और कोई भी उसके आसपास से आया-गया हो, वह अपने मोबाइल के साथ ध्यान अवस्था में बीच बाजार में खड़े साधना कर रहा है।


भूपेन्द्र भारतीय 
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Saturday, December 10, 2022

ईवीएम की प्रचंड जीत....!!

 ईवीएम की प्रचंड जीत....!!

      



आखिर ईवीएम की प्रचंड जीत का सपना सच हो ही गया। उसने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास जीत ही लिया। इस बेचारी ईवीएम को क्या नहीं कहा गया ? उसे क्या-क्या नहीं सहना पड़ा ! विगत दो दशकों से उसे मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम किया जा रहा था। जिस तरह नयी नयी बहु के हर काम में मीनमेख निकाला जाता है विगत एक दशक से ईवीएम प्रताड़ित हो रही थी। आखिर उसके सास-ससुर लोकतंत्र की मेहरबानी उसपर भी हो ही गई और उसे जनतंत्र में जीत का स्वाद चखने का अवसर मिल गया। लंबी बदनामी के बाद ईवीएम को किसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप का सामना नहीं करना पड़ा।

इस बार के तीन राज्यों के चुनावी परिणामों से लोकतंत्र के तीनों स्तंभ भी चैन की साँस ले रहे है। लोकतंत्र भी इस बार बदनाम होने से बच गया। असहिष्णुता व ध्रुवीकरण जैसे राग दरबारी राग किसी टीवी बहस में सुनने को नहीं मिले। हर दल अपनी अपनी जीत में मगन है। मतदाता भी तन कर कह रहा है कि देखा कैसे सबको खुश कर दिया ! ‛भले बाद में ये तीनों मिलकर उसपर हँस रहे होगें।’ लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुत कम बार ऐसा हुआ कि मतदाताओं ने भी चमत्कार किया हो ओर वह भी लोकतांत्रिक पद्धति द्वारा।
 
   


लेकिन कुछ भी कहो इन चुनावों में ईवीएम की प्रचंड जीत तो हुई है। कुछ दलों द्वारा उसकी विश्वनीयता लंबे समय से संदिग्ध माना जा रही थी। जब से ईवीएम से चुनाव हो रहे है, हारने वाला अपनी हार का ठिकरा ईवीएम पर ही फोड़ता आ रहा है। पहली बार किसी भी पार्टी प्रवक्ता के मुँह से एक गलत शब्द ईवीएम के चरित्र पर नहीं निकला। ईवीएम लंबी उम्र के बाद अब चैन की साँस लेकर अपने आप पर गर्व कर सकती है। लगता है वह जवानी की दहलीज पर पहुंच गई है।
ऐसा ही चलता रहा तो हो सकता है कि आगे चलकर साहित्यिक व सहकारिता संगठनों के चुनाव भी ईवीएम से हो। पुरस्कारों का चयन भी ईवीएम के माध्यम से होना शुरू हो जाये और पुरस्कारों की रेवड़ी बटना बंद हो।

अब ईवीएम हमारे लोकतंत्र में सुरक्षित है। आगे किसी भी तरह के चुनाव करवाने के लिए वह प्रथम पसंद मानी जाऐगी। शहरों के महिला क्लबों के चुनाव के लिए भी अब ईवीएम पर भरोसा किया जा सकता है। कोई बड़ी बात नहीं कि आगे चलकर वर-वधु के जोड़े बनाने का भार भी ईवीएम के कंधों पर आ जाए।

ईवीएम अब सेटिंग का विषय नहीं रहेगी। उसे कोई शक की नजर से भी नहीं देखेगा। हर मतदाता पूरे आत्मविश्वास व बगैर किसी लघु-दीर्घ शंका के ईवीएम का बटन दबाने घर-घर से निकलेगा। लोकतंत्र की समृद्धि के लिए घर-घर से ज्यादा से ज्यादा मतदाता निकलेगें। ईवीएम के लिए कितना बड़ा गौरवमयी समय रहेगा।
अब तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वच्छता सूची में ईवीएम का नंबर भी स्वर्ण अक्षरों से लिखा जा सकता है। एग्जिट पोल वाले भी ईवीएम के परिणामों से खुश हैं। वैसे उन्होंने अपने सर्वे को ही श्रेष्ठ बताया और ब्रेकिंग न्यूज़ में यही धमाका करते रहे कि “हमारे चुनावी रूझानों ने ईवीएम की विश्वनीयता पर भी मोहर लगा दी है...!” किसी धाकड़ एंकर ने ईवीएम के परिणामों पर कोई पलटवार नहीं किया। सभी राजनीतिक दल भी खुशी-खुशी अपनी ही पार्टी द्वारा आर्डर किये लड्डू से अपना ही मुँह मीठा कर रहे हैं। ईवीएम की इस प्रचंड जीत पर लोकतंत्र में खुशी की लहर चल रही है। हो सकता है अगले गणतंत्र दिवस की परेड में लोकपथ पर ईवीएम की झांकी से सर्वदलीय खुशी देखी जा सकती हो। हो सकता है भारत के सबसे वयोवृद्ध राजनीतिक दल अपने अगले अध्यक्ष के चुनाव के लिए ईवीएम से ही मतदान करवाये। देखना यह है कि ईवीएम को मिली यह प्रचंड बहुमत वाली जीत कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगी और कबतक राजनीतिक लांछन से बच पाती है....!!



भूपेन्द्र भारतीय 
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हिंदू उत्ताराधिकार विधि पर पुनर्विचार हो....

हिंदू संस्कृति व समाज व्यवस्था में दो सबसे महत्वपूर्ण संस्था है पहली परिवार व दूसरी विवाह। पहला हिन्दू परिवार कब बना होगा यह अनंत व अनादि का...